<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086</id><updated>2012-02-16T12:14:58.012+05:30</updated><category term='फोटोस्केचर'/><category term='पेन्टर'/><category term='चक दे इंडिया'/><category term='स्केचर'/><category term='माइ नेम इज खान'/><category term='दोस्ती'/><category term='मित्रता दिवस'/><category term='सॉफ्टवेयर'/><title type='text'>अपनी बात</title><subtitle type='html'>आस पास कि परिस्थितियो, अनुभवो, माहौल को देखकर मन मे उत्पन भावो को शब्दो मे ढालने की असफल कोशिश।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>49</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8452412383104780931</id><published>2011-12-28T10:43:00.008+05:30</published><updated>2011-12-29T23:15:37.917+05:30</updated><title type='text'>सीमा के रिश्तों पर एक संवेदनशील फ़िल्म</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2005/02/20050216083025terrorist203.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 152px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2005/02/20050216083025terrorist203.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जीतू भाई जी के कहने पर लिटिल टैरोरिस्ट फिल्म देखी. फिल्म की अवधि कुल पन्द्रह मिनट की है. पन्द्रह मिनट में फिल्म खत्म हो जाती है, और हमारे जहन मे छोड़ जाती है ढेर सारे सवाल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटी फ़िल्म बड़ी बात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म की कहानी सीमा पर बसे दो गाँवों के जीवन पर आधारित है जिनके बीच संबंध सिर्फ़ तनाव के हैं. एक ओर राजस्थान का एक गाँव है और दूसरी ओर पाकिस्तान. सीमा पर कंटीली बाड़ लगी है, पाकिस्तान की तरफ वाले गाँव मे बच्चे क्रिकेट खेल रहे है, लेकिन गेंद बाड़ को कहाँ जानती समझती है. उछली और इस पार चली आई. गेंद को यह भी नहीं मालूम कि वहाँ बारुदी सुरंगें बिछी हुई हैं. एक बच्चा है. बमुश्किल दस साल का, नाम “जमाल”. उसने बाड़ के नीचे से थोड़ी सी रेत हटाई और एक देश की सीमा लाँघ कर दूसरे देश में आ गया लेकिन अचानक सायरन बजने लगे और गोलियाँ बरसने लगीं. अभी वो कुछ समझता कि क्या हो रहा है, चारो ओर से अचानक गोलियों की बौछार होने लगती है, बच्चा जान बचाकर भागता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेना के जवानो से बचते हुए उसे रास्ते में एक मास्टर जी मिलते है जो जवानो को गलत सूचना देकर उसे बचा लेते है. वह मास्टरजी के घर पनाह लेता है, जो काफी रहमदिल है, लेकिन मास्टरजी की भतीजी को इस बच्चे के घर आने पर एतराज है क्योंकि वो बच्चा एक मुसलमान है. मास्टरजी के घर में जमाल कुछ हक़ीक़तों से भी वाकिफ़ होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मास्टरजी बच्चे को घर मे शरण देते है और सेना से छुपाने के लिये गन्जा बनाकर चुटिया बना देते है, ताकि वो हिन्दु दिखे ‌और उसका नामकरण “जवाहर” करते है. फिल्म मे इन्सानी रिश्तो पर बेहतर तरीके से रोशनी डाली गयी है.मास्टर साहब की भतीजी का जमाल के प्रति नफरत कई तरह के शैड लिये हुए है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जो दीवार इनसानों ने खड़ी की है वो अक्सर इंसानियत पर भारी पड़ती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस ज़मीन पर जहाँ लोग रात-दिन 'पधारो म्हारो देस' गाते हैं वहीं एक कड़वी सच्चाई मुँह बाए खड़ी है. वो लड़की जिसे जमाल यानी जवाहर आपा कहता है उस मिट्टी के बर्तन को इसलिए तोड़ देती है क्योंकि उसमें एक मुसलमान ने खाना खाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ओर इंसानियत है और दूसरी ओर सामाजिक दायरा &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2005/02/20050216083034terrorist2203.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 152px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2005/02/20050216083034terrorist2203.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बाद मे मास्टर और उसकी भतीजी जमाल को सीमा पार छोड़ आते है, जाने से पहले बच्चा मास्टर और उसकी भतीजी से लिपट जाता है. जमाल अपने घर पहुँच चाता है.जहाँ उसकी माँ उसका बेसब्री से इन्तजार कर रही होती है, लेकिन उसके कटे बाल और चुटिया देखकर उसको मारती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बच्चा रोने के बजाय सीमा पर कंटीली बाड़ो को देखकर जोरदार तरीके से हँसता है, उसकी हँसी मे भय, आतंक, दर्द, तिरस्कार और विस्मय का अदभुत मिलाप है, निर्देशक ने इस सीन को बहुत अच्छे तरीके से फिल्माया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल 15 मिनट की इस फ़िल्म को देखकर ऐसा लगता नहीं कि इसमें एक भी दृश्य अतिरिक्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक छोटे से बच्चे के चेहरे पर भय, विस्मय और प्रेम सब कुछ इस तरह उभरता कि कुछ देर के लिए सिहरन पैदा हो जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म दोनों ओर की कुछ सामाजिक कुरीतियों को भी निशाना बनाती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8452412383104780931?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8452412383104780931/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8452412383104780931' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8452412383104780931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8452412383104780931'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/12/blog-post_28.html' title='सीमा के रिश्तों पर एक संवेदनशील फ़िल्म'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-1885777697129280845</id><published>2011-12-07T20:59:00.004+05:30</published><updated>2011-12-07T21:59:44.450+05:30</updated><title type='text'>फिल्म क्यों देखता हूँ</title><content type='html'>मै फिल्में क्यों देखता हूँ? मुझे अच्छा लगता है। अब आप पूछेगे क्यों अच्छा लगता है? अमा जैसे कि हम सभी लोग आक्सीजन, जल और हवा पर जीते हैं पर मन की खुराक कुछ और ही होती है। फिल्में मुझे भाती हैं। जब कभी मन खराब होता है तो यह मुझे गुदगुदाकर हंसा देती है, जब अकेला होता हूँ तो मेरा साथ देती हैं, जब मित्रो के साथ होता हूँ तो मजा दूगना कर देती है । जब से अपना आशियाना बदला है तब से शायद ही कोई फिल्म छोडी हो । आजकल तो हर नई फिल्म रिलीज होते ही एक या दो दिन में देख लेता हूँ । धन्यवाद देना चाहूँगा अपने मित्रों अजय, विकास और नितिन को जो मुझे कोई फिल्म छोड़ने नही देते है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै अक्सर यही सोचाता हूँ कि मुझे किस तरह की फिल्में पसंद हैं पर सचाई यही लगती है कि स्थितिजन्य कारणों से कोई फिल्म पसंद आती है और कोई नहीं, कई बार उद्देश्यपूर्ण सिनेमा पसंद आ जाता है तो कई बार बेसिरपैर का धमाल भा जाता है। शायद इसीलिये द डर्टी पिक्चर’ और 'राकस्टार' पसंद आई पर 'देशी-ब्वायज' नहीं, 'दमादम' अच्छी लगी पर 'रा-वन' नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्में देखना बचपन से ही पसंद है। बचपन में मोहल्ले के कुछ बड़े लडके उस समय वि सी आर पर फिल्म दिखाया करते थे, वो भी चन्दा एकत्रित करके।  हर घर से पाँच या दस रुपये लिए जाते थे। बड़े-बूढ़ों और स्त्रियों को एक धार्मिक फिल्म दीखा दी जाती थी और बाद में अपनी पसंद कि फिल्में देखी जाती थी । पूरी रात फिल्म देखते रहते। अगर निद भी आ रही होती तो मुँह दो लेते।  उस समय वि सी आर के सबसे नज़दीक बैठने की होड़ होती थी । वि सी आर का किराया 80 रूपये और कैसेट का 20 रूपये प्रती रात्रि शुल्क होता था । माह में एक बार इस तरह कि व्यवस्था कर ही दी जाती थी । कुछ समय बाद वि सी आर कि जगह सी डि प्लेयर ने ले ली। तब दोस्तों के यहा सी डि प्लेयर किराये पर लाकर फिल्में देखा करते थे। अपने खास मित्र नितिन के यहा तो काफी फिल्में देखी और इन्जाय करी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्में मुझे हर रूप में पसंद आती हैं, चाहे फेटासी, प्राइम प्रधान, हास्य हो या यथार्थ के नज़दीक। आजकल की फिल्मों में खास यह बात अच्छी लगती है कि तकनीक बढ़िया हुई है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-1885777697129280845?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/1885777697129280845/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=1885777697129280845' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/1885777697129280845'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/1885777697129280845'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html' title='फिल्म क्यों देखता हूँ'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-1040406241994234274</id><published>2011-12-04T10:07:00.004+05:30</published><updated>2011-12-04T12:13:06.941+05:30</updated><title type='text'>द डर्टी पिक्चर : फिल्म समीक्षा</title><content type='html'>इस शुक्रवार फिल्म देखी ‘द डर्टी पिक्चर’ अर्थात गंदी फिल्म । अमा गलत मत समझियेगा मुझे गंदी फिल्म वैसी वाली नही जैसे काल्रेज के दिनों में देखते थे। बहुत प्रचार-प्रसार हुआ था फिल्म कि रिलीज से पह्ले । कोई कुछ ये कह रहा था तो कोई वो कह रहा था । मै भी थोड़ा उत्सुक था कि देखें तो सही क्या है इस फिल्म में। वैसे भी हमारे भाई समान मित्र विकास जी* ने इस फिल्म को हमें दिखाने कि पूरी व्य्व्स्था कर रखी थी। वो बात अलग है कि एक दिन पहले मेरे अन्य मित्र अजय जी ने उनके The Twilight Saga: Breaking Dawn को नकार चुके थे। (*जी का प्रयोग महानता दर्शाने के लिये व्यक्त किया गया है)&lt;br /&gt;&lt;a href="http://cdn.fridayrelease.com/movies/smallthumb/2011/the-dirty-picture/poster.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 225px; height: 324px;" src="http://cdn.fridayrelease.com/movies/smallthumb/2011/the-dirty-picture/poster.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;आप लोगो को तो में अपने चिट्ठे (बालाग) में पहले ही बता  चूका हूँ कि विद्या बालन अपनी चहैती कटेग्री में आती थी वो बात अलग है कि समय के साथ साथ स्वाद भी बदलता रहता है। तो थोड़ा आप को फिल्म के बारे में बता दू ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव से भागकर मद्रास आई रेशमा(विद्या बालन) की ख्वाहिश है कि वह भी फिल्मों में काम करे। यह किसी भी सामान्य किशोरी की ख्वाहिश हो सकती है। फर्क यह है कि निरंतर छंटनी से रेशमा  की समझ में आ जाता है कि उसमें कुछ खास बात होनी चाहिए। जल्दी ही उसे पता चल जाता है कि पुरुषों की इस दुनिया में कामयाब होने के लिए उसके पास एक अस्त्र है.. उसकी अपनी देह। अभिनेत्री बनने के सपने को साकार करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इस एहसास के बाद वह हर शर्म तोड़ देती है। रेशमा  से सिल्क बनने में उसे समय नहीं लगता।  पुरुषों में अंतर्निहित तन और धन की लोलुपता को वह खूब समझती है। सफलता की सीढि़यां चढ़ती हुई फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टारडम की ऊंचाईयों पर पहुंचने के बाद सिल्क को सच्चे प्यार की तलाश है। उसे कई लोग मिलते भी हैं मगर सब धोखा दे जाते है। सबसे पहले उनके को स्टार सूर्यकांत(नसीरुद्दीन शाह) उनकी जिंदगी में आते हैं मगर उन्हें सिल्क नहीं बल्कि उसके जिस्म से प्यार है। इसके बाद स्क्रिप्ट राइटर रमाकांत(तुषार कपूर)भी उन्हें उन्हें धोखा देकर उनका दिल तोड़ देते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार में मिले धोखे से सिल्क एकदम टूट जाती है और उसका करियर भी ढलान पर आने लगता है। अंत में निर्देशक (इब्राहीम) इमरान हाशमी के रूप में उन्हें सच्चा प्यार जरुर मिलता है मगर तब तक वो पूरी तरह से टूट चुकी होती है और आत्मह्त्या का फेसला चुन चुकी होती है  ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म की कहानी को इसका संगीत और दिलचस्प बनाता है। उह ला ला... और इश्क सूफियाना... जैसे गाने पहले ही जबरदस्त लोकप्रिय हो चुके हैं। उह ला ला... तो मेरा पेवरेट गाना बना हुआ है । इश्क सूफियाना अनावश्यक और ठूंसा हुआ लगता है पर चलाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्यों देखें:&lt;/strong&gt;सिल्क बनी विद्या की जबरदस्त अभिनय प्रतिभा और इस वीकेंड में अगर एक विशुद्ध मनोरंजक फिल्म देखने की इच्छा रखते हैं तो 'डर्टी पिक्चर' जरूर देखिएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्यों न देखें:&lt;/strong&gt;  परिवार के साथ देखने लायक नही, दोहरे अर्थ वाले संवाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दोनों मित्रों ने तो 'डर्टी पिक्चर' को पाँच में से 2 अंक दिये है पर मेरे हिसाब से 3 अंक तो बनते है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-1040406241994234274?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/1040406241994234274/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=1040406241994234274' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/1040406241994234274'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/1040406241994234274'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='द डर्टी पिक्चर : फिल्म समीक्षा'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7920927003438296402</id><published>2011-11-28T13:23:00.008+05:30</published><updated>2011-12-01T08:15:11.480+05:30</updated><title type='text'>ऐसे अनपढ़ चाहिये उत्तराखंड को</title><content type='html'>एक आंदोलन, जिसने विश्वव्यापी पटल पर धूम मचाई। पर्वतीय लोगों की मंशा और इच्छाशक्ति का आयाम बना। विश्व के लोगों ने अनुसरण किया, लेकिन अपने ही लोगों ने भुला दिया। एक क्रांतिकारी घटना, जिसकी याद में देश भर में चरचा, गोष्ठियां और सम्मेलन आयोजित होने चाहिए थे, अफसोस! किसी को सुध तक नहीं रही। हम बात कर रहे हैं विश्वविख्यात 'चिपको आंदोलन ’ की। 'पहले हमें काटो, फिर जंगल ’ के नारे के साथ 26 मार्च, 1974 को शुरू हुआ यह आंदोलन उस वक्त जनमानस की आवाज बन गया था। आंदोलन की सफलता अपनी परिणति पर पहुंची और सैकड़ों-हजारों पेड़ कटने से बच गए। लेकिन आज सवाल यह खड़ा होता है, क्या अब सब कुछ सुधर गया है? क्या हमें अब पेड़ों की जरूरत नहीं? या एक बार आंदोलित होने के बाद हम चैन की बंशी बजा रहे हैं। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-x5GTwEStt_U/TtNQkEWZa7I/AAAAAAAAAGU/5jnnR33Iy5U/s1600/gauradevi02.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 158px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-x5GTwEStt_U/TtNQkEWZa7I/AAAAAAAAAGU/5jnnR33Iy5U/s200/gauradevi02.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5679972135617522610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व प्रसिद्ध चिपको आन्दोलन के बारे में सभी जानते हैं लेकिन इस आन्दोलन की जननी गौरा देवी को कम ही लोग जानते हैं। लेकिन आज जब विकास के नाम पर पर्वतीय राज्य की रूपरेखा को एक आयाम देकर उत्तराखंड राज्य का गठन कर दिया गया, तब यहीं के लोग इसे भूल गए। कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को अगर छोड़ दिया जाए तो न ही आम आदमी को इसकी जानकारी है और न ही सरकार के नुमाइंदों को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिपको की महिलाओं को और गौरा देवी को पढ़े-लिखे लोग ‘अनपढ़’ कहते हैं। यह कोई नहीं बताता कि पढ़े-लिखे होने का क्या अभिप्राय है ? क्या स्कूल न जा पाने के कारण वे ‘अनपढ़’ कहलाएँ ? क्या अपने परिवेश को समझ चुकीं और उसकी सुरक्षा हेतु प्रतिरोध की अनिवार्यता सिद्व कर चुकीं महिलाएँ किसी मायने में अनपढ़ हैं ? क्या वे स्कूल-कालेजों की पढ़ी होतीं तो ऐसे निर्णय लेतीं ? देवी की बात करते हुए कोई उन सच्चाइयों को नहीं देखता जो स्वतः दिखाई देती हैं और जिनसे उनका कद और ऊँचा हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए आपको मै इसकी पृष्ठभूमि के बारे में अवगत कराता हूँ , जहां से शुरू हुई थी एक मुहिम, जिसने देखते ही देखते न सिर्फ विश्वव्यापी रूप धारण कर लिया बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में एक तूफान खड़ा कर दिया। हमेशा नमन की हकदार रहेगी वह महिला गौरा देवी जिसने इस मुहिम को न सिर्फ शुरू किया, बल्कि इसे इसके मुकाम तक पहुंचाया। 1925 में जोशीमठ से करीब 24 किलोमीटर नीती घाटी के लाता गांव के एक जनजातीय परिवार में जन्मी गौरा देवी का अपना जीवन खुद एक संघर्ष की गाथा है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.apnauttarakhand.com/wp-content/uploads/Gaura-devi-during-aaa-84-300x268.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 268px;" src="http://www.apnauttarakhand.com/wp-content/uploads/Gaura-devi-during-aaa-84-300x268.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;12 साल की उम्र में विवाह, 19 साल की उम्र में एक पुत्र को जन्म और 22 साल की उम्र में पति का स्वर्गवास। । सिर्फ 10 साल का वैवाहिक जीवन रहा उनका! एक पहाड़ी विधवा के सारे संकट उन्हें झेलने पड़े पर इन्हीं संकटों ने उनके भीतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित की। दुखों का पहाड़ झेलते हुए अशिक्षित होने के बावजूद इस महिला ने कभी हार नहीं मानी और अपने जीवन को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां आज उसे पूरा विश्व सम्मान की नजर से देखता है।&lt;br /&gt;गौरा देवी ने ससुराल में रह्कर छोटे बच्चे की परवरिश, वृद्ध सास-ससुर की सेवा और खेती-बाड़ी, कारोबार के लिये अत्यन्त कष्टों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने पुत्र को स्वालम्बी बनाया, उन दिनों भारत-तिब्बत व्यापार हुआ करता था, गौरा देवी ने उसके जरिये भी अपनी आजीविका का निर्वाह किया। १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बन्द हो गया तो चन्द्र सिंह ने ठेकेदारी, ऊनी कारोबार और मजदूरी द्वारा आजीविका चलाई, इससे गौरा देवी आश्वस्त हुई और खाली समय में वह गांव के लोगों के सुख-दुःख में सहभागी होने लगीं। इसी बीच अलकनन्दा में १९७० में प्रलंयकारी बाढ़ आई, जिससे यहां के लोगों में बाढ़ के कारण और उसके उपाय के प्रति जागरुकता बनी और इस कार्य के लिये प्रख्यात पर्यावरणविद श्री चण्डी प्रसा भट्ट ने पहल की। भारत-चीन युद्ध के बाद भारत सरकार को चमोली की सुध आई और यहां पर सैनिकों के लिये सुगम मार्ग बनाने के लिये पेड़ों का कटान शुरु हुआ। जिससे बाढ़ से प्रभावित लोगों में संवेदनशील पहाड़ों के प्रति चेतना जागी। इसी चेतना का प्रतिफल था, हर गांव में महिला मंगल दलों की स्थापना, १९७२ में गौरा देवी जी को रैंणी गांव की महिला मंगल दल का अध्यक्ष चुना गया। इसी दौरान वह चण्डी प्रसा भट्ट, गोबिन्द सिंह रावत, वासवानन्द नौटियाल और हयात सिंह जैसे समाजिक कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आईं। जनवरी १९७४ में रैंणी गांव के २४५१ पेड़ों का छपान हुआ। २३ मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों का कटान किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ, जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया। प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि २६ मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिये सभी को चमोली आना था। इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिये ठेकेदारों को निर्देशित कर दिया कि २६ मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को वार्ता के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जायेगा और आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://tarangbharat.com/tarangbharat/images/chipko%201.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 118px; height: 166px;" src="http://tarangbharat.com/tarangbharat/images/chipko%201.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इसी योजना पर अमल करते हुये श्रमिक रैंणी की ओर चल पड़े और रैंणी से पहले ही उतर कर ऋषिगंगा के किनारे रागा होते हुये रैंणी के देवदार के जंगलों को काटने के लिये चल पड़े। इस हलचल को एक लड़की द्वारा देख लिया गया और उसने तुरंत इससे गौरा देवी को अवगत कराया। पारिवारिक संकट झेलने वाली गौरा देवी पर आज एक सामूहिक उत्तरदायित्व आ पड़ा। गांव में उपस्थित २१ महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ी। इनमें बती देवी, महादेवी, भूसी देवी, नृत्यी देवी, लीलामती, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, पासा देवी, रुक्का देवी, रुपसा देवी, तिलाड़ी देवी, इन्द्रा देवी शामिल थीं। इनका नेतृत्व कर रही थी, गौरा देवी, इन्होंने खाना बना रहे मजदूरो से कहा”भाइयो, यह जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी-फल, और लकड़ी मिलती है, जंगल काटोगे तो बाढ़ आयेगी, हमारे बगड़ बह जायेंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द आ जायेंगे तो फैसला होगा।” ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे, उन्हें बाधा डालने में गिरफ्तार करने की भी धमकी दी, लेकिन यह महिलायें नहीं डरी। ठेकेदार ने बन्दूक निकालकर इन्हें धमकाना चाहा तो गौरा देवी ने अपनी छाती तानकर गरजते हुये कहा “मारो गोली और काट लो हमारा मायका” इस पर मजदूर सहम गये। गौरा देवी के अदम्य साहस से इन महिलाओं में भी शक्ति का संचार हुआ और महिलायें पेड़ों के चिपक गई और कहा कि हमारे साथ इन पेड़ों को भी काट लो। ऋषिगंगा के तट पर नाले पर बना सीमेण्ट का एक पुल भी महिलाओं ने तोड़ डाला, जंगल के सभी मार्गों पर महिलायें तैतात हो गई। ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को डराने-धमकाने का प्रयास किया, यहां तक कि उनके ऊपर थूक तक दिया गया। लेकिन गौरा देवी ने नियंत्रण नहीं खोया और पूरी इच्छा शक्ति के साथ अपना विरोध जारी रखा। इससे मजदूर और ठेकेदार वापस चले गये, इन महिलाओं का मायका बच गया। इस आन्दोलन ने सरकार के साथ-साथ वन प्रेमियों और वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। सरकार को इस हेतु डा० वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया। जांच के बाद पाया गया कि रैंणी के जंगल के साथ ही अलकनन्दा में बांई ओर मिलने वाली समस्त नदियों ऋषि गंगा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, विरही और नन्दाकिनी के जल ग्रहण क्षेत्रों और कुवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा पर्यावरणीय दृष्टि से बहुत आवश्यक है। इस प्रकार से पर्यावरण के प्रति अतुलित प्रेम का प्रदर्शन करने और उसकी रक्षा के लिये अपनी जान को भी ताक पर रखकर गौरा देवी ने जो अनुकरणीय कार्य किया, उसने उन्हें रैंणी गांव की गौरा देवी से चिपको वूमेन फ्राम इण्डिया बना दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमती गौरा देवी पेड़ों के कटान को रोकने के साथ ही वृक्षारोपण के कार्यों में भी संलग्न रहीं, उन्होंने ऐसे कई कार्यक्रमों का नेतृत्व किया। आकाशवाणी नजीबाबाद के ग्रामीण कार्यक्रमों की सलाहकार समिति की भी वह सदस्य थी। सीमित ग्रामीण दायरे में जीवन यापन करने के बावजूद भी वह दूर की समझ रखती थीं। उनके विचार जनहितकारी हैं, जिसमें पर्यावरण की रक्षा का भाव निहित था, नारी उत्थान और सामाजिक जागरण के प्रति उनकी विशेष रुचि थी। श्रीमती गौरा देवी जंगलों से अपना रिश्ता बताते हुये कहतीं थीं कि “जंगल हमारे मैत (मायका) हैं” उन्हें दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल की तीस महिला मंगल दल की अध्यक्षाओं के साथ भारत सरकार ने वृक्षों की रक्षा के लिये 1986 में प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया। जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा प्रदान किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरा देवी ने ही अपने अदम्य साहस और दूरदर्शिता से चिपको आन्दोलन का सूत्रपात किया था। हालांकि उन्हें परे कर अनेक लोगों ने इस आन्दोलन को हाईजैक कर अनेकों पुरस्कार बटोरे। लेकिन हमारी नजर में चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी ही हैं। इस महान व्यक्तित्व का निधन 4 जुलाई, 1991 को हुआ, यद्यपि आज गौरा देवी इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उत्तराखण्ड ही हर महिला में वह अपने विचारों से विद्यमान हैं। हिमपुत्री की वनों की रक्षा की ललकार ने यह साबित कर दिया कि संगठित होकर महिलायें किसी भी कार्य को करने में सक्षम हो सकती है। जिसका ज्वलंत उदाहरण है चिपको आन्दोलन को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त होना है। चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी आज विश्वभर के पर्यावरण वैज्ञानिकों के बीच ‘चिपको वुमेन फ्राम इण्डिया’ के नाम से विख्यात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरा देवी और साथियों के संघर्ष का ही परिणाम था जो 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बना और केंद्र सरकार को पर्यावरण मंत्रालय का गठन करना पड़ा। आज जब पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहा है। भविष्य में इसके खतरे पूरी पृथ्वी को लील लेना चाहते हैं, ऐसे में हमें जरूरत है फिर से एक चिपको आंदोलन की। हम अल्प समय के लिए मिलने वाली सुविधाओं के लिए प्रकृति से खिलवाड़ नहीं कर सकते। आज नहीं तो कल हमें इसके भयंकर दुष्परिणाम भुगतने होंगे। अगर हम आज नहीं चेते तो कल इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभार : विभिन्न चिटटा जगत, मीडिया नारद, अपना उत्तराखंड&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7920927003438296402?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7920927003438296402/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7920927003438296402' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7920927003438296402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7920927003438296402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='ऐसे अनपढ़ चाहिये उत्तराखंड को'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-x5GTwEStt_U/TtNQkEWZa7I/AAAAAAAAAGU/5jnnR33Iy5U/s72-c/gauradevi02.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-353984018437959380</id><published>2011-07-10T09:40:00.000+05:30</published><updated>2011-07-10T09:58:50.090+05:30</updated><title type='text'>लोग रूठ जाते हैं मुझसे</title><content type='html'>इन्टरनेट के मायाजाल मे उल-जलुल हरकते करते करते एक मज़ेदार शायरी मिली, सोचा आप लोगो मे भी बाटा जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग रूठ जाते हैं मुझसे&lt;br /&gt;और मुझे मनाना नहीं आता,&lt;br /&gt;मैं चाहता हूँ क्या&lt;br /&gt;मुझे जताना नहीं आता,&lt;br /&gt;आँसुओं को पीना पुरानी आदत है&lt;br /&gt;मुझे आंसू बहाना नहीं आता,&lt;br /&gt;लोग कहते हैं मेरा दिल है पत्थर का&lt;br /&gt;इसलिए इसको पिघलाना नहीं आता,&lt;br /&gt;अब क्या कहूँ मैं&lt;br /&gt;क्या आता है, क्या नहीं आता,&lt;br /&gt;बस मुझे मौसम की तरह&lt;br /&gt;बदलना नहीं आता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहिए कैसी लगी, एक एक शब्द मेरे तो दिल मे लग गया, क्या दर्द है, शायर महोदय का तो पता नही चल पाया आप को पता लगे तो मुझे भी बतलाईएगा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-353984018437959380?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/353984018437959380/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=353984018437959380' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/353984018437959380'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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/&gt;आज वी-डे है, प्यार का अनमोल दिन, मेरे लिए आवश्यक है की इस विषय में भी कुछ लिखूं, चलिए अपने परदेश यानी उत्तराखंड में प्रचलित एक प्रेमगाथा के बारे में बताता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहानी कोई हज़ार साल पुरानी है, कुमांऊं के पहले राजवंश कत्‍यूर के किसी वंशज को लेकर यह कहानी है, उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्‍होंने कई मनौतियां मनाई। अन्‍त में उन्‍हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्‍हें संतान की प्राप्‍ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्‍यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे।  दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड्का और लड्की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया।  समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्‍दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्‍य सबको अपनी ओर खींचता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि “हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवे दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा।”  राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया।  लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे….राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लड़की को रंगीली वैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा। &lt;br /&gt;एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;” मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी?&lt;br /&gt;पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा?&lt;br /&gt;देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी मां ने उत्तर दिया ” दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि ” हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया।  लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि ” हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।”   यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोड़कर? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने।  रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोला ’दे माई भिक्षा!’ तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ’ले जोगी भिक्षा’ पर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि ’मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखता’ तो राजुला ने कहा कि ’मैं सुनपति शौका की लड़की राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या है’ तो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा ’चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था’। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि ’हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया’। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि ’ मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर वैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि ’मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोड़्कर जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहानी शताब्दियों पुरानी है, पर पीड़ी दर पीड़ी यह कहानी आगे बड़ रही है, और सच ही कहा सच्चा प्यार कभी मरता नही है, हमेशा के लिए अमर हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभार : &lt;a href="http://www.merapahad.com/rajula-malushahi-immortal-love-story-of-uttarakhand/"&gt;मेरा पहाड़ (Mera Pahad)&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-3820863662843718690?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/3820863662843718690/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=3820863662843718690' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/3820863662843718690'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/3820863662843718690'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/02/blog-post_14.html' title='राजुला मालुशाही: एक अमर प्रेम कथा'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8842126018998002088</id><published>2011-02-12T18:15:00.014+05:30</published><updated>2011-02-13T12:22:48.216+05:30</updated><title type='text'>कुमाऊं के देवी-देवता</title><content type='html'>उत्तर में उत्तुंग हिमाच्छादित नन्दादेवी, नन्दाकोट, त्रिशूल की सुरम्य पर्वत मालाएं हैं। पूर्व में पशुपति नाथ का सुन्दर नेपाल है। पश्चिम में तीर्थों का लीडर भव्य गढ़वाल है। दक्षिण में टनकपुर, हल्द्वानी, रामनगर की (पीलीभीत) जरखेज तराई की धरती है। यही उत्तराखंड की एक कमिश्नरी है कुमाऊं। इसकी वादियों में बहती है कलकल-छलछल करती तीव्र गति में बहुत-सी नदियां। यहां 50 हजार से पांच लाख साल पुराने शैलाश्रयों के आदिम मानव सभ्यता के अवशेष इतिहासकार बताते हैं। पं. बद्रीदत्त पांडे जी ने ई.