सोमवार, फ़रवरी 14, 2011

राजुला मालुशाही: एक अमर प्रेम कथा

उत्‍तराखंड के विभिन्‍न हिस्‍सों में प्रेम कहानियां लोकगथाओं के रूप में जन जन तक पहुंची हैं, हालांकि यह अधिकतर राजघरानों से जुड़ी हैं लेकिन वह आम आदमी तक प्‍यार का संदेश छोड्ने में कामयाब रही हैं

आज वी-डे है, प्यार का अनमोल दिन, मेरे लिए आवश्यक है की इस विषय में भी कुछ लिखूं, चलिए अपने परदेश यानी उत्तराखंड में प्रचलित एक प्रेमगाथा के बारे में बताता हूँ

यह कहानी कोई हज़ार साल पुरानी है, कुमांऊं के पहले राजवंश कत्‍यूर के किसी वंशज को लेकर यह कहानी है, उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्‍होंने कई मनौतियां मनाई। अन्‍त में उन्‍हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्‍हें संतान की प्राप्‍ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्‍यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे। दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड्का और लड्की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया। समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्‍दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्‍य सबको अपनी ओर खींचता था।

पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि “हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवे दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा।” राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया। लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।

धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे….राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लड़की को रंगीली वैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा।
एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि

” मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी?
पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा?
देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”

उसकी मां ने उत्तर दिया ” दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट”

तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि ” हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।

वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया। लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि ” हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।” यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।

गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके।

तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोड़कर? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने। रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।

मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोला ’दे माई भिक्षा!’ तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ’ले जोगी भिक्षा’ पर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि ’मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखता’ तो राजुला ने कहा कि ’मैं सुनपति शौका की लड़की राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या है’ तो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा ’चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था’। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि ’हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया’। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि ’ मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा’।

तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।

सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर वैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि ’मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोड़्कर जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।

यह कहानी शताब्दियों पुरानी है, पर पीड़ी दर पीड़ी यह कहानी आगे बड़ रही है, और सच ही कहा सच्चा प्यार कभी मरता नही है, हमेशा के लिए अमर हो जाता है।

सभार : मेरा पहाड़ (Mera Pahad)

शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

कुमाऊं के देवी-देवता

उत्तर में उत्तुंग हिमाच्छादित नन्दादेवी, नन्दाकोट, त्रिशूल की सुरम्य पर्वत मालाएं हैं। पूर्व में पशुपति नाथ का सुन्दर नेपाल है। पश्चिम में तीर्थों का लीडर भव्य गढ़वाल है। दक्षिण में टनकपुर, हल्द्वानी, रामनगर की (पीलीभीत) जरखेज तराई की धरती है। यही उत्तराखंड की एक कमिश्नरी है कुमाऊं। इसकी वादियों में बहती है कलकल-छलछल करती तीव्र गति में बहुत-सी नदियां। यहां 50 हजार से पांच लाख साल पुराने शैलाश्रयों के आदिम मानव सभ्यता के अवशेष इतिहासकार बताते हैं। पं. बद्रीदत्त पांडे जी ने ई.पू. 2500 से 700वी ई. तक कत्यूरों का राज बताया है। आदि शंकराचार्च ने सातवीं शताब्दी में सूर्यवंशी राज्य का अभिषेक किया था। इससे पहले यहां बौद्ध धर्म था। वेे बाद में कत्यूरी कहलाए। राहुल सांकृत्यायन 850 से 1060 तक कत्यूरी राज मानते हैं। चंदों ने 1200 से 1700 तक राज किया। 1729-43 तक रूहेलों के निरंतर आक्रमणों से कुमाऊं त्रस्त था। 1790 से 1815 तक गोरखा कुराज रहा। उसके बाद अंग्रेजी राज में मिला लिया गया था। 1857 के विद्रोह के कई सेनानी यहां पहुंचे थे। जंगे आजादी की खूब हलचल थी। कुमाऊं नाम की कई कथाएं हैं। कूर्माकार होना ही कुमाऊं माना जाता हैं। स्कंध पुराण में इसका वर्णन है। कवि चन्दवरदाई के पृथ्वीराज रासो में लिखा है—


‘सवलष्प उत्तर सयल, कुमऊं गढ़ दुरंग।
राजतराज कुमोदमणि हय गय द्रिब्ब अभंग।’

कुमाऊंनी संस्कृत, अप्रभंश, दरद-खास-पैशाची, सौर सेनी से बनी, तथा इसमें नेपाली, गढ़वाली, बंगला शब्दों की भरमार है। 1105 से कुमाऊंनी का रूप-लय ढलने लगा था। कुमाऊंनी बोलने वालों की संख्या 15 लाख बताई गयी है। कुमाऊं की अपनी संस्कृति, अपनी बोली, अपनी एक विशिष्ट जीवनचर्या है, पहचान है। वैदिक धर्म ही कालांतर में हिंदू धर्म बना। प्रारम्भ से ही हिंदू धर्म में बहु-ईश्वरवाद है। कुमाऊं में हिंदू देवता तो हैं ही साथ में स्थानीय देवी-देवता भी हैं जिनमें अधिकतर जागर प्रधान हैं। यह उनके वीरों, पूर्वजों के स्मरण की एक प्रणाली है। इन पर गहन आस्था है, साथ में एक सामाजिक न्याय प्रणाली और संकट मोचक देव-देवी बन गए हैं। कस्बों में बहुधर्मी समाज है, जबकि गांवों में ब्राह्मण-राजपूत प्रधान हैं। तीसरे स्थान पर दलित हैं।

ऊंचे-ऊंचे शिखरों पर देवी के थान (मंदिर) हैं। नदी-नालों के किनारे शिवालय हैं। सत्य नारायण कथा के शंख-घंटियां सभी घरों में बजती हैं। पार्वती, भगवती, (देवी) सरस्वती, लक्ष्मी पूजन आम हैं। ब्रह्मा-विष्णु, महेश देव सबके हैं। कुमाऊं के स्थानीय देवताओं की एक लम्बी फेहरिस्त है। वे अधिकतर जागर प्रधान हैं। एक होता है जगरिया। वह एक लयबद्ध कथा से बाजों द्वारा डंगरियां (वह व्यक्ति जिसके शरीर में देव प्रविष्ठï होता है) नचाता है। वह पूजा लेता है। न्याय देता है। खुश होता है। संरक्षण करता है। ये हैं कुमाऊं के देवी-देवता।

भूमिया : हर गांव में भूमिया का मंदिर है। रबी-खरीफ की फसल कटने के बाद भूमिया देवता पूजे जाते हैं। सामूहिक शेयर से पूवे पकाए जाते हैं।
देवी : दुर्गा, भगवती कई नामों के मंदिर हैं। उनमें भंडारे होते हैं। कत्यूरी वंश की ऐतिहासिक वीरांगना जियारानी रानीबाग चित्रशिला पर हर मकर संक्रांति (उत्तरायणी) पर जागरों द्वारा पूजी जाती है।

गोलू : राजा झालराई की सात रानियां होने पर भी वह नि:संतान थे। संतान प्राप्ति की आस में राजा द्वारा काशी के सिद्ध बाबा से भैरव यज्ञ करवाया और सपने में उन्हें गौर भैरव ने दर्शन दिए और कहा राजन अब आप आठवां विवाह करो में उसी रानी के गर्भ से आपके पुत्र रूप में जन्म लूंगा। इस प्रकार राजा ने आठवां विवाह कालिंका से रचाया। मगर इससे सातों रानियों में कालिंका को लेकर ईष्या उत्पन्न हो गई। कालिंका का गर्भवती होना सातों रानियों के लिए असहनीय हो गया। तब तीनों रानियों ने ईष्या के चलते षडयंत्र रचते हुए कालिंका को बताया कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए माता से पैदा होने वाले शिशु की सूरत सात दिनों तक नहीं देखनी पड़ेगी। यह सुनकर वंश की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कालिंका तैयार हो गई। कालिंका को कोठरी में कर दिया गया। प्रसव पीड़ा होते ही उसकी आंखों में काली पट्टी बांध दी गई। सातों रानियों ने नवजात शिशु को हटाकर उसकी जगह सिलबट्टंा रख दिया गया। फिर उसे बताया कि उसने सिलबट्टे को जन्म दिया है। सातों रानियां नवजात शिशु को मारने की व्यवस्था करने लगी। सर्वप्रथम उन्होंने बालक को गौशाला में फेंककर यह सोचा की बालक जानवरों के पैर तले कुचलकर मर जाएगा। मगर देखा कि गाय घुटने टेक कर शिशु के मुंह में अपना थन डाले हुए दूध पिला रही है। अनेक कोशिशों के बाद भी बालक नहीं मरा तो रानियों ने उसे संदूक में डालकर काली नदी में फेंक दिया। मगर ईश्वरी चमत्कार से संदूक तैरता हुआ गौरी घाट तक पहुंच गया। जहां वह भाना नामक मछुवारे के जाल में फंस गया। संदूक में मिले बालक को लेकर नि:संतान मछुवारा अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे घर ले गया। गौरी घाट में मिलने के कारण उसने बालक का नाम गोरिया रख दिया। बालक जब कुछ बड़ा हुआ तो उसने मछुवारे से घोड़ा लेने की जिद की। गरीब मछुवारे के लिए घोड़ा खरीद पाना मुश्किल था, उसने बालक की जिद पर उसे लकड़ी का घोड़ा बनाकर दे दिया। बालक घोड़ा पाकर अति प्रसन्न हुआ। बालक जब घोड़े पर बैठा तो वह घोड़ा सरपट दौड़ने लगा। यह दृश्य देख गांव वाले चकित रह गए। एक दिन काठ के घोड़े पर चढकर वह धोली धूमाकोट नामक स्थान पर जा पहुंचा, जहां सातों रानियां राजघाट से पानी भर रही थीं। वह रानियों से बोला पहले उसका घोड़ा पानी पियेगा, बाद में आप लोग पानी भरना। यह सुनकर रानियां हंसने लगी और बोली अरे मूर्ख जा बेकार की बातें मतकर कहीं कांठ का घोड़ा भी पानी पीता है। बालक बोला जब स्त्री के गर्भ से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो कांठ का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता। यह सुनकर सातों रानियां घबरा गई। सातों रानियों ने यह बात राजा से कहीं। राजा द्वारा बालक को बुलाकर सच्चाई जानना चाही तो बालक ने सातों रानियों द्वारा उनकी माता कालिंका के साथ रचे गये षडयंत्र की कहानी सुनायी। तब राजा झालराई ने उस बालक से अपना पुत्र होने का प्रमाण मागा। इस पर बालक गोरिया ने कहा कि यदि मैं माता कालिंका का पुत्र हूं तो इसी पल मेरे माता के वक्ष से दूध की धारा निकलकर मेरे मुंह में चली जाएगी और ऐसा ही हुआ। राजा ने बालक को गले लगा लिया और राजपाठ सौंप दिया। इसके बाद वह राजा बनकर जगह-जगह न्याय सभाएं लगाकर प्रजा को न्याय दिलाते रहे। न्याय देवता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद वह अलोप हो गए।


गोलज्यू का मूल स्थान चम्पावत माना जाता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार उन्हे घोड़ाखाल में स्थापित करने का श्रेय महरागांव की एक महिला को माना जाता है। यह महिला वर्षो पूर्व अपने परिजनों द्वारा सतायी जाती रही। उसने चम्पावत अपने मायके जाकर गोलज्यू से न्याय हेतु साथ चलने की प्रार्थना की। गोलज्यू उसके साथ यहां पहुंचे। मान्यता है कि सच्चे मन से मनौती मांगने जो भी घोड़ाखाल पहुंचते हैं गोलज्यू उसकी मनौती पूर्ण करते हैं। न्याय के देवता के रूप पूजे जाने वाले गोलज्यू पर आस्था रखने वाले उनके अनुयायी न्याय की आस लेकर मंदिर में अर्जियां टांग जाते हैं। जिसका प्रमाण मंदिर में टंगी हजारों अर्जियां हैं। न्याय की प्राप्ति होने पर वह घंटियां चढ़ाना नहीं भूलते। जिसके चलते घोड़ाखाल का गोलू मंदिर पर्यटकों के बीच घंटियों वाले मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो चला है।

गणनाथ : डोटी के राजा भवैचन्द का पुत्र था। नाथ पंथ में दीक्षित था। उसने भाना के घर अलख जगाई। भाना गर्भवती हुई। जोशियों ने रंगेहाथ पकड़ा, गणनाथ के साथ गर्भवती भाना की हत्या कर दी। तीसरे दिन जीवित होकर झकरूआ समेत गणनाथ, भाना, बरमीबाला ने जोशी खोला में उत्पात मचा दिया। क्षमा याचना पर जोशियों के घर के ऊपर पूजा पाने लगा।

भोलनाथ : भोलनाथ राजा उदयचन्द के बड़े बेटे थे। निर्वासित थे। छोटे पुत्र ज्ञानचंद का राज्याभिषेक किया। एक बार भोलनाथ साधू वेश में अल्मोड़ा में पोखर किनारे ठहरे। ज्ञानचंद को जानकारी मिली। उसने गद्दी जाने के भय से छल से भोलनाथ और गर्भवती स्त्री की हत्या करवा दी। वे भूत बनकर सताने लगे। उनकी पूजा हुई। तब शांति मिली।

