शुक्रवार, अप्रैल 20, 2007

मेरी परिचय

नाम : गिरीश सिह,
जन्मतिथी :31 जनवरी 1983

इमेल: girish.singh एटदी रेट रेडिफमेल डाट काम
और girishsinghbisht एटदी रेट जीमेल डाट काम

जींवन के महत्वपूर्ण 21 साल, कहे तो जींदगी का एक अध्याय रूडकी मे बिताने के बाद लगभग 3 वर्षो से दिल्ली मे हूँ। रोजी रोटी जो कमानी है। कुछ सपने है जिन्हे पूरा करना चाहता हूँ। खेलो मे क्रिकेट, शतरंज फुटबाल पसंद करता हूँ। कम्प्यूटर गेम, चेटीग पर भी हाथ साफ है। थोडा बहुत किताबी कीडा भी हूँ पर वो बात अलग है कि आजकल तो समय नही पाता हूँ इस कार्य के लिये। इन्टरनेट पर जो पढ लिया वो ही काफी है। संगीत से काफी लगाव है। जगजीत सिह, किशोर, रफी, मुकेश और बर्मन दा के गाने ज्यादा पसंद करता हूँ।
अमिताभ बच्चन, शाहरूक खान, आशुतोष राणा पसंदीदा अभिनेता है। अभिनेत्रिया तो उम्र के साथ साथ बदलती रही। बचपन मे मधुबाला, रेखा पसंद थी कुछ समय के बाद ऐश, प्रिटी तत्पश्चात रानी ,प्रियंका और अब विघा बालान । कपडो मे जीन्स, टी-शर्ट पसंद करता हूँ। पर ज्यादातर साधारण वेशभुषा मे रहता हूँ। खाने मे चटपटा खाना पसंद करता हूँ। कभी-कभी कुछ नये व्यंजन वनाने की भी नाकाम कोशिश करता रहता हूँ। थोडा बहुत हाड ड्रिक का भी शौक पाल रखा है। पर अकेले मे कभी नही पीता हूँ। सही मे मै झूठ नही बोलता।
प्यार के मामले मे अब तक थोडा अनलक्की रहा हूँ, कारण शायद यही रहा होगा कि दिल के डिसीजन लेते समय मैने दिमाग को ज्यादा अहमियत दी। जींदगी के हाइवे पर काफी उतार चढाव देखे है। कभी खुशी का उजाला तो कभी दु:ख का अधेरा । अपनो को बैगाना एवं बैगानो को अपना बनते देखा है। एक संवेदनशील और कोआपरेटीव आदमी हूँ। जो कभी कभी एक कमजोरी भी लगती है,क्योकि आजकल ज्यादा कोआपरेटीवनेस दिखाते है तो लोग समझते है कि न जाने इसे क्या फायदा रहा है? और संवेदनशीलता तो लोगो को दिखावा लगती है।
दोस्तो मे काफी पसंद किया जाता हूँ। दुनिया को अपनी नजरो से देखना चाहता हूँ पर कम्बखत चश्मा बीच मे आ जाता है। किसी चीज से नफरत है तो वह है सुबह जल्दी उठना,बर्तन माझना और गन्दगी । पर क्या करे जब तक अकेले है तो इन चीजो से रोज दो-दो हाथ करने ही पडते है। मेरा मानना है कि जींदगी काफी छोटी होती है इसमे सिर्फ प्यार के लिये जगह होनी चाहिये,नफरत के लिये नही। वर्तमान एक उपहार है इसलिये तो अग्रेजी मे इसे present से उच्चारित करते है। मेरे हिसाब से काफी झक छेत ली मैने अपने बारे मे कुछ और पुछना हो तो मेल करे।

बुधवार, अप्रैल 04, 2007

48 वर्षो से नहाया ही नहीं

क्या आप यकीन करेंगे कि कोई व्यक्ति 48 साल तक बिना नहाये रह सकता है। लेकिन संबलपुर के धनेश्वर प्रधान की कहानी दूसरों से काफी हटकर है। उनकी उम्र इस समय लगभग 120 वर्ष है पर वे 48 वर्षो से नहाये नही है। है न कमाल कि बात? चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ऐसा करने वाले के शरीर में तरह-तरह की बीमारियाँ घर कर सकती हैं, लेकिन वे तो अभी भी भले-चंगे हैं। जीवन का शतकीय पारी खेल चुके प्रधान के बाजुओ मे अब भले हि पहले जितनी ताकत न हो, भले हि उन्हे लाठी का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन वे अपना सारा काम खुद ही करते हैं। 48 वर्षो से अब तक न नहाने का रहस्य धनेश्वर प्रधान ने खोला नहीं है। पर पूछे जाने पर पता चला कि उन्हें गर्मी के दिनों में भी ठंड लगती है और वे आग जलाकर तापने बैठ जाते हैं। ऐसे स्वाधीनता सेनानी पर अब तक सरकार की कोई दृष्टि नहीं पड़ी है और वे गुमनाम सी जिंदगी जी रहे हैं। पूरी खबर यहाँ पढे

मंगलवार, अप्रैल 03, 2007

खोता बचपन

आजकल के शहरी बच्चो के बचपन को देखकर मेरे मन मे अकसर ये खयाल आत है कि क्या इन्हे वो बचपन नसीब हो रहा है जिसके ये हकदार है। क्या इनके बचपन को इनके माता पिता या अभिभावको ने उनके भविष्य को सुरक्षित करने को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इनके वर्तमान का गला घोट दिया है। मै इस बात से इनकार नही करता कि आज कल के संघर्षपूण माहौल देख कर इनके जीवन की सीढी के पहले पायदान को मजबूत करने की जरुरत है पर बच्चो के बचपन को भी नजरअंदाज न करे।

ज्यादातर घरो मे एक या दो ही बच्चे होते है । वे तरह-तरह की सुविधाओ के बीच पल रहे है। घर पर खाना उनकी इच्छानुसार ही बनाया जाता है। उनसे किसी तरह का घरेलू कार्य नही कराया जाता है। उन्हे विघालय से लाने और ले जाने के लिय आरामदेह गाङिया या बसे होती है। पढने के लिये सुन्दर किताबे एव लिखने के लिये रंग-बिरंगी कापिया होती है। स्कूली वेशभूषायें एवं जूते-मोजे भी कई प्रकार के होते है। स्कूल मे भी उन्हे घर जैसी सुख-सुविधायें उपलब्ध होती है। बडे-बडे हवादार कमरे, तरह-तरह के खेलो के लिये मैदान, अच्छी बैठक व्यवस्था, अच्छी पुस्तकालय, विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्पर्धायें इत्यादि। फिर भी बच्चो के माता पिता या अभिभावको की यही शिकायत रहती है कि बस्ते के बोझ से बच्चो का बचपन दब रहा है। परीक्षाओं का भी बच्चो पर काफी दबाव होता है। इन शिकायतों के चलते परीक्षाओं को सरल और बस्ते के बोझ को कम करने की कवायद चलती रहती है। परीक्षाओं को सरल करने के लिये कभी ग्रेड देकर काम चला लिया जाता है, तो कभी मौखिक या मासिक परीक्षाओं के परिणाम को देखकर दुसरी कक्षा मे भेज दिया जाता है।

बच्चो को बचपन से ही कुछ बनने के लिये प्रेरित किया जाता है। उनके सर्वागीण विकास के लिये मंह्गे खेलो से सम्बंन्धित विभिन्न संस्थाओं मे प्रवेश दिला दिया जाता है। मार्ग दर्शन के लिये अच्छे कोच नियुक्त किये जाते है। अब बच्चे बडे दिनो या गरमी की छुट्टियॉ खेलने-कूदने मे जाया नही करते बल्कि उन्हे विभिन्न प्रकार की हाबी क्लासो मे प्रवेश दिला दिया जाता है। गुल्ली डंड़े, कंच्चो,पतंग बाजी, छुपन्न-छुपाइ जैसे खेलो का स्थान हिंसक कम्पयूटर गेम्स एवं विडियो गेम्स ने ले लिया है। मेलो या हाट के बारे मे शायद हीं किसी को पता हो। बच्चे तो सिर्फ जूँ , वाट्ररपार्क जैसी जगहें जाना पसंद करते है। क्योंकि वो सिर्फ उन्ही के बारे मे जानते है। बच्चो पर इन तथाकथित सुख-सुविधाओ के साथ तनाव अनजाने ही लादा जाता है। रिश्ते नाते नही, दोस्त नहीं, मन भर का खेल नही, ज्यादा घूमना फिरना नही, और तो और भरपूर नीद को भी तरस जाते है ये बच्चे। दिन भर स्कूल मे, घर आकर होमवर्क, ट्यूशन और ट्यूशन वर्क मे ही दिन-रात गुजर जाते है। इन सब मे बचपन, बचपन की चंचलता, मस्ती दफन हो जाती है। इस कारण बच्चे कई बार अतृप्त, दुखी, उदास, चिड़चिडे, सबसे खफा से दिखाई देते है।

दसवी मे प्रवेश करते ही उस का सारे जग से रिश्ता तुड्वा दिया जाता है। न दोस्तो से मिलना, न घूमना-फिरना, न खेलना। घर को सोने का पिजरा बना दिया जाता है। 12वी का वर्ष तो अतिदक्षता को प्राप्त करने का वर्ष होता है। 12वी की पढाई के साथ-साथ विभिन्न करियर संबधी होने वाली परीक्षाओं का दबाव अलग से होता है। बच्चो के माता पिता या अभिभावक उन्हे वो बनाना चाह्ते है जो वे खुद न बन सके। सब कुछ हासिल करना ही जीवन का उदेश्शय बना दिया जाता है। जिसके कारण जीवन मे असफलता, अपयश के कटु अनुभवो को स्वीकारना उनके लिय अत्यन्त कठिन हो जाता है।

