शुक्रवार, फ़रवरी 23, 2007

मेरा गाँव

मेरा गाँव, गाँव का नाम सुनते ही न जाने कितनी ही स्मृतिया एक के बाद एक मानस पटल पर क्रिड्रा करने लगती है। पुराना मकान, सीढीनुमा हरे भरे खेत, चीड, देवदार, साल, सागौन के पेडो से भरे जंगल और प्यारा सा बचपन। बहुत पहले पिताजी हमे शहर ले आये थे। तब मे शायद 3 या 4 साल का रहा हूँगा। पिताजी को सरकारी आवास मिला हुआ था। उसी मे बचपन के दूसरे चरण का प्रारम्भ हुआ। गाँव का बचपन धूमिल होता गया और शहरी बचपन नये पायदान पर।

मै 15 वषौ के बाद गाँव गया था, वो भी इजा के पिताजी को बार बार कहने पर कि देख तो आइये हमारा मकान कैसा है। खेतीहर जमीन हमने जिन लोगौ को दी है,वो ढंग से खेती करते है भी कि नही। जमीन बंजर तो नही छोडी हुई है। मकान कही से टूटा तो नही है। तब मै इजा के गाँव से जुडे इस प्रेम को नही समझ पाता था।

गाँव आकर पुरानी यादे ताजा हो गयी,गाँव की चढाई मे बच्चो का समूह,कंधे पर बस्ता,हाथ मे कमेट की दवात,जेब मे लाइन खीचने का धागा लिये स्कूल जाते थे,आज भी जाते है। फर्क है तो ये कि पहले गाँव वाले लडकियो को स्कूल नही भेजते थे, अब भेजते है। मेरे समय मे स्कूल कि इमारत कच्ची थी, अब पक्की हो गयी है। पुराने समय मे अगर किसी गाँव मे या किसी आदमी को कोई संदेश या न्यौत देना होता था तो उस आदमी को बता दिया जाता था जो उस गाँव के संर्पक मे हो या उस आदमी का परिचित हो। गाँव के लोग इसी तरह से संदेशो का आदान प्रदान करते थे। अब तो एक छोटा सा पोस्ट आफिस भी है। फोन इत्यादि की सुविधाये भी पहुचने लगी है। दवाई इत्यादि के लिये पहले 20 किलोमीटर दूर जाना पडता था,पर अब छोटे से सरकारी अस्पताल के खुल जाने से छोटी छोटी बीमारियो का ईलाज वही पर हो जाता है।

गाँव की खेती के तो क्या कहने। जंगल से खेतो की खाद के लिये पतेल, पिरोउ के जाल गोठ मे संचित किये जाते है और बाद मे गोबर के साथ डालो मे भरकर खेत मे डाल दिये थे। अब भी वही प्रथा चली आ रही है। गेंहूँ,जौ,धान,मडुआ,काकुनी,गहत,भट्र की खेती उसी तरह से होती है। खाद वही पुरानी और पानी के लिये देवराज इंन्द्र पर निर्भरता। बिना खाद पानी के जमीन से आशा भी क्या की जा सकती है। कमरतोड मेहनत और फल वही, मुटठी भर अनाज। पर मजाल है गाँव वाले मेहनत करना छोड दे।

पिताजी कहते थे कि पहले गाँव मे पहुचने के लिए लगभग 30 या 35 किलोमीटर पैदल चलना पडता था पर अब तो मोटर मार्ग बन गया है। कई टैक्सी, जीपे एव सरकारी बसे रोजाना आती जाती है। गाँव से अब मु्श्किल से आधे किलोमीटर की चढाई चढनी पडती है। मोटर मार्ग के कारण बहुत सी सुविधाये मिल गयी है।आजकल तो ये हालात है की ह्लद्रानी\अल्मोडे से खरीदे समान मे एव स्थानीय बाजार से खरीदे समान मे 2 या 3 प्रतिशत का अंतर होता है। गाँव के लोग रात्रि मे उजाले के मिट्रटी के तेल की ढिबरी का प्रयोग करते थे। अब तो गाँव मे बिजली पहुच गयी है।