पू. 2500 से 700वी ई. तक कत्यूरों का राज बताया है। आदि शंकराचार्च ने सातवीं शताब्दी में सूर्यवंशी राज्य का अभिषेक किया था। इससे पहले यहां बौद्ध धर्म था। वेे बाद में कत्यूरी कहलाए। राहुल सांकृत्यायन 850 से 1060 तक कत्यूरी राज मानते हैं। चंदों ने 1200 से 1700 तक राज किया। 1729-43 तक रूहेलों के निरंतर आक्रमणों से कुमाऊं त्रस्त था। 1790 से 1815 तक गोरखा कुराज रहा। उसके बाद अंग्रेजी राज में मिला लिया गया था। 1857 के विद्रोह के कई सेनानी यहां पहुंचे थे। जंगे आजादी की खूब हलचल थी। कुमाऊं नाम की कई कथाएं हैं। कूर्माकार होना ही कुमाऊं माना जाता हैं। स्कंध पुराण में इसका वर्णन है। कवि चन्दवरदाई के पृथ्वीराज रासो में लिखा है—&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://dainiktribuneonline.com/wp-content/uploads/2011/02/goll.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 256px; height: 192px;" src="http://dainiktribuneonline.com/wp-content/uploads/2011/02/goll.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘सवलष्प उत्तर सयल, कुमऊं गढ़ दुरंग।&lt;br /&gt;राजतराज कुमोदमणि हय गय द्रिब्ब अभंग।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुमाऊंनी संस्कृत, अप्रभंश, दरद-खास-पैशाची, सौर सेनी से बनी, तथा इसमें नेपाली, गढ़वाली, बंगला शब्दों की भरमार है। 1105 से कुमाऊंनी का रूप-लय ढलने लगा था। कुमाऊंनी बोलने वालों की संख्या 15 लाख बताई गयी है। कुमाऊं की अपनी संस्कृति, अपनी बोली, अपनी एक विशिष्ट जीवनचर्या है, पहचान है। वैदिक धर्म ही कालांतर में हिंदू धर्म बना। प्रारम्भ से ही हिंदू धर्म में बहु-ईश्वरवाद है। कुमाऊं में हिंदू देवता तो हैं ही साथ में स्थानीय देवी-देवता भी हैं जिनमें अधिकतर जागर प्रधान हैं। यह उनके वीरों, पूर्वजों के स्मरण की एक प्रणाली है। इन पर गहन आस्था है, साथ में एक सामाजिक न्याय प्रणाली और संकट मोचक देव-देवी बन गए हैं। कस्बों में बहुधर्मी समाज है, जबकि गांवों में ब्राह्मण-राजपूत प्रधान हैं। तीसरे स्थान पर दलित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊंचे-ऊंचे शिखरों पर देवी के थान (मंदिर) हैं। नदी-नालों के किनारे शिवालय हैं। सत्य नारायण कथा के शंख-घंटियां सभी घरों में बजती हैं। पार्वती, भगवती, (देवी) सरस्वती, लक्ष्मी पूजन आम हैं। ब्रह्मा-विष्णु, महेश देव सबके हैं। कुमाऊं के स्थानीय देवताओं की एक लम्बी फेहरिस्त है। वे अधिकतर जागर प्रधान हैं। एक होता है जगरिया। वह एक लयबद्ध कथा से बाजों द्वारा डंगरियां (वह व्यक्ति जिसके शरीर में देव प्रविष्ठï होता है) नचाता है। वह पूजा लेता है। न्याय देता है। खुश होता है। संरक्षण करता है। ये हैं कुमाऊं के देवी-देवता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भूमिया &lt;/span&gt;: हर गांव में भूमिया का मंदिर है। रबी-खरीफ की फसल कटने के बाद भूमिया देवता पूजे जाते हैं। सामूहिक शेयर से पूवे पकाए जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;देवी&lt;/span&gt; : दुर्गा, भगवती कई नामों के मंदिर हैं। उनमें भंडारे होते हैं।  कत्यूरी वंश की ऐतिहासिक वीरांगना जियारानी रानीबाग चित्रशिला पर हर मकर संक्रांति (उत्तरायणी) पर जागरों द्वारा पूजी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://img1.photographersdirect.com/img/16153/wm/pd621920.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 164px;" src="http://img1.photographersdirect.com/img/16153/wm/pd621920.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गोलू :&lt;/span&gt; राजा झालराई की सात रानियां होने पर भी वह नि:संतान थे। संतान प्राप्ति की आस में राजा द्वारा काशी के सिद्ध बाबा से भैरव यज्ञ करवाया और सपने में उन्हें गौर भैरव ने दर्शन दिए और कहा राजन अब आप आठवां विवाह करो में उसी रानी के गर्भ से आपके पुत्र रूप में जन्म लूंगा। इस प्रकार राजा ने आठवां विवाह कालिंका से रचाया। मगर इससे सातों रानियों में कालिंका को लेकर ईष्या उत्पन्न हो गई। कालिंका का गर्भवती होना सातों रानियों के लिए असहनीय हो गया। तब तीनों रानियों ने ईष्या के चलते षडयंत्र रचते हुए कालिंका को बताया कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए माता से पैदा होने वाले शिशु की सूरत सात दिनों तक नहीं देखनी पड़ेगी। यह सुनकर वंश की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कालिंका तैयार हो गई। कालिंका को कोठरी में कर दिया गया। प्रसव पीड़ा होते ही उसकी आंखों में काली पट्टी बांध दी गई। सातों रानियों ने नवजात शिशु को हटाकर उसकी जगह सिलबट्टंा रख दिया गया। फिर उसे बताया कि उसने सिलबट्टे को जन्म दिया है। सातों रानियां नवजात शिशु को मारने की व्यवस्था करने लगी। सर्वप्रथम उन्होंने बालक को गौशाला में फेंककर यह सोचा की बालक जानवरों के पैर तले कुचलकर मर जाएगा। मगर देखा कि गाय घुटने टेक कर शिशु के मुंह में अपना थन डाले हुए दूध पिला रही है। अनेक कोशिशों के बाद भी बालक नहीं मरा तो रानियों ने उसे संदूक में डालकर काली नदी में फेंक दिया। मगर ईश्वरी चमत्कार से संदूक तैरता हुआ गौरी घाट तक पहुंच गया। जहां वह भाना नामक मछुवारे के जाल में फंस गया। संदूक में मिले बालक को लेकर नि:संतान मछुवारा अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे घर ले गया। गौरी घाट में मिलने के कारण उसने बालक का नाम गोरिया रख दिया। बालक जब कुछ बड़ा हुआ तो उसने मछुवारे से घोड़ा लेने की जिद की। गरीब मछुवारे के लिए घोड़ा खरीद पाना मुश्किल था, उसने बालक की जिद पर उसे लकड़ी का घोड़ा बनाकर दे दिया। बालक घोड़ा पाकर अति प्रसन्न हुआ। बालक जब घोड़े पर बैठा तो वह घोड़ा सरपट दौड़ने लगा। यह दृश्य देख गांव वाले चकित रह गए। एक दिन काठ के घोड़े पर चढकर वह धोली धूमाकोट नामक स्थान पर जा पहुंचा, जहां सातों रानियां राजघाट से पानी भर रही थीं। वह रानियों से बोला पहले उसका घोड़ा पानी पियेगा, बाद में आप लोग पानी भरना। यह सुनकर रानियां हंसने लगी और बोली अरे मूर्ख जा बेकार की बातें मतकर कहीं कांठ का घोड़ा भी पानी पीता है। बालक बोला जब स्त्री के गर्भ से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो कांठ का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता। यह सुनकर सातों रानियां घबरा गई। सातों रानियों ने यह बात राजा से कहीं। राजा द्वारा बालक को बुलाकर सच्चाई जानना चाही तो बालक ने सातों रानियों द्वारा उनकी माता कालिंका के साथ रचे गये षडयंत्र की कहानी सुनायी। तब राजा झालराई ने उस बालक से अपना पुत्र होने का प्रमाण मागा। इस पर बालक गोरिया ने कहा कि यदि मैं माता कालिंका का पुत्र हूं तो इसी पल मेरे माता के वक्ष से दूध की धारा निकलकर मेरे मुंह में चली जाएगी और ऐसा ही हुआ। राजा ने बालक को गले लगा लिया और राजपाठ सौंप दिया। इसके बाद वह राजा बनकर जगह-जगह न्याय सभाएं लगाकर प्रजा को न्याय दिलाते रहे। न्याय देवता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद वह अलोप हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोलज्यू का मूल स्थान चम्पावत माना जाता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार उन्हे घोड़ाखाल में स्थापित करने का श्रेय महरागांव की एक महिला को माना जाता है। यह महिला वर्षो पूर्व अपने परिजनों द्वारा सतायी जाती रही। उसने चम्पावत अपने मायके जाकर गोलज्यू से न्याय हेतु साथ चलने की प्रार्थना की। गोलज्यू उसके साथ यहां पहुंचे। मान्यता है कि सच्चे मन से मनौती मांगने जो भी घोड़ाखाल पहुंचते हैं गोलज्यू उसकी मनौती पूर्ण करते हैं। न्याय के देवता के रूप पूजे जाने वाले गोलज्यू पर आस्था रखने वाले उनके अनुयायी न्याय की आस लेकर मंदिर में अर्जियां टांग जाते हैं। जिसका प्रमाण मंदिर में टंगी हजारों अर्जियां हैं। न्याय की प्राप्ति होने पर वह घंटियां चढ़ाना नहीं भूलते। जिसके चलते घोड़ाखाल का गोलू मंदिर पर्यटकों के बीच घंटियों वाले मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो चला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गणनाथ&lt;/span&gt; : डोटी के राजा भवैचन्द का पुत्र था। नाथ पंथ में दीक्षित था। उसने भाना के घर अलख जगाई। भाना गर्भवती हुई। जोशियों ने रंगेहाथ पकड़ा, गणनाथ के साथ गर्भवती भाना की हत्या कर दी। तीसरे दिन जीवित होकर झकरूआ समेत गणनाथ, भाना, बरमीबाला ने जोशी खोला में उत्पात मचा दिया। क्षमा याचना पर जोशियों के घर के ऊपर पूजा पाने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भोलनाथ :&lt;/span&gt; भोलनाथ राजा उदयचन्द के बड़े बेटे थे। निर्वासित थे। छोटे पुत्र ज्ञानचंद का राज्याभिषेक किया। एक बार भोलनाथ साधू वेश में अल्मोड़ा में पोखर किनारे ठहरे। ज्ञानचंद को जानकारी मिली। उसने गद्दी जाने के भय से छल से भोलनाथ और गर्भवती स्त्री की हत्या करवा दी। वे भूत बनकर सताने लगे। उनकी पूजा हुई। तब शांति मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मलैनाथ&lt;/span&gt; : डोटी के आभालिंग का पुत्र था। मलैनाथ के फाग गए जाते है। जैसा की बंगा, अस्कोट, देवचूला, पंचमई, डिडीहाट में मलैनाथ के मंदिर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हरू&lt;/span&gt; : परोपकारी देवता हैं। सुख, संपदा, धन धान्य सूचक हैं। हरू काली नाग देवी का ज्येष्ठ पुत्र था। चम्पावत का राजा बना। एक दिन राज त्याग साधू हो गया। छिपलाकोट की रानी को वरण करने गया, कैद हो गया। छोटे भाई सैम और भांजा ग्वेल ने मुक्त कराया। भाटकोट आदि में मंदिर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सैम&lt;/span&gt; : कालीनारा के हरू का छोटा भाई था। हरू की भांति सुख-समृद्धि के देव हैं। हरू सैम के फाग गए जाते हैं। ग्वेल धूनी के जागरों में पूजा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कलबिष्ट&lt;/span&gt; : केशव कोट्यूडी का बेटा था। पाटिया गांव कोट्यूडा कोट में रहता था। राजपूत था। बिनसर में गायें चराता था। छलपूर्वक लखडय़ोड़ी ने मार डाला। लोगों की मदद करता है। बिनसर, पाली पछाऊं में पूजा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चौमू, बधाण, नौलदानू&lt;/span&gt; : ये पशुओं के देवता हैं। चौमू रियुणी, द्वारसों में पूजा जाता है। बधाण गाय भैसों के जनने के 5वें, 7वें या 11वें दिन पूजा जाता है। उसके बाद दूध देवताओं में चढ़ाने काबिल होता है। नौलदानू का किसी दुधैल पेड़ की जड़ में वास माना जाता है।&lt;br /&gt;भागलिंग, हुंस्कर, बालचिन, कालचिन, छुरमल, बजैण : डोटी में पूजनीय हैं। नेपाल से आया देवता है। बालचिन हुंस्कर का बेटा है। डूंगरा, डांगटी, तामाकोट, जोहार में पूजा जाता है। कालचिन कालिंग का पुत्र था। छुरमल कालचिन का बेटा था। बजैण भनार में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नारसिंह&lt;/span&gt; : ये पैराणिक कथा नृसिंह हैं। स्थानीय देव के रूप में भी पूजा जाता है। आदि व्याधि, संकट दूर करने वाला जोगी देवता है। जागर में आता है। पत्र पुष्प से प्रसन्न हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कलुवा&lt;/span&gt; : हलराय का पुत्र था। इसकी उत्पत्ति सिलबट्टे से बताई जाती है। गड्देवी के जागर में कलुवा भी आता है। थान में खिचड़ी पकती है। मुर्गे की बलि चढ़ती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सिदुवा-विदुवा&lt;/span&gt; : ये वीर और तांत्रिक थे। गड़देवी के धरम-भाई माने जाते हैं। देवी आपदाओं से रक्षा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गढ़देवी &lt;/span&gt;: गाड़-गधेरों में वास करने वाले महाशक्ति गड़देवी काली मां दुर्गा का स्थानीय रूप है। गड़देवी के कानों बात डाली जाती है। उसके साथ परियां आचरियां रहती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नन्दा देवी&lt;/span&gt; : &lt;br /&gt;नंदा देवी समूचे कुमाऊं मंडल,गढ़वाल मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं । नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं । रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है । भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है । नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है । भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं । शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है । शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं । अनेक स्थानों पर नंदा के सम्मान में मेलों के रुप में समारोह आयोजित होते हैं । नंदाष्टमी को कोट की माई का मेला और नैतीताल में नंदादेवी मेला अपनी सम्पन्न लोक विरासत के कारण कुछ अलग ही छटा लिये होते हैं परन्तु अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिकता नंदादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.ghughuti.com/file/sns_uploads/662/images/RJ1.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 196px; height: 136px;" src="http://www.ghughuti.com/file/sns_uploads/662/images/RJ1.JPG" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बारह काली हाटकाली &lt;/span&gt;: कालिका के रूप में देवीधुरा में पूजी जाती हैं। हाट काली गंगोलीहाट में। कोट की कोटगाड़ी-थल के निकट मंदिर हैं। यहा प्राय: बलि चढ़ती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एड़ी&lt;/span&gt; : कोई राजपूत मर कर भूत बना। उसके साथ बकरी, परियां, हाथी, कुत्ते चलते हैं। शिखरों में रहते हैं। पांव पीछे को होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मसाण, खबीस और रूनिया&lt;/span&gt; : ये श्मशान के भूत हैं। अतृप्त आत्माएं हैं। कमजोर व्यक्तियों पर चिपटते हैं। बलि द्वारा संतुष्ट होते हैं। पीर फकीर के रूप में भी आने लगे हैं।&lt;br /&gt;आजकल जागरी का काम बड़ा महंगा हो गया है। अधिकतर देवी-देवता शोक गाथाओं पर आधारित हैं। जिनके साथ अन्याय, अत्याचार हुआ, वे स्थानीय देव बन गए। कालान्तर में न्याय, सुख, समृद्धि, शांति, खुशी के देवी-देवता बन गए। चप्पे-चप्पे पर देवों का वास है। इसलिए सारे उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos.travellerspoint.com/41779/Nainital%20Mosque.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://photos.travellerspoint.com/41779/Nainital%20Mosque.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_zTqIoHQeTQ4/TA_NUI6ok-I/AAAAAAAADIo/dHovj07TQjQ/s320/DSC_0194.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_zTqIoHQeTQ4/TA_NUI6ok-I/AAAAAAAADIo/dHovj07TQjQ/s320/DSC_0194.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्य : नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा में भव्य पुराने चर्च हैं जो अंग्रेजों ने निर्मित किए थे। ईसाई इसमें प्रार्थना करते हैं। रामनगर, हल्द्वानी, टनकपुर, रानीखेत, नैनीताल, अल्मोड़ा में मस्जिदें हैं। यद्यपि ईसाई और मुसलमान बहुत कम हैं। सारे देवी-देवताओं का जमावड़ा उत्तराखंड में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हमुंकै बड़ी प्यारी लागी, कुर्माचलै भूमि।&lt;br /&gt;दुनी है बड़ी न्यारी लागी कुर्माचलै भूमि॥’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभार : &lt;a href="http://dainiktribuneonline.com/2011/02/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF-%E0%A4%B8/"&gt;गोविन्दसिंह असिवाल&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8842126018998002088?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8842126018998002088/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8842126018998002088' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8842126018998002088'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8842126018998002088'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/02/blog-post_12.html' title='कुमाऊं के देवी-देवता'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_zTqIoHQeTQ4/TA_NUI6ok-I/AAAAAAAADIo/dHovj07TQjQ/s72-c/DSC_0194.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7602526214623345397</id><published>2011-02-05T08:40:00.004+05:30</published><updated>2011-02-06T00:03:05.027+05:30</updated><title type='text'>बाँस की धुनाई - तनाव से मुक्ति</title><content type='html'>नमस्कार मित्रो, &lt;br /&gt;आज आफिस मे बाँस से चीक-चीक हो गई, सोचा आज दो दो हाथ हो हि जाये पर कुछ सोच कर रुक गये। हमारे मित्र ने कहा आफिस के बाहर चलते है एक एक सुटा मारते है और दो चार चमाकोभादर टाइप की गाली देते है। तनाव से मुक्ति तो नही पर हा कुछ राहत जरुर मिलेगी। हम सोचे भईया यहा रहे तो पारा ओर बढ सकता है, जो कि सेहत और मेरे लिये सुखदाइ तो होगा नही भलाई  इसी मे है कि निकल ले यहा से और वेसे भी ट्राइ करने मे क्या जाता है। चल दिये  अपने गंतव्य कि दिशा मे । सुटा मार लिया चमाकोभादर tटाइप की गाली भी दे दी पर तनाव से मुक्ति नही मिली। आ गये नरक रुपी कार्यस्थल कि ओर । इन्ट्नेट मे सुझाव कि तलाश मे मसगुल हो गये ।  कुछ ये कह रहे थे कुछ वो करने को कह रहे। कुछ ने ओनलाइन गेम खेलने कि सलाह दि तो कुछ ने योग द्वारा तनाव से मुक्ति की । सोचा योग तो हमसे हो ने से रहा ओनलाइन गेम ही खेल लिये जाये । दो चार गेम पे हाथ मारा। आप भी खेल सकते है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.miniclip.com/games/paintball/en/"&gt;यहा किलक करे&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.puffgames.com/stickstress/"&gt;यहा किलक करे&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनाव कुछ कम हुआ पर पुर्णतया समाप्त नही हुआ। फिर कुछ नया तलाशने लगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.ampgames.com/game/227/Beat-Up-Your-PC.html"&gt;फिर ये ट्राइ किया , &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ राहत मिली पर ये तनाव जाने का नाम ही नही ले रहा था। फिर कुछ नया तलाशने लगे। अंत मे सफलता मिल हि गई, मिलती भी क्यो ना, इतनी मक्कत जो कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप भी ट्राइ कर सकते है। &lt;a href="http://arcadevoid.com/play/whack-your-boss"&gt;यहा किलक करे&lt;/a&gt; और बाँस कि चीक-चीक सुन कर होने वाले तनाव से मुक्ति पाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडा इंतजार करना पड सकता है, सफलता पाने के लिये क्योकि भइया अभी 2G मे ही जी रहे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट : अगर आप पुर्णतया संन्तुष्ट हुये हो तो अपनी आन्न्दमई टिप्प्णी से जरुर नवाजे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7602526214623345397?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7602526214623345397/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7602526214623345397' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7602526214623345397'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7602526214623345397'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='बाँस की धुनाई - तनाव से मुक्ति'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-6132920182838097140</id><published>2011-01-30T23:52:00.003+05:30</published><updated>2011-01-30T23:56:56.589+05:30</updated><title type='text'>बट वी लव गाँधी...!!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/news/news/national/1101/30/images/img1110130019_1_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 250px;" src="http://hindi.webdunia.com/news/news/national/1101/30/images/img1110130019_1_1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट 'फेसबुक' पर भारतीय युवाओं ने 'आई हेट गाँधी' ग्रुप बनाए। पंजाब प्रांत के चार युवाओं ने आई हेट गाँधी नामक समूह बनाया है। पंजाब के राहुल देवगन इस समूह के क्रिएटर हैं और इसमें एक युवती भी है। दुखद आश्चर्य की बात कि वेबसाइट पर लगभग 700 भारतीय युवा फ्रेंडलिस्ट में हैं। यहाँ गाँधीजी के बारे में अपमानजनक टिप्पणियाँ डाली गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन युवाओं का कहना है कि गाँधीजी अँग्रेजों के सहायक थे, इस कारण हमने इस समूह का निर्माण किया है। इस समूह ने गाँधीजी के कई अशोभनीय फोटो भी इस वेबसाइट पर अपलोड कर दिए हैं। लखनऊ के एक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने इस समूह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। पंजाब का राहुल देवगन मुख्य आरोपी है। इसके अलावा अमेरिका स्थित फेसबुक के कार्यालय को भी इसमें नामजद किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये भारतीय युवा अपने अधकचरे ज्ञान की यह पोटली अपने सीमित वर्ग तक ही खोलते तो शायद क्षम्य भी होता। क्योंकि इतिहास गवाह है कि हर महान व्यक्तित्व को कतिपय कुंठित लोगों ने नीचा दिखाने की चेष्टा की है। यह बात और है कि इससे उस शख्सियत का कद तो बौना होने से रहा ऐसी बेवकूफाना हरकते हँसी का विषय अवश्य बनी है। सार्वजनिक रूप से अपने मानसिक दिवालिया होने का सबूत इस तरह देने से पहले बेहतर होता कि वे अपने अतीत को गंभीरतापूर्वक खंगाल लेते। और अगर अतीत तक पहुँचना उनके लिए मुश्किल है तो डॉमिनिक लेपियर की 'फ्रीडम इन द मिडनाइट' ही एक बार पढ़ ली होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह अपेक्षा हम किससे कर रहे हैं? उनसे जिनके लिए हर पुराने को कोसना ही आधुनिकता की निशानी है? उनसे जिनके लिए राष्ट्र के महान संत को गाली देना फैशन स्टेटस है। गाँधी को कितना जानते हैं वे? और उन्हें कोसने का अधिकार इन युवाओं ने हासिल किस आधार पर किया? देश के लिए अपने घर को खाली और खत्म करना क्या होता हैं, क्या यह सोचना भी उनके लिए संभव है जबकि बापू ने अप्रत्यक्षत: समूचे परिवार को देश पर न्योछावर कर दिया? अपने ही बच्चों को अपने नेता होने का फायदा ना पहुँचाने के गाँधी के संकल्प को क्या यह अज्ञान पीढ़ी समझ सकेगी जो येनकेन प्रकारेण खुद अपने लिए नेताओं की 'अप्रोच' तलाशती है? काश, एक अँगुली उन पर उठाने से पहले अपनी तरफ मुड़ी तीन अँगुलियाँ भी देख ली होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँधी उन तक इसलिए भी नहीं पहुँच सके क्योंकि उन्होंने गाँधी को कथनी और करनी की दृ‍ष्टि से एक जुबान रहते स्वयं नहीं देखा। गाँधीवाद उन तक उन भ्रष्ट नेताओं के माध्यम से पहुँचा जो मात्र सफेद टोपी धारण कर कर्मों से गाँधी से कोसों दूर थे। वे युवा गाँधी जिनके लिए एमजी रोड़ है, नोट पर छपी तस्वीर है, घटिया एसएमएस है, सस्ता चुटकुला है, खादी में मिलता डिस्काउंट है या फिर एक शर्मनाक प्रचलित मुहावरा कि 'मजबूरी का नाम...? भला कैसे जानेंगे कि उस राष्ट्रसंत ने अपनी हर छोटी से छोटी भूल की खुद को कठोरतम सजा दी है। क्या उन युवाओं के लिए यह सोच पाना भी संभव है कि जेल में तकिए के स्थान पर लकड़ी के पटिए को रखना कितना भीषण कष्टकारी है लेकिन गाँधी ने ऐसा बार-बार किया तब जब-जब देश के हित में कोई एक छोटी सी अनिवार्य भूमिका भी वे नहीं निभा सके। अपनी ही संतान के लिए जीवन भर उन्होंने अपराधी बनना स्वीकार किया बजाय देश के प्रति भूल से भी कोई अपराध करने के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्रीडम इन द मिडनाइट में लेखक उन्हें बार-बार बुढ़ऊ कहता है पर यह शब्द भी संदर्भों में इसलिए बुरा नहीं लगता है क्योंकि वह उस दुर्बल से दिखने वाले प्राणी की ताकत को पहचान कर उसे अति आत्मीयतावश यह संबोधन देता है। वह उसे एक चमत्कारी इंसान मानता है कि अगर कोलकाता में अपने अनशन से उसने हजारों के जनसैलाब को नहीं रोका होता तो आज इतिहास का सबसे खूनी संघर्ष वही होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक बार-बार मानता है कि यह चमत्कार सिर्फ और सिर्फ वहीं इंसान कर सकता था जिसकी जनता पर ऐसी अदभुत पकड़ थी। तन पर एक कपड़ा और हाथ में एक लाठी,बस यही तो चीजें तो थी उसकी ताकत। लेखक ने घोर आश्चर्य व्यक्त किया है कि आखिर ऐसा क्या था उस बूढ़े मनुष्य की वाणी में कि उग्रतम जनसमुदाय भी उसे सुनकर ऐसे शांत और कोमल हो जाता था मानों कोई तुफानी समंदर अचानक शांत हो गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर 'फेसबुकी कल्चर' के अधकचरे-अल्पज्ञानी भला उस दौर की कल्पना भी कैसे करें जबकि उनके लिए गाँधी सिर्फ एक शब्द है जिस पर भरपूर विकार निकाले जा सकें। आई हेट गाँधी कहने वालों आपके मुकाबले में कई गुना युवा कह रहे हैं आई लव गाँधी क्योंकि वे गाँधी को जान रहे हैं, पहचान रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभार : वेब दुनिया- स्मृति जोशी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-6132920182838097140?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='enclosure' type='text/html' href='http://hindi.webdunia.com/news/news/national/1101/30/1110130019_1.htm' length='0'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/6132920182838097140/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=6132920182838097140' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/6132920182838097140'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/6132920182838097140'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='बट वी लव गाँधी...!!'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-5030298792432449423</id><published>2010-08-31T22:49:00.002+05:30</published><updated>2010-09-02T00:40:03.157+05:30</updated><title type='text'>काँच की बरनी और दो कप चाय</title><content type='html'>जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं…उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची… उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ… आवाज आई…फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे… फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई…प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो… टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी…ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है…यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा… मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक-अप करवाओ.. टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है… पहले तय करो कि क्या जरूरी है… बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया… इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..मैंने अभी-अभी यही किया है.. :)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-5030298792432449423?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/5030298792432449423/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=5030298792432449423' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5030298792432449423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5030298792432449423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/08/blog-post_2115.html' title='काँच की बरनी और दो कप चाय'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2663160693640436733</id><published>2010-08-31T22:35:00.000+05:30</published><updated>2010-08-31T22:36:02.453+05:30</updated><title type='text'>अकेला</title><content type='html'>इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.&lt;br /&gt;सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो ना समझ सके, उनके लिये "कौन".&lt;br /&gt;जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.&lt;br /&gt;सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.&lt;br /&gt;जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.&lt;br /&gt;दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2663160693640436733?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2663160693640436733/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2663160693640436733' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2663160693640436733'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2663160693640436733'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/08/blog-post_31.html' title='अकेला'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-578333402654259496</id><published>2010-08-06T22:35:00.002+05:30</published><updated>2010-08-07T08:12:16.808+05:30</updated><title type='text'>अप्रेजल की दुखद कहानी</title><content type='html'>हर बार नए फैनेंशियल इयर की शुरुआत में अक्सर ऑफिसों में अप्रेजल की बात चलने लगती है। और इसी अप्रेजल की बात के साथ शुरू हो जाता है अप्रेजल का खेल । अप्रेजल से संम्बधित विपीन खनडूरी कि ये कविता बहुत ही अच्छी लगी जो मुझे मेल द्रारा प्राप्त हुई । तो सोचा क्यो ना आप लोगो से भी इसे बाँटा जाये । कुछ इसी तरह का वाक्या मेरे साथ भी घटित हो चुका है फरक इतना है कि मेरा 2 रुपये कि जगह पर सिर्फ 500 रुपये कि बढोतरी हुई थी और मेने भी खनडूरी कि तरह कि करना उचित समझा इस कविता ने ने 2 साल पहले का वाक्या याद दिला दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्रेजल के नाम पर एक लम्बी आह भरते  है,&lt;br /&gt;चलीये अब हम इस दुखद कहानी कि शुरुआत करते है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमेशा कि तरह 10 बजे ठुमकते हुए आफिस आया,&lt;br /&gt;11 बजे नाश्ता किया और बारह बजे तक मेल पढ पाया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमेशा कि तरह आज भी मुझे आलस आ रहा था, &lt;br /&gt;और मेरा PM मुझे तिरछी निगाहो से देख देख गुस्सा रहा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै बडे कन्सनट्रेसन के साथ एक मेल पढ रहा था,&lt;br /&gt;तभी देखा मेरे PM के नाम का नया मेल कोने मे से झाक रहा था, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर कोई ट्रेनिग करनी होगी, ये क्या बकवास है, &lt;br /&gt;क्या जबाब दू कि, मेरे मेल बाक्स का उपवास है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेने आखे बंद कि और 10 बार ॐ ॐ बोला&lt;br /&gt;और प्रणाम करते हुये मैने वो मेल खोला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;PM के इस मेल मैं एक अजीब सा सुकून और भोलापन है&lt;br /&gt;लिखा है भाइयों अप्रेजल पत्र आ गएअब तो आमने सामने कि बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मॅन मैं ऐसे बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे&lt;br /&gt;ऊपर से कुछ लोग मेरे डि अप्रेजल की गन्दी अफवाह उड़ा रहे थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;PM को पत्र लाते देख हर कोई उसे देखता जाता है&lt;br /&gt;जैसे मलिका के किसी नए गाने को देखा जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर वो वक़्त आयाPM ने एक एक करके सब को बुलाया&lt;br /&gt;जो भी अंदर जाता हँसता हुआ जाता&lt;br /&gt;जो बहार आतामुरझाया हुआ आता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहार आ कर इंसान संभल भी नहीं पता है&lt;br /&gt;की कितना हुआ कितना मीला हर कोई उसपे टूट जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी एक को अप्रेजल मैं 2000 रुपये मिले थेमैं उसकी हंसी उड़ा रहा था&lt;br /&gt;तभी मैंने देखा मेरा PM इशारे से मुझे अंदर बुला रहा था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आत्मविश्वास से उठा और आगे कदम बढाया&lt;br /&gt;तभी मेरी बेलट का बकल टूट के नीकल आया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी हालत तो अभी से ही बुरी हो गयी&lt;br /&gt;साला इज्ज़त उतरना तो यही से शुरू हो गयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अंदर पहुंचा और PM ने मुझे बिठाया&lt;br /&gt;उसने पत्र पढा और वो हंसी रोक न पाया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वोह इतना हंसा की उसके आंसू आ गए&lt;br /&gt;क्या मेरे अप्रेजल के अंक इतने भा गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे ही उसने अप्रेजल पत्र मेरी तरफ बढाया&lt;br /&gt;मेरी आँखों के आगे घनघोर अँधेरा छाया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगा जैसे मेरे दिल की दीवार को किसी ने गोबर से पोता है&lt;br /&gt;अरे यार बीस रुपये ये भी कोई बढोतरी का इनाम होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये साप्टवेयर इन्ड्स्ट्री है अखाडा नहीं है&lt;br /&gt;ये वेतन बढोतरी है रोहनी आने -जाने का भाडा नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे चारों तरफ कलि घटा छायी तभी मेरे PM की मोहक आवाज़ आई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम सोच रहे होगे के company mgmt का दिमाग फिर गया है&lt;br /&gt;पर बेटा हम क्या करें डालर का भाव 2 रुपये जो गिर गया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर फिर भी मुझे लगता है ये पत्र गलत है&lt;br /&gt;मुझे तो लगता है ये प्रिन्टिग की गलती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम HR मैं जाओ और ये पता करके आओ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई HR मैं जाने के लिए तैयार होना पड़ता है&lt;br /&gt;वही तो ऐसी जगह है जहाँ सुंदर लड़कियों से पला पड़ता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ये क्या जहाँ रेनुका बैठी है आज वहां बैठा आपताब है&lt;br /&gt;मैं समझ गया बेटा आज अपना किस्मत ही ख़राब है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मेरा पत्र खोला और खुश हो के बोला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो बोला श्रीमान आप के लिए खुशखबरी है&lt;br /&gt;आप के पत्र ने प्रिन्टिग की ही गलती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा मित्र अब देर न लगाएं&lt;br /&gt;और मुझे मेरा सही सही हिसाब किताब बताएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वो बोला माफ करे श्रीमान ये एक्सीडेंट है&lt;br /&gt;बीस रुपये नहीं दो रुपये आप कि बढोतरी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं क्या करूं आप को ये बताते हुए मेरा दिल रो रहा है&lt;br /&gt;पर क्या करें डालर का भाव भी तो कम हो रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बस वहाँ खडा था कुछ समझ नहीं आ रहा था&lt;br /&gt;मुझसे ज्यादा बढोतरी तो चपरासी वाला पा रहा था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने खुद को संभालाखुद को उठाया&lt;br /&gt;मैं लौटा और सीधे PM के पास आया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सीधा उसके केबिन गया और दरवाज़ा खोला&lt;br /&gt;इस से पहले की वो बोले मैं ही उस से बोला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाशय ये पैसे वापिस ले लीजिये बात करना फीजूल है&lt;br /&gt;मैं गरीब हूँ पर भीख नहीं लेता ये मेरा उसूल है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभार : विपीन खनडूरी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-578333402654259496?