हमारा बचपन था जब हम कई तरह के अभावो मे जीते थे। हम घर के काम को अपनी जिम्मेदारी समझते थे, एक जोडी यूनिफार्म एव एक जोडी जूते-जुराब साल भर घिसते । किसी त्योहार पर अगर रात को 9 बजे तक घूमने कि आज्ञा मिलने पर स्वत्रंतत्रा का अनुभव करते, कुल्फी या आईसक्रिम मिलने पर आनंदित होते। रोटी के जगह पराठे मिलने पर माँ को धन्यवाद देते। जन्मदिन पर माता पिता के आशिर्वाद से तृप्त होना, विभिन्न संस्कारो वाला बचपन कितना सुखी था।

रिश्तो की मह्क से महकता, संस्कारो से जडा, आभावो मे भी जीवन को जीना, हर परिस्थिती का मुकाबला करना, जो मिल गया उसी मे सुखी होना, हार-जीत, सफलता-असफलता को समझना, यश- अपयश को स्वीकारना यही तो सीखा है हमने अपने बचपन से जो शायद आज की पीढी को नसीब नही हो रहा है।

शुक्रवार, मार्च 30, 2007

एक कहानी

आज हम चिट्ठाकार मित्रो को एक कहानी सुनाते है। यह कहानी अच्छी हि नही बल्कि हमारे सामाजिक जीवन एवम पैशे के लिये भी महत्वपूर्ण है। तो शुरु करे । एक धोबी महाशय होते है, जिनके पास दो गधे होते है। गधा अ ओर गधा स । अ का मनना था कि वह बहुत फुर्तीला और हर कार्य को स से अच्छा कर सकता है। वह हमेशा धोबी का विश्वासपात्र और चहेता बनना चाहता था इस कारण वह ज्यादा बोझ उठाने तथा धोबी के साथ चलने की कोशिश करता। बेचारी स बहुत सीधा और साधारण विचारो का था। वह अपनी क्षमता के हिसाब से बोझ उठाता एवं औसत चाल से चलता। अ के कार्य को देखकर धोबी ने स पर अ के बराबर कार्य करने के लिये दबाव डालना शुरू कर दिया। स ने भी थोडी बहुत कोशिश की परन्तु ज्यादा सफल न हो सका। इस कारण वह हमेशा की मार खाता।
बेचारा स काफी दुखी था उसने अ से विन्रमतापूर्वक प्रार्थना कर कहा प्रिय मित्र यहा पर सिर्फ हम दो ही है इसलिये क्यो एक दूसरे से आगे निकलने के लिये दौड करे। आपको ज्ञात है कि मैं ज्यादा बोझ उठाने मे असर्मथ हूँ। हम बराबर बोझ उठाते है और औसत चाल से चले। परन्तु अ कहा मानने वाला था। अगले दिन अ ने ईष्या के कारण और दिन की अपेक्षा थोडा ज्यादा वजन उठाया और अपनी रफ्तार भी बढा दी। स ने भी थोडी बहुत कोशिश की परन्तु ज्यादा सफल न हो सका। स के कार्य को देखकर धोबी काफी खफा था। बेचारा स नित्य मार खाता रहता। अ यह देखकर काफी खुश होता। एक दिन स अत्यधिक मार से चल बसा। अ अपने आप को सर्वोच समझने लगा पर कुछ समय पश्चात ही उसका यह भ्रंम टूट गया। अब उसे स का भी कार्य करना पडता वो भी दोहरे रफ्तार से। अत्यधिक कार्य करने के कारण बेचारा बिमार पड गया। अब उससे ज्यादा नही उठता था और रफ्तार मे भी कमी आ गयी थी। स के कार्य करने की क्षमता मे गिरावट देखकर धोबी को काफी गुस्सा आता। धोबी ने स से भी मार मार कार्य कराना शुरू कर दिया। स अपने कार्य करने की क्षमता को न बढा सका और एक दिन ने धोबी उसे लात मारकर चला गया नये गधे ढूढने।
यहा पर इस कहानी का अन्त नही है पर इस से हमे व्यवसायिक और सामाजिक शिक्षा मिलती है कि हमे अपने सभी साथियो को समान समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति कि अपनी क्षमता होती है। कभी भी अपने स्वामी के आगे जरूरत से ज्यादा दिखावा नही करना चाहिए और न ही साथियो को दबाव मे देखकर प्रसन्न होना चाहिए। इस बात से कोई फर्क नही पडता आप अ हो या स लेकिन आप अपने स्वामी के लिये गधे हो। आखिर मैं यही कहना चाहूगा कि जरूरत से ज्यादा काम करने की कोशिश न करे बल्कि काम को चतुराई से करे। सफलता कोई नियत स्थान नही है बल्कि एक यात्रा है। आशा करता हूँ आप लोग इस कहानी से कुछ सीख जरूर लेगे।

बुधवार, मार्च 21, 2007

आज श्रीलंका के लिये प्रार्थना करे,परसों इंडिया के लिये

बरमूडा के खिलाफ 257 रनों की जीत से टीम इंडिया ने वर्ल्ड कप के सुपर 8 में प्रवेश की अपनी संभावनाएं बेहतर बना ली हैं, लेकिन उसे अभी कई बाधाएं पार करनी हैं। सबसे बड़ी बाधा है आखिरी ग्रुप मैच में श्रीलंका को मात देना। भारत को हर हाल में श्रीलंका को हराना होगा। उसके बाद भी मामला नेट रन रेट पर अटक सकता है। फिलहाल श्रीलंका, भारत और बांग्लादेश, तीनों के दो-दो अंक हैं। श्रीलंका और बांग्लादेश ने एक-एक मैच खेला है जबकि भारत ने दो मैचों के बाद इतने अंक हासिल किए हैं। नेट रन रेट सबसे अच्छा श्रीलंका का है 4.860, जबकि भारत का नेट रन रेट 2.507 और बांग्लादेश का -0.139 है। नेट रन रेट किसी टीम द्वारा बनाए गए रनों को खेले गए ओवरों से भाग देकर निकली संख्या में से उस टीम द्वारा दिए गए रनों में ओवरों का भाग देकर निकली संख्या को घटा कर निकाला जाता है। भारत-बरमूडा मैच के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसके हिसाब से आगे 4 संभावनाएं बन सकती हैं।

संभावना : 1 श्रीलंका आज बांग्लादेश को हरा दे और भारत शुक्रवार को श्रीलंका को मात दे दे । उसके बाद बांग्लादेश आखिरी मैच में बरमूडा को हरा दे।

इस लिहाज से भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश तीनों के चार-चार अंक हो जाएंगे और सुपर-8 में पहुंचने वाली टीमों का फैसला नेट रन रेट के आधार पर होगा। बांग्लादेश पर जीत के बाद श्रीलंका का नेट रन रेट और बेहतर होगा और भारत भी श्रीलंका पर जीत से अपना नेट रन रेट और सुधार लेगा। बांग्लादेश का नेट रन रेट श्रीलंका से हार के बाद गिरेगा और उसे बरमूडा के खिलाफ इतना बेहतर करना होगा कि वह भारत से आगे निकल जाए। भारत के फायदे में होगा कि श्रीलंका बांग्लादेश को अच्छे अंतर से हराए।

संभावना : 2 बांग्लादेश अपने मैचों में श्रीलंका और बरमूडा दोनों को हरा दे और भारत भी श्रीलंका को मात दे दे।

बांग्लादेश भारत को हरा सकता है तो श्रीलंका और बरमूडा को क्यों नहीं? ऐसी स्थिति में बांग्लादेश 6 अंको के साथ पहले और भारत 4 अंको के साथ सुपर-8 में पहुंच जाएंगे, जबकि श्रीलंका सिर्फ 2 अंको के साथ बाहर हो जाएगा। इस स्थिति में भारत को नुकसान यह होगा कि वह सुपर-8 में खाली हाथ जाएगा, जबकि बांग्लादेश भारत पर जीत के कारण दो अंक लेकर वहां जाएगा। ऐसे में भारत सुपर 8 में पहले से ही कमज़ोर स्थिति में होगा। संभावना नंबर 1 में भारत श्रीलंका को हराने के कारण 2 अतरिक्त अंक लेकर जाएगा।

संभावना : 3 भारत और बांग्लादेश दोनों श्रीलंका से हार जाएं और बांग्लादेश ने बरमूडा को हरा देऐसी स्थिति में श्रीलंका 6 अंको के साथ पहले और बांग्लादेश 4 अंको के साथ सुपर-8 में पहुंच जाएंगे, जबकि भारत सिर्फ 2 अंको के साथ बाहर हो जाएगा। (भगवान से प्रार्थना करे कि ये बिल्कुल न हो)