लगभग 15 वर्षो मे छोटी मोटी सुविधाऔ के बावजूद मेरा गाँव वैसा ही है जैसा मैने छोडते समय देखा था। गाँव का मूल स्वरूव एव चरित्र बिल्कुल भी नही बदला है। तीज त्यौहारो और धार्मिक मान्यताऔ की उमंग वही पुरानी है। हुडुक, ढोल, मशीनबाज जैसे ठेठ वाद्ययन्तो की थाप पर रात भर झवाड और लोक गीत के बोल गुजते है। आज भी होली मे होलियारो की टोलिया हर घर के आगन मे जाकर होली गाती है, आशिष देती है। होलियारो के पीछे पीछे होता है बच्चो का समूह जो हर घर मे बटने वाले गुड की डलिया इकटृठा करते है। क्या मिठास होती है उस गुड मे। दिवाली पर सभी लोग एक दूसरे के घर जाकर बधाईया देते है। घूघूती, हरेला, मकर संक्राती पहले की भाँती मनाये जाते है।

कहते है जब कोई परिवर्तन होता है तो उसके साथ साथ उस से जुडी अन्य चीजो मे भी छोटे मोटे परिवर्तन होते है। कुछ अच्छे कुछ बुरे। इतने अच्छे परिवर्तनो के साथ कुछ बुरे परिवर्तन भी हुए है। पहले शराब को कोई जानता भी नही था, मगर अब शराब गाँव की जिन्दगी मे कडवाहट घोलती जा रही है। पाश्चातय संस्कृति की हवा से मेरा गाँव भी अछूता नही रहा है। समय एवं परिस्थितियो के साथ गाँव के संदर्भ एवं परिभाषाए अवश्य बदल जाती है पर गाँव कभी नही मरता, वह आज भी जिन्दा है मेरे अन्दर....स्टिल एलाइव। मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरा गाँव खूब फले फूले और तरक्की करे।

गुरुवार, फ़रवरी 22, 2007

क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया


विश्वकप के लिये भारतीय चयनकर्ताओ ने 15 रणबांकुरो को चुन लिया है। वेस्टइंडीज मे होने वाले क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया के विभिन्न खिलाडियो से भारतीय प्रशंसको को बहुत सी उम्मीदे है। क्या भारतीय रणबांकुरे देश के करोडो लोगो की उम्मीदो पर खरे उतर पायेगे ? या हर बार कि तरह फुस, यह तो भविष्य ही बतायेगा। आइये नजर डालते है 15 रणबांकुरो पर और उनसे जुडी भारतीय प्रशंसको कि उम्मीदे :


राहुल द्रविड: मिस्टर वाल, मिस्टर कूल जैसे संबोधनो से जडीत क्रिकेटर इस बार भारतीय सेना के सेनापती है। आपने हाट कप्तानी करनी है एव बल्ले का भी बखुबी उपयोग करना है।

सचिन तेद्रुलकर: लिटिल मास्टर आपने पिछली बार की तरह इस बार भी रनो कि झडी लगानी है। अगर आप नही चल पाये तो समझो किले का एक द्रार टूट चुका है और दुश्मन कभी भी हावी हो सकता है।

सौरव गागुली: बंगाल टाइगर से लोगो को उम्मीद है कि वो दहाडे। अगर वो दहाडेगे तभी तो विपक्षी टीम मे दबाव बढेगा। आपको दिखाना है कि शेर, शेर होता चाहे वह जंगल मे रहे या कही और।

वीरेद्र सहवाग: मुल्तान के सुल्तान पर चयनकर्ताओ ने जो दाव लगाया है आशा है वो इसे विफल नही होने देगे। आप चाहे किसी भी क्रम मे बल्लेबाजी करे पर करे अपने ही अंदाज मे।

महेद्र सिह धोनी: झारखंड के इस सपूत मे किसी भी गेदबाज को मैदान के बाहर का रास्ता दिखाने का दम है पर जरूरत है तो थोडा कूल रहने की। गर्म खाना खाने से हमेशा मुह जलता है, थोडा ठंडा कर खाये।