मलैनाथ : डोटी के आभालिंग का पुत्र था। मलैनाथ के फाग गए जाते है। जैसा की बंगा, अस्कोट, देवचूला, पंचमई, डिडीहाट में मलैनाथ के मंदिर हैं।

हरू : परोपकारी देवता हैं। सुख, संपदा, धन धान्य सूचक हैं। हरू काली नाग देवी का ज्येष्ठ पुत्र था। चम्पावत का राजा बना। एक दिन राज त्याग साधू हो गया। छिपलाकोट की रानी को वरण करने गया, कैद हो गया। छोटे भाई सैम और भांजा ग्वेल ने मुक्त कराया। भाटकोट आदि में मंदिर हैं।

सैम : कालीनारा के हरू का छोटा भाई था। हरू की भांति सुख-समृद्धि के देव हैं। हरू सैम के फाग गए जाते हैं। ग्वेल धूनी के जागरों में पूजा जाता है।

कलबिष्ट : केशव कोट्यूडी का बेटा था। पाटिया गांव कोट्यूडा कोट में रहता था। राजपूत था। बिनसर में गायें चराता था। छलपूर्वक लखडय़ोड़ी ने मार डाला। लोगों की मदद करता है। बिनसर, पाली पछाऊं में पूजा जाता है।

चौमू, बधाण, नौलदानू : ये पशुओं के देवता हैं। चौमू रियुणी, द्वारसों में पूजा जाता है। बधाण गाय भैसों के जनने के 5वें, 7वें या 11वें दिन पूजा जाता है। उसके बाद दूध देवताओं में चढ़ाने काबिल होता है। नौलदानू का किसी दुधैल पेड़ की जड़ में वास माना जाता है।
भागलिंग, हुंस्कर, बालचिन, कालचिन, छुरमल, बजैण : डोटी में पूजनीय हैं। नेपाल से आया देवता है। बालचिन हुंस्कर का बेटा है। डूंगरा, डांगटी, तामाकोट, जोहार में पूजा जाता है। कालचिन कालिंग का पुत्र था। छुरमल कालचिन का बेटा था। बजैण भनार में हैं।

नारसिंह : ये पैराणिक कथा नृसिंह हैं। स्थानीय देव के रूप में भी पूजा जाता है। आदि व्याधि, संकट दूर करने वाला जोगी देवता है। जागर में आता है। पत्र पुष्प से प्रसन्न हो जाता है।
कलुवा : हलराय का पुत्र था। इसकी उत्पत्ति सिलबट्टे से बताई जाती है। गड्देवी के जागर में कलुवा भी आता है। थान में खिचड़ी पकती है। मुर्गे की बलि चढ़ती है।
सिदुवा-विदुवा : ये वीर और तांत्रिक थे। गड़देवी के धरम-भाई माने जाते हैं। देवी आपदाओं से रक्षा करते हैं।
गढ़देवी : गाड़-गधेरों में वास करने वाले महाशक्ति गड़देवी काली मां दुर्गा का स्थानीय रूप है। गड़देवी के कानों बात डाली जाती है। उसके साथ परियां आचरियां रहती हैं।

नन्दा देवी :
नंदा देवी समूचे कुमाऊं मंडल,गढ़वाल मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं । नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं । रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है । भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है । नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है । भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं । शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है । शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं । अनेक स्थानों पर नंदा के सम्मान में मेलों के रुप में समारोह आयोजित होते हैं । नंदाष्टमी को कोट की माई का मेला और नैतीताल में नंदादेवी मेला अपनी सम्पन्न लोक विरासत के कारण कुछ अलग ही छटा लिये होते हैं परन्तु अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिकता नंदादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग है ।


बारह काली हाटकाली : कालिका के रूप में देवीधुरा में पूजी जाती हैं। हाट काली गंगोलीहाट में। कोट की कोटगाड़ी-थल के निकट मंदिर हैं। यहा प्राय: बलि चढ़ती है।
एड़ी : कोई राजपूत मर कर भूत बना। उसके साथ बकरी, परियां, हाथी, कुत्ते चलते हैं। शिखरों में रहते हैं। पांव पीछे को होते हैं।
मसाण, खबीस और रूनिया : ये श्मशान के भूत हैं। अतृप्त आत्माएं हैं। कमजोर व्यक्तियों पर चिपटते हैं। बलि द्वारा संतुष्ट होते हैं। पीर फकीर के रूप में भी आने लगे हैं।
आजकल जागरी का काम बड़ा महंगा हो गया है। अधिकतर देवी-देवता शोक गाथाओं पर आधारित हैं। जिनके साथ अन्याय, अत्याचार हुआ, वे स्थानीय देव बन गए। कालान्तर में न्याय, सुख, समृद्धि, शांति, खुशी के देवी-देवता बन गए। चप्पे-चप्पे पर देवों का वास है। इसलिए सारे उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है।



अन्य : नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा में भव्य पुराने चर्च हैं जो अंग्रेजों ने निर्मित किए थे। ईसाई इसमें प्रार्थना करते हैं। रामनगर, हल्द्वानी, टनकपुर, रानीखेत, नैनीताल, अल्मोड़ा में मस्जिदें हैं। यद्यपि ईसाई और मुसलमान बहुत कम हैं। सारे देवी-देवताओं का जमावड़ा उत्तराखंड में है।

‘हमुंकै बड़ी प्यारी लागी, कुर्माचलै भूमि।
दुनी है बड़ी न्यारी लागी कुर्माचलै भूमि॥’

सभार : गोविन्दसिंह असिवाल

शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

बाँस की धुनाई - तनाव से मुक्ति

नमस्कार मित्रो,
आज आफिस मे बाँस से चीक-चीक हो गई, सोचा आज दो दो हाथ हो हि जाये पर कुछ सोच कर रुक गये। हमारे मित्र ने कहा आफिस के बाहर चलते है एक एक सुटा मारते है और दो चार चमाकोभादर टाइप की गाली देते है। तनाव से मुक्ति तो नही पर हा कुछ राहत जरुर मिलेगी। हम सोचे भईया यहा रहे तो पारा ओर बढ सकता है, जो कि सेहत और मेरे लिये सुखदाइ तो होगा नही भलाई इसी मे है कि निकल ले यहा से और वेसे भी ट्राइ करने मे क्या जाता है। चल दिये अपने गंतव्य कि दिशा मे । सुटा मार लिया चमाकोभादर tटाइप की गाली भी दे दी पर तनाव से मुक्ति नही मिली। आ गये नरक रुपी कार्यस्थल कि ओर । इन्ट्नेट मे सुझाव कि तलाश मे मसगुल हो गये । कुछ ये कह रहे थे कुछ वो करने को कह रहे। कुछ ने ओनलाइन गेम खेलने कि सलाह दि तो कुछ ने योग द्वारा तनाव से मुक्ति की । सोचा योग तो हमसे हो ने से रहा ओनलाइन गेम ही खेल लिये जाये । दो चार गेम पे हाथ मारा। आप भी खेल सकते है।

यहा किलक करे

यहा किलक करे


तनाव कुछ कम हुआ पर पुर्णतया समाप्त नही हुआ। फिर कुछ नया तलाशने लगे।

फिर ये ट्राइ किया ,

कुछ राहत मिली पर ये तनाव जाने का नाम ही नही ले रहा था। फिर कुछ नया तलाशने लगे। अंत मे सफलता मिल हि गई, मिलती भी क्यो ना, इतनी मक्कत जो कर रहे थे।

आप भी ट्राइ कर सकते है। यहा किलक करे और बाँस कि चीक-चीक सुन कर होने वाले तनाव से मुक्ति पाये।

थोडा इंतजार करना पड सकता है, सफलता पाने के लिये क्योकि भइया अभी 2G मे ही जी रहे है।

नोट : अगर आप पुर्णतया संन्तुष्ट हुये हो तो अपनी आन्न्दमई टिप्प्णी से जरुर नवाजे

रविवार, जनवरी 30, 2011

बट वी लव गाँधी...!!


सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट 'फेसबुक' पर भारतीय युवाओं ने 'आई हेट गाँधी' ग्रुप बनाए। पंजाब प्रांत के चार युवाओं ने आई हेट गाँधी नामक समूह बनाया है। पंजाब के राहुल देवगन इस समूह के क्रिएटर हैं और इसमें एक युवती भी है। दुखद आश्चर्य की बात कि वेबसाइट पर लगभग 700 भारतीय युवा फ्रेंडलिस्ट में हैं। यहाँ गाँधीजी के बारे में अपमानजनक टिप्पणियाँ डाली गई है।

इन युवाओं का कहना है कि गाँधीजी अँग्रेजों के सहायक थे, इस कारण हमने इस समूह का निर्माण किया है। इस समूह ने गाँधीजी के कई अशोभनीय फोटो भी इस वेबसाइट पर अपलोड कर दिए हैं। लखनऊ के एक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने इस समूह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। पंजाब का राहुल देवगन मुख्य आरोपी है। इसके अलावा अमेरिका स्थित फेसबुक के कार्यालय को भी इसमें नामजद किया गया है।

ये भारतीय युवा अपने अधकचरे ज्ञान की यह पोटली अपने सीमित वर्ग तक ही खोलते तो शायद क्षम्य भी होता। क्योंकि इतिहास गवाह है कि हर महान व्यक्तित्व को कतिपय कुंठित लोगों ने नीचा दिखाने की चेष्टा की है। यह बात और है कि इससे उस शख्सियत का कद तो बौना होने से रहा ऐसी बेवकूफाना हरकते हँसी का विषय अवश्य बनी है। सार्वजनिक रूप से अपने मानसिक दिवालिया होने का सबूत इस तरह देने से पहले बेहतर होता कि वे अपने अतीत को गंभीरतापूर्वक खंगाल लेते। और अगर अतीत तक पहुँचना उनके लिए मुश्किल है तो डॉमिनिक लेपियर की 'फ्रीडम इन द मिडनाइट' ही एक बार पढ़ ली होती।

लेकिन यह अपेक्षा हम किससे कर रहे हैं? उनसे जिनके लिए हर पुराने को कोसना ही आधुनिकता की निशानी है? उनसे जिनके लिए राष्ट्र के महान संत को गाली देना फैशन स्टेटस है। गाँधी को कितना जानते हैं वे? और उन्हें कोसने का अधिकार इन युवाओं ने हासिल किस आधार पर किया? देश के लिए अपने घर को खाली और खत्म करना क्या होता हैं, क्या यह सोचना भी उनके लिए संभव है जबकि बापू ने अप्रत्यक्षत: समूचे परिवार को देश पर न्योछावर कर दिया? अपने ही बच्चों को अपने नेता होने का फायदा ना पहुँचाने के गाँधी के संकल्प को क्या यह अज्ञान पीढ़ी समझ सकेगी जो येनकेन प्रकारेण खुद अपने लिए नेताओं की 'अप्रोच' तलाशती है? काश, एक अँगुली उन पर उठाने से पहले अपनी तरफ मुड़ी तीन अँगुलियाँ भी देख ली होती।

गाँधी उन तक इसलिए भी नहीं पहुँच सके क्योंकि उन्होंने गाँधी को कथनी और करनी की दृ‍ष्टि से एक जुबान रहते स्वयं नहीं देखा। गाँधीवाद उन तक उन भ्रष्ट नेताओं के माध्यम से पहुँचा जो मात्र सफेद टोपी धारण कर कर्मों से गाँधी से कोसों दूर थे। वे युवा गाँधी जिनके लिए एमजी रोड़ है, नोट पर छपी तस्वीर है, घटिया एसएमएस है, सस्ता चुटकुला है, खादी में मिलता डिस्काउंट है या फिर एक शर्मनाक प्रचलित मुहावरा कि 'मजबूरी का नाम...? भला कैसे जानेंगे कि उस राष्ट्रसंत ने अपनी हर छोटी से छोटी भूल की खुद को कठोरतम सजा दी है। क्या उन युवाओं के लिए यह सोच पाना भी संभव है कि जेल में तकिए के स्थान पर लकड़ी के पटिए को रखना कितना भीषण कष्टकारी है लेकिन गाँधी ने ऐसा बार-बार किया तब जब-जब देश के हित में कोई एक छोटी सी अनिवार्य भूमिका भी वे नहीं निभा सके। अपनी ही संतान के लिए जीवन भर उन्होंने अपराधी बनना स्वीकार किया बजाय देश के प्रति भूल से भी कोई अपराध करने के।

फ्रीडम इन द मिडनाइट में लेखक उन्हें बार-बार बुढ़ऊ कहता है पर यह शब्द भी संदर्भों में इसलिए बुरा नहीं लगता है क्योंकि वह उस दुर्बल से दिखने वाले प्राणी की ताकत को पहचान कर उसे अति आत्मीयतावश यह संबोधन देता है। वह उसे एक चमत्कारी इंसान मानता है कि अगर कोलकाता में अपने अनशन से उसने हजारों के जनसैलाब को नहीं रोका होता तो आज इतिहास का सबसे खूनी संघर्ष वही होता।

लेखक बार-बार मानता है कि यह चमत्कार सिर्फ और सिर्फ वहीं इंसान कर सकता था जिसकी जनता पर ऐसी अदभुत पकड़ थी। तन पर एक कपड़ा और हाथ में एक लाठी,बस यही तो चीजें तो थी उसकी ताकत। लेखक ने घोर आश्चर्य व्यक्त किया है कि आखिर ऐसा क्या था उस बूढ़े मनुष्य की वाणी में कि उग्रतम जनसमुदाय भी उसे सुनकर ऐसे शांत और कोमल हो जाता था मानों कोई तुफानी समंदर अचानक शांत हो गया हो।

पर 'फेसबुकी कल्चर' के अधकचरे-अल्पज्ञानी भला उस दौर की कल्पना भी कैसे करें जबकि उनके लिए गाँधी सिर्फ एक शब्द है जिस पर भरपूर विकार निकाले जा सकें। आई हेट गाँधी कहने वालों आपके मुकाबले में कई गुना युवा कह रहे हैं आई लव गाँधी क्योंकि वे गाँधी को जान रहे हैं, पहचान रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?