संभावना : 4 अगर भारत और बांग्लादेश दोनों श्रीलंका से हार जाएं लेकिन बरमूडा बांग्लादेश को हरा दे
इसको संभावना के बजाय असंभावना कहना ज़्यादा सही होगा । भारत को हराने के बाद से बांग्लादेश के खिलाड़ियों का मनोबल काफी बढा है। बरमूडा बांग्लादेश को हरा दे, यह तभी हो सकता है यदि मैच फिक्स हो या वे मैच खेल ही न पाएं। क्रिकेट अनिश्चितताओ का खेल है इसमे कुछ भी हो सकता है लेकिन अगर ऐसा हो तो भारत श्रीलंका से हारने के बाद भी सुपर 8 में जा सकता है क्योकि तब श्रीलंका के 6 अंक हो जाएंगे और भारत, बरमूडा और बांग्लादेश, तीनों के 2-2 अंक होंगे। लेकिन बांग्लादेशी टीम के फॉर्म को देखते हुए यह ख्याली पुलाव ही लगता है कि वह बरमूडा से हार जाएगी।
देखते है समय के गर्भ मे क्या छुपा है। मेरी शुभकामनाये टीम इंडिया के साथ है आशा है आप सब कि भी होगी।
(स्रोत: विभिन्न समाचार-पत्र)

सोमवार, मार्च 19, 2007

शुरू में ही भारत की शर्मनाक हार

किसी भी खेल के हार और जीत दो जरूरी पहलू होते है जैसे किसी सिक्के का एक तरफ हैड तो दूसरी तरफ टैंल। विश्वकप के एक बहुत ही उलटफेर भरे मैच में बांग्लादेश की टीम ने भारत को 5 विकेट से हरा दिया। बांग्लादेश की टीम ने भारत को खेल के हर क्षेत्र में पछाड़ते यह ऐतिहासिक जीत दर्ज की। चूंकि यह मैमने द्वारा शेर का शिकार करना जैसी घटना है इसलिए यह क्रिकेट प्रेमियों को कुपित करने के लिये काफी है और जो स्वाभाविक भी है। इस घुटनाटेक पराजय के बाद भारतीय टीम की सफलता के लिए लिखे और गाए-बजाए गए सारे तराने बेसुरे हो गये है, सारे हवन-कीर्तन विफल हो गये। क्या कारण है बांग्लादेश के हाथों भारतीय टीम की ये दुर्गति हुई? अपने आप पर जरूरत से ज्यादा भरोसा, प्रतिद्वंद्वी टीम को नौसिखिया और कमजोर समझना या खेल से अधिक विज्ञापन बाजी में ध्यान लगाना है? मेरे विचार से प्रमुख कारण देश के खिलाड़ीयो का खेल के बजाए धन कमाने पर अधिक ध्यान एवं प्रसिद्धि बटोरने के फेर में पड़ जाना है। इन स्थितियों में मैदान पर उनका प्रदर्शन प्रभावित होना तय है।


भारतीय टीम ने खेल के प्रत्येक क्षेत्र में जैसा लचर प्रदर्शन किया और साथ ही जैसे हाव-भाव दिखाए उससे उसके पाकिस्तान की राह पर चल निकलने का खतरा पैदा हो गया है। ऐसा लगता है कि टीम इंडिया ने अपना सारा दमखम अभ्यास मैचों में ही दिखा दिया। नि:संदेह ऐसे रद्दी खेल के बल पर कोई टीम विश्व विजेता बनने का ख्वाब देखने की भी हकदार नहीं। पहले ही मैच में बुरी तरह पिटने के बाद यदि टीम इंडिया के साथ ही उसके कोच ग्रेग चैपल पर गुस्सा उतारा जा रहा है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।हम पहले भी देख चुके है कि भारतीय टीम अतीत में भी बुरी तरह पिटने के बाद बेहतर खेल दिखा चुकी है इसलिए यह अपेक्षा बनाए रखी जानी चाहिए कि वह आगे अपने हालिया प्रदर्शन को दोबारा नही दोहरायेगी, लेकिन इस एक पराजय ने यह तो बता ही दिया कि हमारी टीम में बुनियादी स्तर पर कोई बड़ी खामी है।


नि:संदेह यह खामी टीम इंडिया के प्रबंधन तंत्र में भी है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसी टीम हो जो इतना प्रसिद्धि, पैसा और प्यार पाने के बावजूद अपने खेल के स्तर को ऊंचा उठाने में नाकाम साबित हुई हो। यह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का प्राथमिक दायित्व बनना चाहिए था कि हमारी टीम इस खेल के हर स्तर पर श्रेष्ठता कायम करे, लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी प्राथमिकताओं में केवल धन जुटाना शामिल है। आखिर क्या कारण है कि भारतीय टीम की रैंकिंग ऊपर उठने का नाम नहीं ले रही है? क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि विश्व कप जीतने का दावा करने वाली टीम इंडिया के लिए अब यह दुआ करनी पड़ रही है कि वह बरमूडा से तो अच्छी तरह जीत जाए? यह दुआ करनी पड़ रही है तो इसीलिए कि हमारी टीम ने जीत के लिए तनिक भी जज्बा नहीं दिखाया। दरअसल उसने क्रिकेट प्रेमियों के भरोसे को ही नहीं तोड़ा, बल्कि उन्हें शर्मिदा भी किया है।

राँची में नाराज क्रिकेटप्रेमियों ने धोनी के नए मकान के निर्माण स्थल पर धावा बोलकर उनके खिलाफ नारेबाजी की और एक निर्माणाधीन चारदीवारी को क्षतिग्रस्त कर दिया,कानपुर में सहवाग और विकेटकीपर धोनी के पुतले फूँके गए, जयपुर और वाराणसी में भी टीम इंडिया के खिलाड़ियों के पुतले जलाए गए। कोलकाता में लोगों ने कोच ग्रेग चैपल और कप्तान राहुल द्रविड़ के खिलाफ प्रदर्शन किया। जालंधर के कम्पनी बाग में खिलाड़ियों के पोस्टर जलाए गए।

लेकिन क्रिकेट प्रेमियों को यह ध्यान रखना होगा कि उनका रोष अराजकता में तब्दील न होने पाए। उन्हें अपनी नाराजगी और निराशा जाहिर करने का पूरा अधिकार है, लेकिन संयमित और मर्यादित ढंग से। नि:संदेह क्रिकेट हम भारतीयों के खून में रच-बस सा गया है, लेकिन है तो आखिर वह एक खेल ही। एक मैच में मिली पराजय के बाद सब कुछ गंवा देने का भाव ठीक नहीं।

गुरुवार, मार्च 15, 2007

ट्रैफिक की समस्या

दिल्ली ही नहीं भारत के दूसरे महानगरों में भी ट्रैफिक की समस्या दिनो-दिन बढती जा रही है। ट्रैफिक की समस्या भी उन बड़ी समस्याओं की सूची में आती है जिनकी तरफ हमने आज़ादी के बाद ध्यान नहीं दिया है। आज शहरों में वाहनों की बढ़ती भीड़ प्रशासन के लिए सिरदर्द बनी हुई है। तकनीकी कुशलता और प्रबंधन क्षमता में अव्वल अमेरिका में भी ट्रैफिक जाम एक समस्या है। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत के महानगरों में आबादी का बोझ बढ़ा है। उनमें व्यापारिक गतिविधियां लगातार तेज होती जा रही हैं। उनमें लोगों का जीवन स्तर बढ़ रहा है। दूसरी ओर तकनीकी परिष्कार के साथ नए और बड़े वाहन भी सामने आ रहे हैं। ट्रैफिक की समस्या के समाधान में लोगों का जो सहयोग मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। समस्याओं को टालना, उनका सामना न करना या अस्थाई समाधान खोजना शायद हमारी आदत बन गई है। शहरों का अंधाधुंध और बिना समझे-बूझे विस्तार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, सड़कों और पुलों का अभाव, यातायात के नियमों का पालन न करना आदि कारण हैं जिन पर समग्र रूप से विचार किया जाना चाहिए था। प्रशासन का रवैया टालने वाला है। ज़ाहिर है समस्या के प्रति गंभीर रुझान का अभाव और व्यक्तिगत ढंग से समाधान खोजने की प्रवृति से समस्या विकराल रूप धारण कर रही है।

कहीं भी आने-जाने में लाखों, करोड़ों लोगों के अनगिनत घंटे बर्बाद होते हैं,गाड़ियों में खरबों रुपए का तेल बेवजह फुंकता है, पता नहीं कितना धुआँ परिवेश को गंदा कर देता है? हाल में प्रकाशित अर्बन मोबिलिटी रिपोर्ट- 2005 में इस बात का खुलासा किया गया है कि ट्रैफिक जाम के कारण लोगों का समय तो नष्ट हो ही रहा है, तेल की भी बर्बादी बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में वर्ष 2003 में ट्रैफिक जाम की वजह से लोगों के 3.7 अरब घंटे और 8.7 अरब लीटर तेल की बर्बादी हुई। यह वर्ष 2002 के मुकाबले क्रमश: 7.9 करोड़ घंटे और 26 करोड़ लीटर ज्यादा है। जाहिर है अमेरिका के लिए यह संकट निरंतर बढ़ा है। वहां 1982 से विभिन्न वाहनों द्वारा तय की गई दूरी में 74 फीसदी का इजाफा हुआ है , जबकि सड़कों के दायरे में 6 फीसदी की वृद्धि हुई है। परिवहन अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका की ट्रैफिक समस्या को दूर करने में छह वर्ष का वक्त लग सकता है और इस पर करीब 400 अरब डॉलर के खर्च का अनुमान है।