युवराज सिह: फील्डिग मे जान लगा देनी है पर बेवजाह मे ही कूदना-फादना नही है, क्योकि काफी समय अनफिट रहने के बाद वापसी हुई है। आपने अभी काफी क्रिकेट खेलनी है।

राबिन उथप्पा: दमदार शरीर होने के साथ साथ आपको दमदार शाट लगाते हुए देखना अच्छा लगता है पर इस फार्म को बेरोकटोक जारी रखना।

दिनेश कार्तिक: मैच मे बल्लेबाजी करने का मौका मिले या न मिले पर कूद - फाद कर रन जरूर बचाने है ताकि 15-20 रन कि बढत मिल सके।

अनिल कुंबले: जंबो आपको गेदबाजी के साथ-साथ "रनिग बिटवीन द विकेट" पर भी ध्यान देना है क्योकि हो सकता है आपको निचले क्रम मे बल्लेबाजी करने का मौका भी मिल सकता है।

हरभजन सिह: भज्जी आपको गेदबाजी पर काफी ध्यान देना है क्योकि हो सकता है किसी मैच मे आप अकेले ही स्पिनर हो। पर आपने अपने धर्मगुरू के कथन "सवा लाख से एक लडाउ ता गुरू गोविंद सिंह नाम कहाउ" को चरिर्थाथ करना है।

जहीर खान: टीम से बाहर होकर अच्छे प्रदर्शन के जरिये टीम मे आना कोई आप से सीखे। गेदबाजी के साथ-साथ सही लाइन लेथ पर भी ध्यान देना होगा ।

मुनाफ पटेल: चयनकर्ताओ को इस गेदबाज पर काफी भरोसा है। अपनी गेदबाजी की धार को कायम रख कर उनके भरोसे को कायम रखना।

इरफान पठान: कृपया अपनी गेदबाजी पर ध्यान दे क्योकि घातक गेदबाजी के जरिये ही आप टीम इंडिया को जीत दिला सकते है।

अजित अगारकर: टीम को ब्रेकथुरू दिलाना आपको भली - भाती आता है, पर रनो पर हाथ ढिला रखना और घातक गेदबाजी करना

श्रीसंत: माना कि आप अच्छे डांसर है पर आप टीम मे गेदबाजी के लिये रखे गये है। कृपया अपना होमवर्क पूरा कर अपनी गेदबाजी पर ध्यान दे ।


विश्व कप के लिए चुनी गई भारतीय टीम
राहुल द्रविड़ (कप्तान), सचिन तेंदुलकर (उप-कप्तान), वीरेंदर सहवाग, सौरभ गाँगुली, युवराज सिंह, महेंद्र सिंह धोनी, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, रॉबिन उथप्पा, दिनेश कार्तिक, ज़हीर ख़ान, अजित अगरकर, मुनाफ़ पटेल, श्रीसंत, इरफ़ान पठान.

बुधवार, फ़रवरी 21, 2007

क्या ईश्वर देखा है तुमने ?


कहते है जिसे ईश्वर
क्या देखा है तुमने
जिसने सारा संसार बनाया
क्या देखा है तुमने ।।

संसार में इंसान आया
इंसान मे शैतान समाया
शैतान के कारण बनता दु:ख
और दु:ख मे छिपता सुख ।।

कैसी है ये भाग्य विडम्बना
ईश्वर से इंसान बना
दु:खो एव सुखो के मेल से
एक नया संसार बना ।।

दु:ख और सुख है
एक भंवर की भांती
जिसमे फस गये तो
फसे रहते दिन राती ।।

न फसे तो सिर्फ शून्य
शून्य मे फिर ईश्वर
कहते है और जिसे परमेश्वर
क्या देखा है तुमने ।।

पर बंधी है एक विश्वास की डोरी
रचना की जिसने इस सृष्टि की
वह ईश्वर है, वह ईश्वर है
न देखा है तुमने न देखा है मैने ।।