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/578333402654259496/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=578333402654259496' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/578333402654259496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/578333402654259496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html' title='अप्रेजल की दुखद कहानी'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8385731285110790498</id><published>2010-08-01T11:29:00.004+05:30</published><updated>2010-08-01T11:38:04.323+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मित्रता दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्ती'/><title type='text'>दोस्ती, खुशी का मीठा दरिया है</title><content type='html'>मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज से उसके रिश्तों का ताना-बाना बड़ा ही वृहद होता है। वैसे तो उसके रिश्तों की फेहरिस्त बड़ी लंबी होती है, परंतु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो जीने का जुनून जगाते हैं, कुछ कर गुजरने की जिद बन जाते हैं क्योंकि उन रिश्तों में 'प्रेरणा' की ऊर्जा निहित होती है। ये रिश्ते उस स्पंदन की अनुभूति होते हैं, जिनका आधार ही दोस्ती की नींव है। दोस्ती कहें या मित्रता, बोलने-सुनने में भले ही सहज सा लगे परंतु इस आत्मीय रिश्ते की गहराइयाँ पग-पग पर किस तरह हमें अनुकूलता/प्रतिकूलताओं में प्रेरित करती है, हमारा सम्बल बनती है, हमें संभालती है, यह वही समझ सकता है जिसके पास एक अच्छा दोस्त है। कुछ रिश्ते तो निभाए जाते हैं मगर यह इकलौता ऐसा है, जिसे जिया जाता है। 'दोस्ती' जिंदादिली का नाम है। 'दोस्त' बनकर दर्द दूर नहीं किया तो दोस्ती क्या खाक निभाई। सुख-दु:ख में दोस्ती ठंडी हवा का झोंका बनकर गले से लिपट जाती है, जिसका स्नेहिल स्पर्श तनाव में भी सुकून देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच्चा दोस्त किस्मत वालों को ही मिलता है। आसान नहीं है दोस्त मिलना और खुद किसी का दोस्त बन जाना। क्योंकि आज हम जिन लोगों के साथ घूमते-फिरते हैं। पिक्चर देखते हैं। टाइम पास करने के लिए हँस-बोल लेते हैं। उन्हें ही दोस्त कहने और समझने भी लग जाते हैं। दोस्ती एक अनमोल रिश्ता है जिसमें आदमी कब बँध जाता है। पता ही नहीं चलता। मुश्किल समय में काम आने वाला, नेक सलाह देने वाला मित्र ही सच्चा मित्र है। सच्ची मित्रता को किसी फ्रेंडशिप डे या फ्रेंडशिप बेल्ट जैसी औपचारिकताओं की जरूरत नहीं होती। उनके लिए प्रत्येक दिन ही मित्रता दिवस होता है। यह दिन शायद उन मित्रों के लिए बना हो जोकि बहुत ही मुश्किल से साल भर में यदा-कदा ही मिल पाते हों तो कम से कम इस दिन उन्हें याद कर लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'दोस्ती' की सरगम पर विश्वास के सुर पैरों में अपनेपन के नुपूर बाँधकर थिरकते हैं। 'दोस्ती' के पर्वत से ही प्रेरणा के झरने बहकर सफलतारूपी सरोवर में जा मिलते हैं। 'दोस्ती' वह जुगनू है, जिसकी टिमटिमाती रोशनी प्रतिकूलताओं की निशा में उम्मीद की किरण की तरह हमेशा जगमगाती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'दोस्ती' उस सुरभि का नाम है जिसका अहसास 'अपनत्व' का अनुभव कराता है। कोई कहे 'दोस्त' हमदर्द होता है परंतु सच्चाई तो यह है कि 'दोस्त' वह गुरूर होता है, जिसके आश्रय में हममें मुसीबतों से लड़ने का साहस जाग जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदलते कालचक्र में भले ही दोस्ती ने नया आयाम ले लिया हो परंतु इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि दोस्ती का रिश्ता आज भी उसी विश्वास, समर्पण और अगाध स्नेह का पर्याय है, जितना कि वह बीते समय में रहा है। चूँकि समय बलवान है इसलिए बदलता रहता है परंतु तमाम रिश्तों में एक सच्चे दोस्त की 'दोस्ती' का रिश्ता समय की धारा के साथ परिवर्तित नहीं बल्कि प्रगाढ़ होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वॉशिंगटन अर्विंग ने कहा है - &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सच्ची दोस्ती कभी व्यर्थ नहीं जाती, यदि उसे प्रतिदान नहीं मिलता तो वह लौट आती है और दिल को कोमल और पवित्र बनाती है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो बोलिए... क्या आप बन सकते हैं, ऐसे दोस्त। यदि 'हाँ' तो आज ही के दिन से इसकी शुरुआत कीजिए...।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8385731285110790498?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8385731285110790498/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8385731285110790498' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8385731285110790498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8385731285110790498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='दोस्ती, खुशी का मीठा दरिया है'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-974657400286153198</id><published>2010-02-14T11:09:00.005+05:30</published><updated>2010-02-14T11:42:56.356+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फोटोस्केचर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्केचर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सॉफ्टवेयर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पेन्टर'/><title type='text'>मैजिकल सॉफ्टवेयर  "फोटोस्केचर"</title><content type='html'>इन्टरनेट के मायाजाल मे उल-जलुल हरकते करते रहने से कुछ न कुछ तो अवश्य ज्ञान की प्राप्ति होती ही रहती है। इस कारण जब भी समय मिलता है निकल पडता हूँ इस तरह के ज्ञान कि खोज मे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों हम जानते हैं कि तुम्हारे अंदर भी एक कलाकार मौजूद है, जो कभी-कभी तुम्हें कैनवास पर हाथ आजमाने के लिए उकसाता रहता है। पहाडों के मनमोहक  दृश्य हर किसी का मन मोह लेते हैं। तुम्हारी भी इच्छा होती होगी कि काश, मैं इस दृश्य को कैनवास पर उकेर पाता । आज एक ऐसे सॉफ्टवेयर के बारे में, जो आपकी पेंटर बनने की इच्छा चुटकियों  में पूरी कर देगा। न तो इसमें ब्रश की जरूरत है और न ही कैनवास की। मुझे तो यह सॉफ्टवेयर बहुत हि काम का लगा।  इससे आप को भी कुछ लाभ मिले, अत: अपने ब्लाग मे इसका उल्लेख करना उचित समझा। तो महाशय तैयार हो जाये ब्रहम ज्ञान का रसपान करने के लिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मैजिक सॉफ्टवेयर का नाम है फोटोस्केचर। फोटोस्केचर के लिए आप लोगो को कोई कीमत भी नहीं चुकानी है। फोटोस्केचर, पलक झपकते ही डिजिटल फोटो को आर्ट में तब्दील कर देता है। अगर आप किसी घोडे या किसी सुंदर सीनरी की पेंटिग  बनाना चाहते हो, तो फोटोस्केचर फटाफट उसे स्केच में बदल देगा। इस मैजिकल सॉफ्टवेयर के जनक है महाशय “डेविड थोइरान” ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा, आप इस सॉफ्टवेयर की मदद से अपने दोस्तों के फोटोग्राफ्स  को स्केच में बदल कर उनके जन्मदिन पर गिफ्ट भी कर सकते हो। इसकी मदद से आप लोगो को बर्थडे कार्ड, ग्रीटिंग स्टेशनरी या फिर किसी भी आर्ट का प्रिंट लेकर उसे अपने कमरे की दीवार पर भी टांग भी सकते हो।  फोटोस्केचर  में कई सारे स्केच, पेन और इंक ड्राइंग जैसे ऑप्शन भी दिए गए हैं। फोटोशॉप  की तरह फोटोस्केचर  में भी किसी भी फोटो का फाइन किया जा सकता है, उसका स्केच तैयार किया जा सकता है। और भी बहुत कुछ है इस सॉफ्टवेयर  में । इसी बात को तो कहते हैं हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए। फोटोस्केचर को आप http://www.fotosketcher.com/ मुफ्त से डाउनलोड कर सकते हो।  इस सॉफ्टवेयर के विषय मे और अधिक जानकारी आप &lt;a href="http://www.fotosketcher.com/index.htm"&gt;यहा से&lt;/a&gt; पा सकते है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो देर किस बात की है आजमाइये इसे और बन जाइये पेन्टर और स्केचर ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-974657400286153198?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/974657400286153198/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=974657400286153198' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/974657400286153198'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/974657400286153198'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/02/blog-post_7453.html' title='मैजिकल सॉफ्टवेयर  &quot;फोटोस्केचर&quot;'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2590988222780113568</id><published>2010-02-14T00:01:00.005+05:30</published><updated>2010-02-14T00:25:15.789+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माइ नेम इज खान'/><title type='text'>"माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट"</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://patrika.com/articles/12022010my-name-is-khan.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 150px;" src="http://patrika.com/articles/12022010my-name-is-khan.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वर्ल्ड  ट्रेड  सेंटर  पर  9/11  को  हुए  आतंकी  हमले  के  बाद  दुनियाभर  में  एक  समुदाय  के  प्रति  बदली  सोच  को  लेकर  अब  तक  आधा  दर्जन  के  करीब  फिल्में  बन  चुकी  हैं। 9/11  हमले  के  बाद  दुनिया  के  कई  देशों  में  मुस्लिम  समुदाय  के  प्रति  यकायक  बदली  सोच  पर  करण  ने  एक  ऐसी  प्रेम  कहानी  का  सहारा  लिया  है  जो  आम  बॉलिवुड  फिल्मों  से  कोसों  दूर  है।  करण  की  इस  फिल्म  में  एक  ऐसे  युवक  का  अपना  खोया  हुआ  प्यार  फिर  से  हासिल  करने  का  सफर  दिखाया  गया  है  जो  आम  इंसानों  से  हटकर  है।  फिल्म  में  रिजवान  द्वारा  बार  -  बार  बोला  गया  डायलॉग  "माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट"  हॉल  में  बैठे  दर्शक  के  दिल  को  छूता  है।  दरअसल  ,  करण  अपनी  इस  फिल्म  के  माध्यम  से  दुनिया  को  शायद  यही  मेसेज  देना  चाहते  हैं  कि  '  हर  मुसलमान  आतंकवादी  नहीं  है।  ' करण जौहर अपनी प्रेम मुहब्बत, रोने धोने वाले फार्मूले से मुक्ति की छटपटाहट से बाहर आने की कोशिश कर रहे है। उन्हें हमारे हौसले की जरूरत है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;माय नेम इज खान&lt;/span&gt; के जरिए वे यह बताना चाह रहे हैं कि दुनिया मे सिर्फ दो ही किस्म के इंसान होते हैं, अच्छे और बुरे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह फिल्म हमारे भीतर छुपे शैतान को पत्थर मारने में हमारी मदद करती है जहां बाल ठाकरे या बजरंग दलियों ने यह मान लिया है कि खान सरनेम का अर्थ ही धोखेबाज और आतंकवादी होना है। यह एसपर्जर सिंड्रोम से पीडित रिजवान खान की कहानी है, जिसे नई जगह, पीले रंग और तेज शोर से डर लगता है लेकिन वह बहुत ही समझदार और ज्ञानी भी है। धुन का पक्का है। मानवीय नजरिया उसे उसकी मां, उसके टीचर वाडिया और इस्लाम से उसे विरासत में मिला है। वह अमेरिका में एक लड़की मंदिरा के सैलून मे अपने ब्यूटी प्रोडक्ट बेचने जाता है और उसी से प्यार कर बैठता है। मंदिरा तलाकशुदा है और उसके पहले से एक बच्चा है। शादी के बाद उसका सरनेम मंदिरा खान और उसके बेटे का नाम समीर खान हो जाता है। 9/11 से पहले सब कुछ ठीक था लेकिन उसके बाद पूरी दुनिया ने करवट ली खान सरनेम की वजह से एक हादसा होता है। दोनों पति पत्नी अलग हो जाते हैं। मंदिरा उसे चुनौती देती है कि किस किस के सामने वह बेगुनाही का सबूत देगा कि तुम्हारा नाम खान है और तुम टेरेरिस्ट नहीं हो। यहां से खान अमेरिका के प्रेसीडेंट से मिलने की यात्रा शुरू करता है। जहां जहां राष्ट्रपति को जाना होता है, वहां वह पहुंचता है, लेकिन मिल नहीं पाता। फिल्म इसी यात्रा को आगे बढाती है और अंजाम तक पहुंचती है। इस यात्रा में रिजवान खान एक नायक बनकर उभरता है। जॉर्जिया में छोटे से गांव के लोगों को बचाने में रिजवान खान अकेला जुटा तो उसके पीछे सैकड़ों लोग राहत सामग्री लेकर आए हैं। जहां वह काउंटर पर कमरे की सिर्फ जानकारी लेने गया था वहां भी होटल मालिक ने बोर्ड टांग लिया है कि यहां खान ठहरा था। कहानी में बीच में कहीं ठहराव और एकरसता आती है लेकिन सारे नंबर शाहरूख खान को इसलिए जाते हैं कि वह अभिनय के एक नए अवतार में सामने है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9/11  हादसे  को  एक  ऐसे  नजरिए  के  साथ  देखना  चाहते  हैं  जो  अब  तक  अनदेखा  रहा  तो  फिल्म  आपके  लिए  है। माइ नेम इज खान की तारीफ इसलिए भी जरुरी है क्योकि हमारी राजनीति और आदमी की लिप्साओं ने भेदभाव का जो अमानवीय चेहरा हमारे सामने बना लिया है उसे चुनौती दी जा सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2590988222780113568?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2590988222780113568/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2590988222780113568' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2590988222780113568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2590988222780113568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/02/blog-post_14.html' title='&quot;माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट&quot;'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-5121627088542794928</id><published>2010-02-13T09:08:00.003+05:30</published><updated>2010-02-14T01:03:10.903+05:30</updated><title type='text'>मिलें सुर मेंरा तूम्हारा @2010</title><content type='html'>15  अगस्त  , 1988  को  दूरदर्शन  में  जारी  उस म्यूजिकल फिल्म को भाषा के सभी बंधन तोड़ते हुए देश के बच्चे - बच्चे ने अपने दिल में बसा लिया था। जब भी इसका टेलिकास्ट होता, सब काम रोककर पूरे 16 मिनट तक उसमें अपने सुर मिलाते थे। मै तब लगभग 6-7 साल का रहा हूँगा । और अब 2010 में इंडिया को एक बार फिर वही सुर लौटाए है।&lt;br /&gt;&lt;a href="&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/gstRrEmTcBc&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/gstRrEmTcBc&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;फिर मिले सुर का नया विडियो देश भर की 15 लोकेशनों पर शूट किया गया है। पुराने वाले गीत में जहां 26 महान हस्तियों ने हिस्सा लिया था , वहीं नए विडियो में 68 पर्सनैलिटीज हैं। मॉडर्न इंडिया की झलक देने के लिए इसमें बिग बी से लेकर , ए . आर . रहमान और सलमान खान से लेकर बेडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल तक अपने सुर मिला रहे हैं। हर आर्टिस्ट की ओर से इसमें एक सामाजिक संदेश दिया गया है , जिसे ऐतिहासिक स्थलों पर शूट किया गया है। बिग बी के लिए यह विडियो सबसे खास है , क्योंकि वह अकेली ऐसी शख्सियत हैं , जो इसके पहले विडियो में भी थे। कॉरपोरेट कपल आरती और कैलाश सुरेंद्रनाथ ने फिर मिले सुर को प्रड्यूस किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑरिजिनल मिले सुर में जहां पंडित भीमसेन जोशी , अमिताभ बच्चन , कमल हसन , लता मंगेशकर , प्रकाश पादुकोण जैसे आइकॉन थे , तो इस बार नई जेनरेशन के नए आइकॉन सितार वादक अनुष्का शंकर , सरोद वादक अमान और अयान , शूटर अभिनव बिंद्रा , बॉक्सर विजेंदर सुर मिला रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले विडियो का कॉन्सेप्ट सुरेश मलिक ने तैयार किया था और पीयूष पांडेय ने लिखा था। नए विडियो की शानदार सिनेमेटॉग्रफी और म्यूजिक है लुई बैंक्स का। पुराने विडियो में भी लुई बैंक्स ने पी . वैद्यनाथन के साथ मिलकर म्यूजिक तैयार किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(हिन्दी) मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा&lt;br /&gt;सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें&lt;br /&gt;बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के&lt;br /&gt;मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा&lt;br /&gt;मिले सुर मेरा तुम्हारा …&lt;br /&gt;मिले सुर मेरा तुम्हारा …&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कश्मीरी) चॉन्य् तरज़ तय म्यॉन्य् तरज़&lt;br /&gt;इक-वट बनि यि सॉन्य् तरज़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पंजाबी) तेरा सुर मिले मेरे सुर दे नाल&lt;br /&gt;मिलके बणे एक नवा सुर ताल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(हिन्दी) मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सिन्धी) मुहिंजो सुर तुहिंजे साँ प्यारा मिले जडेंह&lt;br /&gt;गीत असाँजो मधुर तरानो बणे तडेंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(उर्दू) सुर का दरिया बह के सागर में मिले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पंजाबी) बदलाँ दा रूप लैके बरसन हौले हौले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(तमिल) इसैन्दाल नम इरुवरिन सुरमुम नमदक्कुम&lt;br /&gt;तिसै वॆरु आनालुम आऴि सेर&lt;br /&gt;मुगिलाय मऴैयय पोऴिवदु पोल इसै&lt;br /&gt;नम इसै…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कन्नड) नन्न ध्वनिगॆ निन्न ध्वनिय,&lt;br /&gt;सेरिदन्तॆ नम्म ध्वनिय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(तेलुगु) ना स्वरमु नी स्वरमु संगम्ममै,&lt;br /&gt;मन स्वरंगा अवतरिंचे .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(मलयालम) निंडॆ स्वरमुम् नींगळुडॆ स्वरमुम्&lt;br /&gt;धट्टुचॆयुम् नमुडॆय स्वरम .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(बाङ्ला) तोमार शुर मोदेर शुर&lt;br /&gt;सृष्टि करूर अइको शुर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(असमिया) सृष्टि हो करून अइको तान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(उड़िया) तोमा मोरा स्वरेर मिलन&lt;br /&gt;सृष्टि करे चालबोचतन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(गुजराती) मिले सुर जो थारो म्हारो&lt;br /&gt;बणे आपणो सुर निरालो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(मराठी) माँझा तुमच्या जुलता तारा&lt;br /&gt;मधुर सुराँचा बरसती धारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(हिन्दी) सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें&lt;br /&gt;बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के&lt;br /&gt;मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा&lt;br /&gt;मिले सुर मेरा तुम्हारा …&lt;br /&gt;तो सुर बने हमारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/3PJ6diHcIVs&amp;hl=en_US&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/3PJ6diHcIVs&amp;hl=en_US&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" width="425" height="344" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="&lt;object width="480" height="385"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/8wyYMWyr-MM&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/8wyYMWyr-MM&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="480" height="385"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हालांकि इसे रिलीज हुए अभी कुछ हि दिन हुए है , लेकिन यंगस्टर्स में यह अभी से पॉप्युलर हो गया है। यूट्यूब में पहले ही दिन इसे 2600 से ज्यादा हिट्स मिले। इंटरनेट पर चैट रूम्स हों या डिस्कशन बोर्ड , ब्लॉग्स हों या फिर ऑरकुट या फेसबुक की कम्युनिटीज ... सब जगह यंगस्टर्स फिर मिले सुर पर बातचीत करते नजर आ रहे हैं। हालांकि कुछ को इसमें बॉलिवुड की ओवरडोज लग रही है , लेकिन ज्यादातर युवा इस बात से खुश हैं कि इसमें राज्यों को अनेकता पर महत्व न देते हुए देश को एक यूनिट की तरह दिखाया गया है। हर सिलेब्रिटी को किसी एक खास राज्य से जोड़कर दिखाने की बजाय पूरे देश की एकता पर जोर दिया गया है। &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-5121627088542794928?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/5121627088542794928/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=5121627088542794928' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5121627088542794928'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5121627088542794928'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/02/2010.html' title='मिलें सुर मेंरा तूम्हारा @2010'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-77519427657514066</id><published>2010-02-09T10:18:00.002+05:30</published><updated>2010-02-09T10:24:09.430+05:30</updated><title type='text'>सबसे बड़ी मदद</title><content type='html'>एक बार बेंजामिन  फ्रैंकलिन ने एक धनी व्यक्ति की मेज पर कुछ सिक्के रखते हुए कहा, 'आपने बुरे वक्त में जो सहायता की थी, मैं उसके लिए बहुत आभारी हूं। पर अब मैं अपनी मेहनत से इतना सक्षम हो गया हूं कि आपका कर्ज वापस कर सकूं। मैं यह सिक्के आपको वापस करने आया हूं।' बेंजामिन फ्रैंकलिन की बात सुनकर वह सज्जन उन्हें घूरते हुए बोले, 'क्षमा करिए, पर मैंने आपको पहचाना नहीं। न ही मुझे यह याद है कि मैंने किसी को उधार दिया था।' बेंजामिन ने कहा, 'मैं उन दिनों एक प्रेस में अखबार छापने का काम करता था। एक दिन अचानक मेरी तबीयत खराब हो गई तब मैंने आपसे बीस डॉलर लिए थे।' यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपने बीते दिनों को याद किया तो उन्हें स्मरण हो आया कि एक बालक प्रेस में काम करता था और एक दिन उसके बीमार होने पर उन्होंने उसकी मदद की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह याद आने पर उस व्यक्ति ने कहा, 'हां, मुझे याद आ गया। लेकिन दोस्त, यह तो मनुष्य का सहज धर्म है कि वह आपत्तिग्रस्त व्यक्ति की सहायता करे। इन सिक्कों को आप अपने पास ही रखें और कभी कोई जरूरतमंद व्यक्ति आपकी नजरों में आए, तो उसे दे दीजिएगा।' इस बात से बेंजामिन बहुत प्रभावित हुए और उन्हें नमस्कार कर उन सिक्कों को वापस अपने साथ ले आए। इसके बाद उन्होंने एक जरूरतमंद युवक को वे सिक्के दिए। जब उस युवक ने सिक्के लौटने चाहे तो बेंजामिन ने कहा, 'दोस्त, जब तुम सक्षम हो जाओगे तो अपने जैसे किसी जरूरतमंद को ये सिक्के दे देना। मैं समझूंगा कि मेरे पैसे मुझे मिल गए।' वह युवक बोला, 'मैं ऐसा ही करूंगा।' इसके बाद बेंजामिन उस युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, 'किसी जरूरतमंद की वक्त पर मदद करना ही इंसानियत है। अगर हम किसी की मदद करते हैं तो वह मदद सौ गुना अधिक होकर हमारे पास वापस आती है और हमें कामयाब बनाती है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकलन: रेनू सैनी (नवभारत टाइंम्स)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-77519427657514066?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/77519427657514066/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=77519427657514066' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/77519427657514066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/77519427657514066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='सबसे बड़ी मदद'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-398063723525358371</id><published>2009-10-05T12:41:00.002+05:30</published><updated>2009-10-05T12:50:49.615+05:30</updated><title type='text'>पहाड़ से गिरकर मरती हैं सैकड़ों महिलाएं</title><content type='html'>हिमालय की ऊंची-ऊंची और लंबी चोटियों से घिरे उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में आज भी पशुओं को चारे के लिए घास काटते समय प्रति वर्ष करीब 200 महिलाएं पहाड़ों से गिरकर अपनी जान गंवा बैठती हैं लेकिन अनेक मामलों में इनकी न तो रिपोर्ट दर्ज होती है और न ही इन्हें कोई मुआवजा दिया जाता है। प्रशासन में ज्यादातर मामलों में ये सामान्य मौत के तौर पर ही दर्ज होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य में अधिकांश गांव सुदूर पहाड़ों की चोटियों पर बसे हुए हैं और इन गांवों में रहने वाले लोग काफी संख्या में भेड़ों, बकरियों गायों, बैलों और भैंसों को पालते हैं। पशुओं के चारे के लिए घास काटने का काम पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाएं ही करती हैं। उत्तराखंड के कुछ जिलों के गांवों का दौरा करने के बाद यह रोचक तथ्य सामने आया कि अभी भी गांवों में घास काटने का काम या तो लड़कियां करती हैं या घर में ब्याह कर आने वाली बहुएं। घर की बुर्जुग महिलाओं द्वारा इन बालिकाओं और युवतियों को घास काटने का काम दिया जाता है। बालिकाओं को जहां यह काम स्कूल से आने के बाद सौंपा जाता है वहीं बहुएं इस काम को सूर्यास्त के पहले ही निपटाना पसंद करती हैं लेकिन अक्सर सूर्य की रोशनी कम होने के चलते और कभी-कभी अति विश्वास के चलते इनके पैर ऊंची चोटियों से लड़खड़ा जाते हैं जिससे ये गिर जाती हैं और इनकी मौत हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ों के गांवों में महिलाओं को शाम के समय पीठ पर लाद कर घास को लाते हुए देखा जा सकता है। राज्य में दूध के लिए जहां बकरियों गायों और भैंसों को पाला जाता है वहीं अभी भी पारंपरिक खेती के लिए बैलों की जरुरत होती है क्योंकि खेत सीढ़ीनुमा होने के चलते वहां ट्रैक्टर सफल नहीं हो पाते। जाड़ों के मौसम में ऊन की जरूरत के लिए भेड़ों को पाला जाता है। इन सभी पशुओं के चारे के लिए सितम्बर से लेकर फरवरी महीने तक पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चट्टानों से सूखी घास काटी जाती है और यही चार महीने उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाओं के चट्टान से गिरकर मौत के महीने होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य प्रशासन के पास हालांकि इन मौतों का कोई आकलन नहीं होता। समाज कल्याण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हकीकत में कम से कम पूरे राज्य में साल में करीब 200 महिलाओं को घास काटने के चक्कर में अपनी जान गंवानी पड़ती है और कई पूरे जीवन के लिए अपाहिज हो जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य सरकार के पास इन महिलाओं के परिजनों को मुआवजा देने की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि उनको घायल होने की अवस्था में अस्पताल ले जाने के लिए भी ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालनी होती है क्योंकि पहाड़ियों के कारण गिरने वाली जगह पर आसानी से पहुंचना भी लगभग असंभव होता है। खास तौर पर रात के अंधेरे में बहुत दिक्कत होती है। अधिकांश दुर्घटनाएं सूर्यास्त के बाद रास्ते का पता नहीं चलने और पैर फिसलने के चलते होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर समाज कल्याण विभाग के पास चूंकि जिले से कोई सरकारी आंकड़ा नहीं प्राप्त होता है इसलिए ऐसे मामलों में मुआवजा नहीं दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Source : &lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_5841191.html"&gt;जागरण&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-398063723525358371?