लंदन में ऐसा नियम है कि प्रमुख बाज़ारों जैसे आक्सफोर्ड स्ट्रीट आदि क्षेत्रों में केवल पब्लिक ट्रांसपोर्ट द्वारा -ही जा सकता है। मतलब यह कि प्राइवेट गाड़ियाँ दूर किसी पार्किंग में खड़ी करनी पड़ती हैं। एशिया के अनेक देशों ने भी इस समस्या से जूझने के लिए कई तरह के उपाय किए हैं। थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों में अर्बन रेलवे का विस्तार किया जा रहा है। सिंगापुर में सड़क पर बढ़ती भीड़ को देखकर पैसेंजर कारों पर टोल टैक्स बढ़ा दिया गया है। तीन या उससे कम लोगों को लेकर आने वाली पैसेंजर कारों के शहर और खासकर व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश करने पर शुल्क लगा हुआ है , जिसे एरिया लाइसेंसिंग कहते हैं। मलेशिया में भी ऐसी ही व्यवस्था लागू है। इसी संकट को भांपकर जापान ने लाइट रेल ट्रांजिट सिस्टम शुरू किया जिसके तहत हलकी छोटी ट्रामें चलाई जा रही हैं जो पटरी और सड़क पर समान रूप से चलती हैं।

दिल्ली में इसका उल्टा है। कनाट प्लेस में बसें नहीं आ सकतीं, सिर्फ़ प्राइवेट गाड़ियाँ, कारें या टैक्सियाँ आ सकती है। बसें कनाट प्लेस से कुछ दूर आकर रूक जाती है। यानी बस में चलने वाले को कनाट प्लेस तक आने के लिए पैदल चलना पड़ता है लेकिन कार सीधे दुकान के सामने आ सकती है। पब्लिक ट्राँसपोर्ट पर प्राइवेट ट्राँसपोर्ट को प्राथमिकता देना शायदी हमारी सामंती समझ का हिस्सा है। हमारे देश में सामंत तो नहीं हैं लेकिन सामंती संस्कार बहुत प्रबल हैं। एक और बड़ी समस्या यह है कि हमारे देश में जिन लोगों के पास कारें हैं वे अपनी कारों से घर के दरवाज़े के सामने ही उतरना चाहते हैं। दुकानदार भी यह चाहते हैं कि कार से ही दुकान के सामने उतरें। उन्हें दो कदम भी पैदल न चलना पड़े। इस मानसिकता ने सड़क के किनारे वाली जगह को पार्किंग बना दिया है जो मुफ्त में मिल जाती है। दुकानदारो द्वारा अपनी दुकानो के आगे तक करीब 5 से 6 फुट की जगह पर समान रखना, कही पर भी ट्रैक्टर या ट्राली का खडा कर देना जैसे कारक भी ट्रैफिक की समस्या को जटील बना देते है। लेकिन इसकी वजह से कितनी अव्यवस्था होती है। लोगों को कितनी परेशानी होती है, यह सब जानते हैं।

शहरों और खासतौर पर बड़े शहरों के मास्टर प्लान के साथ मनमाने खिलवाड़ ने भी ट्रैफिक की समस्या को विकराल बना दिया है। जहाँ एक कोठी हुआ करती थी और 10-12 लोग रहा करते थे वहाँ अब ऊँची-ऊँची इमारते बन गई है जिनमें सैंकड़ों लोग रहते हैं। बडे बडे शोपिग सैटर, माल खुल गये है। शहर की व्यस्तम सडको पर हर 10 मिनट के बाद लगता जाम प्रत्येक आने जाने वाले के लिए परेशानी का कारण बनता है। 40-50 किलोमीटर प्रति घंटा की चाल से 1 किलोमीटर का सफर तय करने मे मुश्किल से डेढ मिनट लगता है पर यहा तो आधा किलोमीटर का सफर तय करने मे ही 10 मिनट लग जाते है। सड़के रबड़ की तो बनी है नहीं जिन्हे चाहे जितना खीच कर बडा कर लो । ज़ाहिर है कि उनकी अपनी एक क्षमता है जो समाप्त हो सकती है।

यह भी एक विडंबना है कि पिछले दो दशकों में पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्र के लिए राशि बढ़ रही है लेकिन ग्रामीण इलाकों से शहरों-महानगरों की ओर लोगों का पलायन रुकने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में ट्रैफिक की समस्या अब भयावह रूप लेती जा रही है। पर इस संकट को सुलझाने की कोई कारगर योजना नजर नहीं आ रही। अगर आपके पास कोई सामाधान है तो जरूर बताये

शुक्रवार, मार्च 09, 2007

फिल्म समीक्षा - निशब्द

अधेड उम्र के पुरूष या महिला का अपनी बेटा/बेटी के उम्र के लडके/लडकी के साथ प्यार, आकषर्ण भारतीय दर्शको के लिये कोई नया विषय नही है। निशब्द से पहले भी कई फिल्मे इस विषय पर बन चुकी है जैसे दूसरा आदमी, लम्हे, लीला, तुम, छोटी सी लव स्टोरी और जांर्गस पार्क। इन फिल्मो मे इस तरह के रिश्ते की पेचदीगियो और उनके भावो को परदे पर दर्शाने का प्रयास किया गया था। पर क्या भारतीय दर्शक इस विषय पर बनी फिल्म देखने के लिये मानसिक रूप से तैयार है? पर मानना पडेगा रामगोपाल वर्मा को जिन्होने इस संवेदनशील को चुना और बडी शिद्रदत के साथ पर्दे पर उतारा भी है। इस फिल्म के जरिये उन्होने साबित कर दिया है कि वो संवेदनशील विषयो पर भावुक फिल्मे बना सकते है। बहुत से लोग इसे एडरिन लापन की "लोलिता" की कांपी बताते है पर ऐसा कुछ नही है, केवल समानता है तो सिर्फ विषय कि और कुछ नही।

फिल्म कि शुरूआत होती है विजय (अमिताभ बच्चन, ज्यादातर फिल्मो मे उनका यही नाम होता है) से, जो पेशे से एक वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर है। अपनी पत्नी रेवती और बेटी रितु (श्रद्धा आर्य) के साथ एक हिल स्टेशन मे रहते है। एक बार की सहेली जिया (जिया खान) उसके साथ छुटटीया बिताने उसके घर आती है। तलाकशुदा माँ बाप की बेटी जिया भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर है। विजय से पहली ही मुलाकात मे जिया उसकी तरफ आर्कषित हो जाती है। इसे पहली नजर का प्यार कहो या विपरिताकर्षण । दोनो एक दूसरे कि तरफ खीचे चले जाते है। विजय को अपने प्यार को व्यक्त करने के लिये शब्द ही नही मिलते। वह अपनी भावना को करने मे खुद को दोषी महसूस करता है। इस कारण वह आत्महत्या के बारे मे भी सोचता है। वह असंमनजस मे है। एक तरफ उसकी भावनाए है, तो दूसरी तरफ जिम्मेदारी। जैसा कि होता ही है प्यार छुपाये नही छुपता। रितु को अपने पिता और जिया के प्यार के बारे मे पता लग जाता है। तब आता है सब के जींवन मे सुनामी जैसा कहर। विजय को अपने दंद्ध एव जिम्मेदारी की के बीच फैसला लेना पडता है और जिम्मेदारी की जीत होती है । विजय, जिया को अपने घर से निकल जाने का आदेश देते है पर इस से पहले अपनी पत्नी और बेटी के सामने जिया से प्यार को स्वीकारते है। जिया चली जाती है और विजय अपनी यादो मे जिया को बसाए हुए है। इसी के साथ फिल्म खत्म हो जाती है ।

फिल्म ठीक-ठाक बन पडी है पर फिल्म की गति बहुत धीमी है। इन्टरवल के बाद तो और भी 2-3 पंचर हो जाते है। अमित राय की सिनेमेट्रोग्राफी काफी बेहतरीन है, मन्नार के चाय के बागान एव हरी भरी वादीयो को अच्छी तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म में संगीत दिया है विशाल भारद्वाज और अमर मोहिले ने और बोल लिखे हैं फरहद, साजिद ने। इसमें बिग बी और जिया खान ने खुद ही गाने गाए है। पाश्र्वसंगीत भी अच्छा है। थोडी मेलोडी के बीच मे स्वर ध्वनिया अधिक कारगर लगती है। लगता है लेखक महाशय कहानी के बीच मे कही उलझ गये थे जिस कारण फिल्म के मध्य भाग मे ठहराव सा प्रतीत होता है। संवाद द्रश्यो को अच्छी तरह से न फिल्मा पाना भी नकारात्मक असर डालता है। अभिनय के मामले मे अमिताभ बच्चन तो कमाल करते ही है। आँखो से अपना सारा दर्द ब्यान करने मे सफल हुए है। जिया ने भी अच्छा अभिनय किया है। रेवती, श्रद्धा आर्य, नासीर ने अपने कार्य के साथ न्याय किया है। सब कुछ मिलाकर फिल्म को देखा जा सकता है अगर आप इस विषय के अनकहे दर्द को झेलना चाहते है तो। और हाँ फिल्म को देखने के बाद अपनी प्रतिक्रिया लिखना मत भुलना।

बुधवार, मार्च 07, 2007

विश्व कप क्रिकेट का कार्यक्रम एवं स्वरूप

वेस्टइंडीज़ में हो रहे क्रिकेट महासंग्राम 2007 में 16 टीमें हिस्सा ले रही है। इन 16 टीमों को चार-चार के चार ग्रुप में बाँटा गया है। इस बार के विश्व कप में ग्रुप का निर्धारण करते समय पिछले साल विश्व कप के कार्यक्रमों की घोषणा के समय की आईसीसी रैंकिंग के आधार पर टीमों को वरीयता दी गई है।

ग्रुप ए

ऑस्ट्रेलिया (1)
दक्षिण अफ़्रीका (5)
स्कॉटलैंड (12)
हौलेन्ड (16)