सभार : वेब दुनिया- स्मृति जोशी

मंगलवार, अगस्त 31, 2010

काँच की बरनी और दो कप चाय

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।

दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं…उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची… उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ… आवाज आई…फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे… फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई…प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो… टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी…ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है…यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा… मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक-अप करवाओ.. टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है… पहले तय करो कि क्या जरूरी है… बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया… इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..मैंने अभी-अभी यही किया है.. :)

अकेला

इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.

जो ना समझ सके, उनके लिये "कौन".
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.

दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.

सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.

आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ.

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

अप्रेजल की दुखद कहानी

हर बार नए फैनेंशियल इयर की शुरुआत में अक्सर ऑफिसों में अप्रेजल की बात चलने लगती है। और इसी अप्रेजल की बात के साथ शुरू हो जाता है अप्रेजल का खेल । अप्रेजल से संम्बधित विपीन खनडूरी कि ये कविता बहुत ही अच्छी लगी जो मुझे मेल द्रारा प्राप्त हुई । तो सोचा क्यो ना आप लोगो से भी इसे बाँटा जाये । कुछ इसी तरह का वाक्या मेरे साथ भी घटित हो चुका है फरक इतना है कि मेरा 2 रुपये कि जगह पर सिर्फ 500 रुपये कि बढोतरी हुई थी और मेने भी खनडूरी कि तरह कि करना उचित समझा इस कविता ने ने 2 साल पहले का वाक्या याद दिला दिया।

अप्रेजल के नाम पर एक लम्बी आह भरते है,
चलीये अब हम इस दुखद कहानी कि शुरुआत करते है,

हमेशा कि तरह 10 बजे ठुमकते हुए आफिस आया,
11 बजे नाश्ता किया और बारह बजे तक मेल पढ पाया,

हमेशा कि तरह आज भी मुझे आलस आ रहा था,
और मेरा PM मुझे तिरछी निगाहो से देख देख गुस्सा रहा था,

मै बडे कन्सनट्रेसन के साथ एक मेल पढ रहा था,
तभी देखा मेरे PM के नाम का नया मेल कोने मे से झाक रहा था,

फिर कोई ट्रेनिग करनी होगी, ये क्या बकवास है,
क्या जबाब दू कि, मेरे मेल बाक्स का उपवास है,

मेने आखे बंद कि और 10 बार ॐ ॐ बोला
और प्रणाम करते हुये मैने वो मेल खोला,

PM के इस मेल मैं एक अजीब सा सुकून और भोलापन है
लिखा है भाइयों अप्रेजल पत्र आ गएअब तो आमने सामने कि बात है।

मॅन मैं ऐसे बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे
ऊपर से कुछ लोग मेरे डि अप्रेजल की गन्दी अफवाह उड़ा रहे थे

PM को पत्र लाते देख हर कोई उसे देखता जाता है
जैसे मलिका के किसी नए गाने को देखा जाता है

आखिर वो वक़्त आयाPM ने एक एक करके सब को बुलाया
जो भी अंदर जाता हँसता हुआ जाता
जो बहार आतामुरझाया हुआ आता

बहार आ कर इंसान संभल भी नहीं पता है
की कितना हुआ कितना मीला हर कोई उसपे टूट जाता है

किसी एक को अप्रेजल मैं 2000 रुपये मिले थेमैं उसकी हंसी उड़ा रहा था
तभी मैंने देखा मेरा PM इशारे से मुझे अंदर बुला रहा था

मैं आत्मविश्वास से उठा और आगे कदम बढाया
तभी मेरी बेलट का बकल टूट के नीकल आया

मेरी हालत तो अभी से ही बुरी हो गयी
साला इज्ज़त उतरना तो यही से शुरू हो गयी

मैं अंदर पहुंचा और PM ने मुझे बिठाया
उसने पत्र पढा और वो हंसी रोक न पाया

वोह इतना हंसा की उसके आंसू आ गए
क्या मेरे अप्रेजल के अंक इतने भा गए

जैसे ही उसने अप्रेजल पत्र मेरी तरफ बढाया
मेरी आँखों के आगे घनघोर अँधेरा छाया

मुझे लगा जैसे मेरे दिल की दीवार को किसी ने गोबर से पोता है
अरे यार बीस रुपये ये भी कोई बढोतरी का इनाम होता है

ये साप्टवेयर इन्ड्स्ट्री है अखाडा नहीं है
ये वेतन बढोतरी है रोहनी आने -जाने का भाडा नहीं है

मेरे चारों तरफ कलि घटा छायी तभी मेरे PM की मोहक आवाज़ आई

तुम सोच रहे होगे के company mgmt का दिमाग फिर गया है
पर बेटा हम क्या करें डालर का भाव 2 रुपये जो गिर गया है

पर फिर भी मुझे लगता है ये पत्र गलत है
मुझे तो लगता है ये प्रिन्टिग की गलती है

तुम HR मैं जाओ और ये पता करके आओ

भाई HR मैं जाने के लिए तैयार होना पड़ता है
वही तो ऐसी जगह है जहाँ सुंदर लड़कियों से पला पड़ता है

ये क्या जहाँ रेनुका बैठी है आज वहां बैठा आपताब है
मैं समझ गया बेटा आज अपना किस्मत ही ख़राब है

उसने मेरा पत्र खोला और खुश हो के बोला

वो बोला श्रीमान आप के लिए खुशखबरी है
आप के पत्र ने प्रिन्टिग की ही गलती है

मैंने कहा मित्र अब देर न लगाएं
और मुझे मेरा सही सही हिसाब किताब बताएं

वो बोला माफ करे श्रीमान ये एक्सीडेंट है
बीस रुपये नहीं दो रुपये आप कि बढोतरी है

मैं क्या करूं आप को ये बताते हुए मेरा दिल रो रहा है
पर क्या करें डालर का भाव भी तो कम हो रहा है

मैं बस वहाँ खडा था कुछ समझ नहीं आ रहा था
मुझसे ज्यादा बढोतरी तो चपरासी वाला पा रहा था

मैंने खुद को संभालाखुद को उठाया
मैं लौटा और सीधे PM के पास आया

मैं सीधा उसके केबिन गया और दरवाज़ा खोला
इस से पहले की वो बोले मैं ही उस से बोला

महाशय ये पैसे वापिस ले लीजिये बात करना फीजूल है
मैं गरीब हूँ पर भीख नहीं लेता ये मेरा उसूल है|

सभार : विपीन खनडूरी

रविवार, अगस्त 01, 2010

दोस्ती, खुशी का मीठा दरिया है

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज से उसके रिश्तों का ताना-बाना बड़ा ही वृहद होता है। वैसे तो उसके रिश्तों की फेहरिस्त बड़ी लंबी होती है, परंतु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो जीने का जुनून जगाते हैं, कुछ कर गुजरने की जिद बन जाते हैं क्योंकि उन रिश्तों में 'प्रेरणा' की ऊर्जा निहित होती है। ये रिश्ते उस स्पंदन की अनुभूति होते हैं, जिनका आधार ही दोस्ती की नींव है। दोस्ती कहें या मित्रता, बोलने-सुनने में भले ही सहज सा लगे परंतु इस आत्मीय रिश्ते की गहराइयाँ पग-पग पर किस तरह हमें अनुकूलता/प्रतिकूलताओं में प्रेरित करती है, हमारा सम्बल बनती है, हमें संभालती है, यह वही समझ सकता है जिसके पास एक अच्छा दोस्त है। कुछ रिश्ते तो निभाए जाते हैं मगर यह इकलौता ऐसा है, जिसे जिया जाता है। 'दोस्ती' जिंदादिली का नाम है। 'दोस्त' बनकर दर्द दूर नहीं किया तो दोस्ती क्या खाक निभाई। सुख-दु:ख में दोस्ती ठंडी हवा का झोंका बनकर गले से लिपट जाती है, जिसका स्नेहिल स्पर्श तनाव में भी सुकून देता है।

सच्चा दोस्त किस्मत वालों को ही मिलता है। आसान नहीं है दोस्त मिलना और खुद किसी का दोस्त बन जाना। क्योंकि आज हम जिन लोगों के साथ घूमते-फिरते हैं। पिक्चर देखते हैं। टाइम पास करने के लिए हँस-बोल लेते हैं। उन्हें ही दोस्त कहने और समझने भी लग जाते हैं। दोस्ती एक अनमोल रिश्ता है जिसमें आदमी कब बँध जाता है। पता ही नहीं चलता। मुश्किल समय में काम आने वाला, नेक सलाह देने वाला मित्र ही सच्चा मित्र है। सच्ची मित्रता को किसी फ्रेंडशिप डे या फ्रेंडशिप बेल्ट जैसी औपचारिकताओं की जरूरत नहीं होती। उनके लिए प्रत्येक दिन ही मित्रता दिवस होता है। यह दिन शायद उन मित्रों के लिए बना हो जोकि बहुत ही मुश्किल से साल भर में यदा-कदा ही मिल पाते हों तो कम से कम इस दिन उन्हें याद कर लें।

'दोस्ती' की सरगम पर विश्वास के सुर पैरों में अपनेपन के नुपूर बाँधकर थिरकते हैं। 'दोस्ती' के पर्वत से ही प्रेरणा के झरने बहकर सफलतारूपी सरोवर में जा मिलते हैं। 'दोस्ती' वह जुगनू है, जिसकी टिमटिमाती रोशनी प्रतिकूलताओं की निशा में उम्मीद की किरण की तरह हमेशा जगमगाती रहती है।

'दोस्ती' उस सुरभि का नाम है जिसका अहसास 'अपनत्व' का अनुभव कराता है। कोई कहे 'दोस्त' हमदर्द होता है परंतु सच्चाई तो यह है कि 'दोस्त' वह गुरूर होता है, जिसके आश्रय में हममें मुसीबतों से लड़ने का साहस जाग जाता है।

बदलते कालचक्र में भले ही दोस्ती ने नया आयाम ले लिया हो परंतु इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि दोस्ती का रिश्ता आज भी उसी विश्वास, समर्पण और अगाध स्नेह का पर्याय है, जितना कि वह बीते समय में रहा है। चूँकि समय बलवान है इसलिए बदलता रहता है परंतु तमाम रिश्तों में एक सच्चे दोस्त की 'दोस्ती' का रिश्ता समय की धारा के साथ परिवर्तित नहीं बल्कि प्रगाढ़ होता है।

वॉशिंगटन अर्विंग ने कहा है - सच्ची दोस्ती कभी व्यर्थ नहीं जाती, यदि उसे प्रतिदान नहीं मिलता तो वह लौट आती है और दिल को कोमल और पवित्र बनाती है।

तो बोलिए... क्या आप बन सकते हैं, ऐसे दोस्त। यदि 'हाँ' तो आज ही के दिन से इसकी शुरुआत कीजिए...।

रविवार, फ़रवरी 14, 2010

मैजिकल सॉफ्टवेयर "फोटोस्केचर"

इन्टरनेट के मायाजाल मे उल-जलुल हरकते करते रहने से कुछ न कुछ तो अवश्य ज्ञान की प्राप्ति होती ही रहती है। इस कारण जब भी समय मिलता है निकल पडता हूँ इस तरह के ज्ञान कि खोज मे।

दोस्तों हम जानते हैं कि तुम्हारे अंदर भी एक कलाकार मौजूद है, जो कभी-कभी तुम्हें कैनवास पर हाथ आजमाने के लिए उकसाता रहता है। पहाडों के मनमोहक दृश्य हर किसी का मन मोह लेते हैं। तुम्हारी भी इच्छा होती होगी कि काश, मैं इस दृश्य को कैनवास पर उकेर पाता । आज एक ऐसे सॉफ्टवेयर के बारे में, जो आपकी पेंटर बनने की इच्छा चुटकियों में पूरी कर देगा। न तो इसमें ब्रश की जरूरत है और न ही कैनवास की। मुझे तो यह सॉफ्टवेयर बहुत हि काम का लगा। इससे आप को भी कुछ लाभ मिले, अत: अपने ब्लाग मे इसका उल्लेख करना उचित समझा। तो महाशय तैयार हो जाये ब्रहम ज्ञान का रसपान करने के लिये।