सोमवार, जनवरी 08, 2007

नववर्ष का स्वागत

सभी भारतीयो को नववर्ष की हार्दीक शुभकामनाएँ । भारतवर्ष जिसे लोग आजकल "इंडिया" कह कर संबोधित करते है, मे जिस धूमधाम एवं महोत्सव के रूप मे नववर्ष मनाया जाता है, उसे देखकर मुझे ऐसा आभास होता है कि वह समय अब ज्यादा दूर नही जब हम पश्चिमी देशो के बृहद संस्करण मे पूरी तरह तब्दील हो जायेगे। वैसे तो अंग्रेजीयत के प्रभाव से हमारा देश अमेरिका व ब्रिटेन जैसा ही लगता है पर कुछ तो बात थी जो हमे इन सब से अलग रखती थी। दिल मे कुछ भंम्र था पर नववर्ष की महामाया मे इस बार वह भी टूट गया।

नववर्ष के उपलक्ष्य मे कही "डिस्को थैक" तो कही पर "कैबरे" का आयोजन किया जा रहा था। पबो, रेस्टोरेंटो, होटलो ने इस अवसर पर कई रंगारंग कार्यक्रमो का आयोजन किया था। इन आयोजनो को पूर्ण करने मे किसी प्रकार की कमी नही छोडी जा रही थी। विघुत छटा से लेकर पुष्प सजावट तक की गई तैयारिया अवर्णनीय थी। मेरी मस्तिक को यह बात हिलोरे मार रही थी कि जिस शहर मे बिजली की समस्या का रोज का रोना रहता है, मे अचानक से क्या चमत्कार हो गया कि बिजली का उत्पादन एकदम से बढ गया।

मेरे सहमित्रो ने भी ऐसे ही एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। मुझे भी आयोजन मे उपस्थित होकर कार्यक्रम कि शोभा बढाने के लिये आमन्त्रित किया गया था। जब मे कार्यक्रम मे पहुचा तो हर एक मेहमान पूर्ण जोश के साथ अपने-अपने कार्यो मे लीन थे। काम के प्रति इतनी लग्न मैने आज तक नही देखी थी। मेरे एक मित्र ने विभिन्न प्रकार की मदिरा से युक्त एक जाम से मेरा स्वागत किया और नृत्य के लिये प्रेरित किया। नृत्य तो मेरे लिये माउन्ट एवरेष्ट चढने से भी कठिन कार्य के समान है अत: मैने सहमित्रो का नृत्य देखना ही उचित समझा। कुछ किशोर नाम मात्र के पहनी किशोरियो के साथ नृत्य का आन्नद लेने के दौरान चिपकने का भी प्रयास कर रहे थे। मेरी समझ मे नही आ रहा था कि बाहर इतनी कडाके की ठंड है और ये किशोरियो गर्म क्यो है। शायद बाद मे तो इतने कपडे भी बोझ लगने लगेगे इन्हे। मंच पर विभिन्न प्रकार के पाँप और फिल्मी गानो का नान-स्टाप कार्यक्रम चल रहा था। बीडी जलइले... और दिल्ली की सर्दी... जैसे गानो की झडी लगी थी।

मैने भी 1-2 घंटा कार्यक्रम का पूर्ण आन्नद लिया। पर मुझे जल्द ही अहसास हुआ कि अगर मैं इस माहौल मे और ज्यादा देर रहा तो घर पहुचना मेरे लिये दूभर हो जायेगा। अत: मैने कार्यक्रम से निकलने मे ही भलाई समझी। घर पहुचने पर कब निद्रा ने मुझे अपने आँचल मे ढका पता ही नही चला। आँख खुली तो मस्तिक मे हल्का सा दर्द सा महसूस हो रहा था और बाहर सूरज चाचू मुस्कुरा रहे थे। नववर्ष मे उनका प्रथम दिन जो था।