ग्रुप बी

श्रीलंका (2)
भारत (8)
बांग्लादेश (11)
बरमूडा (15)

ग्रुप सी

न्यूज़ीलैंड (3)
इंग्लैंड (7)
कीनिया (10)
कनाडा (14)

ग्रुप डी

पाकिस्तान (4)
वेस्टइंडीज़ (6)
ज़िम्बाब्वे (9)
आयरलैंड (13)

(कोष्टक मे दी गई टीम रैकिक अप्रैल 2005 मे आईसीसी द्रारा जारी)


11 मार्च: उदघाटन समारोह

ग्रुप मैच

13 मार्च: ग्रुप डी- वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान (जमैका)
14 मार्च: ग्रुप ए- ऑस्ट्रेलिया और स्कॉटलैंड ( सेंट किट्स)

14 मार्च: ग्रुप सी- कीनिया और कनाडा (सेंट लूसिया)
15 मार्च: ग्रुप बी- श्रीलंका और बरमूडा (त्रिनिडाड)
15 मार्च: ग्रुप डी- ज़िम्बाब्वे और आयरलैंड (जमैका)
16 मार्च: ग्रुप ए- दक्षिण अफ़्रीका और हौलेन्ड (सेंट किट्स)
16 मार्च: ग्रुप सी- इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड (सेंट लूसिया)
17 मार्च: ग्रुप बी- भारत बांग्लादेश (त्रिनिडाड)
17 मार्च: ग्रुप डी- पाकिस्तान और आयरलैंड (जमैका)
18 मार्च: ग्रुप ए- ऑस्ट्रेलिया और हौलेन्ड (सेंट किट्स)
18 मार्च: ग्रुप सी- इंग्लैंड और कनाडा (सेंट लूसिया)
19 मार्च: ग्रुप बी- भारत और बरमूडा (त्रिनिडाड)
19 मार्च: ग्रुप डी- वेस्टइंडीज़ और ज़िम्बाब्वे (जमैका)

20 मार्च: ग्रुप ए- दक्षिण अफ़्रीका और स्कॉटलैंड (सेंट किट्स)
20 मार्च: ग्रुप सी- न्यूज़ीलैंड और कीनिया (सेंट लूसिया)
21 मार्च: ग्रुप बी- श्रीलंका और बांग्लादेश (त्रिनिडाड)
21 मार्च: ग्रुप डी- ज़िम्बाब्वे और पाकिस्तान (जमैका)
22 मार्च: ग्रुप ए- स्कॉटलैंड और हौलेन्ड (सेंट किट्स)
22 मार्च: ग्रुप सी- न्यूज़ीलैंड और कनाडा (सेंट लूसिया)
23 मार्च: ग्रुप बी- भारत और श्रीलंका (त्रिनिडाड)
23 मार्च: ग्रुप डी- वेस्टइंडीज़ और आयरलैंड (जमैका)
24 मार्च: ग्रुप ए- ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका (सेंट किट्स)
24 मार्च: ग्रुप सी- इंग्लैंड और कीनिया (सेंट लूसिया)
25 मार्च: ग्रुप बी- बरमूडा और बांग्लादेश (त्रिनिडाड)


(ग्रुप ए बी और सी के मैच भारतीय समयानुसार साय 7:00 बजे तथा ग्रुप डी के मैच भारतीय समयानुसार साय 8:00 बजे प्रारम्भ होगे।)

सुपर-8

27 मार्च: एंटिगा- डी-2 और ए-1
28 मार्च: गयाना- ए-2 और बी-1
29 मार्च: एंटिगा- डी-2 और सी-1
30 मार्च: गयाना- डी-1 और सी-2
31 मार्च: एंटिगा- ए-1 और बी-2
01 अप्रैल: गयाना- डी-2 और बी-1
02 अप्रैल: एंटिगा- बी-2 और सी-1
03 अप्रैल: गयाना- डी-1 और ए-2
04 अप्रैल: एंटिगा- सी-2 और बी-1
07 अप्रैल: गयाना- बी-2 और ए-2
08 अप्रैल: एंटिगा- ए-1 और सी-2
09 अप्रैल: गयाना- डी-1 और सी-1
10 अप्रैल: ग्रेनाडा- डी-2 और ए-2
11 अप्रैल: बारबाडोस- सी-2 और बी-2
12 अप्रैल: ग्रेनाडा- बी-1 और सी-1
13 अप्रैल: बारबाडोस- ए-1 और डी-1
14 अप्रैल: ग्रेनाडा- ए-2 और सी-1
15 अप्रैल: बारबाडोस- बी-2 और डी-1
16 अप्रैल: ग्रेनाडा- ए-1 और बी-1
17 अप्रैल: बारबाडोस- ए-2 और सी-2
18 अप्रैल: ग्रेनाडा- डी-1 और बी-1
19 अप्रैल: बारबाडोस- डी-2 और बी-2
20 अप्रैल: ग्रेनाडा- बी-1 और सी-1
21 अप्रैल: बारबाडोस- डी-2 और सी-2

(अंकों के आधार पर चार शीर्ष टीमों को सेमी फ़ाइनल में जगह मिलेगी, सभी मैच भारतीय समयानुसार साय 8:00 बजे प्रारम्भ होगे।)

सेमी फ़ाइनल
24 अप्रैल: जमैका- दूसरी टीम और तीसरी टीम (भारतीय समयानुसार साय 8:15 बजे प्रारम्भ)
25 अप्रैल: सेंट लूसिया- पहली टीम और चौथी टीम (भारतीय समयानुसार साय 7:15 बजे प्रारम्भ)

फ़ाइनल
28 अप्रैल: बारबाडोस (पहले सेमी फ़ाइनल का विजेता और दूसरे सेमी फ़ाइनल का विजेता, भारतीय समयानुसार साय 7:15 बजे प्रारम्भ)

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ग्रुप मैचों में जीत के लिए टीम को दो अंक, टाई और मैच रद्द होने पर एक अंक मिलेगे । ग्रुप मैचों के बाद हर ग्रुप की दो शीर्ष टीमों को सुपर-8 में जगह मिलेगी । अगर दो टीमों को बराबर अंक मिले, तो टाई ब्रेकर के आधार पर फ़ैसला होगा। टाई ब्रेकर में टीमों के ज़्यादा मैच जीतने के औसत, रन को भी आधार बनाया जा सकता है।

ग्रुप मैचों में जीत के लिए टीम को दो अंक, टाई और मैच रद्द होने पर एक अंक मिलेगे । ग्रुप मैचों के बाद हर ग्रुप की दो शीर्ष टीमों को सुपर-8 में जगह मिलेगी । अगर दो टीमों को बराबर अंक मिले, तो टाई ब्रेकर के आधार पर फ़ैसला होगा। टाई ब्रेकर में शीर्ष टीम के निर्धारण के लिये टीम के ज़्यादा मैच जीतने के औसत, रन गति को भी आधार बनाया जा सकता है ।

सुपर-8 में कुल 24 मैच खेले जाएँगे । सुपर-8 में पहुँचने वाली टीम ग्रुप मैच में जिस टीम से पहले लड चुकी है, उसे छोड़कर बाक़ी सभी टीमों से मैच खेलेगी । अर्थात सुपर-8 मे प्रत्येक टीम को 6 अन्य टीमो से लडना होगा । सुपर-8 में पहुँचने वाली टीमों को ग्रुप मैचों में जितने अंक मिले हैं, वो सुपर-8 में भी उनके खाते में जुड़ जाएँगे । सुपर-8 की चार शीर्ष टीमें सेमी फ़ाइनल में पहुँचेंगी। सुपर-8 में वरीयता ग्रुप मैचों की तरह ही दी गई है । सुपर-8 में पहुँचने वाली टीमों को ग्रुप मैचों में जितने अंक मिले हैं, वो सुपर-8 में भी उनके खाते में जुड़ जाएँगे। सुपर-8 की चार शीर्ष टीमें सेमी फ़ाइनल में पहुँचेंगी। इन चार शीर्ष टीमों मे से दो टीमे फाइनल मे पहुचेगी।






शनिवार, मार्च 03, 2007

नोटपेड का डायरी कि तरह उपयोग

इन्टरनेट के मायाजाल मे उल-जलुल हरकते करते करते मुझे एक नये ब्रहम ज्ञान की प्राप्ति हुई। नोटपेड का डायरी कि तरह उपयोग करने का तरीका । मुझे काफी अच्छा लगा। कौन इस के जन्मदाता है ये तो पता नही चला परन्तु मैने सोचा शायद हमारे कुछ मित्रो को इस के बारे मे जानकारी न हो। अत: अपने ब्लाग मे इसका उल्लेख करना उचित समझा। तो महाशय तैयार हो जाये ब्रहम ज्ञान का रसपान करने के लिये।

  1. ये तो आप लोगो को पता ही होगा कि नोटपेड को कैसे खोलते है। नही पता तो घबराने की कोई आवश्यकता नही है, हम बताते है। स्ट्रार्ट पर किल्लिक करे, प्रोग्राम मे जाये, असशिरीज मे किल्लिक करे। नोटपेड दिखाई दिया ना तो बिना रूके किल्लिक कर दे।हा तो खुल गया आपका का कोरा कागज ।
  2. अब लिखे .LOG (लिखने के लिये बडे अक्षरो का प्रयोग करे)लिखना शुरू कि लाइन मे ही है। एन्टर दबा दे।
  3. अब वक्त है इस पोथी को सहजने का अर्थात सेव करने का। सेव कर दे अपनी मन मुताबिक स्थान पर मन मुताबिक नाम से जैसे कि डांयरी, मेरी डांयरी इत्यादि ।
  4. अब अपनी सेव की पोथी को खोले। देखा महाशय चम्तकार आपकी पोथी मे आपके कम्प्युटर की घडी के मुताबिक समय और तिथी आ गई है। लिखिये अपनी गाथा और सेव कर दे। जब आप अगली बार पोथी खोलेगे तो एक लाइन छोड कर नयी समय और तिथी आ जायेगी।