इस मैजिक सॉफ्टवेयर का नाम है फोटोस्केचर। फोटोस्केचर के लिए आप लोगो को कोई कीमत भी नहीं चुकानी है। फोटोस्केचर, पलक झपकते ही डिजिटल फोटो को आर्ट में तब्दील कर देता है। अगर आप किसी घोडे या किसी सुंदर सीनरी की पेंटिग बनाना चाहते हो, तो फोटोस्केचर फटाफट उसे स्केच में बदल देगा। इस मैजिकल सॉफ्टवेयर के जनक है महाशय “डेविड थोइरान” ।

इसके अलावा, आप इस सॉफ्टवेयर की मदद से अपने दोस्तों के फोटोग्राफ्स को स्केच में बदल कर उनके जन्मदिन पर गिफ्ट भी कर सकते हो। इसकी मदद से आप लोगो को बर्थडे कार्ड, ग्रीटिंग स्टेशनरी या फिर किसी भी आर्ट का प्रिंट लेकर उसे अपने कमरे की दीवार पर भी टांग भी सकते हो। फोटोस्केचर में कई सारे स्केच, पेन और इंक ड्राइंग जैसे ऑप्शन भी दिए गए हैं। फोटोशॉप की तरह फोटोस्केचर में भी किसी भी फोटो का फाइन किया जा सकता है, उसका स्केच तैयार किया जा सकता है। और भी बहुत कुछ है इस सॉफ्टवेयर में । इसी बात को तो कहते हैं हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए। फोटोस्केचर को आप http://www.fotosketcher.com/ मुफ्त से डाउनलोड कर सकते हो। इस सॉफ्टवेयर के विषय मे और अधिक जानकारी आप यहा से पा सकते है।

तो देर किस बात की है आजमाइये इसे और बन जाइये पेन्टर और स्केचर ।

"माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट"


वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 को हुए आतंकी हमले के बाद दुनियाभर में एक समुदाय के प्रति बदली सोच को लेकर अब तक आधा दर्जन के करीब फिल्में बन चुकी हैं। 9/11 हमले के बाद दुनिया के कई देशों में मुस्लिम समुदाय के प्रति यकायक बदली सोच पर करण ने एक ऐसी प्रेम कहानी का सहारा लिया है जो आम बॉलिवुड फिल्मों से कोसों दूर है। करण की इस फिल्म में एक ऐसे युवक का अपना खोया हुआ प्यार फिर से हासिल करने का सफर दिखाया गया है जो आम इंसानों से हटकर है। फिल्म में रिजवान द्वारा बार - बार बोला गया डायलॉग "माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट" हॉल में बैठे दर्शक के दिल को छूता है। दरअसल , करण अपनी इस फिल्म के माध्यम से दुनिया को शायद यही मेसेज देना चाहते हैं कि ' हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है। ' करण जौहर अपनी प्रेम मुहब्बत, रोने धोने वाले फार्मूले से मुक्ति की छटपटाहट से बाहर आने की कोशिश कर रहे है। उन्हें हमारे हौसले की जरूरत है। माय नेम इज खान के जरिए वे यह बताना चाह रहे हैं कि दुनिया मे सिर्फ दो ही किस्म के इंसान होते हैं, अच्छे और बुरे।

यह फिल्म हमारे भीतर छुपे शैतान को पत्थर मारने में हमारी मदद करती है जहां बाल ठाकरे या बजरंग दलियों ने यह मान लिया है कि खान सरनेम का अर्थ ही धोखेबाज और आतंकवादी होना है। यह एसपर्जर सिंड्रोम से पीडित रिजवान खान की कहानी है, जिसे नई जगह, पीले रंग और तेज शोर से डर लगता है लेकिन वह बहुत ही समझदार और ज्ञानी भी है। धुन का पक्का है। मानवीय नजरिया उसे उसकी मां, उसके टीचर वाडिया और इस्लाम से उसे विरासत में मिला है। वह अमेरिका में एक लड़की मंदिरा के सैलून मे अपने ब्यूटी प्रोडक्ट बेचने जाता है और उसी से प्यार कर बैठता है। मंदिरा तलाकशुदा है और उसके पहले से एक बच्चा है। शादी के बाद उसका सरनेम मंदिरा खान और उसके बेटे का नाम समीर खान हो जाता है। 9/11 से पहले सब कुछ ठीक था लेकिन उसके बाद पूरी दुनिया ने करवट ली खान सरनेम की वजह से एक हादसा होता है। दोनों पति पत्नी अलग हो जाते हैं। मंदिरा उसे चुनौती देती है कि किस किस के सामने वह बेगुनाही का सबूत देगा कि तुम्हारा नाम खान है और तुम टेरेरिस्ट नहीं हो। यहां से खान अमेरिका के प्रेसीडेंट से मिलने की यात्रा शुरू करता है। जहां जहां राष्ट्रपति को जाना होता है, वहां वह पहुंचता है, लेकिन मिल नहीं पाता। फिल्म इसी यात्रा को आगे बढाती है और अंजाम तक पहुंचती है। इस यात्रा में रिजवान खान एक नायक बनकर उभरता है। जॉर्जिया में छोटे से गांव के लोगों को बचाने में रिजवान खान अकेला जुटा तो उसके पीछे सैकड़ों लोग राहत सामग्री लेकर आए हैं। जहां वह काउंटर पर कमरे की सिर्फ जानकारी लेने गया था वहां भी होटल मालिक ने बोर्ड टांग लिया है कि यहां खान ठहरा था। कहानी में बीच में कहीं ठहराव और एकरसता आती है लेकिन सारे नंबर शाहरूख खान को इसलिए जाते हैं कि वह अभिनय के एक नए अवतार में सामने है।

9/11 हादसे को एक ऐसे नजरिए के साथ देखना चाहते हैं जो अब तक अनदेखा रहा तो फिल्म आपके लिए है। माइ नेम इज खान की तारीफ इसलिए भी जरुरी है क्योकि हमारी राजनीति और आदमी की लिप्साओं ने भेदभाव का जो अमानवीय चेहरा हमारे सामने बना लिया है उसे चुनौती दी जा सके।

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

मिलें सुर मेंरा तूम्हारा @2010

15 अगस्त , 1988 को दूरदर्शन में जारी उस म्यूजिकल फिल्म को भाषा के सभी बंधन तोड़ते हुए देश के बच्चे - बच्चे ने अपने दिल में बसा लिया था। जब भी इसका टेलिकास्ट होता, सब काम रोककर पूरे 16 मिनट तक उसमें अपने सुर मिलाते थे। मै तब लगभग 6-7 साल का रहा हूँगा । और अब 2010 में इंडिया को एक बार फिर वही सुर लौटाए है।
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फिर मिले सुर का नया विडियो देश भर की 15 लोकेशनों पर शूट किया गया है। पुराने वाले गीत में जहां 26 महान हस्तियों ने हिस्सा लिया था , वहीं नए विडियो में 68 पर्सनैलिटीज हैं। मॉडर्न इंडिया की झलक देने के लिए इसमें बिग बी से लेकर , ए . आर . रहमान और सलमान खान से लेकर बेडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल तक अपने सुर मिला रहे हैं। हर आर्टिस्ट की ओर से इसमें एक सामाजिक संदेश दिया गया है , जिसे ऐतिहासिक स्थलों पर शूट किया गया है। बिग बी के लिए यह विडियो सबसे खास है , क्योंकि वह अकेली ऐसी शख्सियत हैं , जो इसके पहले विडियो में भी थे। कॉरपोरेट कपल आरती और कैलाश सुरेंद्रनाथ ने फिर मिले सुर को प्रड्यूस किया है।

ऑरिजिनल मिले सुर में जहां पंडित भीमसेन जोशी , अमिताभ बच्चन , कमल हसन , लता मंगेशकर , प्रकाश पादुकोण जैसे आइकॉन थे , तो इस बार नई जेनरेशन के नए आइकॉन सितार वादक अनुष्का शंकर , सरोद वादक अमान और अयान , शूटर अभिनव बिंद्रा , बॉक्सर विजेंदर सुर मिला रहे हैं।

पिछले विडियो का कॉन्सेप्ट सुरेश मलिक ने तैयार किया था और पीयूष पांडेय ने लिखा था। नए विडियो की शानदार सिनेमेटॉग्रफी और म्यूजिक है लुई बैंक्स का। पुराने विडियो में भी लुई बैंक्स ने पी . वैद्यनाथन के साथ मिलकर म्यूजिक तैयार किया था।

(हिन्दी) मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
मिले सुर मेरा तुम्हारा …

(कश्मीरी) चॉन्य् तरज़ तय म्यॉन्य् तरज़
इक-वट बनि यि सॉन्य् तरज़

(पंजाबी) तेरा सुर मिले मेरे सुर दे नाल
मिलके बणे एक नवा सुर ताल

(हिन्दी) मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

(सिन्धी) मुहिंजो सुर तुहिंजे साँ प्यारा मिले जडेंह
गीत असाँजो मधुर तरानो बणे तडेंह

(उर्दू) सुर का दरिया बह के सागर में मिले

(पंजाबी) बदलाँ दा रूप लैके बरसन हौले हौले

(तमिल) इसैन्दाल नम इरुवरिन सुरमुम नमदक्कुम
तिसै वॆरु आनालुम आऴि सेर
मुगिलाय मऴैयय पोऴिवदु पोल इसै
नम इसै…

(कन्नड) नन्न ध्वनिगॆ निन्न ध्वनिय,
सेरिदन्तॆ नम्म ध्वनिय

(तेलुगु) ना स्वरमु नी स्वरमु संगम्ममै,
मन स्वरंगा अवतरिंचे .

(मलयालम) निंडॆ स्वरमुम् नींगळुडॆ स्वरमुम्
धट्टुचॆयुम् नमुडॆय स्वरम .

(बाङ्ला) तोमार शुर मोदेर शुर
सृष्टि करूर अइको शुर

(असमिया) सृष्टि हो करून अइको तान

(उड़िया) तोमा मोरा स्वरेर मिलन
सृष्टि करे चालबोचतन

(गुजराती) मिले सुर जो थारो म्हारो
बणे आपणो सुर निरालो

(मराठी) माँझा तुमच्या जुलता तारा
मधुर सुराँचा बरसती धारा

(हिन्दी) सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
तो सुर बने हमारा

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हालांकि इसे रिलीज हुए अभी कुछ हि दिन हुए है , लेकिन यंगस्टर्स में यह अभी से पॉप्युलर हो गया है। यूट्यूब में पहले ही दिन इसे 2600 से ज्यादा हिट्स मिले। इंटरनेट पर चैट रूम्स हों या डिस्कशन बोर्ड , ब्लॉग्स हों या फिर ऑरकुट या फेसबुक की कम्युनिटीज ... सब जगह यंगस्टर्स फिर मिले सुर पर बातचीत करते नजर आ रहे हैं। हालांकि कुछ को इसमें बॉलिवुड की ओवरडोज लग रही है , लेकिन ज्यादातर युवा इस बात से खुश हैं कि इसमें राज्यों को अनेकता पर महत्व न देते हुए देश को एक यूनिट की तरह दिखाया गया है। हर सिलेब्रिटी को किसी एक खास राज्य से जोड़कर दिखाने की बजाय पूरे देश की एकता पर जोर दिया गया है।

मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

सबसे बड़ी मदद

एक बार बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक धनी व्यक्ति की मेज पर कुछ सिक्के रखते हुए कहा, 'आपने बुरे वक्त में जो सहायता की थी, मैं उसके लिए बहुत आभारी हूं। पर अब मैं अपनी मेहनत से इतना सक्षम हो गया हूं कि आपका कर्ज वापस कर सकूं। मैं यह सिक्के आपको वापस करने आया हूं।' बेंजामिन फ्रैंकलिन की बात सुनकर वह सज्जन उन्हें घूरते हुए बोले, 'क्षमा करिए, पर मैंने आपको पहचाना नहीं। न ही मुझे यह याद है कि मैंने किसी को उधार दिया था।' बेंजामिन ने कहा, 'मैं उन दिनों एक प्रेस में अखबार छापने का काम करता था। एक दिन अचानक मेरी तबीयत खराब हो गई तब मैंने आपसे बीस डॉलर लिए थे।' यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपने बीते दिनों को याद किया तो उन्हें स्मरण हो आया कि एक बालक प्रेस में काम करता था और एक दिन उसके बीमार होने पर उन्होंने उसकी मदद की थी।