शनिवार, दिसंबर 30, 2006

आशावादिता

आशावादिता वह शक्ति है जो मनुष्य को किसी भी कठिनाई को यर्थाथपूर्वक रवैये से हल करने मे मदद करती है। इस शक्ति से हम कठिनाई को हल करने का ऐसा रास्ता चुनते है जो विकासपूर्वक होने के साथ-साथ हमे सक्रियता एवमं पूर्ण दक्षता की और लेकर जाता है। आशावादिता न सिर्फ किसी मनुष्य के जीवन मे खुशहाली और सफलता लेकर आती है, बल्कि वह संबंधित शक्स को एक ऐसे चुंबक मे तब्दील कर देती है, जो सफलता को स्वयं अपनी और खीच लेता है। निराशा को दूर भगाने के लिये आशावादिता एक ऐसी तकनीक प्रदान करता है, जो नैराश्य को खत्म कर आत्मविश्वास लाती है। इसके बलबूते व्यक्तिगत उदेश्यो और उपलब्धियो को अधिक से अधिक हासिल किया जा सकता है।

आशावादिता एक बेहतर मूल्यवान नजरिया है जिसे हमे समय के साथ साथ और विकसित करते रहना चाहिए। हम जहाँ भी जाते है हमारा नजरिया हमारे साथ साथ जाता है और हम उसी के चश्मे से दुनिया को देखते है। हमारा नजरिया ही तो है डुबते सूरज को दो तरह से परिभाषित करता है, निराशावादी मनुष्य कहता है कि सूरज डूब रहा है, रात होने वाली है जबकि आशावादी मनुष्य कहता है कि सूरज डूब रहा है और कल फिर से उगेगा अर्थात कल हम एक बार फिर से संर्घष करने के तैयार होगे ।
जींवन की कठिनाईयो और मुश्किलो के सामने घुटने टेक देना तो सबसे आसान काम है, लेकिन उनका डट कर मुकाबला करने के लिये आशावादिता से पूर्ण बहुत बडे कलेजे की जरूरत होती है। आशा से भरपूर नजरिये से आप स्वयं को दुनियावालो मे सक्षम व्यक्ति के तौर देखते है। आपके साथ आशावादिता की चिंगारी जलेगी जो न सिर्फ आपको जीवन के अंधेरेयुक्त रास्तो मे मार्गदर्शन करेगी बल्कि आपको रिस्क लेने को प्रेरित करेगी। आप हवा के रूख को तो नही मोड सकते लेकिन अपने परवाज को इस तरह से व्यवस्थित जरूर कर सकते है कि आसानी से अपनी मंजील पा सके।

मंगलवार, दिसंबर 19, 2006

संर्घष आवश्यक है।

जिन्दगी एक रहगुजर की तरह है और हम मुसाफिर, जिसके रास्ते मे अनेक रंग देखने को मिलते है। कभी खुशी का उजाला तो कभी गम का अंधेरा। जब हमारा गमो से पाला पडता है तो हमे चारो तरफ निराशा के बादल दिखाई देने लगते है और हम घबरा जाते है। पर निराशा के बादल गहरे है तो क्या हुआ। जिस तरह रात चाहे कितनी भी काली क्यो न हो सवेरा तो होता ही है। उसी तरह से निराशा के बादल भी छट जायेगे। किसी मुश्किल को देखकर भागने से या हाथ पर हाथ रखकर बैठने से मुश्किल हल नही हो जाती। किसी भी मुश्किल से डरे नही बल्कि ये सोचे की मुश्किल से मुकाबला कैसे करे। कैसे हम दुःख के पलो मे भी खुशियो के कुछ पल हासिल कर सकते है।
कुछ लोग सिर्फ सपने देखते है, दूसरो के सहारे जीते है, पंगु बनकर संघर्ष करना नही चाहते है। अपने पैरो पर कभी नही चलते, न ही पैरो पर चलना सीखना चाहते है। दरअसल अपने पैरो पर चलना बहुत कठिन होता है, बहुत सहना पडता है। जिन्दगी खुशिया उन्ही के आगे फैलाती है जो आखरी सांस तक लडना जानते है। जो लोग जिन्दगी के किसी पडाव को ही अपनी मंजील समझ लेते है उन्हे वह नही मिल पाता जिसके वो असली हकदार होते है। अचानक कुछ नही घटता, जो होता है धीरे धीरे होता रहता है, जिस दिन पूरी तरह होता है उस दिन हम उसका होना जान पाते है।