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/398063723525358371/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=398063723525358371' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/398063723525358371'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/398063723525358371'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='पहाड़ से गिरकर मरती हैं सैकड़ों महिलाएं'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-5561987034511473408</id><published>2009-09-14T22:07:00.001+05:30</published><updated>2009-09-14T22:07:45.318+05:30</updated><title type='text'>हिन्दी के बारे में 14 बातें</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। राष्ट्र के गौरव का यह तकाजा है कि उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो। कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* भारत में अनेक उन्नत और समृद्ध भाषाएँ हैं किंतु हिन्दी सबसे अधिक व्यापक क्षेत्र में और सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* हिन्दी केवल हिन्दी भाषियों की ही भाषा नहीं रही, वह तो अब भारतीय जनता के हृदय की वाणी बन गई है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* सर्वोच्च सत्ता प्राप्त भारतीय संसद ने देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को राजभाषा के पद पर आसीन किया है। अब यह अखिल भारत की जनता का निर्णय है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* संसार में चीनी तथा अँग्रेजी के बाद हिन्दी सबसे विशाल जनसमूह की भाषा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* प्रांतों में प्रांतीय भाषाएँ जनता तथा सरकारी कार्य का माध्यम होंगी, लेकिन केंद्रीय और अंतरप्रांतीय व्यवहार में राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही कार्य होना आवश्यक है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* प्रादेशिक भाषाएँ तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी दोनों एक-दूसरे की पूरक तथा सहोदरा हैं। एक-दूसरे के सहयोग से वे अधिक समृद्ध होंगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* प्रादेशिक हिन्दी और राष्ट्रीय हिन्दी जैसी कोई चीज नहीं। जिसे आज हिन्दी कहते हैं, वही राष्ट्रभाषा है और उत्तरोत्तर विकास करके समृद्ध एवं गौरवशाली बनेगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* प्रत्येक मनुष्य दो आँखों से देखता है। भारत जैसे विशाल राष्ट्र के निवासी के पास भी दो आँखें चाहिए। ये दो आँखें हैं - 1. अपने प्रांत की भाषा 2. सारे देश के लिए परस्पर व्यवहार की भाषा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* हिन्दी का प्रचार करना राष्ट्रीयता का प्रचार करना है। हिन्दी किसी पर न तो जबर्दस्ती लादी जा रही है और न लादी जाएगी। वह तो प्रेम का प्रतीक है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* कोई भी शब्द चाहे वह किसी भी भाषा का क्यों न हो, यदि वह जनता में प्रचलित है, तो वह राष्ट्रभाषा हिन्दी का शब्द है। आगे भी हिन्दी विभिन्न भाषाओं से शब्द-राशि लेकर समृद्ध बनेगी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* राष्ट्र की एकता के लिए जैसे एक राष्ट्रभाषा होना आवश्यक है, उसी प्रकार एक लिपि का होना भी आवश्यक है। नागरी लिपि में वे सभी गुण उपस्थित हैं, जो किसी वैज्ञानिक लिपि में होने चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* अत: समस्त प्रादेशिक भाषाओं की एक नागरी लिपि हो, यह आवश्यक है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* अँग्रेजी को बनाए रखना हमारी शान और इज्जत के खिलाफ है। वह हमारे देश में रहने वालों के बीच एक दीवार है। इस देश में केवल अँग्रेजी जानने वालों का राज नहीं रह सकता। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;* कौन कहता है कि दक्षिण में अँग्रेजी बोलने वालों की संख्‍या अधिक है? वहाँ अँग्रेजी जानने वालों से पाँच गुना संख्‍या हिन्दी जानने तथा समझने वालों की है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;'&lt;span style="font-size: 10pt; color: rgb(0, 0, 0);"&gt;हिन्दी दिवस के दिन हम प्रतिज्ञा करें कि राष्ट्रभाषा हिन्दी और देवनाग‍री लिपि का प्रचार कर राष्ट्रीय भावना को हम सुदृढ़ करेंगे।&lt;/span&gt;        &lt;div id="tAT"&gt;&lt;link href="http://analytics.webdunia.com/bubble_image/bubble.css" rel="stylesheet" type="text/css" style="display: block;" class="undefined"&gt;&lt;/div&gt;                &lt;div class="wdp_courtsey" align="right"&gt;&lt;b&gt;सौजन्य से&lt;/b&gt; - देवपुत्र&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-5561987034511473408?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/5561987034511473408/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=5561987034511473408' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5561987034511473408'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5561987034511473408'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2009/09/14.html' title='हिन्दी के बारे में 14 बातें'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7533725421417848714</id><published>2009-09-14T21:30:00.001+05:30</published><updated>2009-09-14T21:33:16.625+05:30</updated><title type='text'>'दूसरी औरत'_(दुर्गादत्त जोशी )</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;शहर से कोसों दूर बढ़ापुर नाम का                      एक गाँव है, गाँव में चौहान जाति के ठाकुर रहते हैं, पुराने                      ज़मींदार थे। आज भी किसी-किसी के पास आठ-आठ दस-दस एकड़ ज़मीन                      है। फसल भी अच्छी हो जाती है हर एक के खेत में टयूबवेल लगा है,                      कुछ घर ब्राह्मणों के हैं जो खेती नहीं करते हैं खेत भी नहीं                      है, कुछ और जातियों के घर भी हैं जो इन ज़मींदारों के घर पर                      काम करते हैं, फसल पर कुछ अनाज मिल जाता है कुछ मजदूरी करते                      हैं जहाँ भी आसपास काम मिल गया, कुल मिलाकर गाँव खुशहाल है।                      &lt;/span&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;इसी गाँव में राजेश नाम का एक किसान रहता है, कोई पैंतीस                      छत्तीस साल का होगा, सात आठ साल पहले उसकी शादी हुई थी कमलेश                      के साथ, कमलेश देखने में खूबसूरत थी, उसके पिता जी भी बड़े                      ज़मींदार थे, राजेश के पिता नहीं थे, वह दस बारह साल पहले किसी                      दुर्घटना में मारे गए। राजेश ने अपने चाचा चाची के साथ जाकर                      कमलेश को देखा, देखते ही राजेश शादी को तैयार हो गया, होता भी                      क्यों नहीं ऐसी सुन्दर लड़की और उसका बाप भी मालदार, शादी बड़े                      धूमधाम के साथ सम्पन्न हो गई। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;कमलेश को पाकर राजेश धन्य हो                      गया, साल भर बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया, जिसका कुलदीपक                      नाम रखा, दो साल बाद एक लड़की हुई मीनाक्षी।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;जब मीनाक्षी पेट                      में थी तभी से कमलेश बीमार रहने लगी, मीनाक्षी के होते-होते वह                      काफी कमज़ोर हो चुकी थी, धीरे-धीरे उसने चारपाई पकड़ ली, राजेश                      ने आसपास के कई छोटे मोटे डाक्टरों को दिखाया तमाम दवाइयाँ भी                      खिलाई पर कमलेश का रोग किसी से ठीक नहीं हुआ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;किसान हो या व्यापारी चाहे नौकरी                      पेशा ही क्यों न हो, घर में बीम'ा'री                      किसी को लग जाए तो घर बरबाद हो जाते हैं। राजेश कमलेश को लेकर                      शहर गया। घर बूढ़ी माँ के हवाले हो गया, माँ को दो बच्चे                      देखने, खेतों को देखना, जानवर भी पाले थे, उन्हें कौन देखता,                      सो एक दिन पास के बाज़ार में भिजवाकर सभी जानवर औने पौने दामों                      में बेच दिए, उधर शहर में कमलेश के डॉक्टर ने परीक्षण के आधार                      पर बताया कि इसको शुगर की बीमारी है और वह काफी बढ़ चुकी है,                      एक गुर्दा तो बिल्कुल खराब हो चुका है, दूसरा भी खराब होने ही                      वाला है। कमलेश का रोग ठीक हो ही नहीं सकता इसके गुर्दे बदलने                      पड़ेगे, राजेश की तो हालत खराब, रूवांसा हो गया, कमलेश की उमर                      ही क्या होगी यही कोई अठाइस तीस साल, गुर्दे बदलने को पाँच लाख                      रुपए की ज़रूरत पड़ेगी वो भी ठीक होने की कोई गारण्टी नहीं,                      डाक्टर के कम्पाउन्डर ने सलाह दी कि इसे दिल्ली दिखा दो किसी                      बड़े अस्पताल में। राजेश कमलेश को लेकर दिल्ली पहुँच गया, जो                      भी पाई पैसा था वह सब खर्च हो चुका था, वहाँ के डॉक्टरों ने भी                      वही सलाह दी जो उसके शहर के डॉक्टर ने दी थी, राजेश कमलेश को                      लेकर घर आ गया, घर आने के एक महीने बाद कमलेश की मृत्यु हो गई।                      सारी जमा पूँजी इलाज में लगा दी अन्त में मरीज&lt;span lang="hi"&gt;़'                      से भी हाथ धो बैठा राजेश।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;span lang="hi"&gt;                     &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;राजेश के घर की हालत खराब हो                      चुकी थी, बूढ़ी माँ विक्षिप्त हो गई थी, जब देखो तब आँखों से                      आँसू की धारा, राजेश को जब भी देखें तब रो पड़ती थीं, कलेजे के                      टुकड़े को परेशानी में देखकर हर माँ का दिन ऐसे ही भर आता है।                      छोटे बच्चों की भी हालत खराब। कपड़े मैले हो रहे हैं, हफ्ते भर                      से बच्चों को नहलाया नहीं है, बड़ा स्कूल जाने लायक हो गया हे                      कौन भेजे सब तितर बितर हो गया है, सारा निजाम ही बिगड़ गया है                      घर का, माँ बिल्कुल टूट गई है, उसे घर सुधरने के आसार नज़र                      नहीं आ रहे हैं। निराशा से घिरी रहती है रात दिन, एक दिन राजेश                      के चाचा घर पर आए तो उसकी माँ उनके आगे फफक-फफक कर रो दी, चाचा                      ने बहुत समझाया बुझाया ये सब विधि का विधान है, वैसे ही आपको                      भाईसाहब का दुख सालता रहता है, ऊपर से जवान बहू की मौत हो गई                      रोना तो आएगा ही पर किया क्या जाए, हिम्मत रखो धीरे-धीरे सब                      ठीक हो जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                     &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;इतने में ही राजेश कहीं से आया, बड़ा बच्चा                      राजेश को लिपट गया, छोटी दादी की गोद में बैठी है। पूरा घर ही                      बेतरतीब हुआ पड़ा है, छत की तरफ़ जाले लगे हैं, दीवारें बच्चों                      ने खुरच रखी है, कपड़े अस्तव्यस्त हैं, बरतन कोई यहाँ पड़ा है                      कोई वहाँ, रसोई में मक्खियाँ भिनभिना रहीं हैं। झूठे बर्तनों                      का ढेर लगा पड़ा है। अब राजेश आ गया है, वह छोटी को पकड़ेगा तो                      माँ किसी तरह रोटी का प्रबन्ध करेगी, बातों ही बातों में चाचा                      ने कहा भाभी जी आप राजेश की शादी कर दो, दूसरी औरत आ जाएगी तो                      घर की हालत सँभाल लेगी, ''कह तो ठीक रहे हो पर कोई नरम दिल की                      मिले तब ना'' दूसरी तो पहली के बच्चों को मारेगी, जलन करेगी,                      अगर चाल चलन ठीक नहीं तो घर को नरक बना देगी, उससे तो ऐसे ही                      काट लेंगे। फिर रूवांसी हो गई। चाचा ने कहा, ''फिकर मत करो                      देखभाल कर करेंगे। कोई विधवा परित्यक्ता मिल जाएगी तो ज़्यादा                      ठीक रहेगा। वो ज़्यादा नखरे नहीं करेगी, पर पूछताछ करनी                      पड़ेगी, समय निकाल कर करना होगा। भाभी आपकी हालत मुझसे देखी                      नहीं जाती, आपने तो अपने बच्चे की तरह पाला है मुझे, देखना मैं                      राजेश को सही औरत लाके दूँगा।''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                     &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;चाचा शादी के लिए औरत देखने                      में लग गए, जगह-जगह के आदमियों से चर्चा की, कुछ रिश्तेदारियों                      में संदेशा पहुँचवाया कि कहीं राजेश के लायक कोई औरत हो तो                      बताना, कुछ दिनों के बाद एक गाँव से खबर आई कि यहाँ एक ऐसी औरत                      रहती है, बड़े ही गरीब घर की है, बाप के पास कुछ नहीं है, अगर                      भगवान ने चाहा तो रिश्ता हो जाएगा, चाचा राजेश के साथ उसी गाँव                      में पहुँच गए जिन्होंने सन्देशा भिजवाया था उन्ही के घर रुके,                      नमस्कार कुशलक्षेम के बाद चाय पी। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                     &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;थोड़ी देर बाद घर के                      मुखिया ने कहना शुरू किया, देखो राजेश बाबू आप ठहरे बड़े किसान                      कोशिश करोगे तो आपको कुँवारी कन्या मिल जाएगी थोड़ा बहुत दहेज                      भी मिल जाएगा, अभी आपकी उमर ही क्या है अब तो चालीस छोड़ो                      पैंतालिस साल के भी शादी कर रहे हैं, पर मैंने जो देखा है उसका                      जबाब नही, देखने में साँवली ज़रूर है, कद भी छोटा है,  पर है बड़ी होशियार, अपने बाप को पाल रही है, हमारे ही                      बिरादरी के हैं, इसके दादा गलत सोहलत में पड़ गए थे, तमाम बुरे                      काम 'शराब, जुआ' सब सम्पत्ति बेचकर मरते समय कंगाल हो गए थे,                      आगे को एक लड़का था उसी का बाप हमारे खेतों में काम करता है। न                      पढ़ा न लिखा न ज़मीन और करता भी क्या बीबी पहले ही मर चुकी है,                      हमने रहने के लिए छोटा-सा मकान बनाकर दे दिया था, उसी में रहते                      हैं, मेरे कहने को टालेंगे नहीं कहो तो मैं लड़की और उसके बाप                      को बुला देता हूँ, और यह भी सुन लो हमने उसकी शादी भी करवा दी                      थी एक अच्छे परिवार में पति को पसंद नहीं आई, उसने छोड़ दिया,                      यहीं रहती है, इन्टर तक का कॉलेज है गाँव में इंटर तक पढ़ी है,                      अगर शहर में किसी सेठ के यहाँ पैदा हुई होती तो डॉक्टर                      बैरिस्टर होती। राजेश जी घर बनाने वाली है, सिलाई कढ़ाई करती                      है गाँव के बच्चों को घर पर पढ़ाती है, बड़ी शालीन है, किसी से                      कभी ज़ोर से बोली नहीं होगी, मैं अपनी लड़की समझता हूँ उसे। अगर                      आप राज़ी हो गए तो उस बेचारी की ज़िन्दगी सुधर जाएगी और आपका                      घर भी बन जाएगा।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                     &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;राजेश ने गौर से बातें सुनी                      और औरत और उसके बाप को बुलाने को आग्रह किया, थोड़ी देर में                      दोनों बाप बेटी सामने बैठे थे। वाकई रंग काला ही था फिर गरीब                      थी परित्यक्ता थी, फिक्र में जीने                      वालों का रंग वैसे ही काला पड़ जाता है पच्चीस छब्बीस की होगी,                      चेहरे से ज़्यादा की लग रही थी, बाप कुछ बोला नहीं गरदन झुकाकर                      एक तरफ़ को बैठ गया। राजेश ने नाम पूछा तो औरत ने 'रूपा' बता                      दिया, शादी के लिए पूछने पर कह दिया जैसा ताऊजी कहेंगे। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                     &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;फिर                      राजेश के चाचा ने कहना शुरू किया देखो बिटिया ये दो बच्चों का                      बाप है? घर में बूढ़ी माँ है, घरवाली के इलाज में बहुत बरबाद                      हो गया है, इसके पास जमा पूँजी कुछ नहीं है, बस एक ट्रैक्टर                      और खेत में टयूबवैल है। एक हवेली और सात आठ एकड़ ज़मीन है। सारे                      जानवर बहू की बिमारी के दौरान देखभाल न हो पाने की खातिर बेच                      दिए हैं, तुम समझ लो बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, भाभी को सम्भालना                      होगा, बच्चों की देखभाल करनी होगी, तुम यह सब कर लोगी, रूपा ने                      हाँ में गरदन हिला दी, फिर उस रिश्तेदार जिसके यहाँ रुके थे ने                      कहना शुरू किया, ''बेटी ये बड़े किसान हैं परेशानी किसे नहीं                      आती, सब दिन एक समान नहीं होते जमी जमाई गृहस्थी है, मुझे यकीन                      है तुम ज़रूर सँभाल लोगी, फिर राजेश की तरफ़ मुखातिब होकर बोले                      राजेश जी आपने इसे देख लिया है आप हाँ कर रहे हो?'' राजेश ने                      भी हाँ कह दिया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="hi"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;दूसरे दिन गाँव के ही पंडित ने गाँव के मन्दिर                      में एक दूसरे के गले में जयमाला डलवा दी। राजेश और उसके चाचा                      रूपा को लेकर गाँव आ गए। चाचा जी ने अपने घर से खाना पका कर                      भेज दिया, खाना खा पीकर थोड़ी देर बातचीत कर सब सो गए। दूसरे                      दिन सूर्योदय से पहले ही जाग की खड़ी हुई रूपा, पूरे मकान की                      सफाई की छतों के जाले साफ़ किए, आँगन की लिपाई कर दी फ़र्श पर                      पोंछा लगाया, सभी कपड़ो की तह कर करीने से जगह पर रखे, रसोई की                      धुलाई कर दी राजेश थोड़ी देर देखता रहा फिर उठकर वह भी रूपा का                      हाथ बँटाने लगा, पड़ोस से दूध लाया चाय बनाई माँ को जगाया                      उन्हें चाय पिलाई फिर रूपा ने दोनों बच्चे जगाए, उनको सुबह ही                      नहला दिया, उनको नए कपड़े पहना दिए, दूध पिलाकर आँगन में खाट                      बिछाकर बैठा दिए, वे दानों खेलने लगे माँजी को नहला दिया। उनके                      बालों में थोड़ा तेल चुपड़कर कंघी कर दी, साफ़ धोती पहनने को                      दी, उनको भी बाहर खाट पर बिठा दिया, अब देखो कल शाम ही रूपा घर                      में आई थी सुबह उसके काम को देखकर लग रहा था जैसे बरसों से                      यहीं रह रही हो, हो भी क्यों न सेवा भाव हो तो हाथ पैर काम की                      तरफ़ अपने आप चलने लगते हैं, रूपा रसोई में गई सभी डिब्बे                      खोलकर देखा किस डिब्बे में क्या दालें हैं, आटा चावल के बरतन                      टटोले राजेश खेतों से कुछ सब्ज़ियाँ ले आया, इतने में रूपा ने                      पराठे सेंक दिए सभी का नाश्ता हो गया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;नाश्ते से निपटकर रूपा ने घर                      के सभी कपड़े धोए राजेश ने हेंडपंप चलाकर रूपा का सहयोग किया,                      दोनों ने मिलकर कपड़े फैला दिए, माँ आँगन में खाट पर बैठकर                      रूपा को काम करते हुए एक टक देखती रही, चन्द घन्टों में ही घर                      की काया पलट दी रूपा ने। सुबह के सारे कामों से निपट खुद                      नहाधोकर रूपा ने माँ जी से पूछा दिन में खाने के लिए क्या                      पकाना है। माँ जी ने उसे अपने साथ थोड़ी देर खाट पर बैठाया,                      कुलदीपक संशय भरी निगाह से देख रहा था रूपा को, उसने हाथ                      पकड़कर खींचा अपने सीने से लगाया, उसने उसके गालों को कई बार                      चूमा, फिर उसे छोड़कर मीनाक्षी को गोद में उठा लिया, उसे लेकर                      आँगन में ही टहलने लगी। चंद घन्टों में ही बच्चे भी अपना लिए                      माँ भी खुश।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;पड़ोस में नई दुल्हन आई हो और                      पड़ोसने देखने को न आएँ ऐसा कैसे हो सकता है? लिहाजा दोपहर के                      समय एक-एक दो-दो करके घर में आने लगीं। रूपा का रंग रूप देखकर                      सभी माँ जी से फुसफुसाने लगीं, ''अरे लाना ही था तो किसी                      अच्छी-सी देखने भालने में ठीक-सी लाते। ये क्या लाए हो? इतनी                      जल्दी भी क्या थी? अभी छ: महीने ही तो हुए हैं कमलेश को मरे।                      हमसे कहते हमारे मायके में है एक पति से बनी नहीं मायके में ही                      रह रही है इतनी सुन्दर की पूछो मत। माँ जी उनको सुनती रहीं                      बोली कुछ नहीं। थोड़ी देर में रूपा चाय बना लेकर आई सबको चाय                      के कप पकड़वाए। फिर जिस जिसको माँ जी ने बताया उनके पैर छुए                      सामने बैठ गई। पड़ोसनों का आना जाना दो तीन घन्टे चला आखिर में                      छाया आई। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;छाया इस गाँव की सबसे पढ़ी लिखी बहू                      है। एम.ए. तक पढ़ी है। लम्बी-सी चोटी माँग में सिन्दूर                      बड़ी-बड़ी आँखे गदराया हुआ शरीर गोरा चिट्ठा रंग जैसे अंग्रेज़                      हो। गाँव भर में इसके रूप रंग के चर्चे होते हैं। पति भी बहुत                      प्यार करता है। गाँव के जवान लड़के घर पर मंड़राते रहते हैं।                      बड़े सलीके से रहती है आसपास की औरतें इससे ईर्ष्या रखती हैं।                      बहुत कम बोलचाल है कुछ घमन्डी टाइप की है। यह नई बहुओं को                      देखने के लिए इसलिए जाती है कि कहीं आने वाली मुझसे ज़्यादा                      सुन्दर तो नहीं? बनाव शृंगार में घन्टों लगाती है इसके खर्चे                      भी बहुत हैं। छाया के पति ने घर में टीवी, फ्रिज, गैस चूल्हा                      सब रखा है। इन सबके लिए अपना पुराना ट्रैक्टर तक बेच दिया, जो                      इनकम होती है कुछ फैशन में, कुछ ज़ायके के हवाले हो जाती है। पर                      है बहुत खुश। बीबी जो अति सुन्दर है। छाया ने भरपूर नज़र रूपा                      के चेहरे पर डाली पूरा शरीर आँखो से टटोला फिर माँजी की तरफ़                      मुस्कुराकर देखा, अपने घर चली आई। रूपा के रूप रंग से गाँव की                      रूपवतियाँ खुश नहीं थी। एक ने दूसरे से कहा, ''हमें क्या है?                      जब राजेश को पसन्द है तो ठीक है।''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;रूपा को आए पूरा हफ्ता हो                      चुका है। माँ जी को लग रहा है जैसे रूपा हफ्ता नहीं बरसों से                      साथ है। सेवा में लगी रहती है, राजेश से कहकर दूध देने वाली                      भैंस ख़रीद ली। बच्चों को दूध घर का मिलने लगा, कुलदीपक स्कूल                      जाने लगा है मीनाक्षी अभी डेढ़ साल की है। रूपा कुलदीपक को                      बड़े प्यार से पढ़ा रही है। बच्चे मम्मी-मम्मी कहने लग गए हैं।                      राजेश खेतों की देखरेख में लग गया है। माँ जी सुबह शाम घूमने                      लगीं हैं, माँ जी के सिर में तेल ठोककर पैरों के तलवों की                      मालिश होने लगी है। पूरा घर घर की तरह हो गया है। गाँव के                      बाज़ार से कपड़ा लाकर बच्चों को नए कपड़े रूपा ने खुद सीकर                      पहना दिए, माँ जी का ब्लाउज पेटीकोट सी दिया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;पड़ोसने चुपचाप                      देखती रहती, रूपा को किसी और से बात करने की फुरसत कहाँ। इन्टर                      पास है गाँव के कॉलेज से वो भी कृषि विज्ञान से, उसने खेतों                      में जाना भी शुरू कर दिया। राजेश को खेत की मिट्टी की जाँच                      कराने को कहा सही बीज खाद का चयन करने को कहा। एक भैंस से घर                      के ही दूध की भरपाई हो पाती है, अगर हमारे पास आठ दस भैंसे                      होती तो हमारी इनकम बढ़ जाती बायो गैस प्लान्ट लग जाता घर की                      रोशनी के लिए सौर ऊर्जा संयत्र लग जाता गोबर के उपले की जगह                      जैविक खाद बनने लगती। किसी सरकारी बैंक से कर्ज़ लेकर राजेश ने                      रूपा की मनोकामना पूरी कर दी। भैंसो की देखरेख के लिए एक नौकर                      रख दिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;रूपा राजेश के संग पिछले एक                      डेढ़ साल से रह रही है। माँजी ने कहा, ''रूपा बेटी तुम्हारा भी                      एक बच्चा होता तो तुम्हारे लिए ही अच्छा होता।'' रूपा ने साफ़                      इनकार कर दिया, ''माँ जी भगवान की कृपा से बगैर पैदा किए दो                      बच्चे मिल गए और मुझे नहीं चाहिए। भगवान इनको लम्बी उमर दे।                      फिर माँ जी अपना पराया क्या है? क्या अपने बच्चे वाले सुखी                      हैं।'' राजेश की माली हालत पहले से काफी बेहतर हो गई। एक दिन                      माँ जी ने गाँव से रूपा के पिता जी को भी अपने घर पर ही बुला                      लिया। इनसे अब मजदूरी नहीं हो पाती है काफी कमज़ोर और बीमार हो                      गए थे। रूपा के अलावा इस संसार में इनका कोई नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;आज राजेश के घर के आगे नई कार                      खड़ी है। दूध की ब्रिकी से ख़रीदी है। बैंक में पैसा भी है, खेत                      पहले से दुगनी उपज वाले हो गए हैं। माँजी जवान लगने लग गईं है                      और बच्चे भी खुशहाल हैं। और क्या चाहिए राजेश को? उधर छाया के                      पति को उसके खर्चों ने कर्ज़दार बना दिया है। आज छाया रूपा के                      आगे नतमस्तक होकर खड़ी है उसे एक हज़ार रुपए की सख़्त ज़रूरत                      है। रूपा ने माँ जी की तरफ़ इशारा कर दिया उनसे ले लो। रूपा से                      मिलने के बाद और उसके कार्यकुशलता से प्रभावित होकर छाया को                      अपने रूप रंग पर खुद ही घृणा होने लगी। अब वह रूपा की दिवानी                      हो चली है। रूपा उसे कृ'षि' एंव पशुपालन                      की ट्रेनिंग दे रही है। उससे रूपा ने कहा दीदी आप मुर्गी फारम                      खोल लो बहुत जल्दी कार आ जाएगी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;                     &lt;/div&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;राजेश के चाचा उसकी मम्मी के                      सामने बैठे हैं रूपा की चर्चा पूरे गाँव में है बोल, ''भगवान                      ने मेरी लाज रख दी मैं अपने को धन्य भाग समझता हूँ। भाभी जी जो                      रूपा जैसी बेमिसाल औरत हमारे गाँव में हैं।'' माँजी की आँखे                      एक बार फिर छलछलाने लगीं पर ये आँसू खुशी के थे जो रूपा ने माँ                      जी को दी थी। आज इस बड़ापुर गाँव में रूपा से रूपवान कोई औरत                      नहीं हैं पर रूपा दूसरी औरत के रूप में आई है काश! कोई रूपा                      जैसी दुल्हन पहली औरत के रूप में सहर्ष ले आता।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/d/durgadutt_joshi.htm"&gt;दुर्गादत्त जोशी &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="hi"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7533725421417848714?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7533725421417848714/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7533725421417848714' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7533725421417848714'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7533725421417848714'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2009/09/blog-post_14.html' title='&apos;दूसरी औरत&apos;_(दुर्गादत्त जोशी )'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-4696918136684332413</id><published>2009-09-12T22:20:00.000+05:30</published><updated>2009-09-12T22:22:09.783+05:30</updated><title type='text'>काबुलीवाला_(रवीन्द्रनाथ ठाकुर)</title><content type='html'>मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी&lt;br /&gt;दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और  बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।" फिर मैं बाहर चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहमत हँसता हुआ कहता, "हाथी।" फिर वह मिनी से कहता, "तुम ससुराल कब जाओगी?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।" इस पर मिनी खूब हँसती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में "काबुलीवाले, काबुलीवाले", कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षणभर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, ‘’तुम ससुराल जाओगे?" रहमत ने हँसकर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई साल बीत गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा, "क्यों रहमत कब आए?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ," उसने बताया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, "ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले" चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ।  इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, “'यह थोड़ा सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, 'आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।'  फिर ज़रा ठहरकर बोला, “आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी हैं। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले  ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखकर मेरी आँखें भर आईं। सबकुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहनें पहने मिनी शरम से सिकुड़ी  मेरे पास आकर खड़ी हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न  करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने?  वह उसकी याद में खो गया।&lt;br /&gt;मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, “रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।“&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-4696918136684332413?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/4696918136684332413/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=4696918136684332413' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/4696918136684332413'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/4696918136684332413'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='काबुलीवाला_(रवीन्द्रनाथ ठाकुर)'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7550780789369319550</id><published>2008-10-20T10:41:00.002+05:30</published><updated>2008-10-20T10:49:57.970+05:30</updated><title type='text'>बास is हमेशा right.</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;एक बार मायावती, आडवाणी और लालू जी एक आटो मे सफर कर कही जा रहे थे। रास्ते मे एक दुर्घटना मे तीनो की मौत हो जाती है। यमलोक मे यमराज उनका इन्तजार कर रहे थे । वो पहले से तय कर चुके थे कि मायावती, आडवाणी को वे स्वर्ग मे और लालू जी को नरक मे भेजेगे। जब उन्होने अपना ये निर्णय तीनो को सुनाया तो लालू जी यमराज के इस निर्णय से संतुष्ट न थे। उन्होने से कहा महाराज आप इस तरह का भेदभावपूर्ण निर्णय क्यो ले रहे है? हम सभी ने जनता की सेवा कि है, घूस ली है, लोक सेवापद का दुरुपयोग किया है। फिर ये अन्याय मेरे हि साथ क्यो कर रहे है। मेरा मानना है कि आप किसी परीक्षा या ठोस आधार पर ये निर्णय ले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यमराज मान गये और सभी कि अंग्रेजी कि परीक्षा लेने को कहा । मायावती जी को इन्डिया (India) का शब्द-विन्यास (spell) करने को कहा गया जो उन्होने आसानी से कर दिया। आडवाणी जी को इग्लैड का शब्द-विन्यास करने को कहा गया उन्होने भी आसानी से कर दिया। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी को चैकोस्लोवाकिया (Czechoslovakia) का शब्द-विन्यास करने को कहा गया। लालू जी का वैसे हि अंग्रेजी मे हाथ-मुँह तंग था तो उनसे चैकोस्लोवाकिया का शब्द-विन्यास ना हो सका और फेल होने पर मजबूर होना पडा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू जी ने यमराज से कहा महाराज आप ने मुझसे कठिन सवाल पूछा जो सही नही था। आप कोई और परीक्षा ले ले। यमराज मान गये और इस बार हिन्दी कि परीक्षा लेने को कहा, लालू जी खुश थे कि हिन्दी कि परीक्षा तो वे आसानी से पास कर लेगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायावती जी को कहा गया लिखो – “कुत्ता बोला भौ भौ “ उन्होने आसानी से लिख दिया। आडवाणी जी को कहा गया लिखो – “चिडिया बोली ची ची “ उन्होने भी आसानी से लिख दिया। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी को कहा गया लिखो – “ गधा दौडा तबडक तबडक”। दूबारा कठिन सवाल पूछा गया, इस बार भी फेल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू जी अब भी खुश न थे । इतिहास के छात्र होने के कारण लालू जी ने अन्तिम परीक्षा इतिहास विषय पर लेने को कहा । यमराज मान गये चलो लालू जी को एक अन्तिम मौका दे देते है लेकिन उन्होने लालू जी को बता दिया कि इसके बाद कोई अन्य परीक्षा नही होगी और लालू जी को इस परीक्षा का निर्णय मानना हि पडेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायावती जी से पूछा गया – भारत देश कब आजाद हुआ ? उन्होने उतर दिया महाराज 1947 मे। इस परीक्षा मे भी पास। आडवाणी जी से पूछा गया – जलियावाला बाग कत्लेआम के लिये कौन जिम्मेदार था? उन्होने उतर दिया महाराज जनरल डायर। वे भी इस परीक्षा मे भी पास। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी से पूछा गया - आप उन सभी लोगो के नाम बताओ जो जलियावाला बाग कत्लेआम मे मारे गये ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू जी ने अपनी हार स्वीकार कर ली और नरक मे चल दिये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा : अगर आपके बास को लगता है आपका दिमाग ठिक से काम नही करता है तो आपको इस तथ्य को स्वीकारना ही होगा और भविष्य मे आने वाले बदलावो के लिये तैयार रहना पडेगा । इस तथ्य से भागने का कोई तरीका नही है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अंग्रेजी (English ) मे पढने के लिये &lt;a href="http://girishsingh.rediffiland.com/blogs/2008/10/10/Boss-is-always-Right.html"&gt;यहा किलक&lt;/a&gt; करे ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7550780789369319550?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7550780789369319550/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7550780789369319550' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7550780789369319550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7550780789369319550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2008/10/is-right.html' title='बास is हमेशा right.'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2214373421802787269</id><published>2008-10-20T10:38:00.000+05:30</published><updated>2008-10-20T10:40:47.349+05:30</updated><title type='text'>आ अब वापस आ जाये</title><content type='html'>नमस्कार चिटठाकार मित्रो  आशा करता हू आप सब ठिक ठाक होगे और जिन्दगी के क्षणो का आनंद ले रहे होगे। अपने काम मै कुछ ज्यादा ही व्यसत होने के कारण ब्लाग जगत से नाता टुट सा गया था ।पर अब लगता है मुझे वापस आ जाना चाहिये। महिने मे एक आध ही पोस्ट सही अपनी उपस्थिती तो दरज करा हि सकते है। इस बहाने आप लोगो से भी नाता जुडा रहेगा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2214373421802787269?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2214373421802787269/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2214373421802787269' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2214373421802787269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2214373421802787269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='आ अब वापस आ जाये'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-718764399415951259</id><published>2007-09-04T11:11:00.000+05:30</published><updated>2007-09-04T11:11:09.835+05:30</updated><title type='text'>“ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”</title><content type='html'>क्या आपने कभी गौर किया है कि किसी आफिस मे ज्यादा काम करने वाले को ही बास उसके काम के अलावा भी दूसरे काम क्यो पकडा देता है? क्यो वह शाम को 6:30 ( जो समय है उस दिन को बाय- बाय कहने का ) के बावजूद काम मे व्यस्त है? अगर बास उसे इतना हि भरोसेमंद समझता है तो क्यो उसको वेतन बढोतरी के समय रुलाया जाता है? जबकी उसके सहपाठी जो उस से कम या ना के बराबर काम करते है (क्योकि उन का ज्यादातर काम तो बेचारा वही करता है) मजे से आफिस सुख का आनंद ले रहे होते है, टेशंन फ्री होकर घूम रहे होते है, गप्पे लडा रहे होते है, हमउम्र के विपरित लिग वाले चोच लडा रहे होते है और वो बास के साथ झक छेत रहा होता है । इन सब सवालो का जबाब चाहिये तो आपको पगला कार्यसंस्कृति को विस्तार से समझना होगा। अब आप लोग कहेगे भइया ये होती क्या है? ये तो नरेन्द्र जी का हिन्दुस्तान दैनिक मे 17.08.07 को लिखा ये लेख पढ ले सबकुछ समझ मे आ जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार मे पागल होना रिस्की होता है । इसमे कामयाबी की संभावना कम होती है। लेकिन काम मे पागल होना शतप्रतिशत फलदायी होता है। पूरी सफलता की गारंटी । अपने आफिस मे आजमा कर देखिये। बडा साफ और सीधा फंडा है “ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ” । कार्यसंस्कृति का यह सिद्धांत बडा सरल है। जो जितना काम करेगा, उससे उतना ही काम करवाया जाएगा। ‘ए’ अगर बहुत अच्छा काम करता है बास ‘ए’ को ही काम करने के लिये कहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ए’ भले ही लंच मिस कर चुका हो और उसके पेट मे चूहे दौड रहे हो, उस के कानो मे तो बास की ये बात ही रहेगी कि ‘खूब बढिया से रेड्डी करवा दो बेटा, एकदम चकाचक’। अब ‘ए’ चाह्कर भी आफिस मे ‘बी’ कि तरह बेपरवाह ‘इडियन आयड्ल’ का फाईनल नही देख पाएगा। ‘पगला’ एक कार्यसंस्कृति है जिसे ‘बी’ ने अपना लिया है और इसी के साथ उस ने आफिस मे टेशन फ्री कैसे रहे का बोध हासिल कर लिया है। विस्तार से जान ना है कि ‘पगला कार्यसंस्कृति’ है क्या, तो पूरा सूत्र समझना होगा। आगे कहानी मे हम ‘ए’ को अगला और ‘बी’ को ‘पगला’ कहेगे। एक दिन जब बास ने ‘अगले’ को एक एसाइन्मेट दिया, तो काम सौपने का तरीका कुछ ऐसा था, मानो इसे ‘अगले’ के अलावा कोई कर ही नही सकता है… ‘अगला’ कोई चार घंटे तक प्यासे मन को डपट कर काबू मे रखने के बाद पानी पीने गया था कि इधर बास को उसकी जोरदार तलब हो गई। आग टाइप एक खबर आई और बास चीख पडे ‘अगला’ कहा गया उसे बुलाओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साथ दस ‘पगले’ ‘अगले’ के मोबाइल पर रिग करने लगे। दो-तीन ‘पगले’ तो चिल्लाते हुए दौड पडे – अभी-अभी पानी पीता हुआ दिखा था। एक ने तो ह्द कर दी। ‘अगले’ की बाह् पकडकर उसे लगभग धकेलते हुए बास के पास ले आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत्यंत गौरवान्वित होते हुए कहा- बास ये काम ‘अगले’ के अलावा कोई कर ही न ही सकता। ‘अगले’ ने बास की पूरी बात सुने बिना हाँ कर दी- ‘समझ गया बास हो जाएगा, अभी हो जाएगा’। सारे ‘पगले’ ‘अगले’ को ढूँढ कर लौट चुके थे। उस ‘पगले’ की और ईष्यार्लु नजरो से देख रहे थे, जो ‘अगले’ को पकड लाया था। देख लो बास… अभी तक हाफ रहे है। ‘अगला’ काम मे लग गया था। लंच की जरुरत अब महसूस नही हो रही थी। पेट पानी से भर चुका था। ‘पगला’ ‘अगले’ को देख कर गा रहा था – जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम । मेरे ख्याल है आप भी दफ्तर मे काम करने का ये बेजोड नुस्खा समझ गए होगे – “ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरेन्द्र जी का हिन्दुस्तान दैनिक मे लिखा ये लेख मुझे नेहरु पैलेस से कुछ सामान लेते हुए मिला। लेख पढा तो काफी अच्छा लगा और ज्ञानपूर्वक भी तो सोचा क्यो न आप लोगो तक भी कि ये बांटा जाये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-718764399415951259?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/718764399415951259/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=718764399415951259' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/718764399415951259'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/718764399415951259'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='“ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-9045973496532423701</id><published>2007-08-20T11:14:00.000+05:30</published><updated>2007-08-20T11:14:35.749+05:30</updated><title type='text'>गुल्ली-डंडा (पिछले भाग से आगे )</title><content type='html'>&lt;a id="d0:e" title="पिछले भाग से आगे" href="http://girishsingh.blogspot.com/2007/08/blog-post_20.html"&gt;पिछले भाग से आगे&lt;/a&gt;&lt;a href="http://girishsingh.blogspot.com/2007/08/blog-post_20.html"&gt; &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीस साल गुजर गए। मैंने इंजीनियरी पास की और उसी जिले का दौरा करता हुआ उसी कस्बे में पहँचा और डाकबँगले में ठहरा। उस स्थान को देखते ही इतनी मधुर बाल-स्मृतियॉँ हृदय में जाग उठीं कि मैंने छड़ी उठाई और क्स्बे की सैर करने निकला। ऑंखें किसी प्यासे पथिक की भॉँति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थीं; पर उस परिचित नाम के सिवा वहॉँ और कुछ परिचित न था। जहॉँ खँडहर था, वहॉँ पक्के मकान खड़े थे। जहॉँ बरगद का पुराना पेड़ था, वहॉँ अब एक सुन्दर बगीचा था। स्थान की काया पलट हो गई थी। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं उसे पहचान भी न सकता। बचपन की संचित और अमर स्मृतियॉँ बॉँहे खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थीं; मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जी होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गईं! मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ।&lt;br /&gt;सहसा एक खुली जगह में मैंने दो-तीन लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखा। एक क्षण के लिए मैं अपने का बिल्कुल भूल गया। भूल गया कि मैं एक ऊँचा अफसर हूँ, साहबी ठाठ में, रौब और अधिकार के आवरण में।&lt;br /&gt;जाकर एक लड़के से पूछा-क्यों बेटे, यहॉँ कोई गया नाम का आदमी रहता है?&lt;br /&gt;एक लड़के ने गुल्ली-डंडा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा-कौन गया? गया चमार?&lt;br /&gt;मैंने यों ही कहा-हॉँ-हॉँ वही। गया नाम का कोई आदमी है तो? शायद वही हो।&lt;br /&gt;‘हॉँ, है तो।‘&lt;br /&gt;‘जरा उसे बुला सकते हो?’&lt;br /&gt;लड़का दौड़ता हुआ गया और एक क्षण में एक पॉँच हाथ काले देव को साथ लिए आता दिखाई दिया। मैं दूर से ही पहचान गया। उसकी ओर लपकना चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊँ, पर कुछ सोचकर रह गया। बोला-कहो गया, मुझे पहचानते हो?&lt;br /&gt;गया ने झुककर सलाम किया-हॉँ मालिक, भला पहचानूँगा क्यों नहीं! आप मजे में हो?&lt;br /&gt;‘बहुत मजे में। तुम अपनी कहा।‘&lt;br /&gt;‘डिप्टी साहब का साईस हूँ।‘&lt;br /&gt;‘मतई, मोहन, दुर्गा सब कहॉँ हैं? कुछ खबर है?&lt;br /&gt;‘मतई तो मर गया, दुर्गा और मोहन दोनों डाकिया हो गए हैं। आप?’&lt;br /&gt;‘मैं तो जिले का इंजीनिया हूँ।‘&lt;br /&gt;‘सरकार तो पहले ही बड़े जहीन थे?&lt;br /&gt;‘अब कभी गुल्ली-डंडा खेलते हो?’&lt;br /&gt;गया ने मेरी ओर प्रश्न-भरी ऑंखों से देखा-अब गुल्ली-डंडा क्या खेलूँगा सरकार, अब तो धंधे से छुट्टी नहीं मिलती।&lt;br /&gt;‘आओ, आज हम-तुम खेलें। तुम पदाना, हम पदेंगे। तुम्हारा एक दॉँव हमारे ऊपर है। वह आज ले लो।‘&lt;br /&gt;गया बड़ी मुश्किल से राजी हुआ। वह ठहरा टके का मजदूर, मैं एक बड़ा अफसर। हमारा और उसका क्या जोड़? बेचारा झेंप रहा था। लेकिन मुझे भी कुछ कम झेंप न थी; इसलिए नहीं कि मैं गया के साथ खेलने जा रहा था, बल्कि इसलिए कि लोग इस खेल को अजूबा समझकर इसका तमाशा बना लेंगे और अच्छी-खासी भीड़ लग जाएगी। उस भीड़ में वह आनंद कहॉँ रहेगा, पर खेले बगैर तो रहा नहीं जाता। आखिर निश्चय हुआ कि दोनों जने बस्ती से बहुत दूर खेलेंगे और बचपन की उस मिठाई को खूब रस ले-लेकर खाऍंगे। मैं गया को लेकर डाकबँगले पर आया और मोटर में बैठकर दोनों मैदान की ओर चले। साथ में एक कुल्हाड़ी ले ली। मैं गंभीर भाव धारण किए हुए था, लेकिन गया इसे अभी तक मजाक ही समझ रहा था। फिर भी उसके मुख पर उत्सुकता या आनंद का कोई चिह्न न था। शायद वह हम दोनों में जो अंतर हो गया था, यही सोचने में मगन था।&lt;br /&gt;मैंने पूछा-तुम्हें कभी हमारी याद आती थी गया? सच कहना।&lt;br /&gt;गया झेंपता हुआ बोला-मैं आपको याद करता हजूर, किस लायक हूँ। भाग में आपके साथ कुछ दिन खेलना बदा था; नहीं मेरी क्या गिनती?&lt;br /&gt;मैंने कुछ उदास होकर कहा-लेकिन मुझे तो बराबर, तुम्हारी याद आती थी। तुम्हारा वह डंडा, जो तुमने तानकर जमाया था, याद है न?&lt;br /&gt;गया ने पछताते हुए कहा-वह लड़कपन था सरकार, उसकी याद न दिलाओ।&lt;br /&gt;‘वाह! वह मेरे बाल-जीवन की सबसे रसीली याद है। तुम्हारे उस डंडे में जो रस था, वह तो अब न आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में।‘&lt;br /&gt;इतनी देर में हम बस्ती से कोई तीन मील निकल आये। चारों तरफ सन्नाटा है। पश्चिम ओर कोसों तक भीमताल फैला हुआ है, जहॉँ आकर हम किसी समय कमल पुष्प तोड़ ले जाते थे और उसके झूमक बनाकर कानों में डाल लेते थे। जेठ की संध्या केसर में डूबी चली आ रही है। मैं लपककर एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी काट लाया। चटपट गुल्ली-डंडा बन गया। खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली। गुल्ली गया के सामने से निकल गई। उसने हाथ लपकाया, जैसे मछली पकड़ रहा हो। गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी। यह वही गया है, जिसके हथों में गुल्ली जैसे आप ही आकर बैठ जाती थी। वह दाहने-बाऍं कहीं हो, गुल्ली उसकी हथेली में ही पहूँचती थी। जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो। नयी गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली सभी उससे मिल जाती थी। जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, गुल्लियों को खींच लेता हो; लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा। फिर तो मैंने पदाना शुरू किया। मैं तरह-तरह की धॉँधलियॉँ कर रहा था। अभ्यास की कसर बेईमानी से पूरी कर रहा था। हुच जाने पर भी डंडा खुले जाता था। हालॉँकि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी। गुल्ली पर ओछी चोट पड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोबारा टॉँड़ लगाता। गया यह सारी बे-कायदगियॉँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गए। उसका निशाना कितना अचूक था। गुल्ली उसके हाथ से निकलकर टन से डंडे से आकर लगती थी। उसके हाथ से छूटकर उसका काम था डंडे से टकरा जाना, लेकिन आज वह गुल्ली डंडे में लगती ही नहीं! कभी दाहिने जाती है, कभी बाऍं, कभी आगे, कभी पीछे।&lt;br /&gt;आध घंटे पदाने के बाद एक गुल्ली डंडे में आ लगी। मैंने धॉँधली की-गुल्ली डंडे में नहीं लगी। बिल्कुल पास से गई; लेकिन लगी नहीं।&lt;br /&gt;गया ने किसी प्रकार का असंतोष प्रकट नहीं किया।&lt;br /&gt;‘न लगी होगी।‘&lt;br /&gt;‘डंडे में लगती तो क्या मैं बेईमानी करता?’&lt;br /&gt;‘नहीं भैया, तुम भला बेईमानी करोगे?’&lt;br /&gt;बचपन में मजाल था कि मैं ऐसा घपला करके जीता बचता! यही गया गर्दन पर चढ़ बैठता, लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिए चला जाता था। गधा है! सारी बातें भूल गया।&lt;br /&gt;सहसा गुल्ली फिर डंडे से लगी और इतनी जोर से लगी, जैसे बन्दूक छूटी हो। इस प्रमाण के सामने अब किसी तरह की धांधली करने का साहस मुझे इस वक्त भी न हो सका, लेकिन क्यों न एक बार सबको झूठ बताने की चेष्टा करूँ? मेरा हरज की क्या है। मान गया तो वाह-वाह, नहीं दो-चार हाथ पदना ही तो पड़ेगा। अँधेरा का बहाना करके जल्दी से छुड़ा लूँगा। फिर कौन दॉँव देने आता है।&lt;br /&gt;गया ने विजय के उल्लास में कहा-लग गई, लग गई। टन से बोली।&lt;br /&gt;मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा-तुमने लगते देखा? मैंने तो नहीं देखा।&lt;br /&gt;‘टन से बोली है सरकार!’&lt;br /&gt;‘और जो किसी ईंट से टकरा गई हो?&lt;br /&gt;मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला, इसका मुझे खुद आश्चर्य है। इस सत्य को झुठलाना वैसा ही था, जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने गुल्ली को डंडे में जोर से लगते देखा था; लेकिन गया ने मेरा कथन स्वीकार कर लिया।&lt;br /&gt;‘हॉँ, किसी ईंट में ही लगी होगी। डंडे में लगती तो इतनी आवाज न आती।‘&lt;br /&gt;मैंने फिर पदाना शुरू कर दिया; लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धॉँधली कर लेने के बाद गया की सरलता पर मुझे दया आने लगी; इसीलिए जब तीसरी बार गुल्ली डंडे में लगी, तो मैंने बड़ी उदारता से दॉँव देना तय कर लिया।&lt;br /&gt;गया ने कहा-अब तो अँधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।&lt;br /&gt;मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाए, इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा।&lt;br /&gt;‘नहीं, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दॉँव ले लो।‘&lt;br /&gt;‘गुल्ली सूझेगी नहीं।‘&lt;br /&gt;‘कुछ परवाह नहीं।‘&lt;br /&gt;गया ने पदाना शुरू किया; पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने दो बार टॉँड लगाने का इरादा किया; पर दोनों ही बार हुच गया। एक मिनिट से कम में वह दॉँव खो बैठा। मैंने अपनी हृदय की विशालता का परिश्च दिया।&lt;br /&gt;‘एक दॉँव और खेल लो। तुम तो पहले ही हाथ में हुच गए।‘&lt;br /&gt;‘नहीं भैया, अब अँधेरा हो गया।‘&lt;br /&gt;‘तुम्हारा अभ्यास छूट गया। कभी खेलते नहीं?’&lt;br /&gt;‘खेलने का समय कहॉँ मिलता है भैया!’&lt;br /&gt;हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिराग जलते-जलते पड़ाव पर पहुँच गए। गया चलते-चलते बोला-कल यहॉँ गुल्ली-डंडा होगा। सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे। तुम भी आओगे? जब तुम्हें फुरसत हो, तभी खिलाड़ियों को बुलाऊँ।&lt;br /&gt;मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस आदमियों की मंडली थी। कई मेरे लड़कपन के साथी निकले! अधिकांश युवक थे, जिन्हें मैं पहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा। आज गया का खेल, उसका नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया। टॉँड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बातें करती। कल की-सी वह झिझक, वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज न थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसेन प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह पदाया होता, तो मैं जरूर रोने लगता। उसके डंडे की चोट खाकर गुल्ली दो सौ गज की खबर लाती थी।&lt;br /&gt;पदने वालों में एक युवक ने कुछ धॉँधली की। उसने अपने विचार में गुल्ली लपक ली थी। गया का कहना था-गुल्ली जमीन मे लगकर उछली थी। इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई है। युवक दब गया। गया का तमतमाया हुआ चेहरा देखकर डर गया। अगर वह दब न जाता, तो जरूर मार-पीट हो जाती।&lt;br /&gt;मैं खेल में न था; पर दूसरों के इस खेल में मुझे वही लड़कपन का आनन्द आ रहा था, जब हम सब कुछ भूलकर खेल में मस्त हो जाते थे। अब मुझे मालूम हुआ कि कल गया ने मेरे साथ खेला नहीं, केवल खेलने का बहाना किया। उसने मुझे दया का पात्र समझा। मैंने धॉँधली की, बेईमानी की, पर उसे जरा भी क्रोध न आया। इसलिए कि वह खेल न रहा था, मुझे खेला रहा था, मेरा मन रख रहा था। वह मुझे पदाकर मेरा कचूमर नहीं निकालना चाहता था। मैं अब अफसर हूँ। यह अफसरी मेरे और उसके बीच में दीवार बन गई है। मैं अब उसका लिहाज पा सकता हूँ, अदब पा सकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया योग्य हूँ। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-9045973496532423701?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/9045973496532423701/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=9045973496532423701' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/9045973496532423701'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/9045973496532423701'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/08/blog-post_9062.html' title='गुल्ली-डंडा (पिछले भाग से आगे )'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7665610060336256625</id><published>2007-08-20T11:08:00.000+05:30</published><updated>2007-08-20T11:08:29.828+05:30</updated><title type='text'>गुल्ली-डंडा (मुंशी प्रेमचन्द्र )</title><content type='html'>हिन्दी के वरिष्ट तथा प्रतिष्टित कथाकारको  मे एक नाम है मुंशी प्रेमचन्द्र का।  मैनै मुंशी प्रेमचन्द्र  की लगभग सभी रचनाओ को पढा है। उनकी  रचनाओ को पढकर हि मै जान पाया कि क्यो उन्हे कहानी स्र्माट कहा जाता है।लगभग 11-12 साल कि उम्र मे मुझे उन की कहानी गुल्ली-डंडा पढने का मौका मिला। मुझे ये कहानी काफी अच्छी  लगी क्योकि मै भी तब काफी गुल्ली-डंडा खेलता था। मुझे इस बात का आभास था कि इस खेल मे कितना मजा आता है। इस कहानी ने मुझे जहा एक तरफ गुल्ली डंडे कि हिन्दुतानिय्त का एह्सास तो दूसरी  तरफ व वरगभेद का आभास कराया। मेरे लिये कहानी का हीरो गया था। कथानक जो 20 साल बाद इंजीनियर बनकर लौटता है और गया से गुल्ली-डंडा खेलने को कहता है तो वह ना चाह्ते हुए भी ना नही कर पाता ।  वह  कथानक के खेल के दौरान लाख बेमानी करने पर भी शांत रहता है। कथानक को बाद मे इस बात का एहसास हो जाता है कि गया उस पर मेहरबानी कर रहा था। पर प्रेमचन्द्र जी कहानी का दूसरा पहलू यह दिखाना चाह्ते थे की गया के दिल मे कथानक के लिये मेहरबानी हि ना थी बगावत भी थी  वरना क्यो वह दूसरे दिन मैच का इन्तज़ाम करके ये जाहिर करता कि उसे इस खेल मे कितनी महारत हासिल है। खैर ये  सब का अलग अलग नजरिया है। कुछ की सहानुभूति गया के साथ तो कुछ की कथानक के साथ पर जो भी है आशा करता हूँ आप सब को यह कहानी जरुर पंसद आयेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे अँग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया।&lt;br /&gt;विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैंकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता। यहॉँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रूपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाऍं, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो? ठीक है, गुल्ली से ऑंख फूट जाने का भय रहता है, तो क्या क्रिकेट से सिर फूट जाने, तिल्ली फट जाने, टॉँग टूट जाने का भय नहीं रहता! अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है, तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं, जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे। यह अपनी-अपनी रूचि है। मुझे गुल्ली की सब खेलों से अच्छी लगती है और बचपन की मीठी स्मृतियों में गुल्ली ही सबसे मीठी है।&lt;br /&gt;वह प्रात:काल घर से निकल जाना, वह पेड़ पर चढ़कर टहनियॉँ काटना और गुल्ली-डंडे बनाना, वह उत्साह, वह खिलाड़ियों के जमघटे, वह पदना और पदाना, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, जिससे छूत्-अछूत, अमीर-गरीब का बिल्कुल भेद न रहता था, जिसमें अमीराना चोचलों की, प्रदर्शन की, अभिमान की गुंजाइश ही न थी, यह उसी वक्त भूलेगा जब .... जब ...। घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे वेग से रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं, अम्माँ की दौड़ केवल द्वार तक है, लेकिन उनकी विचार-धारा में मेरा अंधकारमय भविष्य टूटी हुई नौका की तरह डगमगा रहा है; और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ, न नहाने की सुधि है, न खाने की। गुल्ली है तो जरा-सी, पर उसमें दुनिया-भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा हुआ है।&lt;br /&gt;मेरे हमजोलियों में एक लड़का गया नाम का था। मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा। दुबला, बंदरों की-सी लम्बी-लम्बी, पतली-पतली उँगलियॉँ, बंदरों की-सी चपलता, वही झल्लाहट। गुल्ली कैसी ही हो, पर इस तरह लपकता था, जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है। मालूम नहीं, उसके मॉँ-बाप थे या नहीं, कहॉँ रहता था, क्या खाता था; पर था हमारे गुल्ली-कल्ब का चैम्पियन। जिसकी तरफ वह आ जाए, उसकी जीत निश्चित थी। हम सब उसे दूर से आते देख, उसका दौड़कर स्वागत करते थे और अपना गोइयॉँ बना लेते थे।&lt;br /&gt;एक दिन मैं और गया दो ही खेल रहे थे। वह पदा रहा था। मैं पद रहा था, मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते है; पदना एक मिनट का भी अखरता है। मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चलीं, जो ऐसे अवसर पर शास्त्र-विहित न होने पर भी क्षम्य हैं, लेकिन गया अपना दॉँव लिए बगैर मेरा पिंड न छोड़ता था।&lt;br /&gt;मैं घर की ओर भागा। अननुय-विनय का कोई असर न हुआ था।&lt;br /&gt;गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला-मेरा दॉँव देकर जाओ। पदाया तो बड़े बहादुर बनके, पदने के बेर क्यों भागे जाते हो।&lt;br /&gt;‘तुम दिन-भर पदाओ तो मैं दिन-भर पदता रहँ?’&lt;br /&gt;‘हॉँ, तुम्हें दिन-भर पदना पड़ेगा।‘&lt;br /&gt;‘न खाने जाऊँ, न पीने जाऊँ?’&lt;br /&gt;‘हॉँ! मेरा दॉँव दिये बिना कहीं नहीं जा सकते।‘&lt;br /&gt;‘मैं तुम्हारा गुलाब हूँ?’&lt;br /&gt;‘हॉँ, मेरे गुलाम हो।‘&lt;br /&gt;‘मैं घर जाता हूँ, देखूँ मेरा क्या कर लेते हो!’&lt;br /&gt;‘घर कैसे जाओगे; कोई दिल्लगी है। दॉँव दिया है, दॉँव लेंगे।‘&lt;br /&gt;‘अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था। वह लौटा दो।&lt;br /&gt;‘वह तो पेट में चला गया।‘&lt;br /&gt;‘निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद?’&lt;br /&gt;‘अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। मैं तुमसे मॉँगने न गया था।‘&lt;br /&gt;‘जब तक मेरा अमरूद न दोगे, मैं दॉँव न दूँगा।‘&lt;br /&gt;मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरूद खिलाया होगा। कौन नि:स्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए देते हैं। जब गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुझसे दॉँव लेने का क्या अधिकार है? रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं, यह मेरा अमरूद यों ही हजम कर जाएगा? अमरूद पैसे के पॉँचवाले थे, जो गया के बाप को भी नसीब न होंगे। यह सरासर अन्याय था।&lt;br /&gt;गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा-मेरा दॉँव देकर जाओ, अमरूद-समरूद मैं नहीं जानता।&lt;br /&gt;मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागना चाहता था। वह मुझे जाने न देता! मैंने उसे गाली दी, उसने उससे कड़ी गाली दी, और गाली-ही नहीं, एक चॉँटा जमा दिया। मैंने उसे दॉँत काट लिया। उसने मेरी पीठ पर डंडा जमा दिया। मैं रोने लगा! गया मेरे इस अस्त्र का मुकाबला न कर सका। मैंने तुरन्त ऑंसू पोंछ डाले, डंडे की चोट भूल गया और हँसता हुआ घर जा पहुँचा! मैं थानेदार का लड़का एक नीच जात के लौंडे के हाथों पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हीं दिनों पिताजी का वहॉँ से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने की खुशी में ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिलकुल दु:ख न हुआ। पिताजी दु:खी थे। वह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्मॉँजी भी दु:खी थीं यहॉँ सब चीज सस्ती थीं, और मुहल्ले की स्त्रियों से घराव-सा हो गया था, लेकिन मैं सारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों में जीट उड़ा रहा था, वहॉँ ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे घर हैं कि आसमान से बातें करते हैं। वहॉँ के अँगरेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पीटे, तो उसे जेहल हो जाए। मेरे मित्रों की फैली हुई ऑंखे और चकित मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाह में कितना स्पर्द्घा हो रही थी! मानो कह रहे थे-तु भागवान हो भाई, जाओ। हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7665610060336256625?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7665610060336256625/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7665610060336256625' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7665610060336256625'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7665610060336256625'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/08/blog-post_20.html' title='गुल्ली-डंडा (मुंशी प्रेमचन्द्र )'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8313641881930360051</id><published>2007-08-14T10:37:00.000+05:30</published><updated>2007-08-14T10:37:10.608+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चक दे इंडिया'/><title type='text'>फिल्म समीक्षा - ‘चक दे इंडिया’</title><content type='html'>बहुत दिनो से कोई फिल्म नही देखी थी सोचा चलो आज ये काम भी कर लिया जाये। जीतू भईया ने तो ‘कैश’ देखने का मन बनाने के लिये पहले ही चेतावनी दे चुके थे और मेरा भी मारधाड और काल्पनिक विषय को झेलने का हौशला ना था। रह गई थी ‘चक दे इंडिया’ । बहुत सुना था इस फिल्म के बारे मे सोचा चलो आज आजमा लेते है वैसे भी किसी नये विषय मे बनी फिल्म थी। सच मानो फिल्म देखकर समय और पैसे कि पूरी वशूली हो गई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हॉकी हमारा राष्ट्रीय और देसी खेल है, लेकिन आज यह पिछड़ा हुआ खेल माना जाता है। पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय खेल हॉकी में हमारे देश की टीम का प्रदर्शन बेहद लचर है। इसकी वजह से यह खेल अपनी लोकप्रियता खो बैठा है। हॉकी एसोसिएशन के पदाधिकारियों की सोच रहती है कि चकला-बेलन चलाने वाली लड़कियाँ हॉकी क्या खेलेंगी, लेकिन निर्देशक ने कई दृश्यों के जरिये साबित किया है कि महिलाएँ किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं। इस खेल और देशभक्ति को आपस में सही अनुपात मिलाकर यशराज फिल्म्स ने इतने उम्दा तरीके से फिल्म बनाई है कि ‍सिनेमाघर में बैठकर दर्शक के अंदर देशभक्ति की भावनाएँ हिलोरे लेने लगती हैं। ना कोई फालतू की मार-धाड, ना फालतू के रोमांस कि खिचडि, ना कोई फालतू दृश्य या संवाद । पटकथा एकदम कसी हुई। दर्शक पहली फ्रेम से ही फिल्म में खो जाता है। छोटे-छोटे दृश्यों में कई बातें सामने आती हैं, जो निर्देशक और लेखक की सोच बयान करती हैं। कई बातें बिना संवादों के केवल दृश्यों के माध्यम से कहीं गई हैं। मसलन शाहरुख को खटारा स्कूटर पर बैठाकर निर्देशक ने भारत के श्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी की आर्थिक स्थिति बता दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबीर खान (शाहरुख खान) कभी भारतीय हॉकी टीम का कप्तान हुआ करता था। उसकी कभी दुनिया के श्रेष्ठ सेंटर फॉरवर्ड में गिनती हुआ करती थी। खेल के दौरान एक मामूली चूक के कारण उसे गद्दार मान लिया गया। आज उसकी कोई पहचान नहीं है। उसे कठिन चुनौतियाँ स्वीकारना अच्छा लगता है। उसके अंदर ‘जो नहीं हो सकता है, वहीं करना है’ जैसी भावनाएँ मौजूद है। अपने इस कलंक को धोने के लिए वह एक कठिन चुनौती स्वीकार करता है। वह महिला हॉकी टीम का कोच बनकर इस ‍टीम को विश्वविजेता बनाता है। भारतीय महिला हॉकी टीम को प्रशिक्षण देना बेहद कठिन है। इस टीम में कोई जोश नहीं है। अच्छा खेलने की चाहत नहीं है। भारत के लिए खेलने में जो गर्व महसूस होता है वह कभी इस टीम के खिलाडियों ने महसूस नहीं किया है। वे सिर्फ इसलिए खेल रही हैं ता‍कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें कुछ सरकारी लाभ मिलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिला टीम होने के कारण इन्हें पुरुषों की छींटाकशी ‍का‍ शिकार भी होना पड़ता है। कबीर खान उन्हें सीखाता है कि 'जो महिला पुरुष को पैदा कर सकती है वह कुछ भी कर सकती है'। कोई भी मैच जीतने का स्वाद कैसा होता है। ट्राफी जीतकर उसे उठाने में कितना आनंद आता है। भारत के लिए खेलना कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। ‘चक दे इंडिया’ उस कबीर खान की कहानी है जिसे निचले पायदान वाली टीम को सँवारना है।