यह याद आने पर उस व्यक्ति ने कहा, 'हां, मुझे याद आ गया। लेकिन दोस्त, यह तो मनुष्य का सहज धर्म है कि वह आपत्तिग्रस्त व्यक्ति की सहायता करे। इन सिक्कों को आप अपने पास ही रखें और कभी कोई जरूरतमंद व्यक्ति आपकी नजरों में आए, तो उसे दे दीजिएगा।' इस बात से बेंजामिन बहुत प्रभावित हुए और उन्हें नमस्कार कर उन सिक्कों को वापस अपने साथ ले आए। इसके बाद उन्होंने एक जरूरतमंद युवक को वे सिक्के दिए। जब उस युवक ने सिक्के लौटने चाहे तो बेंजामिन ने कहा, 'दोस्त, जब तुम सक्षम हो जाओगे तो अपने जैसे किसी जरूरतमंद को ये सिक्के दे देना। मैं समझूंगा कि मेरे पैसे मुझे मिल गए।' वह युवक बोला, 'मैं ऐसा ही करूंगा।' इसके बाद बेंजामिन उस युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, 'किसी जरूरतमंद की वक्त पर मदद करना ही इंसानियत है। अगर हम किसी की मदद करते हैं तो वह मदद सौ गुना अधिक होकर हमारे पास वापस आती है और हमें कामयाब बनाती है।'

संकलन: रेनू सैनी (नवभारत टाइंम्स)

सोमवार, अक्टूबर 05, 2009

पहाड़ से गिरकर मरती हैं सैकड़ों महिलाएं

हिमालय की ऊंची-ऊंची और लंबी चोटियों से घिरे उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में आज भी पशुओं को चारे के लिए घास काटते समय प्रति वर्ष करीब 200 महिलाएं पहाड़ों से गिरकर अपनी जान गंवा बैठती हैं लेकिन अनेक मामलों में इनकी न तो रिपोर्ट दर्ज होती है और न ही इन्हें कोई मुआवजा दिया जाता है। प्रशासन में ज्यादातर मामलों में ये सामान्य मौत के तौर पर ही दर्ज होती हैं।

राज्य में अधिकांश गांव सुदूर पहाड़ों की चोटियों पर बसे हुए हैं और इन गांवों में रहने वाले लोग काफी संख्या में भेड़ों, बकरियों गायों, बैलों और भैंसों को पालते हैं। पशुओं के चारे के लिए घास काटने का काम पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाएं ही करती हैं। उत्तराखंड के कुछ जिलों के गांवों का दौरा करने के बाद यह रोचक तथ्य सामने आया कि अभी भी गांवों में घास काटने का काम या तो लड़कियां करती हैं या घर में ब्याह कर आने वाली बहुएं। घर की बुर्जुग महिलाओं द्वारा इन बालिकाओं और युवतियों को घास काटने का काम दिया जाता है। बालिकाओं को जहां यह काम स्कूल से आने के बाद सौंपा जाता है वहीं बहुएं इस काम को सूर्यास्त के पहले ही निपटाना पसंद करती हैं लेकिन अक्सर सूर्य की रोशनी कम होने के चलते और कभी-कभी अति विश्वास के चलते इनके पैर ऊंची चोटियों से लड़खड़ा जाते हैं जिससे ये गिर जाती हैं और इनकी मौत हो जाती है।

पहाड़ों के गांवों में महिलाओं को शाम के समय पीठ पर लाद कर घास को लाते हुए देखा जा सकता है। राज्य में दूध के लिए जहां बकरियों गायों और भैंसों को पाला जाता है वहीं अभी भी पारंपरिक खेती के लिए बैलों की जरुरत होती है क्योंकि खेत सीढ़ीनुमा होने के चलते वहां ट्रैक्टर सफल नहीं हो पाते। जाड़ों के मौसम में ऊन की जरूरत के लिए भेड़ों को पाला जाता है। इन सभी पशुओं के चारे के लिए सितम्बर से लेकर फरवरी महीने तक पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चट्टानों से सूखी घास काटी जाती है और यही चार महीने उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाओं के चट्टान से गिरकर मौत के महीने होते हैं।

राज्य प्रशासन के पास हालांकि इन मौतों का कोई आकलन नहीं होता। समाज कल्याण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हकीकत में कम से कम पूरे राज्य में साल में करीब 200 महिलाओं को घास काटने के चक्कर में अपनी जान गंवानी पड़ती है और कई पूरे जीवन के लिए अपाहिज हो जाती हैं।

राज्य सरकार के पास इन महिलाओं के परिजनों को मुआवजा देने की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि उनको घायल होने की अवस्था में अस्पताल ले जाने के लिए भी ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालनी होती है क्योंकि पहाड़ियों के कारण गिरने वाली जगह पर आसानी से पहुंचना भी लगभग असंभव होता है। खास तौर पर रात के अंधेरे में बहुत दिक्कत होती है। अधिकांश दुर्घटनाएं सूर्यास्त के बाद रास्ते का पता नहीं चलने और पैर फिसलने के चलते होती हैं।


दूसरी ओर समाज कल्याण विभाग के पास चूंकि जिले से कोई सरकारी आंकड़ा नहीं प्राप्त होता है इसलिए ऐसे मामलों में मुआवजा नहीं दिया जाता है।

Source : जागरण

सोमवार, सितंबर 14, 2009

हिन्दी के बारे में 14 बातें

* राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। राष्ट्र के गौरव का यह तकाजा है कि उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो। कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है।
* भारत में अनेक उन्नत और समृद्ध भाषाएँ हैं किंतु हिन्दी सबसे अधिक व्यापक क्षेत्र में और सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।
* हिन्दी केवल हिन्दी भाषियों की ही भाषा नहीं रही, वह तो अब भारतीय जनता के हृदय की वाणी बन गई है।
* सर्वोच्च सत्ता प्राप्त भारतीय संसद ने देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को राजभाषा के पद पर आसीन किया है। अब यह अखिल भारत की जनता का निर्णय है।
* संसार में चीनी तथा अँग्रेजी के बाद हिन्दी सबसे विशाल जनसमूह की भाषा है।
* प्रांतों में प्रांतीय भाषाएँ जनता तथा सरकारी कार्य का माध्यम होंगी, लेकिन केंद्रीय और अंतरप्रांतीय व्यवहार में राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही कार्य होना आवश्यक है।
* प्रादेशिक भाषाएँ तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी दोनों एक-दूसरे की पूरक तथा सहोदरा हैं। एक-दूसरे के सहयोग से वे अधिक समृद्ध होंगी।
* प्रादेशिक हिन्दी और राष्ट्रीय हिन्दी जैसी कोई चीज नहीं। जिसे आज हिन्दी कहते हैं, वही राष्ट्रभाषा है और उत्तरोत्तर विकास करके समृद्ध एवं गौरवशाली बनेगी।
* प्रत्येक मनुष्य दो आँखों से देखता है। भारत जैसे विशाल राष्ट्र के निवासी के पास भी दो आँखें चाहिए। ये दो आँखें हैं - 1. अपने प्रांत की भाषा 2. सारे देश के लिए परस्पर व्यवहार की भाषा।
* हिन्दी का प्रचार करना राष्ट्रीयता का प्रचार करना है। हिन्दी किसी पर न तो जबर्दस्ती लादी जा रही है और न लादी जाएगी। वह तो प्रेम का प्रतीक है।
* कोई भी शब्द चाहे वह किसी भी भाषा का क्यों न हो, यदि वह जनता में प्रचलित है, तो वह राष्ट्रभाषा हिन्दी का शब्द है। आगे भी हिन्दी विभिन्न भाषाओं से शब्द-राशि लेकर समृद्ध बनेगी।
* राष्ट्र की एकता के लिए जैसे एक राष्ट्रभाषा होना आवश्यक है, उसी प्रकार एक लिपि का होना भी आवश्यक है। नागरी लिपि में वे सभी गुण उपस्थित हैं, जो किसी वैज्ञानिक लिपि में होने चाहिए।
* अत: समस्त प्रादेशिक भाषाओं की एक नागरी लिपि हो, यह आवश्यक है।
* अँग्रेजी को बनाए रखना हमारी शान और इज्जत के खिलाफ है। वह हमारे देश में रहने वालों के बीच एक दीवार है। इस देश में केवल अँग्रेजी जानने वालों का राज नहीं रह सकता।
* कौन कहता है कि दक्षिण में अँग्रेजी बोलने वालों की संख्‍या अधिक है? वहाँ अँग्रेजी जानने वालों से पाँच गुना संख्‍या हिन्दी जानने तथा समझने वालों की है।
'हिन्दी दिवस के दिन हम प्रतिज्ञा करें कि राष्ट्रभाषा हिन्दी और देवनाग‍री लिपि का प्रचार कर राष्ट्रीय भावना को हम सुदृढ़ करेंगे।
सौजन्य से - देवपुत्र

'दूसरी औरत'_(दुर्गादत्त जोशी )

शहर से कोसों दूर बढ़ापुर नाम का एक गाँव है, गाँव में चौहान जाति के ठाकुर रहते हैं, पुराने ज़मींदार थे। आज भी किसी-किसी के पास आठ-आठ दस-दस एकड़ ज़मीन है। फसल भी अच्छी हो जाती है हर एक के खेत में टयूबवेल लगा है, कुछ घर ब्राह्मणों के हैं जो खेती नहीं करते हैं खेत भी नहीं है, कुछ और जातियों के घर भी हैं जो इन ज़मींदारों के घर पर काम करते हैं, फसल पर कुछ अनाज मिल जाता है कुछ मजदूरी करते हैं जहाँ भी आसपास काम मिल गया, कुल मिलाकर गाँव खुशहाल है।

इसी गाँव में राजेश नाम का एक किसान रहता है, कोई पैंतीस छत्तीस साल का होगा, सात आठ साल पहले उसकी शादी हुई थी कमलेश के साथ, कमलेश देखने में खूबसूरत थी, उसके पिता जी भी बड़े ज़मींदार थे, राजेश के पिता नहीं थे, वह दस बारह साल पहले किसी दुर्घटना में मारे गए। राजेश ने अपने चाचा चाची के साथ जाकर कमलेश को देखा, देखते ही राजेश शादी को तैयार हो गया, होता भी क्यों नहीं ऐसी सुन्दर लड़की और उसका बाप भी मालदार, शादी बड़े धूमधाम के साथ सम्पन्न हो गई।

कमलेश को पाकर राजेश धन्य हो गया, साल भर बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया, जिसका कुलदीपक नाम रखा, दो साल बाद एक लड़की हुई मीनाक्षी।

जब मीनाक्षी पेट में थी तभी से कमलेश बीमार रहने लगी, मीनाक्षी के होते-होते वह काफी कमज़ोर हो चुकी थी, धीरे-धीरे उसने चारपाई पकड़ ली, राजेश ने आसपास के कई छोटे मोटे डाक्टरों को दिखाया तमाम दवाइयाँ भी खिलाई पर कमलेश का रोग किसी से ठीक नहीं हुआ।

किसान हो या व्यापारी चाहे नौकरी पेशा ही क्यों न हो, घर में बीम'ा'री किसी को लग जाए तो घर बरबाद हो जाते हैं। राजेश कमलेश को लेकर शहर गया। घर बूढ़ी माँ के हवाले हो गया, माँ को दो बच्चे देखने, खेतों को देखना, जानवर भी पाले थे, उन्हें कौन देखता, सो एक दिन पास के बाज़ार में भिजवाकर सभी जानवर औने पौने दामों में बेच दिए, उधर शहर में कमलेश के डॉक्टर ने परीक्षण के आधार पर बताया कि इसको शुगर की बीमारी है और वह काफी बढ़ चुकी है, एक गुर्दा तो बिल्कुल खराब हो चुका है, दूसरा भी खराब होने ही वाला है। कमलेश का रोग ठीक हो ही नहीं सकता इसके गुर्दे बदलने पड़ेगे, राजेश की तो हालत खराब, रूवांसा हो गया, कमलेश की उमर ही क्या होगी यही कोई अठाइस तीस साल, गुर्दे बदलने को पाँच लाख रुपए की ज़रूरत पड़ेगी वो भी ठीक होने की कोई गारण्टी नहीं, डाक्टर के कम्पाउन्डर ने सलाह दी कि इसे दिल्ली दिखा दो किसी बड़े अस्पताल में। राजेश कमलेश को लेकर दिल्ली पहुँच गया, जो भी पाई पैसा था वह सब खर्च हो चुका था, वहाँ के डॉक्टरों ने भी वही सलाह दी जो उसके शहर के डॉक्टर ने दी थी, राजेश कमलेश को लेकर घर आ गया, घर आने के एक महीने बाद कमलेश की मृत्यु हो गई। सारी जमा पूँजी इलाज में लगा दी अन्त में मरीज़' से भी हाथ धो बैठा राजेश।

राजेश के घर की हालत खराब हो चुकी थी, बूढ़ी माँ विक्षिप्त हो गई थी, जब देखो तब आँखों से आँसू की धारा, राजेश को जब भी देखें तब रो पड़ती थीं, कलेजे के टुकड़े को परेशानी में देखकर हर माँ का दिन ऐसे ही भर आता है। छोटे बच्चों की भी हालत खराब। कपड़े मैले हो रहे हैं, हफ्ते भर से बच्चों को नहलाया नहीं है, बड़ा स्कूल जाने लायक हो गया हे कौन भेजे सब तितर बितर हो गया है, सारा निजाम ही बिगड़ गया है घर का, माँ बिल्कुल टूट गई है, उसे घर सुधरने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। निराशा से घिरी रहती है रात दिन, एक दिन राजेश के चाचा घर पर आए तो उसकी माँ उनके आगे फफक-फफक कर रो दी, चाचा ने बहुत समझाया बुझाया ये सब विधि का विधान है, वैसे ही आपको भाईसाहब का दुख सालता रहता है, ऊपर से जवान बहू की मौत हो गई रोना तो आएगा ही पर किया क्या जाए, हिम्मत रखो धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