अतः जिन्दगी मे संर्घष आवश्यक है। हमे जिन्दगी के इस संर्घष मे विजेता बनना है। प्रयास करते रहने है। प्रयास हमे सफलता के लिये त्याग करने तथा अपनी गलतियो को सुधारने की प्रेरणा देता है। उतार चढाव तो आते रहते है, और शुरूआत.....वह तो हम सभी को करनी होती है आर करते भी है। हम सब सुबह जागते है तो वह नए सिरे से उस दिन की शुरूआत होती है।

दिल्ली का जीवन

भागदौड वाली इस जीवनशैली मे हर शक्स एक अनजानी सी दौड में अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड रहा है। मैं भी अपनो से दूर ऐसे ही किसी अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड रहा हूँ। क्या पाना है?, कैसे पाना है?,कुछ पता नही। क्या आपने किसी कुत्ते को अनजाने वाहन के पीछे भागते देखा है? सवाल यह नही कि वो क्यो भाग रहा है? अगर वह उस वाहन को पकड भी लेगा तो करेगा क्या? कभी अपने बारे मे सोचता हूँ तो "मुझे लगे रहो मुन्ना भाई" फिल्म मे विद्या बालान द्वारा कही लाईने याद आ जाती है :
शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?
पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है
भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?
सीरियल्स् के किरदारो का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?
अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?
108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं?
इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं,
लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.
मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है,
लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?
कब डूबते हुए सुरज को देखा था, याद है?
कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?
तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?
5 और 6 लाईने मुझ पर चरितार्थ नही होती है, क्योकि मैं अपने माता पिता से बहुत प्यार करता हूँ और दूरदर्शन देखना तो न के बराबर। मेरे को तो महानगरीय जींवन एक प्रोगाम की तरह लगता है, जिसमे न जाने कितनी प्रतिबंधिताये ( conditions )जैसे कि if, if else, while, do while और न जाने कितनी,देखने को मिलती है स्नातक तक तो सारी याद थी, पर अब नही हैं। छोटे शहरो मे आदमी को मिले एक अवकाश वह न जाने कितने सुखद अनुभव को समेटता हैं। जबकि दिल्ली जैसे शहरो मे उस अवकाश का पता ही नही चलता। कब सुबह, कब दोपहर और कब शाम हो जाती है पता ही नही लगता हैं। यहा तो दिल करता है कि काश दिन मे 36 या 48 घंटे होते तो कितना अच्छा होता। छोटे शहरो मे लोग जिन्दगी जीते है, जबकि महानगरो मे जिन्दगी काटी जाती है ।

जब मैं रूडकी मे जाँब करता था तो रविवार या किसी अन्य अवकाश का पूर्ण उपयोग करता था। उठाई अपनी धन्नो और चल दिये दोस्तो से मिलने। रास्ते मे पडने वाले मुख्य बाजार (Civil Lines)या कन्या विघालयो, महाविघालयो से गुजरने पर चकसुख का परमान्नंद लेने से कभी नही चुकता था। अगर साथ मे मित्र मंडली हो तो पूछो मत। दिल मे एक आस रहती थी कि कभी न कभी तो ईश्वर की कृपा से अपने अंधियारे आंगन मे भी उजाला होगा। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक का परिक्रमण करने मे मुश्किल से एक घंटा लगता था। दिल्ली मे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुचने मे कितने पापड बेलने पडते है, इस को एक दिल्लीवासी ही समझ सकता है। ऐसे मे अवकाश का क्या खाक उपयोग करेगे। अत: सोने (sleep) के अलावा मुझे तो अवकाश का पूर्ण उपयोग करने का कोई दूसरा उपाय नही सुझता।

खैर जैसे भी है जीवन तो जीना ही पडता है। पर कोशिश यही करता हूँ कि इस कागजी फूल जैसी बनावटी जींवन का हिस्सा ना बनू।

शुक्रवार, दिसंबर 08, 2006

खुद से प्रेम

खुद से प्रेम करना सीखे। खुद को स्वीकारे। कोई भी मनुष्य पूर्ण नही होता। हर एक इंसान मे कई अच्छे बुरे गुण समाहित होते है। हमे अपने अच्छे गुणो का निरंतर विकास और द्रुगुणो का मिटाने का प्रयास करना चाहिये। जब तक हम खुद को अपने सम्मुख जैसे है, वैसे नही स्वीकारेगे तब तक हम अपने आप मे वो बदलाव नही ला पायेगे जो हम लाना चाहते है। बदलाव तभी संभव भी हो पायेगा जब हमारी अपनी नजरो मे हमारी तस्वीर एकदम साफ होगी। फिर चाहे दूसरे कुछ भी सोचे। हम क्या है, यह हमारे स्वयं द्रारा तय होना चाहिए। इस संबध मे हम ही है जो दूसरो से ज्यादा जानते है न कि दूसरो से प्रमाण पत्र की चाह मे अपनी स्वयं की कोई दृष्टि ही विकसित कर पाये।
यदि किसी ने भी आपके लिए कुछ किया है, उनके आप एहसानमंद रहे और उनके लिए सदैव आगे बढकर कुछ करने के लिए तैयार रहे। लेकिन उन एहसानो के बदले मे आपके जींवन की दिशा उनके द्रारा तय नही होनी चाहिए। आप अपने जींवन मे किसी को दखल देने का कितना अधिकार है, यह आप स्वयं तय करोगे।अपनी एक सोच व्यक्तित्व बनाये, अपनी सोच को परिपक्व रूप दे क्योकि ये जिन्दगी तुम्हारी है।

शनिवार, दिसंबर 02, 2006

सफलता की राह

जीवन के इस पथ पर
क्या खोना क्या पाना है
जीवन एक संघर्ष है
इसी सोच मे कदम बढाना है।

यदि हम कदम नही बढायेगे
तो उसी जगह मै रह जायेगे
हम आगे नही बढ पायेगे
जीवन मे सिर्फ आगे बढो।

आगे अगर रूक गये
मुश्किलो को देख कर
बढ नही पायेगे हम
लेगी कठनाईया हमे घेर।

जाना है हमे बहुत आगे
पानी है हमे सफलता
जो मिलेगी करके संर्घष
क्योकि जीवन एक संर्घष है।

प्रथम प्रयास

क्या तुमने कभी जिन्दगी को परछाइयो के पीछे भागते देखा है। मैने देखा है और मैं कई बार इन परछाइयो मे खो भी गया हूँ। लेकिन जब भी उजाला हुआ मैने अपने आप को सदा तन्हा और अकेला पाया। यह सिलसिला अगर यही खत्म हो तो कोई बात नही थी पर यह हर रात शुरू होता है और दिन के उजाले के साथ खत्म हो जाता है। कभी दिन का उजाला खतरनाक तथा भयावह सपनो से निजात दिलाता है तो कभी हसीन सपनो के लिये काल का ग्रास बन जाता है। मेरी समझ मे नही आता मे किसका शुकिया अदा करू, उस रात का जो मुझे सच्चाई से दूर हसीन सपने दिखाती है या उस सुबह के उस उजाले का जो मुझे सच्चाई से वाकिफ कराती है।

आप भी सोच रहे होगे ये चिरकुट की तरह बाते क्यो कर रहा है। दोस्तो ऐसा तो होगा ही नये नये लेखक जो बने है। लिखने की ये प्रेरणा के स्रोत भी आप लोग ही है। आप लोग लिखते ही इतना अच्छा हो कि मै बयान नही कर सकता। इसलिये मैने सोचा क्यो ना मै भी प्रयास करू। मै इसमे कहा तक सफल और असफल हुआ हूँ ये तो आप लोग ही मुझे बतायेगे। आशा करता हूँ कि आप सब लोगो के आर्शिवाद से मै अपनी मंजिल जरूर पा सकूगाँ।

आपका अपना

गिरीश