तो देर किस बात की है आजमाइये इसे।

शुक्रवार, फ़रवरी 23, 2007

मेरा गाँव

मेरा गाँव, गाँव का नाम सुनते ही न जाने कितनी ही स्मृतिया एक के बाद एक मानस पटल पर क्रिड्रा करने लगती है। पुराना मकान, सीढीनुमा हरे भरे खेत, चीड, देवदार, साल, सागौन के पेडो से भरे जंगल और प्यारा सा बचपन। बहुत पहले पिताजी हमे शहर ले आये थे। तब मे शायद 3 या 4 साल का रहा हूँगा। पिताजी को सरकारी आवास मिला हुआ था। उसी मे बचपन के दूसरे चरण का प्रारम्भ हुआ। गाँव का बचपन धूमिल होता गया और शहरी बचपन नये पायदान पर।

मै 15 वषौ के बाद गाँव गया था, वो भी इजा के पिताजी को बार बार कहने पर कि देख तो आइये हमारा मकान कैसा है। खेतीहर जमीन हमने जिन लोगौ को दी है,वो ढंग से खेती करते है भी कि नही। जमीन बंजर तो नही छोडी हुई है। मकान कही से टूटा तो नही है। तब मै इजा के गाँव से जुडे इस प्रेम को नही समझ पाता था।

गाँव आकर पुरानी यादे ताजा हो गयी,गाँव की चढाई मे बच्चो का समूह,कंधे पर बस्ता,हाथ मे कमेट की दवात,जेब मे लाइन खीचने का धागा लिये स्कूल जाते थे,आज भी जाते है। फर्क है तो ये कि पहले गाँव वाले लडकियो को स्कूल नही भेजते थे, अब भेजते है। मेरे समय मे स्कूल कि इमारत कच्ची थी, अब पक्की हो गयी है। पुराने समय मे अगर किसी गाँव मे या किसी आदमी को कोई संदेश या न्यौत देना होता था तो उस आदमी को बता दिया जाता था जो उस गाँव के संर्पक मे हो या उस आदमी का परिचित हो। गाँव के लोग इसी तरह से संदेशो का आदान प्रदान करते थे। अब तो एक छोटा सा पोस्ट आफिस भी है। फोन इत्यादि की सुविधाये भी पहुचने लगी है। दवाई इत्यादि के लिये पहले 20 किलोमीटर दूर जाना पडता था,पर अब छोटे से सरकारी अस्पताल के खुल जाने से छोटी छोटी बीमारियो का ईलाज वही पर हो जाता है।

गाँव की खेती के तो क्या कहने। जंगल से खेतो की खाद के लिये पतेल, पिरोउ के जाल गोठ मे संचित किये जाते है और बाद मे गोबर के साथ डालो मे भरकर खेत मे डाल दिये थे। अब भी वही प्रथा चली आ रही है। गेंहूँ,जौ,धान,मडुआ,काकुनी,गहत,भट्र की खेती उसी तरह से होती है। खाद वही पुरानी और पानी के लिये देवराज इंन्द्र पर निर्भरता। बिना खाद पानी के जमीन से आशा भी क्या की जा सकती है। कमरतोड मेहनत और फल वही, मुटठी भर अनाज। पर मजाल है गाँव वाले मेहनत करना छोड दे।

पिताजी कहते थे कि पहले गाँव मे पहुचने के लिए लगभग 30 या 35 किलोमीटर पैदल चलना पडता था पर अब तो मोटर मार्ग बन गया है। कई टैक्सी, जीपे एव सरकारी बसे रोजाना आती जाती है। गाँव से अब मु्श्किल से आधे किलोमीटर की चढाई चढनी पडती है। मोटर मार्ग के कारण बहुत सी सुविधाये मिल गयी है।आजकल तो ये हालात है की ह्लद्रानी\अल्मोडे से खरीदे समान मे एव स्थानीय बाजार से खरीदे समान मे 2 या 3 प्रतिशत का अंतर होता है। गाँव के लोग रात्रि मे उजाले के मिट्रटी के तेल की ढिबरी का प्रयोग करते थे। अब तो गाँव मे बिजली पहुच गयी है।

लगभग 15 वर्षो मे छोटी मोटी सुविधाऔ के बावजूद मेरा गाँव वैसा ही है जैसा मैने छोडते समय देखा था। गाँव का मूल स्वरूव एव चरित्र बिल्कुल भी नही बदला है। तीज त्यौहारो और धार्मिक मान्यताऔ की उमंग वही पुरानी है। हुडुक, ढोल, मशीनबाज जैसे ठेठ वाद्ययन्तो की थाप पर रात भर झवाड और लोक गीत के बोल गुजते है। आज भी होली मे होलियारो की टोलिया हर घर के आगन मे जाकर होली गाती है, आशिष देती है। होलियारो के पीछे पीछे होता है बच्चो का समूह जो हर घर मे बटने वाले गुड की डलिया इकटृठा करते है। क्या मिठास होती है उस गुड मे। दिवाली पर सभी लोग एक दूसरे के घर जाकर बधाईया देते है। घूघूती, हरेला, मकर संक्राती पहले की भाँती मनाये जाते है।

कहते है जब कोई परिवर्तन होता है तो उसके साथ साथ उस से जुडी अन्य चीजो मे भी छोटे मोटे परिवर्तन होते है। कुछ अच्छे कुछ बुरे। इतने अच्छे परिवर्तनो के साथ कुछ बुरे परिवर्तन भी हुए है। पहले शराब को कोई जानता भी नही था, मगर अब शराब गाँव की जिन्दगी मे कडवाहट घोलती जा रही है। पाश्चातय संस्कृति की हवा से मेरा गाँव भी अछूता नही रहा है। समय एवं परिस्थितियो के साथ गाँव के संदर्भ एवं परिभाषाए अवश्य बदल जाती है पर गाँव कभी नही मरता, वह आज भी जिन्दा है मेरे अन्दर....स्टिल एलाइव। मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरा गाँव खूब फले फूले और तरक्की करे।

गुरुवार, फ़रवरी 22, 2007

क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया


विश्वकप के लिये भारतीय चयनकर्ताओ ने 15 रणबांकुरो को चुन लिया है। वेस्टइंडीज मे होने वाले क्रिकेट महासंग्राम मे टीम इंडिया के विभिन्न खिलाडियो से भारतीय प्रशंसको को बहुत सी उम्मीदे है। क्या भारतीय रणबांकुरे देश के करोडो लोगो की उम्मीदो पर खरे उतर पायेगे ? या हर बार कि तरह फुस, यह तो भविष्य ही बतायेगा। आइये नजर डालते है 15 रणबांकुरो पर और उनसे जुडी भारतीय प्रशंसको कि उम्मीदे :


राहुल द्रविड: मिस्टर वाल, मिस्टर कूल जैसे संबोधनो से जडीत क्रिकेटर इस बार भारतीय सेना के सेनापती है। आपने हाट कप्तानी करनी है एव बल्ले का भी बखुबी उपयोग करना है।

सचिन तेद्रुलकर: लिटिल मास्टर आपने पिछली बार की तरह इस बार भी रनो कि झडी लगानी है। अगर आप नही चल पाये तो समझो किले का एक द्रार टूट चुका है और दुश्मन कभी भी हावी हो सकता है।

सौरव गागुली: बंगाल टाइगर से लोगो को उम्मीद है कि वो दहाडे। अगर वो दहाडेगे तभी तो विपक्षी टीम मे दबाव बढेगा। आपको दिखाना है कि शेर, शेर होता चाहे वह जंगल मे रहे या कही और।

वीरेद्र सहवाग: मुल्तान के सुल्तान पर चयनकर्ताओ ने जो दाव लगाया है आशा है वो इसे विफल नही होने देगे। आप चाहे किसी भी क्रम मे बल्लेबाजी करे पर करे अपने ही अंदाज मे।

महेद्र सिह धोनी: झारखंड के इस सपूत मे किसी भी गेदबाज को मैदान के बाहर का रास्ता दिखाने का दम है पर जरूरत है तो थोडा कूल रहने की। गर्म खाना खाने से हमेशा मुह जलता है, थोडा ठंडा कर खाये।

युवराज सिह: फील्डिग मे जान लगा देनी है पर बेवजाह मे ही कूदना-फादना नही है, क्योकि काफी समय अनफिट रहने के बाद वापसी हुई है। आपने अभी काफी क्रिकेट खेलनी है।

राबिन उथप्पा: दमदार शरीर होने के साथ साथ आपको दमदार शाट लगाते हुए देखना अच्छा लगता है पर इस फार्म को बेरोकटोक जारी रखना।

दिनेश कार्तिक: मैच मे बल्लेबाजी करने का मौका मिले या न मिले पर कूद - फाद कर रन जरूर बचाने है ताकि 15-20 रन कि बढत मिल सके।

अनिल कुंबले: जंबो आपको गेदबाजी के साथ-साथ "रनिग बिटवीन द विकेट" पर भी ध्यान देना है क्योकि हो सकता है आपको निचले क्रम मे बल्लेबाजी करने का मौका भी मिल सकता है।