इतने में ही राजेश कहीं से आया, बड़ा बच्चा राजेश को लिपट गया, छोटी दादी की गोद में बैठी है। पूरा घर ही बेतरतीब हुआ पड़ा है, छत की तरफ़ जाले लगे हैं, दीवारें बच्चों ने खुरच रखी है, कपड़े अस्तव्यस्त हैं, बरतन कोई यहाँ पड़ा है कोई वहाँ, रसोई में मक्खियाँ भिनभिना रहीं हैं। झूठे बर्तनों का ढेर लगा पड़ा है। अब राजेश आ गया है, वह छोटी को पकड़ेगा तो माँ किसी तरह रोटी का प्रबन्ध करेगी, बातों ही बातों में चाचा ने कहा भाभी जी आप राजेश की शादी कर दो, दूसरी औरत आ जाएगी तो घर की हालत सँभाल लेगी, ''कह तो ठीक रहे हो पर कोई नरम दिल की मिले तब ना'' दूसरी तो पहली के बच्चों को मारेगी, जलन करेगी, अगर चाल चलन ठीक नहीं तो घर को नरक बना देगी, उससे तो ऐसे ही काट लेंगे। फिर रूवांसी हो गई। चाचा ने कहा, ''फिकर मत करो देखभाल कर करेंगे। कोई विधवा परित्यक्ता मिल जाएगी तो ज़्यादा ठीक रहेगा। वो ज़्यादा नखरे नहीं करेगी, पर पूछताछ करनी पड़ेगी, समय निकाल कर करना होगा। भाभी आपकी हालत मुझसे देखी नहीं जाती, आपने तो अपने बच्चे की तरह पाला है मुझे, देखना मैं राजेश को सही औरत लाके दूँगा।''

चाचा शादी के लिए औरत देखने में लग गए, जगह-जगह के आदमियों से चर्चा की, कुछ रिश्तेदारियों में संदेशा पहुँचवाया कि कहीं राजेश के लायक कोई औरत हो तो बताना, कुछ दिनों के बाद एक गाँव से खबर आई कि यहाँ एक ऐसी औरत रहती है, बड़े ही गरीब घर की है, बाप के पास कुछ नहीं है, अगर भगवान ने चाहा तो रिश्ता हो जाएगा, चाचा राजेश के साथ उसी गाँव में पहुँच गए जिन्होंने सन्देशा भिजवाया था उन्ही के घर रुके, नमस्कार कुशलक्षेम के बाद चाय पी।

थोड़ी देर बाद घर के मुखिया ने कहना शुरू किया, देखो राजेश बाबू आप ठहरे बड़े किसान कोशिश करोगे तो आपको कुँवारी कन्या मिल जाएगी थोड़ा बहुत दहेज भी मिल जाएगा, अभी आपकी उमर ही क्या है अब तो चालीस छोड़ो पैंतालिस साल के भी शादी कर रहे हैं, पर मैंने जो देखा है उसका जबाब नही, देखने में साँवली ज़रूर है, कद भी छोटा है, पर है बड़ी होशियार, अपने बाप को पाल रही है, हमारे ही बिरादरी के हैं, इसके दादा गलत सोहलत में पड़ गए थे, तमाम बुरे काम 'शराब, जुआ' सब सम्पत्ति बेचकर मरते समय कंगाल हो गए थे, आगे को एक लड़का था उसी का बाप हमारे खेतों में काम करता है। न पढ़ा न लिखा न ज़मीन और करता भी क्या बीबी पहले ही मर चुकी है, हमने रहने के लिए छोटा-सा मकान बनाकर दे दिया था, उसी में रहते हैं, मेरे कहने को टालेंगे नहीं कहो तो मैं लड़की और उसके बाप को बुला देता हूँ, और यह भी सुन लो हमने उसकी शादी भी करवा दी थी एक अच्छे परिवार में पति को पसंद नहीं आई, उसने छोड़ दिया, यहीं रहती है, इन्टर तक का कॉलेज है गाँव में इंटर तक पढ़ी है, अगर शहर में किसी सेठ के यहाँ पैदा हुई होती तो डॉक्टर बैरिस्टर होती। राजेश जी घर बनाने वाली है, सिलाई कढ़ाई करती है गाँव के बच्चों को घर पर पढ़ाती है, बड़ी शालीन है, किसी से कभी ज़ोर से बोली नहीं होगी, मैं अपनी लड़की समझता हूँ उसे। अगर आप राज़ी हो गए तो उस बेचारी की ज़िन्दगी सुधर जाएगी और आपका घर भी बन जाएगा।

राजेश ने गौर से बातें सुनी और औरत और उसके बाप को बुलाने को आग्रह किया, थोड़ी देर में दोनों बाप बेटी सामने बैठे थे। वाकई रंग काला ही था फिर गरीब थी परित्यक्ता थी, फिक्र में जीने वालों का रंग वैसे ही काला पड़ जाता है पच्चीस छब्बीस की होगी, चेहरे से ज़्यादा की लग रही थी, बाप कुछ बोला नहीं गरदन झुकाकर एक तरफ़ को बैठ गया। राजेश ने नाम पूछा तो औरत ने 'रूपा' बता दिया, शादी के लिए पूछने पर कह दिया जैसा ताऊजी कहेंगे।

फिर राजेश के चाचा ने कहना शुरू किया देखो बिटिया ये दो बच्चों का बाप है? घर में बूढ़ी माँ है, घरवाली के इलाज में बहुत बरबाद हो गया है, इसके पास जमा पूँजी कुछ नहीं है, बस एक ट्रैक्टर और खेत में टयूबवैल है। एक हवेली और सात आठ एकड़ ज़मीन है। सारे जानवर बहू की बिमारी के दौरान देखभाल न हो पाने की खातिर बेच दिए हैं, तुम समझ लो बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, भाभी को सम्भालना होगा, बच्चों की देखभाल करनी होगी, तुम यह सब कर लोगी, रूपा ने हाँ में गरदन हिला दी, फिर उस रिश्तेदार जिसके यहाँ रुके थे ने कहना शुरू किया, ''बेटी ये बड़े किसान हैं परेशानी किसे नहीं आती, सब दिन एक समान नहीं होते जमी जमाई गृहस्थी है, मुझे यकीन है तुम ज़रूर सँभाल लोगी, फिर राजेश की तरफ़ मुखातिब होकर बोले राजेश जी आपने इसे देख लिया है आप हाँ कर रहे हो?'' राजेश ने भी हाँ कह दिया।


दूसरे दिन गाँव के ही पंडित ने गाँव के मन्दिर में एक दूसरे के गले में जयमाला डलवा दी। राजेश और उसके चाचा रूपा को लेकर गाँव आ गए। चाचा जी ने अपने घर से खाना पका कर भेज दिया, खाना खा पीकर थोड़ी देर बातचीत कर सब सो गए। दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ही जाग की खड़ी हुई रूपा, पूरे मकान की सफाई की छतों के जाले साफ़ किए, आँगन की लिपाई कर दी फ़र्श पर पोंछा लगाया, सभी कपड़ो की तह कर करीने से जगह पर रखे, रसोई की धुलाई कर दी राजेश थोड़ी देर देखता रहा फिर उठकर वह भी रूपा का हाथ बँटाने लगा, पड़ोस से दूध लाया चाय बनाई माँ को जगाया उन्हें चाय पिलाई फिर रूपा ने दोनों बच्चे जगाए, उनको सुबह ही नहला दिया, उनको नए कपड़े पहना दिए, दूध पिलाकर आँगन में खाट बिछाकर बैठा दिए, वे दानों खेलने लगे माँजी को नहला दिया। उनके बालों में थोड़ा तेल चुपड़कर कंघी कर दी, साफ़ धोती पहनने को दी, उनको भी बाहर खाट पर बिठा दिया, अब देखो कल शाम ही रूपा घर में आई थी सुबह उसके काम को देखकर लग रहा था जैसे बरसों से यहीं रह रही हो, हो भी क्यों न सेवा भाव हो तो हाथ पैर काम की तरफ़ अपने आप चलने लगते हैं, रूपा रसोई में गई सभी डिब्बे खोलकर देखा किस डिब्बे में क्या दालें हैं, आटा चावल के बरतन टटोले राजेश खेतों से कुछ सब्ज़ियाँ ले आया, इतने में रूपा ने पराठे सेंक दिए सभी का नाश्ता हो गया।

नाश्ते से निपटकर रूपा ने घर के सभी कपड़े धोए राजेश ने हेंडपंप चलाकर रूपा का सहयोग किया, दोनों ने मिलकर कपड़े फैला दिए, माँ आँगन में खाट पर बैठकर रूपा को काम करते हुए एक टक देखती रही, चन्द घन्टों में ही घर की काया पलट दी रूपा ने। सुबह के सारे कामों से निपट खुद नहाधोकर रूपा ने माँ जी से पूछा दिन में खाने के लिए क्या पकाना है। माँ जी ने उसे अपने साथ थोड़ी देर खाट पर बैठाया, कुलदीपक संशय भरी निगाह से देख रहा था रूपा को, उसने हाथ पकड़कर खींचा अपने सीने से लगाया, उसने उसके गालों को कई बार चूमा, फिर उसे छोड़कर मीनाक्षी को गोद में उठा लिया, उसे लेकर आँगन में ही टहलने लगी। चंद घन्टों में ही बच्चे भी अपना लिए माँ भी खुश।

पड़ोस में नई दुल्हन आई हो और पड़ोसने देखने को न आएँ ऐसा कैसे हो सकता है? लिहाजा दोपहर के समय एक-एक दो-दो करके घर में आने लगीं। रूपा का रंग रूप देखकर सभी माँ जी से फुसफुसाने लगीं, ''अरे लाना ही था तो किसी अच्छी-सी देखने भालने में ठीक-सी लाते। ये क्या लाए हो? इतनी जल्दी भी क्या थी? अभी छ: महीने ही तो हुए हैं कमलेश को मरे। हमसे कहते हमारे मायके में है एक पति से बनी नहीं मायके में ही रह रही है इतनी सुन्दर की पूछो मत। माँ जी उनको सुनती रहीं बोली कुछ नहीं। थोड़ी देर में रूपा चाय बना लेकर आई सबको चाय के कप पकड़वाए। फिर जिस जिसको माँ जी ने बताया उनके पैर छुए सामने बैठ गई। पड़ोसनों का आना जाना दो तीन घन्टे चला आखिर में छाया आई।

छाया इस गाँव की सबसे पढ़ी लिखी बहू है। एम.ए. तक पढ़ी है। लम्बी-सी चोटी माँग में सिन्दूर बड़ी-बड़ी आँखे गदराया हुआ शरीर गोरा चिट्ठा रंग जैसे अंग्रेज़ हो। गाँव भर में इसके रूप रंग के चर्चे होते हैं। पति भी बहुत प्यार करता है। गाँव के जवान लड़के घर पर मंड़राते रहते हैं। बड़े सलीके से रहती है आसपास की औरतें इससे ईर्ष्या रखती हैं। बहुत कम बोलचाल है कुछ घमन्डी टाइप की है। यह नई बहुओं को देखने के लिए इसलिए जाती है कि कहीं आने वाली मुझसे ज़्यादा सुन्दर तो नहीं? बनाव शृंगार में घन्टों लगाती है इसके खर्चे भी बहुत हैं। छाया के पति ने घर में टीवी, फ्रिज, गैस चूल्हा सब रखा है। इन सबके लिए अपना पुराना ट्रैक्टर तक बेच दिया, जो इनकम होती है कुछ फैशन में, कुछ ज़ायके के हवाले हो जाती है। पर है बहुत खुश। बीबी जो अति सुन्दर है। छाया ने भरपूर नज़र रूपा के चेहरे पर डाली पूरा शरीर आँखो से टटोला फिर माँजी की तरफ़ मुस्कुराकर देखा, अपने घर चली आई। रूपा के रूप रंग से गाँव की रूपवतियाँ खुश नहीं थी। एक ने दूसरे से कहा, ''हमें क्या है? जब राजेश को पसन्द है तो ठीक है।''

रूपा को आए पूरा हफ्ता हो चुका है। माँ जी को लग रहा है जैसे रूपा हफ्ता नहीं बरसों से साथ है। सेवा में लगी रहती है, राजेश से कहकर दूध देने वाली भैंस ख़रीद ली। बच्चों को दूध घर का मिलने लगा, कुलदीपक स्कूल जाने लगा है मीनाक्षी अभी डेढ़ साल की है। रूपा कुलदीपक को बड़े प्यार से पढ़ा रही है। बच्चे मम्मी-मम्मी कहने लग गए हैं। राजेश खेतों की देखरेख में लग गया है। माँ जी सुबह शाम घूमने लगीं हैं, माँ जी के सिर में तेल ठोककर पैरों के तलवों की मालिश होने लगी है। पूरा घर घर की तरह हो गया है। गाँव के बाज़ार से कपड़ा लाकर बच्चों को नए कपड़े रूपा ने खुद सीकर पहना दिए, माँ जी का ब्लाउज पेटीकोट सी दिया।