&lt;br /&gt;शाहरुख खान ने एक कलंकित खिलाड़ी और कठोर प्रशिक्षक की भूमिका को बखूबी निभाया है। वे शाहरुख खान नहीं लगकर कबीर खान लगे हैं। कई दृश्यों में उन्होंने अपने भाव मात्र आँखों से व्यक्त किए हैं। कलंक धोने की उनकी बेचैनी उनके चेहरे पर दिखाई देती है। उनकी टीम में शामिल 16 लड़कियाँ भी शाहरुख को टक्कर देने के मामले में कम नहीं रहीं। उनकी आपसी नोकझोंक और हॉकी खेलने वाले दृश्य उम्दा हैं। पंजाब और हरियाणा से आई लड़कियों का अभिनय शानदार है।फिल्म 2-3 गाने हैं, लेकिन वे पार्श्व में बजते रहते हैं। इन गीतों का उपयोग बिलकुल सही स्थानों पर किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चक दे इंडिया’ के जरिये निर्देशक शिमित अमीन और लेखक जयदीप साहनी ने कई बातें कही हैं। जैसे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;· हॉकी की हमारे देश में जो स्थिति है उसके लिये सिर्फ खिलाडियों को ही जिम्मेदार मानना सही नही है, उसके लिये हॉकी संघ में बैठे भ्रष्ट लोग भी उतने ही जिम्मेदार है।&lt;br /&gt;· हॉकी खिलाड़ियों की आर्थिक स्थिति कैसी होती है। मसलन शाहरुख का खटारा स्कूटर पर बैठकर कोचिग देने जान भारत के श्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी की आर्थिक स्थिति बताती है।&lt;br /&gt;· एक सच्चे देशभक्त मुस्लिम को हर समय संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। खेल के दौरान एक मामूली चूक के कारण कबीर खान को गद्दार मान लिया गया।&lt;br /&gt;· महिला खिलाड़ियों को पुरुषों से कमतर आंका जाता है ऐसा समझा जाता है चकला-बेलन चलाने वाली लड़कियाँ हॉकी क्या खेलेंगी&lt;br /&gt;· मिजोरम जैसे उत्तर-पूर्वी लोगों को हमारे देश का सदस्य नहीं माना जाता है।&lt;br /&gt;· मै हिन्दू हूँ, यह मुस्लिम है, वह सिख है, सभी बोलते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि सबसे पहले वे भारतीय हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै तो इस फिल्म को 100 मे से 99 अंक दूँगा तथा आप लोगो से ‘चक दे इंडिया’ को देखकर आने कि अपील करुँगा अगर आप एक अच्छी फिल्म देखने के उदेश्य से सिनेमाहाल जाते है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8313641881930360051?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8313641881930360051/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8313641881930360051' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8313641881930360051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8313641881930360051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/08/blog-post_14.html' title='फिल्म समीक्षा - ‘चक दे इंडिया’'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8661379354596505577</id><published>2007-08-06T10:36:00.001+05:30</published><updated>2007-08-06T10:36:42.255+05:30</updated><title type='text'>मित्रता दिवस - मैत्री पर्व</title><content type='html'>सभी चिट्ठाकार मित्रो को मित्रता दिवस कि हार्दिक शुभकामनाये। माफ करना चिट्ठाकार मित्रो नई नियुक्ति कि शुरुआती व्यक्ता तथा अपने को माहौल के अनुसार ढलने मे कुछ ज्यादा समय लगा । ये पोस्ट तो मेरे को कल पोस्ट करनी चाहिये थी पर समयाभाव के कारण न कर सका। तो हम बात कर  रहे है मित्रता दिवस कि। आमतौर पर लोग इस तरह के दिवसो कि आलोचना करते है क्योकि उन्हे लगता है कि हमे इस तरह के दिवसो कि आवश्य्कता नही है। पर उन्हे क्या पता आजकल के भौतिकवादी, उपभोक्तावादी, मशीनी युग में वे यंत्रवत जीवन शैली में जिंदा है, पर जीने की अदा भूल चुके है। एक ठंडी आह और कसक के साथ हम सब चले जा रहे हैं, अपने कंधों पर अपने-अपने सलीब उठाए। जिस तरह से तमाम नजदिकी संबंध या खून के रिश्ते  खत्म हो रहे है या ढोये जा रहे है सिर्फ दोस्ती वह रिश्ता है जिसका जज्बा आज भी वैसे ही बरकरार है। द्वंद्व और उलझनों से भरे जीवन में कुछ पल शांति और सुकून के मिलते हैं तो वह सिर्फ इस दोस्ती के दायरे में ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी में खुशियों के रंग भरने वाला हसीन रिश्ता है - दोस्ती। इस प्यार भरे रिश्ते को सम्मान दिलाने के लिए अमेरिका में कुछ लोगों ने एक दिन दोस्ती के नाम करना तय किया। उनकी कोशिशें रंग लाईं और सन् 1935 में अमेरिका में अगस्त के पहले रविवार को आधिकारिक रूप से फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस) घोषित किया गया। पिछले 72 सालों में फ्रेंडशिप डे ने अमेरिका की सरहदों को लाँघकर पूरे विश्व में अपना स्थान बना लिया है। जिस तरह से दोस्ती का जज्बा हर दिल, हर देश में होता है, वह किसी जाति, कुल, धर्म, संप्रदाय या प्रांत कि मोहताज नही होती है। जब दोस्ती के रिश्ते के कोई नियम, कायदे-कानून नहीं होते तो इसके सम्मान में समर्पित मित्रता दिवस  (फ्रेंडशिप डे) किसी देश या समाज मे कैसे बंध सकता है। इसलिये मित्रता दिवस भी दुनिया के हर मुल्क में मनाया जाने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह जोडियाँ स्वर्ग में बनने की बात लोग करते हैं, शायद सच्ची दोस्ती भी स्वर्ग में ही बनती होगी। इंसान जब जन्म लेता है तब उसे स्वयं नहीं पता होता कि वह किस जाति, कुल, धर्म, संप्रदाय या प्रांत का हिस्सा बनने जा रहा है। अपने जन्म के साथ ही वह माँ की कोख से अपने साथ लाता है सिर्फ 'रिश्ते', 'खून के रिश्ते'  जैसे भाई-बहन, चाचा-ताऊ-मौसा-मामा जिन्हें वह चाहे तो भी बदल नहीं सकता, बना नहीं पाता, मिटा नहीं पाता। ये रिश्ते बँधे होते हैं मर्यादाओं, परंपराओं और परिस्थितियों की जंजीरों से। बँधना कोई नहीं चाहता। हर इंसान की सहज प्रवृत्ति होती है मुक्ति की चाह, अभिव्यक्ति की इच्छा और यहीं से प्रारंभ होता है एक अच्छे साथी की खोज का शायद यही कारण है कि लाख अच्छा वातावरण और परिवेश होने के बावजूद थोड़ा-सा भी स्वविवेक जागते ही हर व्यक्ति एक 'मित्र' की आकांक्षा में एक नए और अनजाने सफर पर निकल पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई नदी अपने उद्गम स्थल से निकलते ही पूरे उफान और वेग के साथ बह पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया मे कई एसे संबध होते है जिन का अस्तित्व समय के साथ खत्म हो जाता है पर दोस्ती वो जज्बा है जो हमेशा तरोताजा रहता है। ईश्वर ने ऐसे खूबसूरत रिश्ते की बागडोर पूरी तरह से हमारे हाथों में सौंप दी है, जिसके साथ हमारे जीवन की सारी खुशियाँ और सारे गम जुड़े होते हैं। ईश्वर ने हमें पूरी स्वतंत्रता दी है कि हम अपने दोस्त खुद बनाएँ और यह रिश्ता जैसे चाहे, वैसे निभाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्ती, स्नेह, भावना, विचारधारा या अहसास की धरती से अंकुरित नहीं होती, अपितु इसकी नींव जरूरतों की पूर्ति पर टिकी होती है। सच्ची 'मित्रता' वह तो दुनिया के सारे रिश्ते-नातों से ऊपर है। यही वजह है कि इसमें उम्र, कुल, धर्म, संप्रदाय जैसे क्षेपक कभी नहीं लग पाते। यह आस्था और विश्वास का वह अंकुर होती है जो एक बार हृदय में प्रस्फुटित हुआ तो ताउम्र जीवन को सुरभित और सुवासित करता है। इसकी महक आपके व्यक्तित्व और रूह में रच-बस जाती है, इसीलिए परोक्षतः साथ न होने पर भी आपके मित्र की मित्रता सदैव आपके साथ-साथ चलती है। ऐसा साथ परिवार में मिलना मुश्किल है। कारण भी स्पष्ट है कि पारिवारिक रिश्ते 'निरपेक्ष' नहीं रह पाते। उनके पीछे एक अलग पृष्ठभूमि होती है जो बाधक न भी हो तो भी मित्रता की कसौटी पर सध नहीं पाती, क्योंकि सबके अपने-अपने विचार और मूल्य कहीं न कहीं आड़े ही आ जाते हैं। इसीलिए हमें जरूरत होती है एक ऐसे व्यक्ति की जो पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ हमारी अनुभूतियों का साक्षी बने, जो पूरी करुणा के साथ हमारी पीड़ा व दुःख के गहनतम क्षणों को हमारे साथ-साथ भोगे, जिसका स्नेह ऐसा हो कि जब वह बरसे तो मन की धरती से मुस्कुराहटों की कोपलें फूट पड़ें और जो हमारी भूलों पर आवरण न डालते हुए हमें आईना दिखाने के बाद स्वयं बाँहें पसार उनमें समा जाने का आमंत्रण दें। एक ऐसा साथ जो पूजा की तरह पवित्र व सात्विक हो और सर्वथा निर्विकार हो। ऐसा अपनत्व जो मन की गहराइयों को छूकर हमारी धमनी और शिराओं में हमें महसूस हो और हमारी हर धड़कन के साथ स्पंदित हो... यकीनन ये सब भावना के आवेग से उपजे शब्द प्रतीत हो सकतेहैं, मगर हर उस व्यक्ति को जिसकी जिंदगी में कोई सच्चा 'मित्र' रहा हो, उसे यह अपनी ही बात लगेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्रता का शिल्प विश्वास से बना होता है और यह विश्वास इतना कमजोर कतई नहीं होता कि छोटे-छोटे झटके उसे बिखेर दें। सही मित्रता जीवन का प्रकाश पुंज होती है, साथ न रहने पर भी उसकी यादें आपकी राहों को रोशन करती हैं। इसलिए मैत्री पर्व के सुखद अवसर पर यही कामना करता हूँ कि दुनिया के तमाम दोस्तों की हथेलियाँ जुड़ी रहें और जहाँ मित्रता का सूर्य प्रकाशवान हो, ईश्वर करे वहाँ हम भी हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; Source : Web Dunia&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8661379354596505577?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8661379354596505577/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8661379354596505577' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8661379354596505577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8661379354596505577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='मित्रता दिवस - मैत्री पर्व'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-9106923292952822495</id><published>2007-05-07T11:18:00.001+05:30</published><updated>2011-12-04T12:46:55.010+05:30</updated><title type='text'>वाकया जोशी जी का.............</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;किसी ने सच हि कहा है कि शिक्षा के दिन हमेशा हि याद आते है। चाहे वह स्कूली हो या कालेज के । कालेज के दिनो की कुछ शरारतें याद आती हैं - तो चेहरे पर अनायास मुस्कुराहट तैर जाती है। मै ऐसे हि एक वाकया का वर्णन करना चाहूँगा। यह बात तब की है जब मै बी. एस. सी. अन्तिम वर्ष मे था। फाइनल परीक्षा के मुश्किल से दो माह बचे थे। ये दो माह हमारे ग्रुप (तितर बटालियन) के लिये किसी युद्ध से कम नही होते थे। सारी ताकत झोक दी जाती थी इस युद्ध को जीतने के लिये क्योंकि साल के 8-9 माह तो मस्ती करने से फुरसत ही नही मिलती थी। कहने को टयूशन जाते थे पर लडकियो को घूरने या उनको छेडने से फुरसत मिले तब तो पढते। अगर उस से दिल न भरा तो निकल गये सिविल लाइनस( मुख्य बाजार) मे रही सही कसर उतारने । परीक्षा के दो माह मे हम दो या तीन लडके मिल कर एक ग्रुप बना कर कम्बाइन्ड स्ट्डी किया करते थे। मेरा एक दोस्त था सौरभ जोशी जी (जी का प्रयोग महानता दर्शाने के लिये व्यक्त किया गया है)। बेचारे बडे हि सीधे थे। इतने सीधे कि जब उन्होने कालेज मे प्रवेश लिया था तो उन से दो दिन पहले प्रवेश लिये हुए छात्र ने उन की रैगिग ले ली। लड़कियों के शब्द मात्र से उन की हवा खराब हो जाती थी। एक दिन मै और मेरा दोस्त रमैल राणा मेरे कमरे मे कम्बाइन्ड स्ट्डी कर अपने हथियार तेज कर रहे थे, जोशी जी आ धमके। उनका अगले दिन उनका मैट का पैपर था। बेचारे बडे परेशान थे क्योंकि उन्हे किसी का साथ नही मिल रहा था। हमारे ज्यादातर दोस्तो के परीक्षा स्थल शहर के आस पास लगे थे और जोशी जी का परीक्षा स्थल था देहरादून, रुड्की से लगभग़ 55 किलो मीटर दूर, वो भी प्रात:काल मे 9 बजे । सोच रहे थे कैसे जाया जायेगा क्योंकि इससे पहले शायद हि इतनी दूर परीक्षा देने गये हो। देहरादून मे अपना परीक्षा स्थल ढूँढना और वहाँ तक पहुचना तो उन के लिये मैट की परीक्षा से भी मुश्किल काम था । खैर मै और मेरे दोस्त ने अपनी तरफ से पूर्ण कोशिश का आश्वासन देकर जोशी जी को शाम को आने के लिये कहा और ये भी कहा कि अपनी तरफ से भी कोशिश करे किसी मुर्गे को ढूढने कि। हमने काफी कोशिश कि जोशी जी को किसी के साथ एड्जेस्ट करने कि, चाहे कालेज मे पढने वाले दोस्त हो या टयूशन मे पढने वाले मित्र सभी से मदद कि गुहार कि। पर क्या करे ज्यादातर दोस्तो ने अपने-अपने स्वभाव के अनुसार अपने पाट्नर पहले हि ढूँढ लिये थे ताकि खर्चे के दबाव का बराबर बँटवारा किया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोशी जी की हालत हमसे देखी नही जा रही थी क्योंकि एक मित्र को दुखी देखकर दूसरा कैसे खुश हो सकता है। हमारे एक मित्र थे अखिल उनके पास दुपहिया वाहन था। अब उन का जोशी जी से दूर- दूर तक का नाता नही था। अगर होता तो शायद हम उस नाते मदद करने कि दुहाई दे देते। हमने अपने मित्र रमैल से कहा यार तेरे को वो बाइक दे देगा जोशी जी को छोड आना क्योकि अगर वो बाइक दे भी देगा तो जोशी जी को तो चलाना आता नही था। तेरा सारा खाने पीने का व्यय जोशी देगा। जोशी जी मान गये। मरता क्या ना करता। मैने कहा परीक्षा सुबह 9 बजे से है अत; तुम्हें प्रात:काल मे 6 बजे निकलना होगा। जोशी को कहा रात को अपना बोरिया बिस्तर( मतलब स्ट्डी मटिरियल) ले आना मेरे यहाँ। महाशय पहुच गये सही समय पर क्योंकि समय पर पहुचना उन की खानदानी आदतो मे सुमार है। हम भी बैठे हि थे खाना खा कर झक छेतने। कुछ इधर उधर कि बाते करते करते जोशी जी और रमैल मे कुछ कहा सुनी हो गयी, कहा सुनी भी क्या नौबत आ गयी थी हाथापाई तक वो तो मै बीच बचाव मै आ गया वरना दोनो एक दूसरे के खुन के प्यासे हो गये थे। खेर रमैल मिया मेरे समझाने पर मान गये पर जोशी जी शायद लडने का मुड बना कर आये थे। शान्त होने का नाम ही न ही ले रहे थे। विनाशकाले विपरिते बुधे। मै उन्हे समझाने लगा तो मुझ से भी लडने लगे और चिरकुट- चिरकुट कहने लगे। मैने कहा जोशी जी बहुत हो गया मै चुप हूँ इस का मतलब यह मत समझो की मै अहिंसा का पुजारी हूँ कही ऐसा ना हो कि मै अपनी मर्यादा भूल जाऊ और आपको मटिया मेट कर दू। पर जोशी जी कि हिम्मत देखो माने नही। अब मैने सोचा क्यो ना हाथ के बजाय दिमाग का प्रयोग किया जाय । मैने कहा जोशी जी कल आप का पैपर है अगर आप अब शान्त ना हुए तो मै आपको सोने नही दूँगा । अगर आप सोयेगे नही तो आपको परीक्षा मे नीद आयेगी जिससे आपकी परीक्षा की ऐसी तैसी हो जायेगी। पर वो फिर भी ना माने। अब वो जैसी ही थोडा झपकी लेते मै जगा देता। जगकर फिर थोडी देर हमारी ऐसी तैसी करते हुए झपकी लेते में फिर जगा देता, मै फिर जगा देता। यह क्रम सुबह के 3 बजे तक चलता रहा। अन्त मे मैने कहा जोशी जी मान लेते है हम तीनो ही चिरकुट है। हम तीनो ही एक कोरे कागज पर अन्य दो गवाहों कि उपस्थिति मै ये लिखेंगे कि मै चिरकुट हूँ । मैने कहा पहले मै लिखता हूँ बाद मे रमैल लिखेगा और अन्त मे आप लिखना। जोशी जी मान गये। पहले मैने लिखा, फिर रमैल ने और अन्त मे जोशी जी ने। मैने अपना और रमैल का लिखा नोट तो फाड दिया जोशी जी का लिखा मेरे पास रह गया। जो नीचे है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5061115991256629426" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/RjyyLdnmgLI/AAAAAAAAADA/lZHAoeNALog/s320/Untitled-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पत्र  से बहुत लाभ उठाया हमने । इस पत्र को नष्ट करने के एवज में जोशी जी से कई फिल्मों को दीखाने के लिए धन जुटवाया, कई अन्य कम निकलवाये पर नष्ट नही किया । एक यही तो निशानी है जोशी जी कि हमारे पास । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर अब तो जोशी जी MBA कर उतर चुके है व्यापार के अखाडे मै, पर है अभी भी चिरकुट ही। उनका लिखा नोट जब भी पडता हूँ आँखों के सामने उनका मासूम सा चेहरा घूमने लगता है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-9106923292952822495?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/9106923292952822495/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=9106923292952822495' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/9106923292952822495'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/9106923292952822495'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/05/blog-post.html' title='वाकया जोशी जी का.............'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/RjyyLdnmgLI/AAAAAAAAADA/lZHAoeNALog/s72-c/Untitled-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-6147509950956561068</id><published>2007-04-20T14:19:00.000+05:30</published><updated>2007-04-20T14:19:43.513+05:30</updated><title type='text'>मेरी परिचय</title><content type='html'>नाम : गिरीश सिह,&lt;br /&gt;जन्मतिथी :31 जनवरी 1983&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इमेल: girish.singh एटदी रेट रेडिफमेल डाट काम&lt;br /&gt;और girishsinghbisht एटदी रेट जीमेल डाट काम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;जींवन के महत्वपूर्ण 21 साल, कहे तो जींदगी का एक अध्याय रूडकी मे बिताने के बाद लगभग 3 वर्षो से दिल्ली मे हूँ। रोजी रोटी जो कमानी है। कुछ सपने है जिन्हे पूरा करना चाहता हूँ। खेलो मे क्रिकेट, शतरंज फुटबाल पसंद करता हूँ। कम्प्यूटर गेम, चेटीग पर भी हाथ साफ है। थोडा बहुत किताबी कीडा भी हूँ पर वो बात अलग है कि आजकल तो समय नही पाता हूँ इस कार्य के लिये। इन्टरनेट पर जो पढ लिया वो ही काफी है। संगीत से काफी लगाव है। जगजीत सिह, किशोर, रफी, मुकेश और बर्मन दा के गाने ज्यादा पसंद करता हूँ। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अमिताभ बच्चन, शाहरूक खान, आशुतोष राणा पसंदीदा अभिनेता है। अभिनेत्रिया तो उम्र के साथ साथ बदलती रही। बचपन मे मधुबाला, रेखा पसंद थी कुछ समय के बाद ऐश, प्रिटी तत्पश्चात रानी ,प्रियंका और अब विघा बालान । कपडो मे जीन्स, टी-शर्ट पसंद करता हूँ। पर ज्यादातर साधारण वेशभुषा मे रहता हूँ। खाने मे चटपटा खाना पसंद करता हूँ। कभी-कभी कुछ नये व्यंजन वनाने की भी नाकाम कोशिश करता रहता हूँ। थोडा बहुत हाड ड्रिक का भी शौक पाल रखा है। पर अकेले मे कभी नही पीता हूँ। सही मे मै झूठ नही बोलता। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;प्यार के मामले मे अब तक थोडा अनलक्की रहा हूँ, कारण शायद यही रहा होगा कि दिल के डिसीजन लेते समय मैने दिमाग को ज्यादा अहमियत दी। जींदगी के हाइवे पर काफी उतार चढाव देखे है। कभी खुशी का उजाला तो कभी दु:ख का अधेरा । अपनो को बैगाना एवं बैगानो को अपना बनते देखा है। एक संवेदनशील और कोआपरेटीव आदमी हूँ। जो कभी कभी एक कमजोरी भी लगती है,क्योकि आजकल ज्यादा कोआपरेटीवनेस दिखाते है तो लोग समझते है कि न जाने इसे क्या फायदा रहा है? और संवेदनशीलता तो लोगो को दिखावा लगती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दोस्तो मे काफी पसंद किया जाता हूँ। दुनिया को अपनी नजरो से देखना चाहता हूँ पर कम्बखत चश्मा बीच मे आ जाता है। किसी चीज से नफरत है तो वह है सुबह जल्दी उठना,बर्तन माझना और गन्दगी । पर क्या करे जब तक अकेले है तो इन चीजो से रोज दो-दो हाथ करने ही पडते है। मेरा मानना है कि जींदगी काफी छोटी होती है इसमे सिर्फ प्यार के लिये जगह होनी चाहिये,नफरत के लिये नही। वर्तमान एक उपहार है इसलिये तो अग्रेजी मे इसे present से उच्चारित करते है। मेरे हिसाब से काफी झक छेत ली मैने अपने बारे मे कुछ और पुछना हो तो मेल करे। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-6147509950956561068?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/6147509950956561068/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=6147509950956561068' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/6147509950956561068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/6147509950956561068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/02/blog-post_28.html' title='मेरी परिचय'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-3404339144173759847</id><published>2007-04-04T17:03:00.000+05:30</published><updated>2007-04-04T17:03:40.580+05:30</updated><title type='text'>48 वर्षो से नहाया ही नहीं</title><content type='html'>क्या आप यकीन करेंगे कि कोई व्यक्ति 48 साल तक बिना नहाये रह सकता है। लेकिन संबलपुर के धनेश्वर प्रधान की कहानी दूसरों से काफी हटकर है। उनकी उम्र इस समय लगभग 120 वर्ष है पर वे 48 वर्षो से नहाये नही है। है न कमाल कि बात? चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ऐसा करने वाले के शरीर में तरह-तरह की बीमारियाँ घर कर सकती हैं, लेकिन वे तो अभी भी भले-चंगे हैं। जीवन का शतकीय पारी खेल चुके प्रधान के बाजुओ मे अब भले हि पहले जितनी ताकत न हो, भले हि उन्हे लाठी का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन वे अपना सारा काम खुद ही करते हैं। 48 वर्षो से अब तक न नहाने का रहस्य धनेश्वर प्रधान ने खोला नहीं है। पर पूछे जाने पर पता चला कि उन्हें गर्मी के दिनों में भी ठंड लगती है और वे आग जलाकर तापने बैठ जाते हैं। ऐसे स्वाधीनता सेनानी पर अब तक सरकार की कोई दृष्टि नहीं पड़ी है और वे गुमनाम सी जिंदगी जी रहे हैं। पूरी खबर &lt;a title="यहाँ पढे" href="http://ind.jagran.com/hatke/InnerStory.aspx?StoryId=396"&gt;यहाँ पढे&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-3404339144173759847?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://ind.jagran.com/hatke/InnerStory.aspx?StoryId=396' title='48 वर्षो से नहाया ही नहीं'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/3404339144173759847/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=3404339144173759847' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/3404339144173759847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/3404339144173759847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/04/48.html' title='48 वर्षो से नहाया ही नहीं'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8206290616687469543</id><published>2007-04-03T15:22:00.000+05:30</published><updated>2007-04-03T15:22:57.971+05:30</updated><title type='text'>खोता बचपन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आजकल के शहरी बच्चो के बचपन को देखकर मेरे मन मे अकसर ये खयाल आत है कि क्या इन्हे वो बचपन नसीब हो रहा है जिसके ये हकदार है। क्या इनके बचपन को इनके माता पिता या अभिभावको ने उनके भविष्य को सुरक्षित करने को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इनके वर्तमान का गला घोट दिया है। मै इस बात से इनकार नही करता कि आज कल के संघर्षपूण माहौल देख कर इनके जीवन की सीढी के पहले पायदान को मजबूत करने की जरुरत है पर बच्चो के बचपन को भी नजरअंदाज न करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यादातर घरो मे एक या दो ही बच्चे होते है । वे तरह-तरह की सुविधाओ के बीच पल रहे है। घर पर खाना उनकी इच्छानुसार ही बनाया जाता है। उनसे किसी तरह का घरेलू कार्य नही कराया जाता है। उन्हे विघालय से लाने और ले जाने के लिय आरामदेह गाङिया या बसे होती है। पढने के लिये सुन्दर किताबे एव लिखने के लिये रंग-बिरंगी कापिया होती है। स्कूली वेशभूषायें एवं जूते-मोजे भी कई प्रकार के होते है। स्कूल मे भी उन्हे घर जैसी सुख-सुविधायें उपलब्ध होती है। बडे-बडे हवादार कमरे, तरह-तरह के खेलो के लिये मैदान, अच्छी बैठक व्यवस्था, अच्छी पुस्तकालय, विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्पर्धायें इत्यादि। फिर भी बच्चो के माता पिता या अभिभावको की यही शिकायत रहती है कि बस्ते के बोझ से बच्चो का बचपन दब रहा है। परीक्षाओं का भी बच्चो पर काफी दबाव होता है। इन शिकायतों के चलते परीक्षाओं को सरल और बस्ते के बोझ को कम करने की कवायद चलती रहती है। परीक्षाओं को सरल करने के लिये कभी ग्रेड देकर काम चला लिया जाता है, तो कभी मौखिक या मासिक परीक्षाओं के परिणाम को देखकर दुसरी कक्षा मे भेज दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चो को बचपन से ही कुछ बनने के लिये प्रेरित किया जाता है। उनके सर्वागीण विकास के लिये मंह्गे खेलो से सम्बंन्धित विभिन्न संस्थाओं मे प्रवेश दिला दिया जाता है। मार्ग दर्शन के लिये अच्छे कोच नियुक्त किये जाते है। अब बच्चे बडे दिनो या गरमी की छुट्टियॉ खेलने-कूदने मे जाया नही करते बल्कि उन्हे विभिन्न प्रकार की हाबी क्लासो मे प्रवेश दिला दिया जाता है। गुल्ली डंड़े, कंच्चो,पतंग बाजी, छुपन्न-छुपाइ जैसे खेलो का स्थान हिंसक कम्पयूटर गेम्स एवं विडियो गेम्स ने ले लिया है। मेलो या हाट के बारे मे शायद हीं किसी को पता हो। बच्चे तो सिर्फ जूँ , वाट्ररपार्क जैसी जगहें जाना पसंद करते है। क्योंकि वो सिर्फ उन्ही के बारे मे जानते है। बच्चो पर इन तथाकथित सुख-सुविधाओ के साथ तनाव अनजाने ही लादा जाता है। रिश्ते नाते नही, दोस्त नहीं, मन भर का खेल नही, ज्यादा घूमना फिरना नही, और तो और भरपूर नीद को भी तरस जाते है ये बच्चे। दिन भर स्कूल मे, घर आकर होमवर्क, ट्यूशन और ट्यूशन वर्क मे ही दिन-रात गुजर जाते है। इन सब मे बचपन, बचपन की चंचलता, मस्ती दफन हो जाती है। इस कारण बच्चे कई बार अतृप्त, दुखी, उदास, चिड़चिडे, सबसे खफा से दिखाई देते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दसवी मे प्रवेश करते ही उस का सारे जग से रिश्ता तुड्वा दिया जाता है। न दोस्तो से मिलना, न घूमना-फिरना, न खेलना। घर को सोने का पिजरा बना दिया जाता है। 12वी का वर्ष तो अतिदक्षता को प्राप्त करने का वर्ष होता है। 12वी की पढाई के साथ-साथ विभिन्न करियर संबधी होने वाली परीक्षाओं का दबाव अलग से होता है। बच्चो के माता पिता या अभिभावक उन्हे वो बनाना चाह्ते है जो वे खुद न बन सके। सब कुछ हासिल करना ही जीवन का उदेश्शय बना दिया जाता है। जिसके कारण जीवन मे असफलता, अपयश के कटु अनुभवो को स्वीकारना उनके लिय अत्यन्त कठिन हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा बचपन था जब हम कई तरह के अभावो मे जीते थे। हम घर के काम को अपनी जिम्मेदारी समझते थे, एक जोडी यूनिफार्म एव एक जोडी जूते-जुराब साल भर घिसते । किसी त्योहार पर अगर रात को 9 बजे तक घूमने कि आज्ञा मिलने पर स्वत्रंतत्रा का अनुभव करते, कुल्फी या आईसक्रिम मिलने पर आनंदित होते। रोटी के जगह पराठे मिलने पर माँ को धन्यवाद देते। जन्मदिन पर माता पिता के आशिर्वाद से तृप्त होना, विभिन्न संस्कारो वाला बचपन कितना सुखी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिश्तो की मह्क से महकता, संस्कारो से जडा, आभावो मे भी जीवन को जीना, हर परिस्थिती का मुकाबला करना, जो मिल गया उसी मे सुखी होना, हार-जीत, सफलता-असफलता को समझना, यश- अपयश को स्वीकारना यही तो सीखा है हमने अपने बचपन से जो शायद आज की पीढी को नसीब नही हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8206290616687469543?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8206290616687469543/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8206290616687469543' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8206290616687469543'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8206290616687469543'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/04/blog-post.html' title='खोता बचपन'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8273135058829894383</id><published>2007-03-30T17:54:00.000+05:30</published><updated>2007-03-30T17:54:01.453+05:30</updated><title type='text'>एक कहानी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आज हम चिट्ठाकार मित्रो को एक कहानी सुनाते है। यह कहानी अच्छी हि नही बल्कि हमारे सामाजिक जीवन एवम पैशे के लिये भी महत्वपूर्ण है। तो शुरु करे । एक धोबी महाशय होते है, जिनके पास दो गधे होते है। गधा अ ओर गधा स । अ का मनना था कि वह बहुत फुर्तीला और हर कार्य को स से अच्छा कर सकता है। वह हमेशा धोबी का विश्वासपात्र और चहेता बनना चाहता था इस कारण वह ज्यादा बोझ उठाने तथा धोबी के साथ चलने की कोशिश करता। बेचारी स बहुत सीधा और साधारण विचारो का था। वह अपनी क्षमता के हिसाब से बोझ उठाता एवं औसत चाल से चलता। अ के कार्य को देखकर धोबी ने स पर अ के बराबर कार्य करने के लिये दबाव डालना शुरू कर दिया। स ने भी थोडी बहुत कोशिश की परन्तु ज्यादा सफल न हो सका। इस कारण वह हमेशा की मार खाता। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बेचारा स काफी दुखी था उसने अ से विन्रमतापूर्वक प्रार्थना कर कहा प्रिय मित्र यहा पर सिर्फ हम दो ही है इसलिये क्यो एक दूसरे से आगे निकलने के लिये दौड करे। आपको ज्ञात है कि मैं ज्यादा बोझ उठाने मे असर्मथ हूँ। हम बराबर बोझ उठाते है और औसत चाल से चले। परन्तु अ कहा मानने वाला था। अगले दिन अ ने ईष्या के कारण और दिन की अपेक्षा थोडा ज्यादा वजन उठाया और अपनी रफ्तार भी बढा दी। स ने भी थोडी बहुत कोशिश की परन्तु ज्यादा सफल न हो सका। स के कार्य को देखकर धोबी काफी खफा था। बेचारा स नित्य मार खाता रहता। अ यह देखकर काफी खुश होता। एक दिन स अत्यधिक मार से चल बसा। अ अपने आप को सर्वोच समझने लगा पर कुछ समय पश्चात ही उसका यह भ्रंम टूट गया। अब उसे स का भी कार्य करना पडता वो भी दोहरे रफ्तार से। अत्यधिक कार्य करने के कारण बेचारा बिमार पड गया। अब उससे ज्यादा नही उठता था और रफ्तार मे भी कमी आ गयी थी। स के कार्य करने की क्षमता मे गिरावट देखकर धोबी को काफी गुस्सा आता। धोबी ने स से भी मार मार कार्य कराना शुरू कर दिया। स अपने कार्य करने की क्षमता को न बढा सका और एक दिन ने धोबी उसे लात मारकर चला गया नये गधे ढूढने।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यहा पर इस कहानी का अन्त नही है पर इस से हमे व्यवसायिक और सामाजिक शिक्षा मिलती है कि हमे अपने सभी साथियो को समान समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति कि अपनी क्षमता होती है। कभी भी अपने स्वामी के आगे जरूरत से ज्यादा दिखावा नही करना चाहिए और न ही साथियो को दबाव मे देखकर प्रसन्न होना चाहिए। इस बात से कोई फर्क नही पडता आप अ हो या स लेकिन आप अपने स्वामी के लिये गधे हो। आखिर मैं यही कहना चाहूगा कि जरूरत से ज्यादा काम करने की कोशिश न करे बल्कि काम को चतुराई से करे। सफलता कोई नियत स्थान नही है बल्कि एक यात्रा है। आशा करता हूँ आप लोग इस कहानी से कुछ सीख जरूर लेगे। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8273135058829894383?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8273135058829894383/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8273135058829894383' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8273135058829894383'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8273135058829894383'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post_26.html' title='एक कहानी'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7602353040575623851</id><published>2007-03-21T13:26:00.000+05:30</published><updated>2007-03-21T13:26:11.740+05:30</updated><title type='text'>आज श्रीलंका के लिये प्रार्थना करे,परसों इंडिया के लिये</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;बरमूडा के खिलाफ 257 रनों की जीत से टीम इंडिया ने वर्ल्ड कप के सुपर 8 में प्रवेश की अपनी संभावनाएं बेहतर बना ली हैं, लेकिन उसे अभी कई बाधाएं पार करनी हैं। सबसे बड़ी बाधा है आखिरी ग्रुप मैच में श्रीलंका को मात देना। भारत को हर हाल में श्रीलंका को हराना होगा। उसके बाद भी मामला नेट रन रेट पर अटक सकता है। फिलहाल श्रीलंका, भारत और बांग्लादेश, तीनों के दो-दो अंक हैं। श्रीलंका और बांग्लादेश ने एक-एक मैच खेला है जबकि भारत ने दो मैचों के बाद इतने अंक हासिल किए हैं। नेट रन रेट सबसे अच्छा श्रीलंका का है 4.860, जबकि भारत का नेट रन रेट 2.507 और बांग्लादेश का -0.139 है। नेट रन रेट किसी टीम द्वारा बनाए गए रनों को खेले गए ओवरों से भाग देकर निकली संख्या में से उस टीम द्वारा दिए गए रनों में ओवरों का भाग देकर निकली संख्या को घटा कर निकाला जाता है। भारत-बरमूडा मैच के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसके हिसाब से आगे 4 संभावनाएं बन सकती हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;संभावना : 1&lt;/strong&gt; श्रीलंका आज बांग्लादेश को हरा दे और भारत शुक्रवार को श्रीलंका को मात दे दे । उसके बाद बांग्लादेश आखिरी मैच में बरमूडा को हरा दे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस लिहाज से भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश तीनों के चार-चार अंक हो जाएंगे और सुपर-8 में पहुंचने वाली टीमों का फैसला नेट रन रेट के आधार पर होगा। बांग्लादेश पर जीत के बाद श्रीलंका का नेट रन रेट और बेहतर होगा और भारत भी श्रीलंका पर जीत से अपना नेट रन रेट और सुधार लेगा। बांग्लादेश का नेट रन रेट श्रीलंका से हार के बाद गिरेगा और उसे बरमूडा के खिलाफ इतना बेहतर करना होगा कि वह भारत से आगे निकल जाए। भारत के फायदे में होगा कि श्रीलंका बांग्लादेश को अच्छे अंतर से हराए।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संभावना : 2&lt;/strong&gt; बांग्लादेश अपने मैचों में श्रीलंका और बरमूडा दोनों को हरा दे और भारत भी श्रीलंका को मात दे दे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बांग्लादेश भारत को हरा सकता है तो श्रीलंका और बरमूडा को क्यों नहीं? ऐसी स्थिति में बांग्लादेश 6 अंको के साथ पहले और भारत 4 अंको के साथ सुपर-8 में पहुंच जाएंगे, जबकि श्रीलंका सिर्फ 2 अंको के साथ बाहर हो जाएगा। इस स्थिति में भारत को नुकसान यह होगा कि वह सुपर-8 में खाली हाथ जाएगा, जबकि बांग्लादेश भारत पर जीत के कारण दो अंक लेकर वहां जाएगा। ऐसे में भारत सुपर 8 में पहले से ही कमज़ोर स्थिति में होगा। संभावना नंबर 1 में भारत श्रीलंका को हराने के कारण 2 अतरिक्त अंक लेकर जाएगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संभावना : 3&lt;/strong&gt; भारत और बांग्लादेश दोनों श्रीलंका से हार जाएं और बांग्लादेश ने बरमूडा को हरा देऐसी स्थिति में श्रीलंका 6 अंको के साथ पहले और बांग्लादेश 4 अंको के साथ सुपर-8 में पहुंच जाएंगे, जबकि भारत सिर्फ 2 अंको के साथ बाहर हो जाएगा। (भगवान से प्रार्थना करे कि ये बिल्कुल न हो)&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संभावना : 4&lt;/strong&gt; अगर भारत और बांग्लादेश दोनों श्रीलंका से हार जाएं लेकिन बरमूडा बांग्लादेश को हरा दे&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इसको संभावना के बजाय असंभावना कहना ज़्यादा सही होगा । भारत को हराने के बाद से बांग्लादेश के खिलाड़ियों का मनोबल काफी बढा है। बरमूडा बांग्लादेश को हरा दे, यह तभी हो सकता है यदि मैच फिक्स हो या वे मैच खेल ही न पाएं। क्रिकेट अनिश्चितताओ का खेल है इसमे कुछ भी हो सकता है लेकिन अगर ऐसा हो तो भारत श्रीलंका से हारने के बाद भी सुपर 8 में जा सकता है क्योकि तब श्रीलंका के 6 अंक हो जाएंगे और भारत, बरमूडा और बांग्लादेश, तीनों के 2-2 अंक होंगे। लेकिन बांग्लादेशी टीम के फॉर्म को देखते हुए यह ख्याली पुलाव ही लगता है कि वह बरमूडा से हार जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;देखते है समय के गर्भ मे क्या छुपा है। मेरी शुभकामनाये टीम इंडिया के साथ है आशा है आप सब कि भी होगी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;(स्रोत: विभिन्न समाचार-पत्र) &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7602353040575623851?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7602353040575623851/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7602353040575623851' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7602353040575623851'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7602353040575623851'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post_21.html' title='आज श्रीलंका के लिये प्रार्थना करे,परसों इंडिया के लिये'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2402963288188342273</id><published>2007-03-19T11:48:00.000+05:30</published><updated>2007-03-19T11:48:28.353+05:30</updated><title type='text'>शुरू में ही भारत की शर्मनाक हार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;किसी भी खेल के हार और जीत दो जरूरी पहलू होते है जैसे किसी सिक्के का एक तरफ हैड तो दूसरी तरफ टैंल। विश्वकप के एक बहुत ही उलटफेर भरे मैच में बांग्लादेश की टीम ने भारत को 5 विकेट से हरा दिया। बांग्लादेश की टीम ने भारत को खेल के हर क्षेत्र में पछाड़ते यह ऐतिहासिक जीत दर्ज की। चूंकि यह मैमने द्वारा शेर का शिकार करना जैसी घटना है इसलिए यह क्रिकेट प्रेमियों को कुपित करने के लिये काफी है &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4pQuuRiWI/AAAAAAAAACk/AtXb_98q63I/s1600-h/amd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5043514000098298210" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" height="192" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4pQuuRiWI/AAAAAAAAACk/AtXb_98q63I/s320/amd.jpg" width="197" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;और जो स्वाभाविक भी है। इस घुटनाटेक पराजय के बाद भारतीय टीम की सफलता के लिए लिखे और गाए-बजाए गए सारे तराने बेसुरे हो गये है, सारे हवन-कीर्तन विफल हो गये। क्या कारण है बांग्लादेश के हाथों भारतीय टीम की ये दुर्गति हुई? अपने आप पर जरूरत से ज्यादा भरोसा, प्रतिद्वंद्वी टीम को नौसिखिया और कमजोर समझना या खेल से अधिक विज्ञापन बाजी में ध्यान लगाना है? मेरे विचार से प्रमुख कारण देश के खिलाड़ीयो का खेल के बजाए धन कमाने पर अधिक ध्यान एवं प्रसिद्धि बटोरने के फेर में पड़ जाना है। इन स्थितियों में मैदान पर उनका प्रदर्शन प्रभावित होना तय है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;भारतीय टीम ने खेल के प्रत्येक क्षेत्र में जैसा लचर प्रदर्शन किया और साथ ही जैसे हाव-भाव दिखाए उससे उसके पाकिस्तान की राह पर चल निकलने का खतरा पैदा हो गया है। ऐसा लगता है कि टीम इंडिया ने अपना सारा दमखम अभ्यास मैचों में ही दिखा दिया। नि:संदेह ऐसे रद्दी खेल के बल पर कोई टीम विश्व विजेता बनने का ख्वाब देखने की भी हकदार नहीं। पहले ही मैच में बुरी तरह पिटने के बाद यदि टीम इंडिया के साथ ही उसके कोच ग्रेग चैपल पर गुस्सा उतारा जा रहा है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।हम पहले भी देख चुके है कि भारतीय टीम अतीत में भी बुरी तरह पिटने के बाद बेहतर खेल दिखा चुकी है इसलिए यह अपेक्षा बनाए रखी जानी चाहिए कि वह आगे अपने हालिया प्रदर्शन को दोबारा नही दोहरायेगी, लेकिन इस एक पराजय ने यह तो बता ही दिया कि हमारी टीम में बुनियादी स्तर पर कोई बड़ी खामी है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;नि:संदेह यह खामी टीम इंडिया के प्रबंधन तंत्र में भी है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसी टीम हो जो इतना प्रसिद्धि, पैसा और प्यार पाने के बावजूद अपने खेल के स्तर को ऊंचा उठाने में नाकाम&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4pnOuRiXI/AAAAAAAAACs/Ybu4dsuc8Qs/s1600-h/burn.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5043514386645354866" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 133px; CURSOR: hand; HEIGHT: 157px" height="194" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4pnOuRiXI/AAAAAAAAACs/Ybu4dsuc8Qs/s320/burn.bmp" width="143" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; साबित हुई हो। यह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का प्राथमिक दायित्व बनना चाहिए था कि हमारी टीम इस खेल के हर स्तर पर श्रेष्ठता कायम करे, लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी प्राथमिकताओं में केवल धन जुटाना&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4qceuRiYI/AAAAAAAAAC0/Sr7J1JRewDU/s1600-h/sach.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5043515301473388930" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4qceuRiYI/AAAAAAAAAC0/Sr7J1JRewDU/s320/sach.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; शामिल है। आखिर क्या कारण है कि भारतीय टीम की रैंकिंग ऊपर उठने का नाम नहीं ले रही है? क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि विश्व कप जीतने का दावा करने वाली टीम इंडिया के लिए अब यह दुआ करनी पड़ रही है कि वह बरमूडा से तो अच्छी तरह जीत जाए? यह दुआ करनी पड़ रही है तो इसीलिए कि हमारी टीम ने जीत के लिए तनिक भी जज्बा नहीं दिखाया। दरअसल उसने क्रिकेट प्रेमियों के भरोसे को ही नहीं तोड़ा, बल्कि उन्हें शर्मिदा भी किया है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;राँची में नाराज क्रिकेटप्रेमियों ने धोनी के नए मकान के निर्माण स्थल पर धावा बोलकर उनके खिलाफ नारेबाजी की और एक निर्माणाधीन चारदीवारी को क्षतिग्रस्त कर दिया,कानपुर में सहवाग और विकेटकीपर धोनी के पुतले फूँके गए, जयपुर और वाराणसी में भी टीम इंडिया के खिलाड़ियों के पुतले जलाए गए। कोलकाता में लोगों ने कोच ग्रेग चैपल और कप्तान राहुल द्रविड़ के खिलाफ प्रदर्शन किया। जालंधर के कम्पनी बाग में खिलाड़ियों के पोस्टर जलाए गए।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन क्रिकेट प्रेमियों को यह ध्यान रखना होगा कि उनका रोष अराजकता में तब्दील न होने पाए। उन्हें अपनी नाराजगी और निराशा जाहिर करने का पूरा अधिकार है, लेकिन संयमित और मर्यादित ढंग से। नि:संदेह क्रिकेट हम भारतीयों के खून में रच-बस सा गया है, लेकिन है तो आखिर वह एक खेल ही। एक मैच में मिली पराजय के बाद सब कुछ गंवा देने का भाव ठीक नहीं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2402963288188342273?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2402963288188342273/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2402963288188342273' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2402963288188342273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2402963288188342273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post_19.html' title='शुरू में ही भारत की शर्मनाक हार'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rf4pQuuRiWI/AAAAAAAAACk/AtXb_98q63I/s72-c/amd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-5000521236403264271</id><published>2007-03-15T13:38:00.000+05:30</published><updated>2007-03-15T13:38:53.920+05:30</updated><title type='text'>ट्रैफिक की समस्या</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;दिल्ली ही नहीं भारत के दूसरे महानगरों में भी ट्रैफिक की समस्या दिनो-दिन बढती जा रही है। ट्रैफिक की समस्या भी उन बड़ी समस्याओं की सूची में आती है जिनकी तरफ हमने आज़ादी के बाद ध्यान नहीं दिया है। आज शहरों में वाहनों की बढ़ती भीड़ प्रशासन के लिए सिरदर्द बनी हुई है। तकनीकी कुशलता और प्रबंधन क्षमता में अव्वल अमेरिका में भी ट्रैफिक जाम एक समस्या है। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत के महानगरों में आबादी का बोझ बढ़ा है। उनमें व्यापारिक गतिविधियां &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj9NuuRiTI/AAAAAAAAACM/AjXmXFB_am0/s1600-h/delhi-traffic1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5042058195163515186" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj9NuuRiTI/AAAAAAAAACM/AjXmXFB_am0/s320/delhi-traffic1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लगातार तेज होती जा रही हैं। उनमें लोगों का जीवन स्तर बढ़ रहा है। दूसरी ओर तकनीकी परिष्कार के साथ नए और बड़े वाहन भी सामने आ रहे हैं। ट्रैफिक की समस्या के समाधान में लोगों का जो सहयोग मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। समस्याओं को टालना, उनका सामना न करना या अस्थाई समाधान खोजना शायद हमारी आदत बन गई है। शहरों का अंधाधुंध और बिना समझे-बूझे विस्तार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, सड़कों और पुलों का अभाव, यातायात के नियमों का पालन न करना आदि कारण हैं जिन पर समग्र रूप से विचार किया जाना चाहिए था। प्रशासन का रवैया टालने वाला है। ज़ाहिर है समस्या के प्रति गंभीर रुझान का अभाव और व्यक्तिगत ढंग से समाधान खोजने की प्रवृति से समस्या विकराल रूप धारण कर रही है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;कहीं भी आने-जाने में लाखों, करोड़ों लोगों के अनगिनत घंटे बर्बाद होते हैं,गाड़ियों में खरबों रुपए का तेल बेवजह फुंकता है, पता नहीं कितना धुआँ परिवेश को गंदा कर देता है? हाल में प्रकाशित अर्बन मोबिलिटी रिपोर्ट- 2005 में इस बात का खुलासा किया गया है कि ट्रैफिक जाम के कारण लोगों का समय तो नष्ट हो ही रहा है, तेल की भी बर्बादी बढ़ी &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj88euRiSI/AAAAAAAAACE/kiO2YMJeRbM/s1600-h/delhi-traffic.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5042057898810771746" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj88euRiSI/AAAAAAAAACE/kiO2YMJeRbM/s320/delhi-traffic.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में वर्ष 2003 में ट्रैफिक जाम की वजह से लोगों के 3.7 अरब घंटे और 8.7 अरब लीटर तेल की बर्बादी हुई। यह वर्ष 2002 के मुकाबले क्रमश: 7.9 करोड़ घंटे और 26 करोड़ लीटर ज्यादा है। जाहिर है अमेरिका के लिए यह संकट निरंतर बढ़ा है। वहां 1982 से विभिन्न वाहनों द्वारा तय की गई दूरी में 74 फीसदी का इजाफा हुआ है , जबकि सड़कों के दायरे में 6 फीसदी की वृद्धि हुई है। परिवहन अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका की ट्रैफिक समस्या को दूर करने में छह वर्ष का वक्त लग सकता है और इस पर करीब 400 अरब डॉलर के खर्च का अनुमान है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;लंदन में ऐसा नियम है कि प्रमुख बाज़ारों जैसे आक्सफोर्ड स्ट्रीट आदि क्षेत्रों में केवल पब्लिक ट्रांसपोर्ट द्वारा -ही जा सकता है। मतलब यह कि प्राइवेट गाड़ियाँ दूर किसी पार्किंग में खड़ी करनी पड़ती हैं। एशिया के अनेक देशों ने भी इस समस्या से जूझने के लिए कई तरह के उपाय किए हैं। थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों में अर्बन रेलवे का विस्तार किया जा रहा है। सिंगापुर में सड़क पर बढ़ती भीड़ को देखकर पैसेंजर कारों पर टोल टैक्स बढ़ा दिया गया है। तीन या उससे कम लोगों को लेकर आने वाली पैसेंजर कारों के शहर और खासकर व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश करने पर शुल्क लगा हुआ है , जिसे एरिया लाइसेंसिंग कहते हैं। मलेशिया में भी ऐसी ही व्यवस्था लागू है। इसी संकट को भांपकर जापान ने लाइट रेल ट्रांजिट सिस्टम शुरू किया जिसके तहत हलकी छोटी ट्रामें चलाई जा रही हैं जो पटरी और सड़क पर समान रूप से चलती हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में इसका उल्टा है। कनाट प्लेस में बसें नहीं आ सकतीं, सिर्फ़ प्राइवेट गाड़ियाँ, कारें या टैक्सियाँ आ सकती है। बसें कनाट प्लेस से कुछ दूर आकर रूक जाती है। यानी बस में चलने वाले को कनाट प्लेस तक आने के लिए पैदल चलना पड़ता है लेकिन कार सीधे दुकान के सामने आ सकती है। पब्लिक ट्राँसपोर्ट पर प्राइवेट ट्राँसपोर्ट को प्राथमिकता देना शायदी हमारी सामंती समझ का हिस्सा है। हमारे देश में सामंत तो नहीं हैं लेकिन सामंती संस्कार बहुत प्रबल हैं। एक और बड़ी समस्या यह है कि हमारे देश में जिन लोगों के पास कारें हैं वे अपनी कारों से घर के दरवाज़े के सामने ही उतरना चाहते हैं। दुकानदार भी यह चाहते हैं कि कार से ही दुकान के सामने उतरें। उन्हें दो कदम भी पैदल न चलना पड़े। इस मानसिकता ने सड़क के किनारे वाली जगह को पार्किंग बना दिया है जो मुफ्त में मिल जाती है। दुकानदारो द्वारा अपनी दुकानो के आगे तक करीब 5 से 6 फुट की जगह पर समान रखना, कही पर भी ट्रैक्टर या ट्राली का खडा कर देना जैसे कारक भी ट्रैफिक की समस्या को जटील बना देते है। लेकिन इसकी वजह से कितनी अव्यवस्था होती है। लोगों को कितनी परेशानी होती है, यह सब जानते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शहरों और खासतौर पर बड़े शहरों के मास्टर प्लान के साथ मनमाने खिलवाड़ ने भी ट्रैफिक की समस्या को विकराल बना दिया है। जहाँ एक कोठी हुआ करती थी और 10-12 लोग रहा करते थे वहाँ अब ऊँची-ऊँची इमारते बन ग&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj-BeuRiVI/AAAAAAAAACc/iIkTSaTItrc/s1600-h/traffic-716553.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5042059084221745490" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj-BeuRiVI/AAAAAAAAACc/iIkTSaTItrc/s320/traffic-716553.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ई है जिनमें सैंकड़ों लोग रहते हैं। बडे बडे शोपिग सैटर, माल खुल गये है। शहर की व्यस्तम सडको पर हर 10 मिनट के बाद लगता जाम प्रत्येक आने जाने वाले के लिए परेशानी का कारण बनता है। 40-50 किलोमीटर प्रति घंटा की चाल से 1 किलोमीटर का सफर तय करने मे मुश्किल से डेढ मिनट लगता है पर यहा तो आधा किलोमीटर का सफर तय करने मे ही 10 मिनट लग जाते है। सड़के रबड़ की तो बनी है नहीं जिन्हे चाहे जितना खीच कर बडा कर लो । ज़ाहिर है कि उनकी अपनी एक क्षमता है जो समाप्त हो सकती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह भी एक विडंबना है कि पिछले दो दशकों में पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्र के लिए राशि बढ़ रही है लेकिन ग्रामीण इलाकों से शहरों-महानगरों की ओर लोगों का पलायन रुकने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में ट्रैफिक की समस्या अब भयावह रूप लेती जा रही है। पर इस संकट को सुलझाने की कोई कारगर योजना नजर नहीं आ रही। अगर आपके पास कोई सामाधान है तो जरूर बताये&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-5000521236403264271?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/5000521236403264271/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=5000521236403264271' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5000521236403264271'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5000521236403264271'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post_15.html' title='ट्रैफिक की समस्या'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rfj9NuuRiTI/AAAAAAAAACM/AjXmXFB_am0/s72-c/delhi-traffic1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-5098080962433919539</id><published>2007-03-09T15:32:00.000+05:30</published><updated>2007-03-09T15:32:10.192+05:30</updated><title type='text'>फिल्म समीक्षा - निशब्द</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अधेड उम्र के पुरूष या महिला का अपनी बेटा/बेटी के उम्र के लडके/लडकी के साथ प्यार, आकषर्ण भारतीय दर्शको के लिये कोई नया विषय नही है। निशब्द से पहले भी कई फिल्मे इस विषय पर बन चुकी है जैसे दूसरा आदमी, लम्हे, लीला, तुम, छोटी सी लव स्टोरी और जांर्गस पार्क। इन फिल्मो मे इस तरह के रिश्ते की पेचदीगियो और उनके भावो को &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_RjdmwrlI/AAAAAAAAABs/xIWcKiPEthc/s1600-h/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A61.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5039476915223703122" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_RjdmwrlI/AAAAAAAAABs/xIWcKiPEthc/s320/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A61.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;परदे पर दर्शाने का प्रयास किया गया था। पर क्या भारतीय दर्शक इस विषय पर बनी फिल्म देखने के लिये मानसिक रूप से तैयार है? पर मानना पडेगा रामगोपाल वर्मा को जिन्होने इस संवेदनशील को चुना और बडी शिद्रदत के साथ पर्दे पर उतारा भी है। इस फिल्म के जरिये उन्होने साबित कर दिया है कि वो संवेदनशील विषयो पर भावुक फिल्मे बना सकते है। बहुत से लोग इसे एडरिन लापन की "लोलिता" की कांपी बताते है पर ऐसा कुछ नही है, केवल समानता है तो सिर्फ विषय कि और कुछ नही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म कि शुरूआत होती है विजय (अमिताभ बच्चन, ज्यादातर फिल्मो मे उनका यही नाम होता है) से, जो पेशे से एक वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर है। अपनी पत्नी रेवती और बेटी रितु (श्रद्धा आर्य) के साथ एक &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_R2tmwrnI/AAAAAAAAAB8/U8XJiv9fCZ0/s1600-h/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A63.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5039477245936184946" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_R2tmwrnI/AAAAAAAAAB8/U8XJiv9fCZ0/s320/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A63.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हिल स्टेशन मे रहते है। एक बार की सहेली जिया (जिया खान) उसके साथ छुटटीया बिताने उसके घर आती है। तलाकशुदा माँ बाप की बेटी जिया भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर है। विजय से पहली ही मुलाकात मे जिया उसकी तरफ आर्कषित हो जाती है। इसे पहली नजर का प्यार कहो या विपरिताकर्षण । दोनो एक दूसरे कि तरफ खीचे चले जाते है। विजय को अपने प्यार को व्यक्त करने के लिये शब्द ही नही मिलते। वह अपनी भावना को करने मे खुद को दोषी महसूस करता है। इस कारण वह आत्महत्या के बारे मे भी सोचता है। वह असंमनजस मे है। एक तरफ उसकी भावनाए है, तो दूसरी तरफ जिम्मेदारी। जैसा कि होता ही है प्यार छुपाये नही छुपता। रितु को अपने पिता और जिया के प्यार के बारे मे पता लग जाता है। तब आता है सब के जींवन मे सुनामी जैसा कहर। विजय को अपने दंद्ध एव जिम्मेदारी की के बीच फैसला लेना पडता है और जिम्मेदारी की जीत होती है । विजय, जिया को अपने घर से निकल जाने का आदेश देते है पर इस से पहले अपनी पत्नी और बेटी के सामने जिया से प्यार को स्वीकारते है। जिया चली जाती है और विजय अपनी यादो मे जिया को बसाए हुए है। इसी के साथ फिल्म खत्म हो जाती है ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;फिल्म ठीक-ठाक बन पडी है पर फिल्म की गति बहुत धीमी है। इन्टरवल के बाद तो और भी 2-3 पंचर हो जाते है। अमित राय की सिनेमेट्रोग्राफी काफी बेहतरीन है, मन्नार के चाय के बागान एव हरी भरी वादीयो को अच्छी तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म में संगीत दिया है विशाल भारद्वाज और अमर मोहिले ने और बोल लिखे हैं फरहद, साजिद ने। इसमें बिग बी और जिया खान ने खुद ही गाने गाए है। पाश्र्वसंगीत भी अच्छा है। थोडी मेलोडी के बीच मे &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_Rq9mwrmI/AAAAAAAAAB0/F78ZpXDX6Hg/s1600-h/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A62.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5039477044072722018" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_Rq9mwrmI/AAAAAAAAAB0/F78ZpXDX6Hg/s320/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A62.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;स्वर ध्वनिया अधिक कारगर लगती है। लगता है लेखक महाशय कहानी के बीच मे कही उलझ गये थे जिस कारण फिल्म के मध्य भाग मे ठहराव सा प्रतीत होता है। संवाद द्रश्यो को अच्छी तरह से न फिल्मा पाना भी नकारात्मक असर डालता है। अभिनय के मामले मे अमिताभ बच्चन तो कमाल करते ही है। आँखो से अपना सारा दर्द ब्यान करने मे सफल हुए है। जिया ने भी अच्छा अभिनय किया है। रेवती, श्रद्धा आर्य, नासीर ने अपने कार्य के साथ न्याय किया है। सब कुछ मिलाकर फिल्म को देखा जा सकता है अगर आप इस विषय के अनकहे दर्द को झेलना चाहते है तो। और हाँ फिल्म को देखने के बाद अपनी प्रतिक्रिया लिखना मत भुलना। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-5098080962433919539?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/5098080962433919539/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=5098080962433919539' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5098080962433919539'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5098080962433919539'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post_08.html' title='फिल्म समीक्षा - निशब्द'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re_RjdmwrlI/AAAAAAAAABs/xIWcKiPEthc/s72-c/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A61.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7398114476302135003</id><published>2007-03-07T12:31:00.000+05:30</published><updated>2007-03-07T12:31:48.172+05:30</updated><title type='text'>विश्व कप क्रिकेट का कार्यक्रम एवं स्वरूप</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;वेस्टइंडीज़ में हो रहे क्रिकेट महासंग्राम 2007 में 16 टीमें हिस्सा ले रही है। इन 16 टीमों को चार-चार के चार ग्रुप में बाँटा गया है। इस बार के विश्व कप में ग्रुप का निर्धारण करते समय पिछले साल विश्व कप के कार्यक्रमों की घोषणा के समय की आईसीसी रैंकिंग के आधार पर टीमों को वरीयता दी गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप ए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑस्ट्रेलिया (1)&lt;br /&gt;दक्षिण अफ़्रीका (5)&lt;br /&gt;स्कॉटलैंड (12)&lt;br /&gt;हौलेन्ड (16) &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re5jKTnEJsI/AAAAAAAAABM/OtZfozA71TA/s1600-h/trophy.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5039074061788128962" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re5jKTnEJsI/AAAAAAAAABM/OtZfozA71TA/s320/trophy.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप बी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीलंका (2)&lt;br /&gt;भारत (8)&lt;br /&gt;बांग्लादेश (11)&lt;br /&gt;बरमूडा (15)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप सी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यूज़ीलैंड (3)&lt;br /&gt;इंग्लैंड (7)&lt;br /&gt;कीनिया (10)&lt;br /&gt;कनाडा (14)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप डी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान (4)&lt;br /&gt;वेस्टइंडीज़ (6)&lt;br /&gt;ज़िम्बाब्वे (9)&lt;br /&gt;आयरलैंड (13)&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;(कोष्टक मे दी गई टीम रैकिक अप्रैल 2005 मे आईसीसी द्रारा जारी) &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;11 मार्च: उदघाटन समारोह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप मैच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13 मार्च: ग्रुप डी- वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान (जमैका)&lt;br /&gt;14 मार्च: ग्रुप ए- ऑस्ट्रेलिया और स्कॉटलैंड ( सेंट किट्स) &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;14 मार्च: ग्रुप सी- कीनिया और कनाडा (सेंट लूसिया)&lt;br /&gt;15 मार्च: ग्रुप बी- श्रीलंका और बरमूडा (त्रिनिडाड)&lt;br /&gt;15 मार्च: ग्रुप डी- ज़िम्बाब्वे और आयरलैंड (जमैका)&lt;br /&gt;16 मार्च: ग्रुप ए- दक्षिण अफ़्रीका और हौलेन्ड (सेंट किट्स)&lt;br /&gt;16 मार्च: ग्रुप सी- इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड (सेंट लूसिया)&lt;br /&gt;17 मार्च: ग्रुप बी- भारत बांग्लादेश (त्रिनिडाड)&lt;br /&gt;17 मार्च: ग्रुप डी- पाकिस्तान और आयरलैंड (जमैका)&lt;br /&gt;18 मार्च: ग्रुप ए- ऑस्ट्रेलिया और हौलेन्ड (सेंट किट्स)&lt;br /&gt;18 मार्च: ग्रुप सी- इंग्लैंड और कनाडा (सेंट लूसिया)&lt;br /&gt;19 मार्च: ग्रुप बी- भारत और बरमूडा (त्रिनिडाड)&lt;br /&gt;19 मार्च: ग्रुप डी- वेस्टइंडीज़ और ज़िम्बाब्वे (जमैका) &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;20 मार्च: ग्रुप ए- दक्षिण अफ़्रीका और स्कॉटलैंड (सेंट किट्स)&lt;br /&gt;20 मार्च: ग्रुप सी- न्यूज़ीलैंड और कीनिया (सेंट लूसिया)&lt;br /&gt;21 मार्च: ग्रुप बी- श्रीलंका और बांग्लादेश (त्रिनिडाड)&lt;br /&gt;21 मार्च: ग्रुप डी- ज़िम्बाब्वे और पाकिस्तान (जमैका)&lt;br /&gt;22 मार्च: ग्रुप ए- स्कॉटलैंड और हौलेन्ड (सेंट किट्स)&lt;br /&gt;22 मार्च: ग्रुप सी- न्यूज़ीलैंड और कनाडा (सेंट लूसिया)&lt;br /&gt;23 मार्च: ग्रुप बी- भारत और श्रीलंका (त्रिनिडाड)&lt;br /&gt;23 मार्च: ग्रुप डी- वेस्टइंडीज़ और आयरलैंड (जमैका)&lt;br /&gt;24 मार्च: ग्रुप ए- ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका (सेंट किट्स)&lt;br /&gt;24 मार्च: ग्रुप सी- इंग्लैंड और कीनिया (सेंट लूसिया)&lt;br /&gt;25 मार्च: ग्रुप बी- बरमूडा और बांग्लादेश (त्रिनिडाड) &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;(ग्रुप ए बी और सी के मैच भारतीय समयानुसार साय 7:00 बजे तथा ग्रुप डी के मैच भारतीय समयानुसार साय 8:00 बजे प्रारम्भ होगे।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुपर-8&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;27 मार्च: एंटिगा- डी-2 और ए-1&lt;br /&gt;28 मार्च: गयाना- ए-2 और बी-1&lt;br /&gt;29 मार्च: एंटिगा- डी-2 और सी-1&lt;br /&gt;30 मार्च: गयाना- डी-1 और सी-2&lt;br /&gt;31 मार्च: एंटिगा- ए-1 और बी-2&lt;br /&gt;01 अप्रैल: गयाना- डी-2 और बी-1&lt;br /&gt;02 अप्रैल: एंटिगा- बी-2 और सी-1&lt;br /&gt;03 अप्रैल: गयाना- डी-1 और ए-2&lt;br /&gt;04 अप्रैल: एंटिगा- सी-2 और बी-1&lt;br /&gt;07 अप्रैल: गयाना- बी-2 और ए-2&lt;br /&gt;08 अप्रैल: एंटिगा- ए-1 और सी-2&lt;br /&gt;09 अप्रैल: गयाना- डी-1 और सी-1&lt;br /&gt;10 अप्रैल: ग्रेनाडा- डी-2 और ए-2&lt;br /&gt;11 अप्रैल: बारबाडोस- सी-2 और बी-2&lt;br /&gt;12 अप्रैल: ग्रेनाडा- बी-1 और सी-1&lt;br /&gt;13 अप्रैल: बारबाडोस- ए-1 और डी-1&lt;br /&gt;14 अप्रैल: ग्रेनाडा- ए-2 और सी-1&lt;br /&gt;15 अप्रैल: बारबाडोस- बी-2 और डी-1&lt;br /&gt;16 अप्रैल: ग्रेनाडा- ए-1 और बी-1&lt;br /&gt;17 अप्रैल: बारबाडोस- ए-2 और सी-2&lt;br /&gt;18 अप्रैल: ग्रेनाडा- डी-1 और बी-1&lt;br /&gt;19 अप्रैल: बारबाडोस- डी-2 और बी-2&lt;br /&gt;20 अप्रैल: ग्रेनाडा- बी-1 और सी-1&lt;br /&gt;21 अप्रैल: बारबाडोस- डी-2 और सी-2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अंकों के आधार पर चार शीर्ष टीमों को सेमी फ़ाइनल में जगह मिलेगी, सभी मैच भारतीय समयानुसार साय 8:00 बजे प्रारम्भ होगे।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेमी फ़ाइनल&lt;br /&gt;24 अप्रैल: जमैका- दूसरी टीम और तीसरी टीम (भारतीय समयानुसार साय 8:15 बजे प्रारम्भ)&lt;br /&gt;25 अप्रैल: सेंट लूसिया- पहली टीम और चौथी टीम (भारतीय समयानुसार साय 7:15 बजे प्रारम्भ)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ाइनल&lt;br /&gt;28 अप्रैल: बारबाडोस (पहले सेमी फ़ाइनल का विजेता और दूसरे सेमी फ़ाइनल का विजेता, भारतीय समयानुसार साय 7:15 बजे प्रारम्भ)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;ग्रुप मैचों में जीत के लिए टीम को दो अंक, टाई और मैच रद्द होने पर एक अंक मिलेगे । ग्रुप मैचों के बाद हर ग्रुप की दो शीर्ष टीमों को सुपर-8 में जगह मिलेगी । अगर दो टीमों को बराबर अंक मिले, तो टाई ब्रेकर के आधार पर फ़ैसला होगा। टाई ब्रेकर में टीमों के ज़्यादा मैच जीतने के औसत, रन को भी आधार बनाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप मैचों में जीत के लिए टीम को दो अंक, टाई और मैच रद्द होने पर एक अंक मिलेगे । ग्रुप मैचों के बाद हर ग्रुप की दो शीर्ष टीमों को सुपर-8 में जगह मिलेगी । अगर दो टीमों को बराबर अंक मिले, तो टाई ब्रेकर के आधार पर फ़ैसला होगा। टाई ब्रेकर में शीर्ष टीम के निर्धारण के लिये टीम के ज़्यादा मैच जीतने के औसत, रन गति को भी आधार बनाया जा सकता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुपर-8 में कुल 24 मैच खेले जाएँगे । सुपर-8 में पहुँचने वाली टीम ग्रुप मैच में जिस टीम से पहले लड चुकी है, उसे छोड़कर बाक़ी सभी टीमों से मैच खेलेगी । अर्थात सुपर-8 मे प्रत्येक टीम को 6 अन्य टीमो से लडना होगा । सुपर-8 में पहुँचने वाली टीमों को ग्रुप मैचों में जितने अंक मिले हैं, वो सुपर-8 में भी उनके खाते में जुड़ जाएँगे । सुपर-8 की चार शीर्ष टीमें सेमी फ़ाइनल में पहुँचेंगी। सुपर-8 में वरीयता ग्रुप मैचों की तरह ही दी गई है । सुपर-8 में पहुँचने वाली टीमों को ग्रुप मैचों में जितने अंक मिले हैं, वो सुपर-8 में भी उनके खाते में जुड़ जाएँगे। सुपर-8 की चार शीर्ष टीमें सेमी फ़ाइनल में पहुँचेंगी। इन चार शीर्ष टीमों मे से दो टीमे फाइनल मे पहुचेगी। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7398114476302135003?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7398114476302135003/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7398114476302135003' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7398114476302135003'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7398114476302135003'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post_07.html' title='विश्व कप क्रिकेट का कार्यक्रम एवं स्वरूप'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Re5jKTnEJsI/AAAAAAAAABM/OtZfozA71TA/s72-c/trophy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2825126909212523463</id><published>2007-03-03T13:49:00.000+05:30</published><updated>2007-03-03T13:49:23.804+05:30</updated><title type='text'>नोटपेड का डायरी कि तरह उपयोग</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;इन्टरनेट के मायाजाल मे उल-जलुल हरकते करते करते मुझे एक नये ब्रहम ज्ञान की प्राप्ति हुई। नोटपेड का डायरी कि तरह उपयोग करने का तरीका । मुझे काफी अच्छा लगा। कौन इस के जन्मदाता है ये तो पता नही चला परन्तु मैने सोचा शायद हमारे कुछ मित्रो को इस के बारे मे जानकारी न हो। अत: अपने ब्लाग मे इसका उल्लेख करना उचित समझा। तो महाशय तैयार हो जाये ब्रहम ज्ञान का रसपान करने के लिये।&lt;/p&gt;&lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये तो आप लोगो को पता ही होगा कि नोटपेड को कैसे खोलते है। नही पता तो घबराने की कोई आवश्यकता नही है, हम बताते है। स्ट्रार्ट पर किल्लिक करे, प्रोग्राम मे जाये, असशिरीज मे किल्लिक करे। नोटपेड दिखाई दिया ना तो बिना रूके किल्लिक कर दे।हा तो खुल गया आपका का कोरा कागज ।&lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;अब लिखे .LOG (लिखने के लिये बडे अक्षरो का प्रयोग करे)लिखना शुरू कि लाइन मे ही है। एन्टर दबा दे। &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;अब वक्त है इस पोथी को सहजने का अर्थात सेव करने का। सेव कर दे अपनी मन मुताबिक स्थान पर मन मुताबिक नाम से जैसे कि डांयरी, मेरी डांयरी इत्यादि ।&lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;div align="justify"&gt;अब अपनी सेव की पोथी को खोले। देखा महाशय चम्तकार आपकी पोथी मे आपके कम्प्युटर की घडी के मुताबिक समय और तिथी आ गई है। लिखिये अपनी गाथा और सेव कर दे। जब आप अगली बार पोथी खोलेगे तो एक लाइन छोड कर नयी समय और तिथी आ जायेगी। &lt;/div&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;p align="justify"&gt;तो देर किस बात की है आजमाइये इसे।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2825126909212523463?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2825126909212523463/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2825126909212523463' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2825126909212523463'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2825126909212523463'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/03/blog-post.html' title='नोटपेड का डायरी कि तरह उपयोग'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-4165811541354712959</id><published>2007-02-23T17:27:00.002+05:30</published><updated>2011-12-29T23:24:18.885+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;मेरा गाँव, गाँव का नाम सुनते ही न जाने कितनी ही स्मृतिया एक के बाद एक मानस पटल पर क्रिड्रा करने लगती है। पुराना मकान, सीढीनुमा हरे भरे खेत, चीड, देवदार, साल, सागौन के पेडो से भरे जंगल और प्यारा सा बचपन। बहुत पहले पिताजी हमे शहर ले आये थे। तब मे शायद 3 या 4 साल का रहा हूँगा। पिताजी को सरकारी आवास मिला हुआ था। उसी मे बचपन के दूसरे चरण का प्रारम्भ हुआ। गाँव का बचपन धूमिल होता गया और शहरी बचपन नये पायदान पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै 15 वषौ के बाद गाँव गया था, वो भी इजा के पिताजी को बार बार कहने पर कि देख तो आइये हमारा मकान कैसा है। खेतीहर जमीन हमने जिन लोगौ को दी है,वो ढंग से खेती करते है भी कि नही। जमीन बंजर तो नही छोडी हुई है। मकान कही से टूटा तो नही है। तब मै इजा के गाँव से जुडे इस प्रेम को नही समझ पाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव आकर पुरानी यादे ताजा हो गयी,गाँव की चढाई मे बच्चो का समूह,कंधे पर बस्ता,हाथ मे कमेट की दवात,जेब मे लाइन खीचने का धागा लिये स्कूल जाते थे,आज भी जाते है। फर्क है तो ये कि पहले गाँव वाले लडकियो को स्कूल नही भेजते थे, अब भेजते है। मेरे समय मे स्कूल कि इमारत कच्ची थी, अब पक्की हो गयी है। पुराने समय मे अगर किसी गाँव मे या किसी आदमी को कोई संदेश या न्यौत देना होता था तो उस आदमी को बता दिया जाता था जो उस गाँव के संर्पक मे हो या उस आदमी का परिचित हो। गाँव के लोग इसी तरह से संदेशो का आदान प्रदान करते थे। अब तो एक छोटा सा पोस्ट आफिस भी है। फोन इत्यादि की सुविधाये भी पहुचने लगी है। दवाई इत्यादि के लिये पहले 20 किलोमीटर दूर जाना पडता था,पर अब छोटे से सरकारी अस्पताल के खुल जाने से छोटी छोटी बीमारियो का ईलाज वही पर हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव की खेती के तो क्या कहने। जंगल से खेतो की खाद के लिये पतेल, पिरोउ के जाल गोठ मे संचित किये जाते है और बाद मे गोबर के साथ डालो मे भरकर खेत मे डाल दिये थे। अब भी वही प्रथा चली आ रही है। गेंहूँ,जौ,धान,मडुआ,काकुनी,गहत,भट्र की खेती उसी तरह से होती है। खाद वही पुरानी और पानी के लिये देवराज इंन्द्र पर निर्भरता। बिना खाद पानी के जमीन से आशा भी क्या की जा सकती है। कमरतोड मेहनत और फल वही, मुटठी भर अनाज। पर मजाल है गाँव वाले मेहनत करना छोड दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिताजी कहते थे कि पहले गाँव मे पहुचने के लिए लगभग 30 या 35 किलोमीटर पैदल चलना पडता था पर अब तो मोटर मार्ग बन गया है। कई टैक्सी, जीपे एव सरकारी बसे रोजाना आती जाती है। गाँव से अब मु्श्किल से आधे किलोमीटर की चढाई चढनी पडती है। मोटर मार्ग के कारण बहुत सी सुविधाये मिल गयी है।आजकल तो ये हालात है की ह्लद्रानी\अल्मोडे से खरीदे समान मे एव स्थानीय बाजार से खरीदे समान मे 2 या 3 प्रतिशत का अंतर होता है। गाँव के लोग रात्रि मे उजाले के मिट्रटी के तेल की ढिबरी का प्रयोग करते थे। अब तो गाँव मे बिजली पहुच गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग 15 वर्षो मे छोटी मोटी सुविधाऔ के बावजूद मेरा गाँव वैसा ही है जैसा मैने छोडते समय देखा था। गाँव का मूल स्वरूव एव चरित्र बिल्कुल भी नही बदला है। तीज त्यौहारो और धार्मिक मान्यताऔ की उमंग वही पुरानी है। हुडुक, ढोल, मशीनबाज जैसे ठेठ वाद्ययन्तो की थाप पर रात भर झवाड और लोक गीत के बोल गुजते है। आज भी होली मे होलियारो की टोलिया हर घर के आगन मे जाकर होली गाती है, आशिष देती है। होलियारो के पीछे पीछे होता है बच्चो का समूह जो हर घर मे बटने वाले गुड की डलिया इकटृठा करते है। क्या मिठास होती है उस गुड मे। दिवाली पर सभी लोग एक दूसरे के घर जाकर बधाईया देते है। घूघूती, हरेला, मकर संक्राती पहले की भाँती मनाये जाते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते है जब कोई परिवर्तन होता है तो उसके साथ साथ उस से जुडी अन्य चीजो मे भी छोटे मोटे परिवर्तन होते है। कुछ अच्छे कुछ बुरे। इतने अच्छे परिवर्तनो के साथ कुछ बुरे परिवर्तन भी हुए है। पहले शराब को कोई जानता भी नही था, मगर अब शराब गाँव की जिन्दगी मे कडवाहट घोलती जा रही है। पाश्चातय संस्कृति की हवा से मेरा गाँव भी अछूता नही रहा है। समय एवं परिस्थितियो के साथ गाँव के संदर्भ एवं परिभाषाए अवश्य बदल जाती है पर गाँव कभी नही मरता, वह आज भी जिन्दा है मेरे अन्दर....स्टिल एलाइव। मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरा गाँव खूब फले फूले और तरक्की करे।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-4165811541354712959?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/4165811541354712959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=4165811541354712959' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/4165811541354712959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/4165811541354712959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2006/12/blog-post_04.html' title='मेरा गाँव'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2633543982237316444</id><published>2007-02-22T17:29:00.000+05:30</published><updated>2007-02-22T17:29:16.112+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rd2FOKMFi1I/AAAAAAAAAAw/FkHKk2QkPNw/s1600-h/20070212125318indianteam203.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5034326436769794898" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rd2FOKMFi1I/AAAAAAAAAAw/FkHKk2QkPNw/s320/20070212125318indianteam203.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;विश्वकप के लिये भारतीय चयनकर्ताओ ने 15 रणबांकुरो को चुन लिया है। वेस्टइंडीज मे होने वाले क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया के विभिन्न खिलाडियो से भारतीय प्रशंसको को बहुत सी उम्मीदे है। क्या भारतीय रणबांकुरे देश के करोडो लोगो की उम्मीदो पर खरे उतर पायेगे ? या हर बार कि तरह फुस, यह तो भविष्य ही बतायेगा। आइये नजर डालते है 15 रणबांकुरो पर और उनसे जुडी भारतीय प्रशंसको कि उम्मीदे :&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राहुल द्रविड:&lt;/strong&gt; मिस्टर वाल, मिस्टर कूल जैसे संबोधनो से जडीत क्रिकेटर इस बार भारतीय सेना के सेनापती है। आपने हाट कप्तानी करनी है एव बल्ले का भी बखुबी उपयोग करना है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;सचिन तेद्रुलकर:&lt;/strong&gt; लिटिल मास्टर आपने पिछली बार की तरह इस बार भी रनो कि झडी लगानी है। अगर आप नही चल पाये तो समझो किले का एक द्रार टूट चुका है और दुश्मन कभी भी हावी हो सकता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;सौरव गागुली:&lt;/strong&gt; बंगाल टाइगर से लोगो को उम्मीद है कि वो दहाडे। अगर वो दहाडेगे तभी तो विपक्षी टीम मे दबाव बढेगा। आपको दिखाना है कि शेर, शेर होता चाहे वह जंगल मे रहे या कही और।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;वीरेद्र सहवाग:&lt;/strong&gt; मुल्तान के सुल्तान पर चयनकर्ताओ ने जो दाव लगाया है आशा है वो इसे विफल नही होने देगे। आप चाहे किसी भी क्रम मे बल्लेबाजी करे पर करे अपने ही अंदाज मे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;महेद्र सिह धोनी:&lt;/strong&gt; झारखंड के इस सपूत मे किसी भी गेदबाज को मैदान के बाहर का रास्ता दिखाने का दम है पर जरूरत है तो थोडा कूल रहने की। गर्म खाना खाने से हमेशा मुह जलता है, थोडा ठंडा कर खाये।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;युवराज सिह:&lt;/strong&gt; फील्डिग मे जान लगा देनी है पर बेवजाह मे ही कूदना-फादना नही है, क्योकि काफी समय अनफिट रहने के बाद वापसी हुई है। आपने अभी काफी क्रिकेट खेलनी है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;राबिन उथप्पा:&lt;/strong&gt; दमदार शरीर होने के साथ साथ आपको दमदार शाट लगाते हुए देखना अच्छा लगता है पर इस फार्म को बेरोकटोक जारी रखना।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;दिनेश कार्तिक:&lt;/strong&gt; मैच मे बल्लेबाजी करने का मौका मिले या न मिले पर कूद - फाद कर रन जरूर बचाने है ताकि 15-20 रन कि बढत मिल सके।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;अनिल कुंबले:&lt;/strong&gt; जंबो आपको गेदबाजी के साथ-साथ "रनिग बिटवीन द विकेट" पर भी ध्यान देना है क्योकि हो सकता है आपको निचले क्रम मे बल्लेबाजी करने का मौका भी मिल सकता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;हरभजन सिह:&lt;/strong&gt; भज्जी आपको गेदबाजी पर काफी ध्यान देना है क्योकि हो सकता है किसी मैच मे आप अकेले ही स्पिनर हो। पर आपने अपने धर्मगुरू के कथन "सवा लाख से एक लडाउ ता गुरू गोविंद सिंह नाम कहाउ" को चरिर्थाथ करना है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;जहीर खान:&lt;/strong&gt; टीम से बाहर होकर अच्छे प्रदर्शन के जरिये टीम मे आना कोई आप से सीखे। गेदबाजी के साथ-साथ सही लाइन लेथ पर भी ध्यान देना होगा ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;मुनाफ पटेल:&lt;/strong&gt; चयनकर्ताओ को इस गेदबाज पर काफी भरोसा है। अपनी गेदबाजी की धार को कायम रख कर उनके भरोसे को कायम रखना।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;इरफान पठान:&lt;/strong&gt; कृपया अपनी गेदबाजी पर ध्यान दे क्योकि घातक गेदबाजी के जरिये ही आप टीम इंडिया को जीत दिला सकते है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;अजित अगारकर:&lt;/strong&gt; टीम को ब्रेकथुरू दिलाना आपको भली - भाती आता है, पर रनो पर हाथ ढिला रखना और घातक गेदबाजी करना&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;श्रीसंत:&lt;/strong&gt; माना कि आप अच्छे डांसर है पर आप टीम मे गेदबाजी के लिये रखे गये है। कृपया अपना होमवर्क पूरा कर अपनी गेदबाजी पर ध्यान दे ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;विश्व कप के लिए चुनी गई भारतीय टीम&lt;br /&gt;राहुल द्रविड़ (कप्तान), सचिन तेंदुलकर (उप-कप्तान), वीरेंदर सहवाग, सौरभ गाँगुली, युवराज सिंह, महेंद्र सिंह धोनी, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, रॉबिन उथप्पा, दिनेश कार्तिक, ज़हीर ख़ान, अजित अगरकर, मुनाफ़ पटेल, श्रीसंत, इरफ़ान पठान.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2633543982237316444?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2633543982237316444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2633543982237316444' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2633543982237316444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2633543982237316444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/02/blog-post_22.html' title='क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/Rd2FOKMFi1I/AAAAAAAAAAw/FkHKk2QkPNw/s72-c/20070212125318indianteam203.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-1103955925291610569</id><published>2007-02-21T11:21:00.000+05:30</published><updated>2007-02-21T11:21:57.404+05:30</updated><title type='text'>क्या ईश्वर देखा है तुमने ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/RdvdZ6MFi0I/AAAAAAAAAAk/1IBNBIA22_A/s1600-h/god.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5033860445703080770" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/RdvdZ6MFi0I/AAAAAAAAAAk/1IBNBIA22_A/s320/god.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;कहते है जिसे ईश्वर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        क्या  देखा है तुमने &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जिसने सारा संसार बनाया&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        क्या  देखा है तुमने ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;संसार में इंसान आया&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        इंसान मे शैतान समाया&lt;/div&gt;&lt;div&gt; शैतान के कारण बनता दु:ख&lt;/div&gt;&lt;div&gt;       और दु:ख मे छिपता सुख ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;कैसी है ये भाग्य विडम्बना&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        ईश्वर से इंसान बना&lt;/div&gt;&lt;div&gt; दु:खो एव सुखो के मेल से&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        एक नया संसार बना ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;दु:ख और सुख है&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        एक भंवर की भांती&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जिसमे फस गये तो&lt;/div&gt;&lt;div&gt;       फसे रहते दिन राती ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;न फसे तो सिर्फ शून्य&lt;/div&gt;&lt;div&gt;       शून्य मे फिर ईश्वर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कहते है और जिसे परमेश्वर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;       क्या देखा है तुमने ।।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;पर बंधी है एक विश्वास की डोरी&lt;/div&gt;&lt;div&gt;         रचना की जिसने इस सृष्टि की&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वह ईश्वर है, वह ईश्वर है&lt;/div&gt;&lt;div&gt;        न देखा है तुमने न देखा है मैने ।।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-1103955925291610569?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/1103955925291610569/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=1103955925291610569' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/1103955925291610569'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/1103955925291610569'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/02/blog-post.html' title='क्या ईश्वर देखा है तुमने ?'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_mXvvxLnOPsU/RdvdZ6MFi0I/AAAAAAAAAAk/1IBNBIA22_A/s72-c/god.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-5841272496652704293</id><published>2007-01-08T13:15:00.001+05:30</published><updated>2007-01-08T13:15:17.734+05:30</updated><title type='text'>नववर्ष का स्वागत</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;सभी भारतीयो को नववर्ष की हार्दीक शुभकामनाएँ । भारतवर्ष जिसे लोग आजकल "इंडिया" कह कर संबोधित करते है, मे जिस धूमधाम एवं महोत्सव के रूप मे नववर्ष मनाया जाता है, उसे देखकर मुझे ऐसा आभास होता है कि वह समय अब ज्यादा दूर नही जब हम पश्चिमी देशो के बृहद संस्करण मे पूरी तरह तब्दील हो जायेगे। वैसे तो अंग्रेजीयत के प्रभाव से हमारा देश अमेरिका व ब्रिटेन जैसा ही लगता है पर कुछ तो बात थी जो हमे इन सब से अलग रखती थी। दिल मे कुछ भंम्र था पर नववर्ष की महामाया मे इस बार वह भी टूट गया।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;नववर्ष के उपलक्ष्य मे कही "डिस्को थैक" तो कही पर "कैबरे" का आयोजन किया जा रहा था। पबो, रेस्टोरेंटो, होटलो ने इस अवसर पर कई रंगारंग कार्यक्रमो का आयोजन किया था। इन आयोजनो को पूर्ण करने मे किसी प्रकार की कमी नही छोडी जा रही थी। विघुत छटा से लेकर पुष्प सजावट तक की गई तैयारिया अवर्णनीय थी। मेरी मस्तिक को यह बात हिलोरे मार रही थी कि जिस शहर मे बिजली की समस्या का रोज का रोना रहता है, मे अचानक से क्या चमत्कार हो गया कि बिजली का उत्पादन एकदम से बढ गया।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मेरे सहमित्रो ने भी ऐसे ही एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। मुझे भी आयोजन मे उपस्थित होकर कार्यक्रम कि शोभा बढाने के लिये आमन्त्रित किया गया था। जब मे कार्यक्रम मे पहुचा तो हर एक मेहमान पूर्ण जोश के साथ अपने-अपने कार्यो मे लीन थे। काम के प्रति इतनी लग्न मैने आज तक नही देखी थी। मेरे एक मित्र ने विभिन्न प्रकार की मदिरा से युक्त एक जाम से मेरा स्वागत किया और नृत्य के लिये प्रेरित किया। नृत्य तो मेरे लिये माउन्ट एवरेष्ट चढने से भी कठिन कार्य के समान है अत: मैने सहमित्रो का नृत्य देखना ही उचित समझा। कुछ किशोर नाम मात्र के पहनी किशोरियो के साथ नृत्य का आन्नद लेने के दौरान चिपकने का भी प्रयास कर रहे थे। मेरी समझ मे नही आ रहा था कि बाहर इतनी कडाके की ठंड है और ये किशोरियो गर्म क्यो है। शायद बाद मे तो इतने कपडे भी बोझ लगने लगेगे इन्हे। मंच पर विभिन्न प्रकार के पाँप और फिल्मी गानो का नान-स्टाप कार्यक्रम चल रहा था। बीडी जलइले... और दिल्ली की सर्दी... जैसे गानो की झडी लगी थी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मैने भी 1-2 घंटा कार्यक्रम का पूर्ण आन्नद लिया। पर मुझे जल्द ही अहसास हुआ कि अगर मैं इस माहौल मे और ज्यादा देर रहा तो घर पहुचना मेरे लिये दूभर हो जायेगा। अत: मैने कार्यक्रम से निकलने मे ही भलाई समझी। घर पहुचने पर कब निद्रा ने मुझे अपने आँचल मे ढका पता ही नही चला। आँख खुली तो मस्तिक मे हल्का सा दर्द सा महसूस हो रहा था और बाहर सूरज चाचू मुस्कुरा रहे थे। नववर्ष मे उनका प्रथम दिन जो था।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-5841272496652704293?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/5841272496652704293/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=5841272496652704293' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5841272496652704293'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/5841272496652704293'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2007/01/blog-post.html' title='नववर्ष का स्वागत'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-7433967483793723086</id><published>2006-12-30T11:36:00.001+05:30</published><updated>2006-12-30T11:36:49.047+05:30</updated><title type='text'>आशावादिता</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आशावादिता वह शक्ति है जो मनुष्य को किसी भी कठिनाई को यर्थाथपूर्वक रवैये से हल करने मे मदद करती है। इस शक्ति से हम कठिनाई को हल करने का ऐसा रास्ता चुनते है जो विकासपूर्वक होने के साथ-साथ हमे सक्रियता एवमं पूर्ण दक्षता की और लेकर जाता है। आशावादिता न सिर्फ किसी मनुष्य के जीवन मे खुशहाली और सफलता लेकर आती है, बल्कि वह संबंधित शक्स को एक ऐसे चुंबक मे तब्दील कर देती है, जो सफलता को स्वयं अपनी और खीच लेता है। निराशा को दूर भगाने के लिये आशावादिता एक ऐसी तकनीक प्रदान करता है, जो नैराश्य को खत्म कर आत्मविश्वास लाती है। इसके बलबूते व्यक्तिगत उदेश्यो और उपलब्धियो को अधिक से अधिक हासिल किया जा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आशावादिता एक बेहतर मूल्यवान नजरिया है जिसे हमे समय के साथ साथ और विकसित करते रहना चाहिए। हम जहाँ भी जाते है हमारा नजरिया हमारे साथ साथ जाता है और हम उसी के चश्मे से दुनिया को देखते है। हमारा नजरिया ही तो है डुबते सूरज को दो तरह से परिभाषित करता है, निराशावादी मनुष्य कहता है कि सूरज डूब रहा है, रात होने वाली है जबकि आशावादी मनुष्य कहता है कि सूरज डूब रहा है और कल फिर से उगेगा अर्थात कल हम एक बार फिर से संर्घष करने के तैयार होगे ।&lt;br /&gt;जींवन की कठिनाईयो और मुश्किलो के सामने घुटने टेक देना तो सबसे आसान काम है, लेकिन उनका डट कर मुकाबला करने के लिये आशावादिता से पूर्ण बहुत बडे कलेजे की जरूरत होती है। आशा से भरपूर नजरिये से आप स्वयं को दुनियावालो मे सक्षम  व्यक्ति के तौर देखते है। आपके साथ आशावादिता की चिंगारी जलेगी जो न सिर्फ आपको जीवन के अंधेरेयुक्त रास्तो मे मार्गदर्शन करेगी बल्कि आपको रिस्क लेने को प्रेरित करेगी। आप हवा के रूख  को तो नही मोड सकते लेकिन अपने परवाज को इस तरह से व्यवस्थित जरूर कर सकते है कि आसानी से अपनी मंजील पा सके।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-7433967483793723086?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/7433967483793723086/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=7433967483793723086' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7433967483793723086'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/7433967483793723086'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2006/12/blog-post_29.html' title='आशावादिता'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-2110296382921527957</id><published>2006-12-19T12:09:00.000+05:30</published><updated>2006-12-19T12:09:44.734+05:30</updated><title type='text'>संर्घष आवश्यक है।</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;जिन्दगी एक रहगुजर की तरह है और हम मुसाफिर, जिसके रास्ते मे अनेक रंग देखने को मिलते है। कभी खुशी का उजाला तो कभी गम का अंधेरा। जब हमारा गमो से पाला पडता है तो हमे चारो तरफ निराशा के बादल दिखाई देने लगते है और हम घबरा जाते है। पर निराशा के बादल गहरे है तो क्या हुआ। जिस तरह रात चाहे कितनी भी काली क्यो न हो सवेरा तो होता ही है। उसी तरह से निराशा के बादल भी छट जायेगे। किसी मुश्किल को देखकर भागने से या हाथ पर हाथ रखकर बैठने से मुश्किल हल नही हो जाती। किसी भी मुश्किल से डरे नही बल्कि ये सोचे की मुश्किल से मुकाबला कैसे करे। कैसे हम दुःख के पलो मे भी खुशियो के कुछ पल हासिल कर सकते है।&lt;br /&gt;कुछ लोग सिर्फ सपने देखते है, दूसरो के सहारे जीते है, पंगु बनकर संघर्ष करना नही चाहते है। अपने पैरो पर कभी नही चलते, न ही पैरो पर चलना सीखना चाहते है। दरअसल अपने पैरो पर चलना बहुत कठिन होता है, बहुत सहना पडता है। जिन्दगी खुशिया उन्ही के आगे फैलाती है जो आखरी सांस तक लडना जानते है। जो लोग जिन्दगी के किसी पडाव को ही अपनी मंजील समझ लेते है उन्हे वह नही मिल पाता जिसके वो असली हकदार होते है। अचानक कुछ नही घटता, जो होता है धीरे धीरे होता रहता है, जिस दिन पूरी तरह होता है उस दिन हम उसका होना जान पाते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः जिन्दगी मे संर्घष आवश्यक है। हमे जिन्दगी के इस संर्घष मे विजेता बनना है। प्रयास करते रहने है। प्रयास हमे सफलता के लिये त्याग करने तथा अपनी गलतियो को सुधारने की प्रेरणा देता है। उतार चढाव तो आते रहते है, और शुरूआत.....वह तो हम सभी को करनी होती है आर करते भी है। हम सब सुबह जागते है तो वह नए सिरे से उस दिन की शुरूआत होती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-2110296382921527957?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/2110296382921527957/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=2110296382921527957' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2110296382921527957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/2110296382921527957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2006/12/blog-post_15.html' title='संर्घष आवश्यक है।'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-8011913487979016034</id><published>2006-12-19T12:06:00.001+05:30</published><updated>2006-12-19T12:06:48.608+05:30</updated><title type='text'>दिल्ली का जीवन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;भागदौड वाली इस जीवनशैली मे हर शक्स एक अनजानी सी दौड में अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड रहा है। मैं भी अपनो से दूर ऐसे ही किसी अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड रहा हूँ। क्या पाना है?, कैसे पाना है?,कुछ पता नही। क्या आपने किसी कुत्ते को अनजाने वाहन के पीछे भागते देखा है? सवाल यह नही कि वो क्यो भाग रहा है? अगर वह उस वाहन को पकड भी लेगा तो करेगा क्या? कभी अपने बारे मे सोचता हूँ तो "मुझे लगे रहो मुन्ना भाई"  फिल्म मे विद्या बालान द्वारा कही लाईने याद आ जाती है : &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सीरियल्स् के किरदारो का सारा हाल है मालूम&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं,&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है,&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कब डूबते हुए सुरज को देखा था, याद है?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;5 और 6 लाईने मुझ पर चरितार्थ नही होती है, क्योकि मैं अपने माता पिता से बहुत प्यार करता हूँ और दूरदर्शन देखना तो न के बराबर।  मेरे को तो महानगरीय जींवन एक प्रोगाम की तरह  लगता है, जिसमे न जाने कितनी प्रतिबंधिताये ( conditions )जैसे कि if, if else, while, do while और न जाने कितनी,देखने को मिलती है  स्नातक तक तो सारी याद थी, पर अब नही हैं।  छोटे शहरो मे आदमी को मिले एक अवकाश वह न जाने कितने सुखद अनुभव को समेटता हैं। जबकि दिल्ली जैसे शहरो मे उस अवकाश का पता ही नही चलता। कब सुबह, कब दोपहर और कब शाम हो जाती है पता ही नही लगता हैं। यहा तो दिल करता है कि काश दिन मे 36 या 48 घंटे होते तो कितना अच्छा होता। छोटे शहरो मे लोग जिन्दगी जीते है, जबकि महानगरो मे जिन्दगी काटी जाती है ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जब मैं रूडकी मे जाँब करता था तो रविवार या किसी अन्य अवकाश का पूर्ण उपयोग करता था। उठाई अपनी धन्नो और चल दिये दोस्तो से मिलने। रास्ते मे पडने वाले मुख्य बाजार (Civil Lines)या कन्या विघालयो, महाविघालयो से गुजरने पर चकसुख का परमान्नंद लेने से कभी नही चुकता था। अगर साथ मे मित्र मंडली हो तो पूछो मत। दिल मे एक आस रहती थी कि कभी न कभी तो ईश्वर की कृपा से अपने अंधियारे आंगन मे भी उजाला होगा। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक का परिक्रमण करने मे मुश्किल से एक घंटा लगता था। दिल्ली मे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुचने मे कितने पापड बेलने पडते है, इस को एक दिल्लीवासी ही समझ सकता है। ऐसे मे अवकाश का क्या खाक उपयोग करेगे। अत: सोने (sleep) के अलावा मुझे तो अवकाश का पूर्ण उपयोग करने का कोई दूसरा उपाय नही सुझता।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;खैर जैसे भी है जीवन तो जीना ही पडता है। पर कोशिश यही करता हूँ कि इस कागजी फूल जैसी बनावटी जींवन का हिस्सा ना बनू। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/36730086-8011913487979016034?l=girishsingh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girishsingh.blogspot.com/feeds/8011913487979016034/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=36730086&amp;postID=8011913487979016034' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8011913487979016034'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/36730086/posts/default/8011913487979016034'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girishsingh.blogspot.com/2006/12/blog-post_18.html' title='दिल्ली का जीवन'/><author><name>गिरीश सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05793845872303273470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://farm1.static.flickr.com/145/418640259_8e597b8e5a_t.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-36730086.post-1749712209679974230</id><published>2006-12-08T16:05:00.001+05:30</published><updated>2006-12-08T16:05:53.913+05:30</updated><title type='text'>खुद से प्रेम</title><content type='html'>खुद से प्रेम करना सीखे। खुद को स्वीकारे। कोई भी मनुष्य पूर्ण नही होता। हर एक इंसान मे कई अच्छे बुरे गुण समाहित होते है। हमे अपने अच्छे गुणो का निरंतर विकास और द्रुगुणो का मिटाने का प्रयास करना चाहिये। जब तक हम खुद को अपने सम्मुख जैसे है, वैसे नही स्वीकारेगे तब तक हम अपने आप मे वो बदलाव नही ला पायेगे जो हम लाना चाहते है। बदलाव तभी संभव भी हो पायेगा जब हमारी अपनी नजरो मे हमारी तस्वीर एकदम साफ होगी। फिर चाहे दूसरे क