हरभजन सिह: भज्जी आपको गेदबाजी पर काफी ध्यान देना है क्योकि हो सकता है किसी मैच मे आप अकेले ही स्पिनर हो। पर आपने अपने धर्मगुरू के कथन "सवा लाख से एक लडाउ ता गुरू गोविंद सिंह नाम कहाउ" को चरिर्थाथ करना है।

जहीर खान: टीम से बाहर होकर अच्छे प्रदर्शन के जरिये टीम मे आना कोई आप से सीखे। गेदबाजी के साथ-साथ सही लाइन लेथ पर भी ध्यान देना होगा ।

मुनाफ पटेल: चयनकर्ताओ को इस गेदबाज पर काफी भरोसा है। अपनी गेदबाजी की धार को कायम रख कर उनके भरोसे को कायम रखना।

इरफान पठान: कृपया अपनी गेदबाजी पर ध्यान दे क्योकि घातक गेदबाजी के जरिये ही आप टीम इंडिया को जीत दिला सकते है।

अजित अगारकर: टीम को ब्रेकथुरू दिलाना आपको भली - भाती आता है, पर रनो पर हाथ ढिला रखना और घातक गेदबाजी करना

श्रीसंत: माना कि आप अच्छे डांसर है पर आप टीम मे गेदबाजी के लिये रखे गये है। कृपया अपना होमवर्क पूरा कर अपनी गेदबाजी पर ध्यान दे ।


विश्व कप के लिए चुनी गई भारतीय टीम
राहुल द्रविड़ (कप्तान), सचिन तेंदुलकर (उप-कप्तान), वीरेंदर सहवाग, सौरभ गाँगुली, युवराज सिंह, महेंद्र सिंह धोनी, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, रॉबिन उथप्पा, दिनेश कार्तिक, ज़हीर ख़ान, अजित अगरकर, मुनाफ़ पटेल, श्रीसंत, इरफ़ान पठान.

बुधवार, फ़रवरी 21, 2007

क्या ईश्वर देखा है तुमने ?


कहते है जिसे ईश्वर
क्या देखा है तुमने
जिसने सारा संसार बनाया
क्या देखा है तुमने ।।

संसार में इंसान आया
इंसान मे शैतान समाया
शैतान के कारण बनता दु:ख
और दु:ख मे छिपता सुख ।।

कैसी है ये भाग्य विडम्बना
ईश्वर से इंसान बना
दु:खो एव सुखो के मेल से
एक नया संसार बना ।।

दु:ख और सुख है
एक भंवर की भांती
जिसमे फस गये तो
फसे रहते दिन राती ।।

न फसे तो सिर्फ शून्य
शून्य मे फिर ईश्वर
कहते है और जिसे परमेश्वर
क्या देखा है तुमने ।।

पर बंधी है एक विश्वास की डोरी
रचना की जिसने इस सृष्टि की
वह ईश्वर है, वह ईश्वर है
न देखा है तुमने न देखा है मैने ।।

सोमवार, जनवरी 08, 2007

नववर्ष का स्वागत

सभी भारतीयो को नववर्ष की हार्दीक शुभकामनाएँ । भारतवर्ष जिसे लोग आजकल "इंडिया" कह कर संबोधित करते है, मे जिस धूमधाम एवं महोत्सव के रूप मे नववर्ष मनाया जाता है, उसे देखकर मुझे ऐसा आभास होता है कि वह समय अब ज्यादा दूर नही जब हम पश्चिमी देशो के बृहद संस्करण मे पूरी तरह तब्दील हो जायेगे। वैसे तो अंग्रेजीयत के प्रभाव से हमारा देश अमेरिका व ब्रिटेन जैसा ही लगता है पर कुछ तो बात थी जो हमे इन सब से अलग रखती थी। दिल मे कुछ भंम्र था पर नववर्ष की महामाया मे इस बार वह भी टूट गया।

नववर्ष के उपलक्ष्य मे कही "डिस्को थैक" तो कही पर "कैबरे" का आयोजन किया जा रहा था। पबो, रेस्टोरेंटो, होटलो ने इस अवसर पर कई रंगारंग कार्यक्रमो का आयोजन किया था। इन आयोजनो को पूर्ण करने मे किसी प्रकार की कमी नही छोडी जा रही थी। विघुत छटा से लेकर पुष्प सजावट तक की गई तैयारिया अवर्णनीय थी। मेरी मस्तिक को यह बात हिलोरे मार रही थी कि जिस शहर मे बिजली की समस्या का रोज का रोना रहता है, मे अचानक से क्या चमत्कार हो गया कि बिजली का उत्पादन एकदम से बढ गया।

मेरे सहमित्रो ने भी ऐसे ही एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। मुझे भी आयोजन मे उपस्थित होकर कार्यक्रम कि शोभा बढाने के लिये आमन्त्रित किया गया था। जब मे कार्यक्रम मे पहुचा तो हर एक मेहमान पूर्ण जोश के साथ अपने-अपने कार्यो मे लीन थे। काम के प्रति इतनी लग्न मैने आज तक नही देखी थी। मेरे एक मित्र ने विभिन्न प्रकार की मदिरा से युक्त एक जाम से मेरा स्वागत किया और नृत्य के लिये प्रेरित किया। नृत्य तो मेरे लिये माउन्ट एवरेष्ट चढने से भी कठिन कार्य के समान है अत: मैने सहमित्रो का नृत्य देखना ही उचित समझा। कुछ किशोर नाम मात्र के पहनी किशोरियो के साथ नृत्य का आन्नद लेने के दौरान चिपकने का भी प्रयास कर रहे थे। मेरी समझ मे नही आ रहा था कि बाहर इतनी कडाके की ठंड है और ये किशोरियो गर्म क्यो है। शायद बाद मे तो इतने कपडे भी बोझ लगने लगेगे इन्हे। मंच पर विभिन्न प्रकार के पाँप और फिल्मी गानो का नान-स्टाप कार्यक्रम चल रहा था। बीडी जलइले... और दिल्ली की सर्दी... जैसे गानो की झडी लगी थी।

मैने भी 1-2 घंटा कार्यक्रम का पूर्ण आन्नद लिया। पर मुझे जल्द ही अहसास हुआ कि अगर मैं इस माहौल मे और ज्यादा देर रहा तो घर पहुचना मेरे लिये दूभर हो जायेगा। अत: मैने कार्यक्रम से निकलने मे ही भलाई समझी। घर पहुचने पर कब निद्रा ने मुझे अपने आँचल मे ढका पता ही नही चला। आँख खुली तो मस्तिक मे हल्का सा दर्द सा महसूस हो रहा था और बाहर सूरज चाचू मुस्कुरा रहे थे। नववर्ष मे उनका प्रथम दिन जो था।

शनिवार, दिसंबर 30, 2006

आशावादिता

आशावादिता वह शक्ति है जो मनुष्य को किसी भी कठिनाई को यर्थाथपूर्वक रवैये से हल करने मे मदद करती है। इस शक्ति से हम कठिनाई को हल करने का ऐसा रास्ता चुनते है जो विकासपूर्वक होने के साथ-साथ हमे सक्रियता एवमं पूर्ण दक्षता की और लेकर जाता है। आशावादिता न सिर्फ किसी मनुष्य के जीवन मे खुशहाली और सफलता लेकर आती है, बल्कि वह संबंधित शक्स को एक ऐसे चुंबक मे तब्दील कर देती है, जो सफलता को स्वयं अपनी और खीच लेता है। निराशा को दूर भगाने के लिये आशावादिता एक ऐसी तकनीक प्रदान करता है, जो नैराश्य को खत्म कर आत्मविश्वास लाती है। इसके बलबूते व्यक्तिगत उदेश्यो और उपलब्धियो को अधिक से अधिक हासिल किया जा सकता है।

आशावादिता एक बेहतर मूल्यवान नजरिया है जिसे हमे समय के साथ साथ और विकसित करते रहना चाहिए। हम जहाँ भी जाते है हमारा नजरिया हमारे साथ साथ जाता है और हम उसी के चश्मे से दुनिया को देखते है। हमारा नजरिया ही तो है डुबते सूरज को दो तरह से परिभाषित करता है, निराशावादी मनुष्य कहता है कि सूरज डूब रहा है, रात होने वाली है जबकि आशावादी मनुष्य कहता है कि सूरज डूब रहा है और कल फिर से उगेगा अर्थात कल हम एक बार फिर से संर्घष करने के तैयार होगे ।
जींवन की कठिनाईयो और मुश्किलो के सामने घुटने टेक देना तो सबसे आसान काम है, लेकिन उनका डट कर मुकाबला करने के लिये आशावादिता से पूर्ण बहुत बडे कलेजे की जरूरत होती है। आशा से भरपूर नजरिये से आप स्वयं को दुनियावालो मे सक्षम व्यक्ति के तौर देखते है। आपके साथ आशावादिता की चिंगारी जलेगी जो न सिर्फ आपको जीवन के अंधेरेयुक्त रास्तो मे मार्गदर्शन करेगी बल्कि आपको रिस्क लेने को प्रेरित करेगी। आप हवा के रूख को तो नही मोड सकते लेकिन अपने परवाज को इस तरह से व्यवस्थित जरूर कर सकते है कि आसानी से अपनी मंजील पा सके।

मंगलवार, दिसंबर 19, 2006

संर्घष आवश्यक है।

जिन्दगी एक रहगुजर की तरह है और हम मुसाफिर, जिसके रास्ते मे अनेक रंग देखने को मिलते है। कभी खुशी का उजाला तो कभी गम का अंधेरा। जब हमारा गमो से पाला पडता है तो हमे चारो तरफ निराशा के बादल दिखाई देने लगते है और हम घबरा जाते है। पर निराशा के बादल गहरे है तो क्या हुआ। जिस तरह रात चाहे कितनी भी काली क्यो न हो सवेरा तो होता ही है। उसी तरह से निराशा के बादल भी छट जायेगे। किसी मुश्किल को देखकर भागने से या हाथ पर हाथ रखकर बैठने से मुश्किल हल नही हो जाती। किसी भी मुश्किल से डरे नही बल्कि ये सोचे की मुश्किल से मुकाबला कैसे करे। कैसे हम दुःख के पलो मे भी खुशियो के कुछ पल हासिल कर सकते है।
कुछ लोग सिर्फ सपने देखते है, दूसरो के सहारे जीते है, पंगु बनकर संघर्ष करना नही चाहते है। अपने पैरो पर कभी नही चलते, न ही पैरो पर चलना सीखना चाहते है। दरअसल अपने पैरो पर चलना बहुत कठिन होता है, बहुत सहना पडता है। जिन्दगी खुशिया उन्ही के आगे फैलाती है जो आखरी सांस तक लडना जानते है। जो लोग जिन्दगी के किसी पडाव को ही अपनी मंजील समझ लेते है उन्हे वह नही मिल पाता जिसके वो असली हकदार होते है। अचानक कुछ नही घटता, जो होता है धीरे धीरे होता रहता है, जिस दिन पूरी तरह होता है उस दिन हम उसका होना जान पाते है।

अतः जिन्दगी मे संर्घष आवश्यक है। हमे जिन्दगी के इस संर्घष मे विजेता बनना है। प्रयास करते रहने है। प्रयास हमे सफलता के लिये त्याग करने तथा अपनी गलतियो को सुधारने की प्रेरणा देता है। उतार चढाव तो आते रहते है, और शुरूआत.....वह तो हम सभी को करनी होती है आर करते भी है। हम सब सुबह जागते है तो वह नए सिरे से उस दिन की शुरूआत होती है।

दिल्ली का जीवन

भागदौड वाली इस जीवनशैली मे हर शक्स एक अनजानी सी दौड में अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड रहा है। मैं भी अपनो से दूर ऐसे ही किसी अनजाने लक्ष्य के पीछे दौड रहा हूँ। क्या पाना है?, कैसे पाना है?,कुछ पता नही। क्या आपने किसी कुत्ते को अनजाने वाहन के पीछे भागते देखा है? सवाल यह नही कि वो क्यो भाग रहा है? अगर वह उस वाहन को पकड भी लेगा तो करेगा क्या? कभी अपने बारे मे सोचता हूँ तो "मुझे लगे रहो मुन्ना भाई" फिल्म मे विद्या बालान द्वारा कही लाईने याद आ जाती है :
शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?
पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है
भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?
सीरियल्स् के किरदारो का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?
अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?
108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं?
इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं,
लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.
मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है,
लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?
कब डूबते हुए सुरज को देखा था, याद है?
कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?
तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?
5 और 6 लाईने मुझ पर चरितार्थ नही होती है, क्योकि मैं अपने माता पिता से बहुत प्यार करता हूँ और दूरदर्शन देखना तो न के बराबर। मेरे को तो महानगरीय जींवन एक प्रोगाम की तरह लगता है, जिसमे न जाने कितनी प्रतिबंधिताये ( conditions )जैसे कि if, if else, while, do while और न जाने कितनी,देखने को मिलती है स्नातक तक तो सारी याद थी, पर अब नही हैं। छोटे शहरो मे आदमी को मिले एक अवकाश वह न जाने कितने सुखद अनुभव को समेटता हैं। जबकि दिल्ली जैसे शहरो मे उस अवकाश का पता ही नही चलता। कब सुबह, कब दोपहर और कब शाम हो जाती है पता ही नही लगता हैं। यहा तो दिल करता है कि काश दिन मे 36 या 48 घंटे होते तो कितना अच्छा होता। छोटे शहरो मे लोग जिन्दगी जीते है, जबकि महानगरो मे जिन्दगी काटी जाती है ।

जब मैं रूडकी मे जाँब करता था तो रविवार या किसी अन्य अवकाश का पूर्ण उपयोग करता था। उठाई अपनी धन्नो और चल दिये दोस्तो से मिलने। रास्ते मे पडने वाले मुख्य बाजार (Civil Lines)या कन्या विघालयो, महाविघालयो से गुजरने पर चकसुख का परमान्नंद लेने से कभी नही चुकता था। अगर साथ मे मित्र मंडली हो तो पूछो मत। दिल मे एक आस रहती थी कि कभी न कभी तो ईश्वर की कृपा से अपने अंधियारे आंगन मे भी उजाला होगा। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक का परिक्रमण करने मे मुश्किल से एक घंटा लगता था। दिल्ली मे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुचने मे कितने पापड बेलने पडते है, इस को एक दिल्लीवासी ही समझ सकता है। ऐसे मे अवकाश का क्या खाक उपयोग करेगे। अत: सोने (sleep) के अलावा मुझे तो अवकाश का पूर्ण उपयोग करने का कोई दूसरा उपाय नही सुझता।

खैर जैसे भी है जीवन तो जीना ही पडता है। पर कोशिश यही करता हूँ कि इस कागजी फूल जैसी बनावटी जींवन का हिस्सा ना बनू।

शुक्रवार, दिसंबर 08, 2006

खुद से प्रेम

खुद से प्रेम करना सीखे। खुद को स्वीकारे। कोई भी मनुष्य पूर्ण नही होता। हर एक इंसान मे कई अच्छे बुरे गुण समाहित होते है। हमे अपने अच्छे गुणो का निरंतर विकास और द्रुगुणो का मिटाने का प्रयास करना चाहिये। जब तक हम खुद को अपने सम्मुख जैसे है, वैसे नही स्वीकारेगे तब तक हम अपने आप मे वो बदलाव नही ला पायेगे जो हम लाना चाहते है। बदलाव तभी संभव भी हो पायेगा जब हमारी अपनी नजरो मे हमारी तस्वीर एकदम साफ होगी। फिर चाहे दूसरे कुछ भी सोचे। हम क्या है, यह हमारे स्वयं द्रारा तय होना चाहिए। इस संबध मे हम ही है जो दूसरो से ज्यादा जानते है न कि दूसरो से प्रमाण पत्र की चाह मे अपनी स्वयं की कोई दृष्टि ही विकसित कर पाये।
यदि किसी ने भी आपके लिए कुछ किया है, उनके आप एहसानमंद रहे और उनके लिए सदैव आगे बढकर कुछ करने के लिए तैयार रहे। लेकिन उन एहसानो के बदले मे आपके जींवन की दिशा उनके द्रारा तय नही होनी चाहिए। आप अपने जींवन मे किसी को दखल देने का कितना अधिकार है, यह आप स्वयं तय करोगे।अपनी एक सोच व्यक्तित्व बनाये, अपनी सोच को परिपक्व रूप दे क्योकि ये जिन्दगी तुम्हारी है।

शनिवार, दिसंबर 02, 2006

सफलता की राह

जीवन के इस पथ पर
क्या खोना क्या पाना है
जीवन एक संघर्ष है
इसी सोच मे कदम बढाना है।

यदि हम कदम नही बढायेगे
तो उसी जगह मै रह जायेगे
हम आगे नही बढ पायेगे
जीवन मे सिर्फ आगे बढो।

आगे अगर रूक गये
मुश्किलो को देख कर
बढ नही पायेगे हम
लेगी कठनाईया हमे घेर।

जाना है हमे बहुत आगे
पानी है हमे सफलता
जो मिलेगी करके संर्घष
क्योकि जीवन एक संर्घष है।

प्रथम प्रयास

क्या तुमने कभी जिन्दगी को परछाइयो के पीछे भागते देखा है। मैने देखा है और मैं कई बार इन परछाइयो मे खो भी गया हूँ। लेकिन जब भी उजाला हुआ मैने अपने आप को सदा तन्हा और अकेला पाया। यह सिलसिला अगर यही खत्म हो तो कोई बात नही थी पर यह हर रात शुरू होता है और दिन के उजाले के साथ खत्म हो जाता है। कभी दिन का उजाला खतरनाक तथा भयावह सपनो से निजात दिलाता है तो कभी हसीन सपनो के लिये काल का ग्रास बन जाता है। मेरी समझ मे नही आता मे किसका शुकिया अदा करू, उस रात का जो मुझे सच्चाई से दूर हसीन सपने दिखाती है या उस सुबह के उस उजाले का जो मुझे सच्चाई से वाकिफ कराती है।

आप भी सोच रहे होगे ये चिरकुट की तरह बाते क्यो कर रहा है। दोस्तो ऐसा तो होगा ही नये नये लेखक जो बने है। लिखने की ये प्रेरणा के स्रोत भी आप लोग ही है। आप लोग लिखते ही इतना अच्छा हो कि मै बयान नही कर सकता। इसलिये मैने सोचा क्यो ना मै भी प्रयास करू। मै इसमे कहा तक सफल और असफल हुआ हूँ ये तो आप लोग ही मुझे बतायेगे। आशा करता हूँ कि आप सब लोगो के आर्शिवाद से मै अपनी मंजिल जरूर पा सकूगाँ।

आपका अपना

गिरीश