पड़ोसने चुपचाप देखती रहती, रूपा को किसी और से बात करने की फुरसत कहाँ। इन्टर पास है गाँव के कॉलेज से वो भी कृषि विज्ञान से, उसने खेतों में जाना भी शुरू कर दिया। राजेश को खेत की मिट्टी की जाँच कराने को कहा सही बीज खाद का चयन करने को कहा। एक भैंस से घर के ही दूध की भरपाई हो पाती है, अगर हमारे पास आठ दस भैंसे होती तो हमारी इनकम बढ़ जाती बायो गैस प्लान्ट लग जाता घर की रोशनी के लिए सौर ऊर्जा संयत्र लग जाता गोबर के उपले की जगह जैविक खाद बनने लगती। किसी सरकारी बैंक से कर्ज़ लेकर राजेश ने रूपा की मनोकामना पूरी कर दी। भैंसो की देखरेख के लिए एक नौकर रख दिया।

रूपा राजेश के संग पिछले एक डेढ़ साल से रह रही है। माँजी ने कहा, ''रूपा बेटी तुम्हारा भी एक बच्चा होता तो तुम्हारे लिए ही अच्छा होता।'' रूपा ने साफ़ इनकार कर दिया, ''माँ जी भगवान की कृपा से बगैर पैदा किए दो बच्चे मिल गए और मुझे नहीं चाहिए। भगवान इनको लम्बी उमर दे। फिर माँ जी अपना पराया क्या है? क्या अपने बच्चे वाले सुखी हैं।'' राजेश की माली हालत पहले से काफी बेहतर हो गई। एक दिन माँ जी ने गाँव से रूपा के पिता जी को भी अपने घर पर ही बुला लिया। इनसे अब मजदूरी नहीं हो पाती है काफी कमज़ोर और बीमार हो गए थे। रूपा के अलावा इस संसार में इनका कोई नहीं है।

आज राजेश के घर के आगे नई कार खड़ी है। दूध की ब्रिकी से ख़रीदी है। बैंक में पैसा भी है, खेत पहले से दुगनी उपज वाले हो गए हैं। माँजी जवान लगने लग गईं है और बच्चे भी खुशहाल हैं। और क्या चाहिए राजेश को? उधर छाया के पति को उसके खर्चों ने कर्ज़दार बना दिया है। आज छाया रूपा के आगे नतमस्तक होकर खड़ी है उसे एक हज़ार रुपए की सख़्त ज़रूरत है। रूपा ने माँ जी की तरफ़ इशारा कर दिया उनसे ले लो। रूपा से मिलने के बाद और उसके कार्यकुशलता से प्रभावित होकर छाया को अपने रूप रंग पर खुद ही घृणा होने लगी। अब वह रूपा की दिवानी हो चली है। रूपा उसे कृ'षि' एंव पशुपालन की ट्रेनिंग दे रही है। उससे रूपा ने कहा दीदी आप मुर्गी फारम खोल लो बहुत जल्दी कार आ जाएगी।

राजेश के चाचा उसकी मम्मी के सामने बैठे हैं रूपा की चर्चा पूरे गाँव में है बोल, ''भगवान ने मेरी लाज रख दी मैं अपने को धन्य भाग समझता हूँ। भाभी जी जो रूपा जैसी बेमिसाल औरत हमारे गाँव में हैं।'' माँजी की आँखे एक बार फिर छलछलाने लगीं पर ये आँसू खुशी के थे जो रूपा ने माँ जी को दी थी। आज इस बड़ापुर गाँव में रूपा से रूपवान कोई औरत नहीं हैं पर रूपा दूसरी औरत के रूप में आई है काश! कोई रूपा जैसी दुल्हन पहली औरत के रूप में सहर्ष ले आता।

दुर्गादत्त जोशी

शनिवार, सितंबर 12, 2009

काबुलीवाला_(रवीन्द्रनाथ ठाकुर)

मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।

मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"

कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी
दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।

काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?"

मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।" फिर मैं बाहर चला गया।

कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।

काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"

रहमत हँसता हुआ कहता, "हाथी।" फिर वह मिनी से कहता, "तुम ससुराल कब जाओगी?"

इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"

रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।" इस पर मिनी खूब हँसती।

हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।

एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।

कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।

इतने में "काबुलीवाले, काबुलीवाले", कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षणभर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, ‘’तुम ससुराल जाओगे?" रहमत ने हँसकर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"

रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।"

छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।

काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।

कई साल बीत गए।

आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।

पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।

मैंने पूछा, "क्यों रहमत कब आए?"

"कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ," उसने बताया।

मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"

वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, "ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?"

शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले" चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।"

वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।

मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ। इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, “'यह थोड़ा सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।“

मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, 'आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।' फिर ज़रा ठहरकर बोला, “आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी हैं। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।“

उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।

देखकर मेरी आँखें भर आईं। सबकुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहनें पहने मिनी शरम से सिकुड़ी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?”

मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।

मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? वह उसकी याद में खो गया।
मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, “रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।“

सोमवार, अक्टूबर 20, 2008

बास is हमेशा right.

एक बार मायावती, आडवाणी और लालू जी एक आटो मे सफर कर कही जा रहे थे। रास्ते मे एक दुर्घटना मे तीनो की मौत हो जाती है। यमलोक मे यमराज उनका इन्तजार कर रहे थे । वो पहले से तय कर चुके थे कि मायावती, आडवाणी को वे स्वर्ग मे और लालू जी को नरक मे भेजेगे। जब उन्होने अपना ये निर्णय तीनो को सुनाया तो लालू जी यमराज के इस निर्णय से संतुष्ट न थे। उन्होने से कहा महाराज आप इस तरह का भेदभावपूर्ण निर्णय क्यो ले रहे है? हम सभी ने जनता की सेवा कि है, घूस ली है, लोक सेवापद का दुरुपयोग किया है। फिर ये अन्याय मेरे हि साथ क्यो कर रहे है। मेरा मानना है कि आप किसी परीक्षा या ठोस आधार पर ये निर्णय ले।

यमराज मान गये और सभी कि अंग्रेजी कि परीक्षा लेने को कहा । मायावती जी को इन्डिया (India) का शब्द-विन्यास (spell) करने को कहा गया जो उन्होने आसानी से कर दिया। आडवाणी जी को इग्लैड का शब्द-विन्यास करने को कहा गया उन्होने भी आसानी से कर दिया। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी को चैकोस्लोवाकिया (Czechoslovakia) का शब्द-विन्यास करने को कहा गया। लालू जी का वैसे हि अंग्रेजी मे हाथ-मुँह तंग था तो उनसे चैकोस्लोवाकिया का शब्द-विन्यास ना हो सका और फेल होने पर मजबूर होना पडा।

लालू जी ने यमराज से कहा महाराज आप ने मुझसे कठिन सवाल पूछा जो सही नही था। आप कोई और परीक्षा ले ले। यमराज मान गये और इस बार हिन्दी कि परीक्षा लेने को कहा, लालू जी खुश थे कि हिन्दी कि परीक्षा तो वे आसानी से पास कर लेगे।

मायावती जी को कहा गया लिखो – “कुत्ता बोला भौ भौ “ उन्होने आसानी से लिख दिया। आडवाणी जी को कहा गया लिखो – “चिडिया बोली ची ची “ उन्होने भी आसानी से लिख दिया। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी को कहा गया लिखो – “ गधा दौडा तबडक तबडक”। दूबारा कठिन सवाल पूछा गया, इस बार भी फेल ।

लालू जी अब भी खुश न थे । इतिहास के छात्र होने के कारण लालू जी ने अन्तिम परीक्षा इतिहास विषय पर लेने को कहा । यमराज मान गये चलो लालू जी को एक अन्तिम मौका दे देते है लेकिन उन्होने लालू जी को बता दिया कि इसके बाद कोई अन्य परीक्षा नही होगी और लालू जी को इस परीक्षा का निर्णय मानना हि पडेगा।

मायावती जी से पूछा गया – भारत देश कब आजाद हुआ ? उन्होने उतर दिया महाराज 1947 मे। इस परीक्षा मे भी पास। आडवाणी जी से पूछा गया – जलियावाला बाग कत्लेआम के लिये कौन जिम्मेदार था? उन्होने उतर दिया महाराज जनरल डायर। वे भी इस परीक्षा मे भी पास। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी से पूछा गया - आप उन सभी लोगो के नाम बताओ जो जलियावाला बाग कत्लेआम मे मारे गये ?

लालू जी ने अपनी हार स्वीकार कर ली और नरक मे चल दिये ।

शिक्षा : अगर आपके बास को लगता है आपका दिमाग ठिक से काम नही करता है तो आपको इस तथ्य को स्वीकारना ही होगा और भविष्य मे आने वाले बदलावो के लिये तैयार रहना पडेगा । इस तथ्य से भागने का कोई तरीका नही है।
अंग्रेजी (English ) मे पढने के लिये यहा किलक करे ।

आ अब वापस आ जाये

नमस्कार चिटठाकार मित्रो आशा करता हू आप सब ठिक ठाक होगे और जिन्दगी के क्षणो का आनंद ले रहे होगे। अपने काम मै कुछ ज्यादा ही व्यसत होने के कारण ब्लाग जगत से नाता टुट सा गया था ।पर अब लगता है मुझे वापस आ जाना चाहिये। महिने मे एक आध ही पोस्ट सही अपनी उपस्थिती तो दरज करा हि सकते है। इस बहाने आप लोगो से भी नाता जुडा रहेगा ।

मंगलवार, सितंबर 04, 2007

“ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”

क्या आपने कभी गौर किया है कि किसी आफिस मे ज्यादा काम करने वाले को ही बास उसके काम के अलावा भी दूसरे काम क्यो पकडा देता है? क्यो वह शाम को 6:30 ( जो समय है उस दिन को बाय- बाय कहने का ) के बावजूद काम मे व्यस्त है? अगर बास उसे इतना हि भरोसेमंद समझता है तो क्यो उसको वेतन बढोतरी के समय रुलाया जाता है? जबकी उसके सहपाठी जो उस से कम या ना के बराबर काम करते है (क्योकि उन का ज्यादातर काम तो बेचारा वही करता है) मजे से आफिस सुख का आनंद ले रहे होते है, टेशंन फ्री होकर घूम रहे होते है, गप्पे लडा रहे होते है, हमउम्र के विपरित लिग वाले चोच लडा रहे होते है और वो बास के साथ झक छेत रहा होता है । इन सब सवालो का जबाब चाहिये तो आपको पगला कार्यसंस्कृति को विस्तार से समझना होगा। अब आप लोग कहेगे भइया ये होती क्या है? ये तो नरेन्द्र जी का हिन्दुस्तान दैनिक मे 17.08.07 को लिखा ये लेख पढ ले सबकुछ समझ मे आ जायेगा।

प्यार मे पागल होना रिस्की होता है । इसमे कामयाबी की संभावना कम होती है। लेकिन काम मे पागल होना शतप्रतिशत फलदायी होता है। पूरी सफलता की गारंटी । अपने आफिस मे आजमा कर देखिये। बडा साफ और सीधा फंडा है “ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ” । कार्यसंस्कृति का यह सिद्धांत बडा सरल है। जो जितना काम करेगा, उससे उतना ही काम करवाया जाएगा। ‘ए’ अगर बहुत अच्छा काम करता है बास ‘ए’ को ही काम करने के लिये कहेगा।

‘ए’ भले ही लंच मिस कर चुका हो और उसके पेट मे चूहे दौड रहे हो, उस के कानो मे तो बास की ये बात ही रहेगी कि ‘खूब बढिया से रेड्डी करवा दो बेटा, एकदम चकाचक’। अब ‘ए’ चाह्कर भी आफिस मे ‘बी’ कि तरह बेपरवाह ‘इडियन आयड्ल’ का फाईनल नही देख पाएगा। ‘पगला’ एक कार्यसंस्कृति है जिसे ‘बी’ ने अपना लिया है और इसी के साथ उस ने आफिस मे टेशन फ्री कैसे रहे का बोध हासिल कर लिया है। विस्तार से जान ना है कि ‘पगला कार्यसंस्कृति’ है क्या, तो पूरा सूत्र समझना होगा। आगे कहानी मे हम ‘ए’ को अगला और ‘बी’ को ‘पगला’ कहेगे। एक दिन जब बास ने ‘अगले’ को एक एसाइन्मेट दिया, तो काम सौपने का तरीका कुछ ऐसा था, मानो इसे ‘अगले’ के अलावा कोई कर ही नही सकता है… ‘अगला’ कोई चार घंटे तक प्यासे मन को डपट कर काबू मे रखने के बाद पानी पीने गया था कि इधर बास को उसकी जोरदार तलब हो गई। आग टाइप एक खबर आई और बास चीख पडे ‘अगला’ कहा गया उसे बुलाओ।

एक साथ दस ‘पगले’ ‘अगले’ के मोबाइल पर रिग करने लगे। दो-तीन ‘पगले’ तो चिल्लाते हुए दौड पडे – अभी-अभी पानी पीता हुआ दिखा था। एक ने तो ह्द कर दी। ‘अगले’ की बाह् पकडकर उसे लगभग धकेलते हुए बास के पास ले आया।

अत्यंत गौरवान्वित होते हुए कहा- बास ये काम ‘अगले’ के अलावा कोई कर ही न ही सकता। ‘अगले’ ने बास की पूरी बात सुने बिना हाँ कर दी- ‘समझ गया बास हो जाएगा, अभी हो जाएगा’। सारे ‘पगले’ ‘अगले’ को ढूँढ कर लौट चुके थे। उस ‘पगले’ की और ईष्यार्लु नजरो से देख रहे थे, जो ‘अगले’ को पकड लाया था। देख लो बास… अभी तक हाफ रहे है। ‘अगला’ काम मे लग गया था। लंच की जरुरत अब महसूस नही हो रही थी। पेट पानी से भर चुका था। ‘पगला’ ‘अगले’ को देख कर गा रहा था – जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम । मेरे ख्याल है आप भी दफ्तर मे काम करने का ये बेजोड नुस्खा समझ गए होगे – “ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”

नरेन्द्र जी का हिन्दुस्तान दैनिक मे लिखा ये लेख मुझे नेहरु पैलेस से कुछ सामान लेते हुए मिला। लेख पढा तो काफी अच्छा लगा और ज्ञानपूर्वक भी तो सोचा क्यो न आप लोगो तक भी कि ये बांटा जाये।

सोमवार, अगस्त 20, 2007

गुल्ली-डंडा (पिछले भाग से आगे )

पिछले भाग से आगे

बीस साल गुजर गए। मैंने इंजीनियरी पास की और उसी जिले का दौरा करता हुआ उसी कस्बे में पहँचा और डाकबँगले में ठहरा। उस स्थान को देखते ही इतनी मधुर बाल-स्मृतियॉँ हृदय में जाग उठीं कि मैंने छड़ी उठाई और क्स्बे की सैर करने निकला। ऑंखें किसी प्यासे पथिक की भॉँति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थीं; पर उस परिचित नाम के सिवा वहॉँ और कुछ परिचित न था। जहॉँ खँडहर था, वहॉँ पक्के मकान खड़े थे। जहॉँ बरगद का पुराना पेड़ था, वहॉँ अब एक सुन्दर बगीचा था। स्थान की काया पलट हो गई थी। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं उसे पहचान भी न सकता। बचपन की संचित और अमर स्मृतियॉँ बॉँहे खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थीं; मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जी होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गईं! मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ।
सहसा एक खुली जगह में मैंने दो-तीन लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखा। एक क्षण के लिए मैं अपने का बिल्कुल भूल गया। भूल गया कि मैं एक ऊँचा अफसर हूँ, साहबी ठाठ में, रौब और अधिकार के आवरण में।
जाकर एक लड़के से पूछा-क्यों बेटे, यहॉँ कोई गया नाम का आदमी रहता है?
एक लड़के ने गुल्ली-डंडा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा-कौन गया? गया चमार?
मैंने यों ही कहा-हॉँ-हॉँ वही। गया नाम का कोई आदमी है तो? शायद वही हो।
‘हॉँ, है तो।‘
‘जरा उसे बुला सकते हो?’
लड़का दौड़ता हुआ गया और एक क्षण में एक पॉँच हाथ काले देव को साथ लिए आता दिखाई दिया। मैं दूर से ही पहचान गया। उसकी ओर लपकना चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊँ, पर कुछ सोचकर रह गया। बोला-कहो गया, मुझे पहचानते हो?
गया ने झुककर सलाम किया-हॉँ मालिक, भला पहचानूँगा क्यों नहीं! आप मजे में हो?
‘बहुत मजे में। तुम अपनी कहा।‘
‘डिप्टी साहब का साईस हूँ।‘
‘मतई, मोहन, दुर्गा सब कहॉँ हैं? कुछ खबर है?
‘मतई तो मर गया, दुर्गा और मोहन दोनों डाकिया हो गए हैं। आप?’
‘मैं तो जिले का इंजीनिया हूँ।‘
‘सरकार तो पहले ही बड़े जहीन थे?
‘अब कभी गुल्ली-डंडा खेलते हो?’
गया ने मेरी ओर प्रश्न-भरी ऑंखों से देखा-अब गुल्ली-डंडा क्या खेलूँगा सरकार, अब तो धंधे से छुट्टी नहीं मिलती।
‘आओ, आज हम-तुम खेलें। तुम पदाना, हम पदेंगे। तुम्हारा एक दॉँव हमारे ऊपर है। वह आज ले लो।‘
गया बड़ी मुश्किल से राजी हुआ। वह ठहरा टके का मजदूर, मैं एक बड़ा अफसर। हमारा और उसका क्या जोड़? बेचारा झेंप रहा था। लेकिन मुझे भी कुछ कम झेंप न थी; इसलिए नहीं कि मैं गया के साथ खेलने जा रहा था, बल्कि इसलिए कि लोग इस खेल को अजूबा समझकर इसका तमाशा बना लेंगे और अच्छी-खासी भीड़ लग जाएगी। उस भीड़ में वह आनंद कहॉँ रहेगा, पर खेले बगैर तो रहा नहीं जाता। आखिर निश्चय हुआ कि दोनों जने बस्ती से बहुत दूर खेलेंगे और बचपन की उस मिठाई को खूब रस ले-लेकर खाऍंगे। मैं गया को लेकर डाकबँगले पर आया और मोटर में बैठकर दोनों मैदान की ओर चले। साथ में एक कुल्हाड़ी ले ली। मैं गंभीर भाव धारण किए हुए था, लेकिन गया इसे अभी तक मजाक ही समझ रहा था। फिर भी उसके मुख पर उत्सुकता या आनंद का कोई चिह्न न था। शायद वह हम दोनों में जो अंतर हो गया था, यही सोचने में मगन था।
मैंने पूछा-तुम्हें कभी हमारी याद आती थी गया? सच कहना।
गया झेंपता हुआ बोला-मैं आपको याद करता हजूर, किस लायक हूँ। भाग में आपके साथ कुछ दिन खेलना बदा था; नहीं मेरी क्या गिनती?
मैंने कुछ उदास होकर कहा-लेकिन मुझे तो बराबर, तुम्हारी याद आती थी। तुम्हारा वह डंडा, जो तुमने तानकर जमाया था, याद है न?
गया ने पछताते हुए कहा-वह लड़कपन था सरकार, उसकी याद न दिलाओ।
‘वाह! वह मेरे बाल-जीवन की सबसे रसीली याद है। तुम्हारे उस डंडे में जो रस था, वह तो अब न आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में।‘
इतनी देर में हम बस्ती से कोई तीन मील निकल आये। चारों तरफ सन्नाटा है। पश्चिम ओर कोसों तक भीमताल फैला हुआ है, जहॉँ आकर हम किसी समय कमल पुष्प तोड़ ले जाते थे और उसके झूमक बनाकर कानों में डाल लेते थे। जेठ की संध्या केसर में डूबी चली आ रही है। मैं लपककर एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी काट लाया। चटपट गुल्ली-डंडा बन गया। खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली। गुल्ली गया के सामने से निकल गई। उसने हाथ लपकाया, जैसे मछली पकड़ रहा हो। गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी। यह वही गया है, जिसके हथों में गुल्ली जैसे आप ही आकर बैठ जाती थी। वह दाहने-बाऍं कहीं हो, गुल्ली उसकी हथेली में ही पहूँचती थी। जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो। नयी गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली सभी उससे मिल जाती थी। जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, गुल्लियों को खींच लेता हो; लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा। फिर तो मैंने पदाना शुरू किया। मैं तरह-तरह की धॉँधलियॉँ कर रहा था। अभ्यास की कसर बेईमानी से पूरी कर रहा था। हुच जाने पर भी डंडा खुले जाता था। हालॉँकि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी। गुल्ली पर ओछी चोट पड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोबारा टॉँड़ लगाता। गया यह सारी बे-कायदगियॉँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गए। उसका निशाना कितना अचूक था। गुल्ली उसके हाथ से निकलकर टन से डंडे से आकर लगती थी। उसके हाथ से छूटकर उसका काम था डंडे से टकरा जाना, लेकिन आज वह गुल्ली डंडे में लगती ही नहीं! कभी दाहिने जाती है, कभी बाऍं, कभी आगे, कभी पीछे।
आध घंटे पदाने के बाद एक गुल्ली डंडे में आ लगी। मैंने धॉँधली की-गुल्ली डंडे में नहीं लगी। बिल्कुल पास से गई; लेकिन लगी नहीं।
गया ने किसी प्रकार का असंतोष प्रकट नहीं किया।
‘न लगी होगी।‘
‘डंडे में लगती तो क्या मैं बेईमानी करता?’
‘नहीं भैया, तुम भला बेईमानी करोगे?’
बचपन में मजाल था कि मैं ऐसा घपला करके जीता बचता! यही गया गर्दन पर चढ़ बैठता, लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिए चला जाता था। गधा है! सारी बातें भूल गया।
सहसा गुल्ली फिर डंडे से लगी और इतनी जोर से लगी, जैसे बन्दूक छूटी हो। इस प्रमाण के सामने अब किसी तरह की धांधली करने का साहस मुझे इस वक्त भी न हो सका, लेकिन क्यों न एक बार सबको झूठ बताने की चेष्टा करूँ? मेरा हरज की क्या है। मान गया तो वाह-वाह, नहीं दो-चार हाथ पदना ही तो पड़ेगा। अँधेरा का बहाना करके जल्दी से छुड़ा लूँगा। फिर कौन दॉँव देने आता है।
गया ने विजय के उल्लास में कहा-लग गई, लग गई। टन से बोली।
मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा-तुमने लगते देखा? मैंने तो नहीं देखा।
‘टन से बोली है सरकार!’
‘और जो किसी ईंट से टकरा गई हो?
मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला, इसका मुझे खुद आश्चर्य है। इस सत्य को झुठलाना वैसा ही था, जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने गुल्ली को डंडे में जोर से लगते देखा था; लेकिन गया ने मेरा कथन स्वीकार कर लिया।
‘हॉँ, किसी ईंट में ही लगी होगी। डंडे में लगती तो इतनी आवाज न आती।‘
मैंने फिर पदाना शुरू कर दिया; लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धॉँधली कर लेने के बाद गया की सरलता पर मुझे दया आने लगी; इसीलिए जब तीसरी बार गुल्ली डंडे में लगी, तो मैंने बड़ी उदारता से दॉँव देना तय कर लिया।
गया ने कहा-अब तो अँधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।
मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाए, इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा।
‘नहीं, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दॉँव ले लो।‘
‘गुल्ली सूझेगी नहीं।‘
‘कुछ परवाह नहीं।‘
गया ने पदाना शुरू किया; पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने दो बार टॉँड लगाने का इरादा किया; पर दोनों ही बार हुच गया। एक मिनिट से कम में वह दॉँव खो बैठा। मैंने अपनी हृदय की विशालता का परिश्च दिया।
‘एक दॉँव और खेल लो। तुम तो पहले ही हाथ में हुच गए।‘
‘नहीं भैया, अब अँधेरा हो गया।‘
‘तुम्हारा अभ्यास छूट गया। कभी खेलते नहीं?’
‘खेलने का समय कहॉँ मिलता है भैया!’
हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिराग जलते-जलते पड़ाव पर पहुँच गए। गया चलते-चलते बोला-कल यहॉँ गुल्ली-डंडा होगा। सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे। तुम भी आओगे? जब तुम्हें फुरसत हो, तभी खिलाड़ियों को बुलाऊँ।
मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस आदमियों की मंडली थी। कई मेरे लड़कपन के साथी निकले! अधिकांश युवक थे, जिन्हें मैं पहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा। आज गया का खेल, उसका नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया। टॉँड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बातें करती। कल की-सी वह झिझक, वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज न थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसेन प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह पदाया होता, तो मैं जरूर रोने लगता। उसके डंडे की चोट खाकर गुल्ली दो सौ गज की खबर लाती थी।
पदने वालों में एक युवक ने कुछ धॉँधली की। उसने अपने विचार में गुल्ली लपक ली थी। गया का कहना था-गुल्ली जमीन मे लगकर उछली थी। इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई है। युवक दब गया। गया का तमतमाया हुआ चेहरा देखकर डर गया। अगर वह दब न जाता, तो जरूर मार-पीट हो जाती।
मैं खेल में न था; पर दूसरों के इस खेल में मुझे वही लड़कपन का आनन्द आ रहा था, जब हम सब कुछ भूलकर खेल में मस्त हो जाते थे। अब मुझे मालूम हुआ कि कल गया ने मेरे साथ खेला नहीं, केवल खेलने का बहाना किया। उसने मुझे दया का पात्र समझा। मैंने धॉँधली की, बेईमानी की, पर उसे जरा भी क्रोध न आया। इसलिए कि वह खेल न रहा था, मुझे खेला रहा था, मेरा मन रख रहा था। वह मुझे पदाकर मेरा कचूमर नहीं निकालना चाहता था। मैं अब अफसर हूँ। यह अफसरी मेरे और उसके बीच में दीवार बन गई है। मैं अब उसका लिहाज पा सकता हूँ, अदब पा सकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया योग्य हूँ। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूँ।