रविवार, फ़रवरी 14, 2010

मैजिकल सॉफ्टवेयर "फोटोस्केचर"

इन्टरनेट के मायाजाल मे उल-जलुल हरकते करते रहने से कुछ न कुछ तो अवश्य ज्ञान की प्राप्ति होती ही रहती है। इस कारण जब भी समय मिलता है निकल पडता हूँ इस तरह के ज्ञान कि खोज मे।

दोस्तों हम जानते हैं कि तुम्हारे अंदर भी एक कलाकार मौजूद है, जो कभी-कभी तुम्हें कैनवास पर हाथ आजमाने के लिए उकसाता रहता है। पहाडों के मनमोहक दृश्य हर किसी का मन मोह लेते हैं। तुम्हारी भी इच्छा होती होगी कि काश, मैं इस दृश्य को कैनवास पर उकेर पाता । आज एक ऐसे सॉफ्टवेयर के बारे में, जो आपकी पेंटर बनने की इच्छा चुटकियों में पूरी कर देगा। न तो इसमें ब्रश की जरूरत है और न ही कैनवास की। मुझे तो यह सॉफ्टवेयर बहुत हि काम का लगा। इससे आप को भी कुछ लाभ मिले, अत: अपने ब्लाग मे इसका उल्लेख करना उचित समझा। तो महाशय तैयार हो जाये ब्रहम ज्ञान का रसपान करने के लिये।

इस मैजिक सॉफ्टवेयर का नाम है फोटोस्केचर। फोटोस्केचर के लिए आप लोगो को कोई कीमत भी नहीं चुकानी है। फोटोस्केचर, पलक झपकते ही डिजिटल फोटो को आर्ट में तब्दील कर देता है। अगर आप किसी घोडे या किसी सुंदर सीनरी की पेंटिग बनाना चाहते हो, तो फोटोस्केचर फटाफट उसे स्केच में बदल देगा। इस मैजिकल सॉफ्टवेयर के जनक है महाशय “डेविड थोइरान” ।

इसके अलावा, आप इस सॉफ्टवेयर की मदद से अपने दोस्तों के फोटोग्राफ्स को स्केच में बदल कर उनके जन्मदिन पर गिफ्ट भी कर सकते हो। इसकी मदद से आप लोगो को बर्थडे कार्ड, ग्रीटिंग स्टेशनरी या फिर किसी भी आर्ट का प्रिंट लेकर उसे अपने कमरे की दीवार पर भी टांग भी सकते हो। फोटोस्केचर में कई सारे स्केच, पेन और इंक ड्राइंग जैसे ऑप्शन भी दिए गए हैं। फोटोशॉप की तरह फोटोस्केचर में भी किसी भी फोटो का फाइन किया जा सकता है, उसका स्केच तैयार किया जा सकता है। और भी बहुत कुछ है इस सॉफ्टवेयर में । इसी बात को तो कहते हैं हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए। फोटोस्केचर को आप http://www.fotosketcher.com/ मुफ्त से डाउनलोड कर सकते हो। इस सॉफ्टवेयर के विषय मे और अधिक जानकारी आप यहा से पा सकते है।

तो देर किस बात की है आजमाइये इसे और बन जाइये पेन्टर और स्केचर ।

"माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट"


वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 को हुए आतंकी हमले के बाद दुनियाभर में एक समुदाय के प्रति बदली सोच को लेकर अब तक आधा दर्जन के करीब फिल्में बन चुकी हैं। 9/11 हमले के बाद दुनिया के कई देशों में मुस्लिम समुदाय के प्रति यकायक बदली सोच पर करण ने एक ऐसी प्रेम कहानी का सहारा लिया है जो आम बॉलिवुड फिल्मों से कोसों दूर है। करण की इस फिल्म में एक ऐसे युवक का अपना खोया हुआ प्यार फिर से हासिल करने का सफर दिखाया गया है जो आम इंसानों से हटकर है। फिल्म में रिजवान द्वारा बार - बार बोला गया डायलॉग "माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट" हॉल में बैठे दर्शक के दिल को छूता है। दरअसल , करण अपनी इस फिल्म के माध्यम से दुनिया को शायद यही मेसेज देना चाहते हैं कि ' हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है। ' करण जौहर अपनी प्रेम मुहब्बत, रोने धोने वाले फार्मूले से मुक्ति की छटपटाहट से बाहर आने की कोशिश कर रहे है। उन्हें हमारे हौसले की जरूरत है। माय नेम इज खान के जरिए वे यह बताना चाह रहे हैं कि दुनिया मे सिर्फ दो ही किस्म के इंसान होते हैं, अच्छे और बुरे।

यह फिल्म हमारे भीतर छुपे शैतान को पत्थर मारने में हमारी मदद करती है जहां बाल ठाकरे या बजरंग दलियों ने यह मान लिया है कि खान सरनेम का अर्थ ही धोखेबाज और आतंकवादी होना है। यह एसपर्जर सिंड्रोम से पीडित रिजवान खान की कहानी है, जिसे नई जगह, पीले रंग और तेज शोर से डर लगता है लेकिन वह बहुत ही समझदार और ज्ञानी भी है। धुन का पक्का है। मानवीय नजरिया उसे उसकी मां, उसके टीचर वाडिया और इस्लाम से उसे विरासत में मिला है। वह अमेरिका में एक लड़की मंदिरा के सैलून मे अपने ब्यूटी प्रोडक्ट बेचने जाता है और उसी से प्यार कर बैठता है। मंदिरा तलाकशुदा है और उसके पहले से एक बच्चा है। शादी के बाद उसका सरनेम मंदिरा खान और उसके बेटे का नाम समीर खान हो जाता है। 9/11 से पहले सब कुछ ठीक था लेकिन उसके बाद पूरी दुनिया ने करवट ली खान सरनेम की वजह से एक हादसा होता है। दोनों पति पत्नी अलग हो जाते हैं। मंदिरा उसे चुनौती देती है कि किस किस के सामने वह बेगुनाही का सबूत देगा कि तुम्हारा नाम खान है और तुम टेरेरिस्ट नहीं हो। यहां से खान अमेरिका के प्रेसीडेंट से मिलने की यात्रा शुरू करता है। जहां जहां राष्ट्रपति को जाना होता है, वहां वह पहुंचता है, लेकिन मिल नहीं पाता। फिल्म इसी यात्रा को आगे बढाती है और अंजाम तक पहुंचती है। इस यात्रा में रिजवान खान एक नायक बनकर उभरता है। जॉर्जिया में छोटे से गांव के लोगों को बचाने में रिजवान खान अकेला जुटा तो उसके पीछे सैकड़ों लोग राहत सामग्री लेकर आए हैं। जहां वह काउंटर पर कमरे की सिर्फ जानकारी लेने गया था वहां भी होटल मालिक ने बोर्ड टांग लिया है कि यहां खान ठहरा था। कहानी में बीच में कहीं ठहराव और एकरसता आती है लेकिन सारे नंबर शाहरूख खान को इसलिए जाते हैं कि वह अभिनय के एक नए अवतार में सामने है।

9/11 हादसे को एक ऐसे नजरिए के साथ देखना चाहते हैं जो अब तक अनदेखा रहा तो फिल्म आपके लिए है। माइ नेम इज खान की तारीफ इसलिए भी जरुरी है क्योकि हमारी राजनीति और आदमी की लिप्साओं ने भेदभाव का जो अमानवीय चेहरा हमारे सामने बना लिया है उसे चुनौती दी जा सके।

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

मिलें सुर मेंरा तूम्हारा @2010

15 अगस्त , 1988 को दूरदर्शन में जारी उस म्यूजिकल फिल्म को भाषा के सभी बंधन तोड़ते हुए देश के बच्चे - बच्चे ने अपने दिल में बसा लिया था। जब भी इसका टेलिकास्ट होता, सब काम रोककर पूरे 16 मिनट तक उसमें अपने सुर मिलाते थे। मै तब लगभग 6-7 साल का रहा हूँगा । और अब 2010 में इंडिया को एक बार फिर वही सुर लौटाए है।
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फिर मिले सुर का नया विडियो देश भर की 15 लोकेशनों पर शूट किया गया है। पुराने वाले गीत में जहां 26 महान हस्तियों ने हिस्सा लिया था , वहीं नए विडियो में 68 पर्सनैलिटीज हैं। मॉडर्न इंडिया की झलक देने के लिए इसमें बिग बी से लेकर , ए . आर . रहमान और सलमान खान से लेकर बेडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल तक अपने सुर मिला रहे हैं। हर आर्टिस्ट की ओर से इसमें एक सामाजिक संदेश दिया गया है , जिसे ऐतिहासिक स्थलों पर शूट किया गया है। बिग बी के लिए यह विडियो सबसे खास है , क्योंकि वह अकेली ऐसी शख्सियत हैं , जो इसके पहले विडियो में भी थे। कॉरपोरेट कपल आरती और कैलाश सुरेंद्रनाथ ने फिर मिले सुर को प्रड्यूस किया है।

ऑरिजिनल मिले सुर में जहां पंडित भीमसेन जोशी , अमिताभ बच्चन , कमल हसन , लता मंगेशकर , प्रकाश पादुकोण जैसे आइकॉन थे , तो इस बार नई जेनरेशन के नए आइकॉन सितार वादक अनुष्का शंकर , सरोद वादक अमान और अयान , शूटर अभिनव बिंद्रा , बॉक्सर विजेंदर सुर मिला रहे हैं।

पिछले विडियो का कॉन्सेप्ट सुरेश मलिक ने तैयार किया था और पीयूष पांडेय ने लिखा था। नए विडियो की शानदार सिनेमेटॉग्रफी और म्यूजिक है लुई बैंक्स का। पुराने विडियो में भी लुई बैंक्स ने पी . वैद्यनाथन के साथ मिलकर म्यूजिक तैयार किया था।

(हिन्दी) मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
मिले सुर मेरा तुम्हारा …

(कश्मीरी) चॉन्य् तरज़ तय म्यॉन्य् तरज़
इक-वट बनि यि सॉन्य् तरज़

(पंजाबी) तेरा सुर मिले मेरे सुर दे नाल
मिलके बणे एक नवा सुर ताल

(हिन्दी) मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

(सिन्धी) मुहिंजो सुर तुहिंजे साँ प्यारा मिले जडेंह
गीत असाँजो मधुर तरानो बणे तडेंह

(उर्दू) सुर का दरिया बह के सागर में मिले

(पंजाबी) बदलाँ दा रूप लैके बरसन हौले हौले

(तमिल) इसैन्दाल नम इरुवरिन सुरमुम नमदक्कुम
तिसै वॆरु आनालुम आऴि सेर
मुगिलाय मऴैयय पोऴिवदु पोल इसै
नम इसै…

(कन्नड) नन्न ध्वनिगॆ निन्न ध्वनिय,
सेरिदन्तॆ नम्म ध्वनिय

(तेलुगु) ना स्वरमु नी स्वरमु संगम्ममै,
मन स्वरंगा अवतरिंचे .

(मलयालम) निंडॆ स्वरमुम् नींगळुडॆ स्वरमुम्
धट्टुचॆयुम् नमुडॆय स्वरम .

(बाङ्ला) तोमार शुर मोदेर शुर
सृष्टि करूर अइको शुर

(असमिया) सृष्टि हो करून अइको तान

(उड़िया) तोमा मोरा स्वरेर मिलन
सृष्टि करे चालबोचतन

(गुजराती) मिले सुर जो थारो म्हारो
बणे आपणो सुर निरालो

(मराठी) माँझा तुमच्या जुलता तारा
मधुर सुराँचा बरसती धारा

(हिन्दी) सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
तो सुर बने हमारा

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हालांकि इसे रिलीज हुए अभी कुछ हि दिन हुए है , लेकिन यंगस्टर्स में यह अभी से पॉप्युलर हो गया है। यूट्यूब में पहले ही दिन इसे 2600 से ज्यादा हिट्स मिले। इंटरनेट पर चैट रूम्स हों या डिस्कशन बोर्ड , ब्लॉग्स हों या फिर ऑरकुट या फेसबुक की कम्युनिटीज ... सब जगह यंगस्टर्स फिर मिले सुर पर बातचीत करते नजर आ रहे हैं। हालांकि कुछ को इसमें बॉलिवुड की ओवरडोज लग रही है , लेकिन ज्यादातर युवा इस बात से खुश हैं कि इसमें राज्यों को अनेकता पर महत्व न देते हुए देश को एक यूनिट की तरह दिखाया गया है। हर सिलेब्रिटी को किसी एक खास राज्य से जोड़कर दिखाने की बजाय पूरे देश की एकता पर जोर दिया गया है।

मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

सबसे बड़ी मदद

एक बार बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक धनी व्यक्ति की मेज पर कुछ सिक्के रखते हुए कहा, 'आपने बुरे वक्त में जो सहायता की थी, मैं उसके लिए बहुत आभारी हूं। पर अब मैं अपनी मेहनत से इतना सक्षम हो गया हूं कि आपका कर्ज वापस कर सकूं। मैं यह सिक्के आपको वापस करने आया हूं।' बेंजामिन फ्रैंकलिन की बात सुनकर वह सज्जन उन्हें घूरते हुए बोले, 'क्षमा करिए, पर मैंने आपको पहचाना नहीं। न ही मुझे यह याद है कि मैंने किसी को उधार दिया था।' बेंजामिन ने कहा, 'मैं उन दिनों एक प्रेस में अखबार छापने का काम करता था। एक दिन अचानक मेरी तबीयत खराब हो गई तब मैंने आपसे बीस डॉलर लिए थे।' यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपने बीते दिनों को याद किया तो उन्हें स्मरण हो आया कि एक बालक प्रेस में काम करता था और एक दिन उसके बीमार होने पर उन्होंने उसकी मदद की थी।

यह याद आने पर उस व्यक्ति ने कहा, 'हां, मुझे याद आ गया। लेकिन दोस्त, यह तो मनुष्य का सहज धर्म है कि वह आपत्तिग्रस्त व्यक्ति की सहायता करे। इन सिक्कों को आप अपने पास ही रखें और कभी कोई जरूरतमंद व्यक्ति आपकी नजरों में आए, तो उसे दे दीजिएगा।' इस बात से बेंजामिन बहुत प्रभावित हुए और उन्हें नमस्कार कर उन सिक्कों को वापस अपने साथ ले आए। इसके बाद उन्होंने एक जरूरतमंद युवक को वे सिक्के दिए। जब उस युवक ने सिक्के लौटने चाहे तो बेंजामिन ने कहा, 'दोस्त, जब तुम सक्षम हो जाओगे तो अपने जैसे किसी जरूरतमंद को ये सिक्के दे देना। मैं समझूंगा कि मेरे पैसे मुझे मिल गए।' वह युवक बोला, 'मैं ऐसा ही करूंगा।' इसके बाद बेंजामिन उस युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, 'किसी जरूरतमंद की वक्त पर मदद करना ही इंसानियत है। अगर हम किसी की मदद करते हैं तो वह मदद सौ गुना अधिक होकर हमारे पास वापस आती है और हमें कामयाब बनाती है।'

संकलन: रेनू सैनी (नवभारत टाइंम्स)

सोमवार, अक्टूबर 05, 2009

पहाड़ से गिरकर मरती हैं सैकड़ों महिलाएं

हिमालय की ऊंची-ऊंची और लंबी चोटियों से घिरे उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में आज भी पशुओं को चारे के लिए घास काटते समय प्रति वर्ष करीब 200 महिलाएं पहाड़ों से गिरकर अपनी जान गंवा बैठती हैं लेकिन अनेक मामलों में इनकी न तो रिपोर्ट दर्ज होती है और न ही इन्हें कोई मुआवजा दिया जाता है। प्रशासन में ज्यादातर मामलों में ये सामान्य मौत के तौर पर ही दर्ज होती हैं।

राज्य में अधिकांश गांव सुदूर पहाड़ों की चोटियों पर बसे हुए हैं और इन गांवों में रहने वाले लोग काफी संख्या में भेड़ों, बकरियों गायों, बैलों और भैंसों को पालते हैं। पशुओं के चारे के लिए घास काटने का काम पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाएं ही करती हैं। उत्तराखंड के कुछ जिलों के गांवों का दौरा करने के बाद यह रोचक तथ्य सामने आया कि अभी भी गांवों में घास काटने का काम या तो लड़कियां करती हैं या घर में ब्याह कर आने वाली बहुएं। घर की बुर्जुग महिलाओं द्वारा इन बालिकाओं और युवतियों को घास काटने का काम दिया जाता है। बालिकाओं को जहां यह काम स्कूल से आने के बाद सौंपा जाता है वहीं बहुएं इस काम को सूर्यास्त के पहले ही निपटाना पसंद करती हैं लेकिन अक्सर सूर्य की रोशनी कम होने के चलते और कभी-कभी अति विश्वास के चलते इनके पैर ऊंची चोटियों से लड़खड़ा जाते हैं जिससे ये गिर जाती हैं और इनकी मौत हो जाती है।

पहाड़ों के गांवों में महिलाओं को शाम के समय पीठ पर लाद कर घास को लाते हुए देखा जा सकता है। राज्य में दूध के लिए जहां बकरियों गायों और भैंसों को पाला जाता है वहीं अभी भी पारंपरिक खेती के लिए बैलों की जरुरत होती है क्योंकि खेत सीढ़ीनुमा होने के चलते वहां ट्रैक्टर सफल नहीं हो पाते। जाड़ों के मौसम में ऊन की जरूरत के लिए भेड़ों को पाला जाता है। इन सभी पशुओं के चारे के लिए सितम्बर से लेकर फरवरी महीने तक पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चट्टानों से सूखी घास काटी जाती है और यही चार महीने उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाओं के चट्टान से गिरकर मौत के महीने होते हैं।

राज्य प्रशासन के पास हालांकि इन मौतों का कोई आकलन नहीं होता। समाज कल्याण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हकीकत में कम से कम पूरे राज्य में साल में करीब 200 महिलाओं को घास काटने के चक्कर में अपनी जान गंवानी पड़ती है और कई पूरे जीवन के लिए अपाहिज हो जाती हैं।

राज्य सरकार के पास इन महिलाओं के परिजनों को मुआवजा देने की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि उनको घायल होने की अवस्था में अस्पताल ले जाने के लिए भी ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालनी होती है क्योंकि पहाड़ियों के कारण गिरने वाली जगह पर आसानी से पहुंचना भी लगभग असंभव होता है। खास तौर पर रात के अंधेरे में बहुत दिक्कत होती है। अधिकांश दुर्घटनाएं सूर्यास्त के बाद रास्ते का पता नहीं चलने और पैर फिसलने के चलते होती हैं।


दूसरी ओर समाज कल्याण विभाग के पास चूंकि जिले से कोई सरकारी आंकड़ा नहीं प्राप्त होता है इसलिए ऐसे मामलों में मुआवजा नहीं दिया जाता है।

Source : जागरण

सोमवार, सितंबर 14, 2009

हिन्दी के बारे में 14 बातें

* राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। राष्ट्र के गौरव का यह तकाजा है कि उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो। कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है।
* भारत में अनेक उन्नत और समृद्ध भाषाएँ हैं किंतु हिन्दी सबसे अधिक व्यापक क्षेत्र में और सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है।
* हिन्दी केवल हिन्दी भाषियों की ही भाषा नहीं रही, वह तो अब भारतीय जनता के हृदय की वाणी बन गई है।
* सर्वोच्च सत्ता प्राप्त भारतीय संसद ने देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को राजभाषा के पद पर आसीन किया है। अब यह अखिल भारत की जनता का निर्णय है।
* संसार में चीनी तथा अँग्रेजी के बाद हिन्दी सबसे विशाल जनसमूह की भाषा है।
* प्रांतों में प्रांतीय भाषाएँ जनता तथा सरकारी कार्य का माध्यम होंगी, लेकिन केंद्रीय और अंतरप्रांतीय व्यवहार में राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही कार्य होना आवश्यक है।
* प्रादेशिक भाषाएँ तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी दोनों एक-दूसरे की पूरक तथा सहोदरा हैं। एक-दूसरे के सहयोग से वे अधिक समृद्ध होंगी।
* प्रादेशिक हिन्दी और राष्ट्रीय हिन्दी जैसी कोई चीज नहीं। जिसे आज हिन्दी कहते हैं, वही राष्ट्रभाषा है और उत्तरोत्तर विकास करके समृद्ध एवं गौरवशाली बनेगी।
* प्रत्येक मनुष्य दो आँखों से देखता है। भारत जैसे विशाल राष्ट्र के निवासी के पास भी दो आँखें चाहिए। ये दो आँखें हैं - 1. अपने प्रांत की भाषा 2. सारे देश के लिए परस्पर व्यवहार की भाषा।
* हिन्दी का प्रचार करना राष्ट्रीयता का प्रचार करना है। हिन्दी किसी पर न तो जबर्दस्ती लादी जा रही है और न लादी जाएगी। वह तो प्रेम का प्रतीक है।
* कोई भी शब्द चाहे वह किसी भी भाषा का क्यों न हो, यदि वह जनता में प्रचलित है, तो वह राष्ट्रभाषा हिन्दी का शब्द है। आगे भी हिन्दी विभिन्न भाषाओं से शब्द-राशि लेकर समृद्ध बनेगी।
* राष्ट्र की एकता के लिए जैसे एक राष्ट्रभाषा होना आवश्यक है, उसी प्रकार एक लिपि का होना भी आवश्यक है। नागरी लिपि में वे सभी गुण उपस्थित हैं, जो किसी वैज्ञानिक लिपि में होने चाहिए।
* अत: समस्त प्रादेशिक भाषाओं की एक नागरी लिपि हो, यह आवश्यक है।
* अँग्रेजी को बनाए रखना हमारी शान और इज्जत के खिलाफ है। वह हमारे देश में रहने वालों के बीच एक दीवार है। इस देश में केवल अँग्रेजी जानने वालों का राज नहीं रह सकता।
* कौन कहता है कि दक्षिण में अँग्रेजी बोलने वालों की संख्‍या अधिक है? वहाँ अँग्रेजी जानने वालों से पाँच गुना संख्‍या हिन्दी जानने तथा समझने वालों की है।
'हिन्दी दिवस के दिन हम प्रतिज्ञा करें कि राष्ट्रभाषा हिन्दी और देवनाग‍री लिपि का प्रचार कर राष्ट्रीय भावना को हम सुदृढ़ करेंगे।
सौजन्य से - देवपुत्र

'दूसरी औरत'_(दुर्गादत्त जोशी )

शहर से कोसों दूर बढ़ापुर नाम का एक गाँव है, गाँव में चौहान जाति के ठाकुर रहते हैं, पुराने ज़मींदार थे। आज भी किसी-किसी के पास आठ-आठ दस-दस एकड़ ज़मीन है। फसल भी अच्छी हो जाती है हर एक के खेत में टयूबवेल लगा है, कुछ घर ब्राह्मणों के हैं जो खेती नहीं करते हैं खेत भी नहीं है, कुछ और जातियों के घर भी हैं जो इन ज़मींदारों के घर पर काम करते हैं, फसल पर कुछ अनाज मिल जाता है कुछ मजदूरी करते हैं जहाँ भी आसपास काम मिल गया, कुल मिलाकर गाँव खुशहाल है।

इसी गाँव में राजेश नाम का एक किसान रहता है, कोई पैंतीस छत्तीस साल का होगा, सात आठ साल पहले उसकी शादी हुई थी कमलेश के साथ, कमलेश देखने में खूबसूरत थी, उसके पिता जी भी बड़े ज़मींदार थे, राजेश के पिता नहीं थे, वह दस बारह साल पहले किसी दुर्घटना में मारे गए। राजेश ने अपने चाचा चाची के साथ जाकर कमलेश को देखा, देखते ही राजेश शादी को तैयार हो गया, होता भी क्यों नहीं ऐसी सुन्दर लड़की और उसका बाप भी मालदार, शादी बड़े धूमधाम के साथ सम्पन्न हो गई।

कमलेश को पाकर राजेश धन्य हो गया, साल भर बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया, जिसका कुलदीपक नाम रखा, दो साल बाद एक लड़की हुई मीनाक्षी।

जब मीनाक्षी पेट में थी तभी से कमलेश बीमार रहने लगी, मीनाक्षी के होते-होते वह काफी कमज़ोर हो चुकी थी, धीरे-धीरे उसने चारपाई पकड़ ली, राजेश ने आसपास के कई छोटे मोटे डाक्टरों को दिखाया तमाम दवाइयाँ भी खिलाई पर कमलेश का रोग किसी से ठीक नहीं हुआ।

किसान हो या व्यापारी चाहे नौकरी पेशा ही क्यों न हो, घर में बीम'ा'री किसी को लग जाए तो घर बरबाद हो जाते हैं। राजेश कमलेश को लेकर शहर गया। घर बूढ़ी माँ के हवाले हो गया, माँ को दो बच्चे देखने, खेतों को देखना, जानवर भी पाले थे, उन्हें कौन देखता, सो एक दिन पास के बाज़ार में भिजवाकर सभी जानवर औने पौने दामों में बेच दिए, उधर शहर में कमलेश के डॉक्टर ने परीक्षण के आधार पर बताया कि इसको शुगर की बीमारी है और वह काफी बढ़ चुकी है, एक गुर्दा तो बिल्कुल खराब हो चुका है, दूसरा भी खराब होने ही वाला है। कमलेश का रोग ठीक हो ही नहीं सकता इसके गुर्दे बदलने पड़ेगे, राजेश की तो हालत खराब, रूवांसा हो गया, कमलेश की उमर ही क्या होगी यही कोई अठाइस तीस साल, गुर्दे बदलने को पाँच लाख रुपए की ज़रूरत पड़ेगी वो भी ठीक होने की कोई गारण्टी नहीं, डाक्टर के कम्पाउन्डर ने सलाह दी कि इसे दिल्ली दिखा दो किसी बड़े अस्पताल में। राजेश कमलेश को लेकर दिल्ली पहुँच गया, जो भी पाई पैसा था वह सब खर्च हो चुका था, वहाँ के डॉक्टरों ने भी वही सलाह दी जो उसके शहर के डॉक्टर ने दी थी, राजेश कमलेश को लेकर घर आ गया, घर आने के एक महीने बाद कमलेश की मृत्यु हो गई। सारी जमा पूँजी इलाज में लगा दी अन्त में मरीज़' से भी हाथ धो बैठा राजेश।

राजेश के घर की हालत खराब हो चुकी थी, बूढ़ी माँ विक्षिप्त हो गई थी, जब देखो तब आँखों से आँसू की धारा, राजेश को जब भी देखें तब रो पड़ती थीं, कलेजे के टुकड़े को परेशानी में देखकर हर माँ का दिन ऐसे ही भर आता है। छोटे बच्चों की भी हालत खराब। कपड़े मैले हो रहे हैं, हफ्ते भर से बच्चों को नहलाया नहीं है, बड़ा स्कूल जाने लायक हो गया हे कौन भेजे सब तितर बितर हो गया है, सारा निजाम ही बिगड़ गया है घर का, माँ बिल्कुल टूट गई है, उसे घर सुधरने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। निराशा से घिरी रहती है रात दिन, एक दिन राजेश के चाचा घर पर आए तो उसकी माँ उनके आगे फफक-फफक कर रो दी, चाचा ने बहुत समझाया बुझाया ये सब विधि का विधान है, वैसे ही आपको भाईसाहब का दुख सालता रहता है, ऊपर से जवान बहू की मौत हो गई रोना तो आएगा ही पर किया क्या जाए, हिम्मत रखो धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

इतने में ही राजेश कहीं से आया, बड़ा बच्चा राजेश को लिपट गया, छोटी दादी की गोद में बैठी है। पूरा घर ही बेतरतीब हुआ पड़ा है, छत की तरफ़ जाले लगे हैं, दीवारें बच्चों ने खुरच रखी है, कपड़े अस्तव्यस्त हैं, बरतन कोई यहाँ पड़ा है कोई वहाँ, रसोई में मक्खियाँ भिनभिना रहीं हैं। झूठे बर्तनों का ढेर लगा पड़ा है। अब राजेश आ गया है, वह छोटी को पकड़ेगा तो माँ किसी तरह रोटी का प्रबन्ध करेगी, बातों ही बातों में चाचा ने कहा भाभी जी आप राजेश की शादी कर दो, दूसरी औरत आ जाएगी तो घर की हालत सँभाल लेगी, ''कह तो ठीक रहे हो पर कोई नरम दिल की मिले तब ना'' दूसरी तो पहली के बच्चों को मारेगी, जलन करेगी, अगर चाल चलन ठीक नहीं तो घर को नरक बना देगी, उससे तो ऐसे ही काट लेंगे। फिर रूवांसी हो गई। चाचा ने कहा, ''फिकर मत करो देखभाल कर करेंगे। कोई विधवा परित्यक्ता मिल जाएगी तो ज़्यादा ठीक रहेगा। वो ज़्यादा नखरे नहीं करेगी, पर पूछताछ करनी पड़ेगी, समय निकाल कर करना होगा। भाभी आपकी हालत मुझसे देखी नहीं जाती, आपने तो अपने बच्चे की तरह पाला है मुझे, देखना मैं राजेश को सही औरत लाके दूँगा।''

चाचा शादी के लिए औरत देखने में लग गए, जगह-जगह के आदमियों से चर्चा की, कुछ रिश्तेदारियों में संदेशा पहुँचवाया कि कहीं राजेश के लायक कोई औरत हो तो बताना, कुछ दिनों के बाद एक गाँव से खबर आई कि यहाँ एक ऐसी औरत रहती है, बड़े ही गरीब घर की है, बाप के पास कुछ नहीं है, अगर भगवान ने चाहा तो रिश्ता हो जाएगा, चाचा राजेश के साथ उसी गाँव में पहुँच गए जिन्होंने सन्देशा भिजवाया था उन्ही के घर रुके, नमस्कार कुशलक्षेम के बाद चाय पी।

थोड़ी देर बाद घर के मुखिया ने कहना शुरू किया, देखो राजेश बाबू आप ठहरे बड़े किसान कोशिश करोगे तो आपको कुँवारी कन्या मिल जाएगी थोड़ा बहुत दहेज भी मिल जाएगा, अभी आपकी उमर ही क्या है अब तो चालीस छोड़ो पैंतालिस साल के भी शादी कर रहे हैं, पर मैंने जो देखा है उसका जबाब नही, देखने में साँवली ज़रूर है, कद भी छोटा है, पर है बड़ी होशियार, अपने बाप को पाल रही है, हमारे ही बिरादरी के हैं, इसके दादा गलत सोहलत में पड़ गए थे, तमाम बुरे काम 'शराब, जुआ' सब सम्पत्ति बेचकर मरते समय कंगाल हो गए थे, आगे को एक लड़का था उसी का बाप हमारे खेतों में काम करता है। न पढ़ा न लिखा न ज़मीन और करता भी क्या बीबी पहले ही मर चुकी है, हमने रहने के लिए छोटा-सा मकान बनाकर दे दिया था, उसी में रहते हैं, मेरे कहने को टालेंगे नहीं कहो तो मैं लड़की और उसके बाप को बुला देता हूँ, और यह भी सुन लो हमने उसकी शादी भी करवा दी थी एक अच्छे परिवार में पति को पसंद नहीं आई, उसने छोड़ दिया, यहीं रहती है, इन्टर तक का कॉलेज है गाँव में इंटर तक पढ़ी है, अगर शहर में किसी सेठ के यहाँ पैदा हुई होती तो डॉक्टर बैरिस्टर होती। राजेश जी घर बनाने वाली है, सिलाई कढ़ाई करती है गाँव के बच्चों को घर पर पढ़ाती है, बड़ी शालीन है, किसी से कभी ज़ोर से बोली नहीं होगी, मैं अपनी लड़की समझता हूँ उसे। अगर आप राज़ी हो गए तो उस बेचारी की ज़िन्दगी सुधर जाएगी और आपका घर भी बन जाएगा।

राजेश ने गौर से बातें सुनी और औरत और उसके बाप को बुलाने को आग्रह किया, थोड़ी देर में दोनों बाप बेटी सामने बैठे थे। वाकई रंग काला ही था फिर गरीब थी परित्यक्ता थी, फिक्र में जीने वालों का रंग वैसे ही काला पड़ जाता है पच्चीस छब्बीस की होगी, चेहरे से ज़्यादा की लग रही थी, बाप कुछ बोला नहीं गरदन झुकाकर एक तरफ़ को बैठ गया। राजेश ने नाम पूछा तो औरत ने 'रूपा' बता दिया, शादी के लिए पूछने पर कह दिया जैसा ताऊजी कहेंगे।

फिर राजेश के चाचा ने कहना शुरू किया देखो बिटिया ये दो बच्चों का बाप है? घर में बूढ़ी माँ है, घरवाली के इलाज में बहुत बरबाद हो गया है, इसके पास जमा पूँजी कुछ नहीं है, बस एक ट्रैक्टर और खेत में टयूबवैल है। एक हवेली और सात आठ एकड़ ज़मीन है। सारे जानवर बहू की बिमारी के दौरान देखभाल न हो पाने की खातिर बेच दिए हैं, तुम समझ लो बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, भाभी को सम्भालना होगा, बच्चों की देखभाल करनी होगी, तुम यह सब कर लोगी, रूपा ने हाँ में गरदन हिला दी, फिर उस रिश्तेदार जिसके यहाँ रुके थे ने कहना शुरू किया, ''बेटी ये बड़े किसान हैं परेशानी किसे नहीं आती, सब दिन एक समान नहीं होते जमी जमाई गृहस्थी है, मुझे यकीन है तुम ज़रूर सँभाल लोगी, फिर राजेश की तरफ़ मुखातिब होकर बोले राजेश जी आपने इसे देख लिया है आप हाँ कर रहे हो?'' राजेश ने भी हाँ कह दिया।


दूसरे दिन गाँव के ही पंडित ने गाँव के मन्दिर में एक दूसरे के गले में जयमाला डलवा दी। राजेश और उसके चाचा रूपा को लेकर गाँव आ गए। चाचा जी ने अपने घर से खाना पका कर भेज दिया, खाना खा पीकर थोड़ी देर बातचीत कर सब सो गए। दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ही जाग की खड़ी हुई रूपा, पूरे मकान की सफाई की छतों के जाले साफ़ किए, आँगन की लिपाई कर दी फ़र्श पर पोंछा लगाया, सभी कपड़ो की तह कर करीने से जगह पर रखे, रसोई की धुलाई कर दी राजेश थोड़ी देर देखता रहा फिर उठकर वह भी रूपा का हाथ बँटाने लगा, पड़ोस से दूध लाया चाय बनाई माँ को जगाया उन्हें चाय पिलाई फिर रूपा ने दोनों बच्चे जगाए, उनको सुबह ही नहला दिया, उनको नए कपड़े पहना दिए, दूध पिलाकर आँगन में खाट बिछाकर बैठा दिए, वे दानों खेलने लगे माँजी को नहला दिया। उनके बालों में थोड़ा तेल चुपड़कर कंघी कर दी, साफ़ धोती पहनने को दी, उनको भी बाहर खाट पर बिठा दिया, अब देखो कल शाम ही रूपा घर में आई थी सुबह उसके काम को देखकर लग रहा था जैसे बरसों से यहीं रह रही हो, हो भी क्यों न सेवा भाव हो तो हाथ पैर काम की तरफ़ अपने आप चलने लगते हैं, रूपा रसोई में गई सभी डिब्बे खोलकर देखा किस डिब्बे में क्या दालें हैं, आटा चावल के बरतन टटोले राजेश खेतों से कुछ सब्ज़ियाँ ले आया, इतने में रूपा ने पराठे सेंक दिए सभी का नाश्ता हो गया।

नाश्ते से निपटकर रूपा ने घर के सभी कपड़े धोए राजेश ने हेंडपंप चलाकर रूपा का सहयोग किया, दोनों ने मिलकर कपड़े फैला दिए, माँ आँगन में खाट पर बैठकर रूपा को काम करते हुए एक टक देखती रही, चन्द घन्टों में ही घर की काया पलट दी रूपा ने। सुबह के सारे कामों से निपट खुद नहाधोकर रूपा ने माँ जी से पूछा दिन में खाने के लिए क्या पकाना है। माँ जी ने उसे अपने साथ थोड़ी देर खाट पर बैठाया, कुलदीपक संशय भरी निगाह से देख रहा था रूपा को, उसने हाथ पकड़कर खींचा अपने सीने से लगाया, उसने उसके गालों को कई बार चूमा, फिर उसे छोड़कर मीनाक्षी को गोद में उठा लिया, उसे लेकर आँगन में ही टहलने लगी। चंद घन्टों में ही बच्चे भी अपना लिए माँ भी खुश।

पड़ोस में नई दुल्हन आई हो और पड़ोसने देखने को न आएँ ऐसा कैसे हो सकता है? लिहाजा दोपहर के समय एक-एक दो-दो करके घर में आने लगीं। रूपा का रंग रूप देखकर सभी माँ जी से फुसफुसाने लगीं, ''अरे लाना ही था तो किसी अच्छी-सी देखने भालने में ठीक-सी लाते। ये क्या लाए हो? इतनी जल्दी भी क्या थी? अभी छ: महीने ही तो हुए हैं कमलेश को मरे। हमसे कहते हमारे मायके में है एक पति से बनी नहीं मायके में ही रह रही है इतनी सुन्दर की पूछो मत। माँ जी उनको सुनती रहीं बोली कुछ नहीं। थोड़ी देर में रूपा चाय बना लेकर आई सबको चाय के कप पकड़वाए। फिर जिस जिसको माँ जी ने बताया उनके पैर छुए सामने बैठ गई। पड़ोसनों का आना जाना दो तीन घन्टे चला आखिर में छाया आई।

छाया इस गाँव की सबसे पढ़ी लिखी बहू है। एम.ए. तक पढ़ी है। लम्बी-सी चोटी माँग में सिन्दूर बड़ी-बड़ी आँखे गदराया हुआ शरीर गोरा चिट्ठा रंग जैसे अंग्रेज़ हो। गाँव भर में इसके रूप रंग के चर्चे होते हैं। पति भी बहुत प्यार करता है। गाँव के जवान लड़के घर पर मंड़राते रहते हैं। बड़े सलीके से रहती है आसपास की औरतें इससे ईर्ष्या रखती हैं। बहुत कम बोलचाल है कुछ घमन्डी टाइप की है। यह नई बहुओं को देखने के लिए इसलिए जाती है कि कहीं आने वाली मुझसे ज़्यादा सुन्दर तो नहीं? बनाव शृंगार में घन्टों लगाती है इसके खर्चे भी बहुत हैं। छाया के पति ने घर में टीवी, फ्रिज, गैस चूल्हा सब रखा है। इन सबके लिए अपना पुराना ट्रैक्टर तक बेच दिया, जो इनकम होती है कुछ फैशन में, कुछ ज़ायके के हवाले हो जाती है। पर है बहुत खुश। बीबी जो अति सुन्दर है। छाया ने भरपूर नज़र रूपा के चेहरे पर डाली पूरा शरीर आँखो से टटोला फिर माँजी की तरफ़ मुस्कुराकर देखा, अपने घर चली आई। रूपा के रूप रंग से गाँव की रूपवतियाँ खुश नहीं थी। एक ने दूसरे से कहा, ''हमें क्या है? जब राजेश को पसन्द है तो ठीक है।''

रूपा को आए पूरा हफ्ता हो चुका है। माँ जी को लग रहा है जैसे रूपा हफ्ता नहीं बरसों से साथ है। सेवा में लगी रहती है, राजेश से कहकर दूध देने वाली भैंस ख़रीद ली। बच्चों को दूध घर का मिलने लगा, कुलदीपक स्कूल जाने लगा है मीनाक्षी अभी डेढ़ साल की है। रूपा कुलदीपक को बड़े प्यार से पढ़ा रही है। बच्चे मम्मी-मम्मी कहने लग गए हैं। राजेश खेतों की देखरेख में लग गया है। माँ जी सुबह शाम घूमने लगीं हैं, माँ जी के सिर में तेल ठोककर पैरों के तलवों की मालिश होने लगी है। पूरा घर घर की तरह हो गया है। गाँव के बाज़ार से कपड़ा लाकर बच्चों को नए कपड़े रूपा ने खुद सीकर पहना दिए, माँ जी का ब्लाउज पेटीकोट सी दिया।

पड़ोसने चुपचाप देखती रहती, रूपा को किसी और से बात करने की फुरसत कहाँ। इन्टर पास है गाँव के कॉलेज से वो भी कृषि विज्ञान से, उसने खेतों में जाना भी शुरू कर दिया। राजेश को खेत की मिट्टी की जाँच कराने को कहा सही बीज खाद का चयन करने को कहा। एक भैंस से घर के ही दूध की भरपाई हो पाती है, अगर हमारे पास आठ दस भैंसे होती तो हमारी इनकम बढ़ जाती बायो गैस प्लान्ट लग जाता घर की रोशनी के लिए सौर ऊर्जा संयत्र लग जाता गोबर के उपले की जगह जैविक खाद बनने लगती। किसी सरकारी बैंक से कर्ज़ लेकर राजेश ने रूपा की मनोकामना पूरी कर दी। भैंसो की देखरेख के लिए एक नौकर रख दिया।

रूपा राजेश के संग पिछले एक डेढ़ साल से रह रही है। माँजी ने कहा, ''रूपा बेटी तुम्हारा भी एक बच्चा होता तो तुम्हारे लिए ही अच्छा होता।'' रूपा ने साफ़ इनकार कर दिया, ''माँ जी भगवान की कृपा से बगैर पैदा किए दो बच्चे मिल गए और मुझे नहीं चाहिए। भगवान इनको लम्बी उमर दे। फिर माँ जी अपना पराया क्या है? क्या अपने बच्चे वाले सुखी हैं।'' राजेश की माली हालत पहले से काफी बेहतर हो गई। एक दिन माँ जी ने गाँव से रूपा के पिता जी को भी अपने घर पर ही बुला लिया। इनसे अब मजदूरी नहीं हो पाती है काफी कमज़ोर और बीमार हो गए थे। रूपा के अलावा इस संसार में इनका कोई नहीं है।

आज राजेश के घर के आगे नई कार खड़ी है। दूध की ब्रिकी से ख़रीदी है। बैंक में पैसा भी है, खेत पहले से दुगनी उपज वाले हो गए हैं। माँजी जवान लगने लग गईं है और बच्चे भी खुशहाल हैं। और क्या चाहिए राजेश को? उधर छाया के पति को उसके खर्चों ने कर्ज़दार बना दिया है। आज छाया रूपा के आगे नतमस्तक होकर खड़ी है उसे एक हज़ार रुपए की सख़्त ज़रूरत है। रूपा ने माँ जी की तरफ़ इशारा कर दिया उनसे ले लो। रूपा से मिलने के बाद और उसके कार्यकुशलता से प्रभावित होकर छाया को अपने रूप रंग पर खुद ही घृणा होने लगी। अब वह रूपा की दिवानी हो चली है। रूपा उसे कृ'षि' एंव पशुपालन की ट्रेनिंग दे रही है। उससे रूपा ने कहा दीदी आप मुर्गी फारम खोल लो बहुत जल्दी कार आ जाएगी।

राजेश के चाचा उसकी मम्मी के सामने बैठे हैं रूपा की चर्चा पूरे गाँव में है बोल, ''भगवान ने मेरी लाज रख दी मैं अपने को धन्य भाग समझता हूँ। भाभी जी जो रूपा जैसी बेमिसाल औरत हमारे गाँव में हैं।'' माँजी की आँखे एक बार फिर छलछलाने लगीं पर ये आँसू खुशी के थे जो रूपा ने माँ जी को दी थी। आज इस बड़ापुर गाँव में रूपा से रूपवान कोई औरत नहीं हैं पर रूपा दूसरी औरत के रूप में आई है काश! कोई रूपा जैसी दुल्हन पहली औरत के रूप में सहर्ष ले आता।

दुर्गादत्त जोशी

शनिवार, सितंबर 12, 2009

काबुलीवाला_(रवीन्द्रनाथ ठाकुर)

मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।

मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"

कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी
दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।

काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?"

मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।" फिर मैं बाहर चला गया।

कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।

काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"

रहमत हँसता हुआ कहता, "हाथी।" फिर वह मिनी से कहता, "तुम ससुराल कब जाओगी?"

इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"

रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।" इस पर मिनी खूब हँसती।

हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।

एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।

कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।

इतने में "काबुलीवाले, काबुलीवाले", कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षणभर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, ‘’तुम ससुराल जाओगे?" रहमत ने हँसकर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"

रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।"

छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।

काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।

कई साल बीत गए।

आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।

पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।

मैंने पूछा, "क्यों रहमत कब आए?"

"कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ," उसने बताया।

मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"

वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, "ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?"

शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले" चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।"

वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।

मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ। इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, “'यह थोड़ा सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।“

मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, 'आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।' फिर ज़रा ठहरकर बोला, “आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी हैं। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।“

उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।

देखकर मेरी आँखें भर आईं। सबकुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहनें पहने मिनी शरम से सिकुड़ी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?”

मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।

मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? वह उसकी याद में खो गया।
मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, “रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।“

सोमवार, अक्टूबर 20, 2008

बास is हमेशा right.

एक बार मायावती, आडवाणी और लालू जी एक आटो मे सफर कर कही जा रहे थे। रास्ते मे एक दुर्घटना मे तीनो की मौत हो जाती है। यमलोक मे यमराज उनका इन्तजार कर रहे थे । वो पहले से तय कर चुके थे कि मायावती, आडवाणी को वे स्वर्ग मे और लालू जी को नरक मे भेजेगे। जब उन्होने अपना ये निर्णय तीनो को सुनाया तो लालू जी यमराज के इस निर्णय से संतुष्ट न थे। उन्होने से कहा महाराज आप इस तरह का भेदभावपूर्ण निर्णय क्यो ले रहे है? हम सभी ने जनता की सेवा कि है, घूस ली है, लोक सेवापद का दुरुपयोग किया है। फिर ये अन्याय मेरे हि साथ क्यो कर रहे है। मेरा मानना है कि आप किसी परीक्षा या ठोस आधार पर ये निर्णय ले।

यमराज मान गये और सभी कि अंग्रेजी कि परीक्षा लेने को कहा । मायावती जी को इन्डिया (India) का शब्द-विन्यास (spell) करने को कहा गया जो उन्होने आसानी से कर दिया। आडवाणी जी को इग्लैड का शब्द-विन्यास करने को कहा गया उन्होने भी आसानी से कर दिया। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी को चैकोस्लोवाकिया (Czechoslovakia) का शब्द-विन्यास करने को कहा गया। लालू जी का वैसे हि अंग्रेजी मे हाथ-मुँह तंग था तो उनसे चैकोस्लोवाकिया का शब्द-विन्यास ना हो सका और फेल होने पर मजबूर होना पडा।

लालू जी ने यमराज से कहा महाराज आप ने मुझसे कठिन सवाल पूछा जो सही नही था। आप कोई और परीक्षा ले ले। यमराज मान गये और इस बार हिन्दी कि परीक्षा लेने को कहा, लालू जी खुश थे कि हिन्दी कि परीक्षा तो वे आसानी से पास कर लेगे।

मायावती जी को कहा गया लिखो – “कुत्ता बोला भौ भौ “ उन्होने आसानी से लिख दिया। आडवाणी जी को कहा गया लिखो – “चिडिया बोली ची ची “ उन्होने भी आसानी से लिख दिया। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी को कहा गया लिखो – “ गधा दौडा तबडक तबडक”। दूबारा कठिन सवाल पूछा गया, इस बार भी फेल ।

लालू जी अब भी खुश न थे । इतिहास के छात्र होने के कारण लालू जी ने अन्तिम परीक्षा इतिहास विषय पर लेने को कहा । यमराज मान गये चलो लालू जी को एक अन्तिम मौका दे देते है लेकिन उन्होने लालू जी को बता दिया कि इसके बाद कोई अन्य परीक्षा नही होगी और लालू जी को इस परीक्षा का निर्णय मानना हि पडेगा।

मायावती जी से पूछा गया – भारत देश कब आजाद हुआ ? उन्होने उतर दिया महाराज 1947 मे। इस परीक्षा मे भी पास। आडवाणी जी से पूछा गया – जलियावाला बाग कत्लेआम के लिये कौन जिम्मेदार था? उन्होने उतर दिया महाराज जनरल डायर। वे भी इस परीक्षा मे भी पास। अब बारी लालू जी कि थी। लालू जी से पूछा गया - आप उन सभी लोगो के नाम बताओ जो जलियावाला बाग कत्लेआम मे मारे गये ?

लालू जी ने अपनी हार स्वीकार कर ली और नरक मे चल दिये ।

शिक्षा : अगर आपके बास को लगता है आपका दिमाग ठिक से काम नही करता है तो आपको इस तथ्य को स्वीकारना ही होगा और भविष्य मे आने वाले बदलावो के लिये तैयार रहना पडेगा । इस तथ्य से भागने का कोई तरीका नही है।
अंग्रेजी (English ) मे पढने के लिये यहा किलक करे ।

आ अब वापस आ जाये

नमस्कार चिटठाकार मित्रो आशा करता हू आप सब ठिक ठाक होगे और जिन्दगी के क्षणो का आनंद ले रहे होगे। अपने काम मै कुछ ज्यादा ही व्यसत होने के कारण ब्लाग जगत से नाता टुट सा गया था ।पर अब लगता है मुझे वापस आ जाना चाहिये। महिने मे एक आध ही पोस्ट सही अपनी उपस्थिती तो दरज करा हि सकते है। इस बहाने आप लोगो से भी नाता जुडा रहेगा ।

मंगलवार, सितंबर 04, 2007

“ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”

क्या आपने कभी गौर किया है कि किसी आफिस मे ज्यादा काम करने वाले को ही बास उसके काम के अलावा भी दूसरे काम क्यो पकडा देता है? क्यो वह शाम को 6:30 ( जो समय है उस दिन को बाय- बाय कहने का ) के बावजूद काम मे व्यस्त है? अगर बास उसे इतना हि भरोसेमंद समझता है तो क्यो उसको वेतन बढोतरी के समय रुलाया जाता है? जबकी उसके सहपाठी जो उस से कम या ना के बराबर काम करते है (क्योकि उन का ज्यादातर काम तो बेचारा वही करता है) मजे से आफिस सुख का आनंद ले रहे होते है, टेशंन फ्री होकर घूम रहे होते है, गप्पे लडा रहे होते है, हमउम्र के विपरित लिग वाले चोच लडा रहे होते है और वो बास के साथ झक छेत रहा होता है । इन सब सवालो का जबाब चाहिये तो आपको पगला कार्यसंस्कृति को विस्तार से समझना होगा। अब आप लोग कहेगे भइया ये होती क्या है? ये तो नरेन्द्र जी का हिन्दुस्तान दैनिक मे 17.08.07 को लिखा ये लेख पढ ले सबकुछ समझ मे आ जायेगा।

प्यार मे पागल होना रिस्की होता है । इसमे कामयाबी की संभावना कम होती है। लेकिन काम मे पागल होना शतप्रतिशत फलदायी होता है। पूरी सफलता की गारंटी । अपने आफिस मे आजमा कर देखिये। बडा साफ और सीधा फंडा है “ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ” । कार्यसंस्कृति का यह सिद्धांत बडा सरल है। जो जितना काम करेगा, उससे उतना ही काम करवाया जाएगा। ‘ए’ अगर बहुत अच्छा काम करता है बास ‘ए’ को ही काम करने के लिये कहेगा।

‘ए’ भले ही लंच मिस कर चुका हो और उसके पेट मे चूहे दौड रहे हो, उस के कानो मे तो बास की ये बात ही रहेगी कि ‘खूब बढिया से रेड्डी करवा दो बेटा, एकदम चकाचक’। अब ‘ए’ चाह्कर भी आफिस मे ‘बी’ कि तरह बेपरवाह ‘इडियन आयड्ल’ का फाईनल नही देख पाएगा। ‘पगला’ एक कार्यसंस्कृति है जिसे ‘बी’ ने अपना लिया है और इसी के साथ उस ने आफिस मे टेशन फ्री कैसे रहे का बोध हासिल कर लिया है। विस्तार से जान ना है कि ‘पगला कार्यसंस्कृति’ है क्या, तो पूरा सूत्र समझना होगा। आगे कहानी मे हम ‘ए’ को अगला और ‘बी’ को ‘पगला’ कहेगे। एक दिन जब बास ने ‘अगले’ को एक एसाइन्मेट दिया, तो काम सौपने का तरीका कुछ ऐसा था, मानो इसे ‘अगले’ के अलावा कोई कर ही नही सकता है… ‘अगला’ कोई चार घंटे तक प्यासे मन को डपट कर काबू मे रखने के बाद पानी पीने गया था कि इधर बास को उसकी जोरदार तलब हो गई। आग टाइप एक खबर आई और बास चीख पडे ‘अगला’ कहा गया उसे बुलाओ।

एक साथ दस ‘पगले’ ‘अगले’ के मोबाइल पर रिग करने लगे। दो-तीन ‘पगले’ तो चिल्लाते हुए दौड पडे – अभी-अभी पानी पीता हुआ दिखा था। एक ने तो ह्द कर दी। ‘अगले’ की बाह् पकडकर उसे लगभग धकेलते हुए बास के पास ले आया।

अत्यंत गौरवान्वित होते हुए कहा- बास ये काम ‘अगले’ के अलावा कोई कर ही न ही सकता। ‘अगले’ ने बास की पूरी बात सुने बिना हाँ कर दी- ‘समझ गया बास हो जाएगा, अभी हो जाएगा’। सारे ‘पगले’ ‘अगले’ को ढूँढ कर लौट चुके थे। उस ‘पगले’ की और ईष्यार्लु नजरो से देख रहे थे, जो ‘अगले’ को पकड लाया था। देख लो बास… अभी तक हाफ रहे है। ‘अगला’ काम मे लग गया था। लंच की जरुरत अब महसूस नही हो रही थी। पेट पानी से भर चुका था। ‘पगला’ ‘अगले’ को देख कर गा रहा था – जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम । मेरे ख्याल है आप भी दफ्तर मे काम करने का ये बेजोड नुस्खा समझ गए होगे – “ बने रहो पगला, काम करेगा अगला ”

नरेन्द्र जी का हिन्दुस्तान दैनिक मे लिखा ये लेख मुझे नेहरु पैलेस से कुछ सामान लेते हुए मिला। लेख पढा तो काफी अच्छा लगा और ज्ञानपूर्वक भी तो सोचा क्यो न आप लोगो तक भी कि ये बांटा जाये।

सोमवार, अगस्त 20, 2007

गुल्ली-डंडा (पिछले भाग से आगे )

पिछले भाग से आगे

बीस साल गुजर गए। मैंने इंजीनियरी पास की और उसी जिले का दौरा करता हुआ उसी कस्बे में पहँचा और डाकबँगले में ठहरा। उस स्थान को देखते ही इतनी मधुर बाल-स्मृतियॉँ हृदय में जाग उठीं कि मैंने छड़ी उठाई और क्स्बे की सैर करने निकला। ऑंखें किसी प्यासे पथिक की भॉँति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थीं; पर उस परिचित नाम के सिवा वहॉँ और कुछ परिचित न था। जहॉँ खँडहर था, वहॉँ पक्के मकान खड़े थे। जहॉँ बरगद का पुराना पेड़ था, वहॉँ अब एक सुन्दर बगीचा था। स्थान की काया पलट हो गई थी। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं उसे पहचान भी न सकता। बचपन की संचित और अमर स्मृतियॉँ बॉँहे खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थीं; मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जी होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गईं! मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ।
सहसा एक खुली जगह में मैंने दो-तीन लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखा। एक क्षण के लिए मैं अपने का बिल्कुल भूल गया। भूल गया कि मैं एक ऊँचा अफसर हूँ, साहबी ठाठ में, रौब और अधिकार के आवरण में।
जाकर एक लड़के से पूछा-क्यों बेटे, यहॉँ कोई गया नाम का आदमी रहता है?
एक लड़के ने गुल्ली-डंडा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा-कौन गया? गया चमार?
मैंने यों ही कहा-हॉँ-हॉँ वही। गया नाम का कोई आदमी है तो? शायद वही हो।
‘हॉँ, है तो।‘
‘जरा उसे बुला सकते हो?’
लड़का दौड़ता हुआ गया और एक क्षण में एक पॉँच हाथ काले देव को साथ लिए आता दिखाई दिया। मैं दूर से ही पहचान गया। उसकी ओर लपकना चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊँ, पर कुछ सोचकर रह गया। बोला-कहो गया, मुझे पहचानते हो?
गया ने झुककर सलाम किया-हॉँ मालिक, भला पहचानूँगा क्यों नहीं! आप मजे में हो?
‘बहुत मजे में। तुम अपनी कहा।‘
‘डिप्टी साहब का साईस हूँ।‘
‘मतई, मोहन, दुर्गा सब कहॉँ हैं? कुछ खबर है?
‘मतई तो मर गया, दुर्गा और मोहन दोनों डाकिया हो गए हैं। आप?’
‘मैं तो जिले का इंजीनिया हूँ।‘
‘सरकार तो पहले ही बड़े जहीन थे?
‘अब कभी गुल्ली-डंडा खेलते हो?’
गया ने मेरी ओर प्रश्न-भरी ऑंखों से देखा-अब गुल्ली-डंडा क्या खेलूँगा सरकार, अब तो धंधे से छुट्टी नहीं मिलती।
‘आओ, आज हम-तुम खेलें। तुम पदाना, हम पदेंगे। तुम्हारा एक दॉँव हमारे ऊपर है। वह आज ले लो।‘
गया बड़ी मुश्किल से राजी हुआ। वह ठहरा टके का मजदूर, मैं एक बड़ा अफसर। हमारा और उसका क्या जोड़? बेचारा झेंप रहा था। लेकिन मुझे भी कुछ कम झेंप न थी; इसलिए नहीं कि मैं गया के साथ खेलने जा रहा था, बल्कि इसलिए कि लोग इस खेल को अजूबा समझकर इसका तमाशा बना लेंगे और अच्छी-खासी भीड़ लग जाएगी। उस भीड़ में वह आनंद कहॉँ रहेगा, पर खेले बगैर तो रहा नहीं जाता। आखिर निश्चय हुआ कि दोनों जने बस्ती से बहुत दूर खेलेंगे और बचपन की उस मिठाई को खूब रस ले-लेकर खाऍंगे। मैं गया को लेकर डाकबँगले पर आया और मोटर में बैठकर दोनों मैदान की ओर चले। साथ में एक कुल्हाड़ी ले ली। मैं गंभीर भाव धारण किए हुए था, लेकिन गया इसे अभी तक मजाक ही समझ रहा था। फिर भी उसके मुख पर उत्सुकता या आनंद का कोई चिह्न न था। शायद वह हम दोनों में जो अंतर हो गया था, यही सोचने में मगन था।
मैंने पूछा-तुम्हें कभी हमारी याद आती थी गया? सच कहना।
गया झेंपता हुआ बोला-मैं आपको याद करता हजूर, किस लायक हूँ। भाग में आपके साथ कुछ दिन खेलना बदा था; नहीं मेरी क्या गिनती?
मैंने कुछ उदास होकर कहा-लेकिन मुझे तो बराबर, तुम्हारी याद आती थी। तुम्हारा वह डंडा, जो तुमने तानकर जमाया था, याद है न?
गया ने पछताते हुए कहा-वह लड़कपन था सरकार, उसकी याद न दिलाओ।
‘वाह! वह मेरे बाल-जीवन की सबसे रसीली याद है। तुम्हारे उस डंडे में जो रस था, वह तो अब न आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में।‘
इतनी देर में हम बस्ती से कोई तीन मील निकल आये। चारों तरफ सन्नाटा है। पश्चिम ओर कोसों तक भीमताल फैला हुआ है, जहॉँ आकर हम किसी समय कमल पुष्प तोड़ ले जाते थे और उसके झूमक बनाकर कानों में डाल लेते थे। जेठ की संध्या केसर में डूबी चली आ रही है। मैं लपककर एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी काट लाया। चटपट गुल्ली-डंडा बन गया। खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली। गुल्ली गया के सामने से निकल गई। उसने हाथ लपकाया, जैसे मछली पकड़ रहा हो। गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी। यह वही गया है, जिसके हथों में गुल्ली जैसे आप ही आकर बैठ जाती थी। वह दाहने-बाऍं कहीं हो, गुल्ली उसकी हथेली में ही पहूँचती थी। जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो। नयी गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली सभी उससे मिल जाती थी। जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, गुल्लियों को खींच लेता हो; लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा। फिर तो मैंने पदाना शुरू किया। मैं तरह-तरह की धॉँधलियॉँ कर रहा था। अभ्यास की कसर बेईमानी से पूरी कर रहा था। हुच जाने पर भी डंडा खुले जाता था। हालॉँकि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी। गुल्ली पर ओछी चोट पड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोबारा टॉँड़ लगाता। गया यह सारी बे-कायदगियॉँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गए। उसका निशाना कितना अचूक था। गुल्ली उसके हाथ से निकलकर टन से डंडे से आकर लगती थी। उसके हाथ से छूटकर उसका काम था डंडे से टकरा जाना, लेकिन आज वह गुल्ली डंडे में लगती ही नहीं! कभी दाहिने जाती है, कभी बाऍं, कभी आगे, कभी पीछे।
आध घंटे पदाने के बाद एक गुल्ली डंडे में आ लगी। मैंने धॉँधली की-गुल्ली डंडे में नहीं लगी। बिल्कुल पास से गई; लेकिन लगी नहीं।
गया ने किसी प्रकार का असंतोष प्रकट नहीं किया।
‘न लगी होगी।‘
‘डंडे में लगती तो क्या मैं बेईमानी करता?’
‘नहीं भैया, तुम भला बेईमानी करोगे?’
बचपन में मजाल था कि मैं ऐसा घपला करके जीता बचता! यही गया गर्दन पर चढ़ बैठता, लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिए चला जाता था। गधा है! सारी बातें भूल गया।
सहसा गुल्ली फिर डंडे से लगी और इतनी जोर से लगी, जैसे बन्दूक छूटी हो। इस प्रमाण के सामने अब किसी तरह की धांधली करने का साहस मुझे इस वक्त भी न हो सका, लेकिन क्यों न एक बार सबको झूठ बताने की चेष्टा करूँ? मेरा हरज की क्या है। मान गया तो वाह-वाह, नहीं दो-चार हाथ पदना ही तो पड़ेगा। अँधेरा का बहाना करके जल्दी से छुड़ा लूँगा। फिर कौन दॉँव देने आता है।
गया ने विजय के उल्लास में कहा-लग गई, लग गई। टन से बोली।
मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा-तुमने लगते देखा? मैंने तो नहीं देखा।
‘टन से बोली है सरकार!’
‘और जो किसी ईंट से टकरा गई हो?
मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला, इसका मुझे खुद आश्चर्य है। इस सत्य को झुठलाना वैसा ही था, जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने गुल्ली को डंडे में जोर से लगते देखा था; लेकिन गया ने मेरा कथन स्वीकार कर लिया।
‘हॉँ, किसी ईंट में ही लगी होगी। डंडे में लगती तो इतनी आवाज न आती।‘
मैंने फिर पदाना शुरू कर दिया; लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धॉँधली कर लेने के बाद गया की सरलता पर मुझे दया आने लगी; इसीलिए जब तीसरी बार गुल्ली डंडे में लगी, तो मैंने बड़ी उदारता से दॉँव देना तय कर लिया।
गया ने कहा-अब तो अँधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।
मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाए, इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा।
‘नहीं, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दॉँव ले लो।‘
‘गुल्ली सूझेगी नहीं।‘
‘कुछ परवाह नहीं।‘
गया ने पदाना शुरू किया; पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने दो बार टॉँड लगाने का इरादा किया; पर दोनों ही बार हुच गया। एक मिनिट से कम में वह दॉँव खो बैठा। मैंने अपनी हृदय की विशालता का परिश्च दिया।
‘एक दॉँव और खेल लो। तुम तो पहले ही हाथ में हुच गए।‘
‘नहीं भैया, अब अँधेरा हो गया।‘
‘तुम्हारा अभ्यास छूट गया। कभी खेलते नहीं?’
‘खेलने का समय कहॉँ मिलता है भैया!’
हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिराग जलते-जलते पड़ाव पर पहुँच गए। गया चलते-चलते बोला-कल यहॉँ गुल्ली-डंडा होगा। सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे। तुम भी आओगे? जब तुम्हें फुरसत हो, तभी खिलाड़ियों को बुलाऊँ।
मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस आदमियों की मंडली थी। कई मेरे लड़कपन के साथी निकले! अधिकांश युवक थे, जिन्हें मैं पहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा। आज गया का खेल, उसका नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया। टॉँड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बातें करती। कल की-सी वह झिझक, वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज न थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसेन प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह पदाया होता, तो मैं जरूर रोने लगता। उसके डंडे की चोट खाकर गुल्ली दो सौ गज की खबर लाती थी।
पदने वालों में एक युवक ने कुछ धॉँधली की। उसने अपने विचार में गुल्ली लपक ली थी। गया का कहना था-गुल्ली जमीन मे लगकर उछली थी। इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई है। युवक दब गया। गया का तमतमाया हुआ चेहरा देखकर डर गया। अगर वह दब न जाता, तो जरूर मार-पीट हो जाती।
मैं खेल में न था; पर दूसरों के इस खेल में मुझे वही लड़कपन का आनन्द आ रहा था, जब हम सब कुछ भूलकर खेल में मस्त हो जाते थे। अब मुझे मालूम हुआ कि कल गया ने मेरे साथ खेला नहीं, केवल खेलने का बहाना किया। उसने मुझे दया का पात्र समझा। मैंने धॉँधली की, बेईमानी की, पर उसे जरा भी क्रोध न आया। इसलिए कि वह खेल न रहा था, मुझे खेला रहा था, मेरा मन रख रहा था। वह मुझे पदाकर मेरा कचूमर नहीं निकालना चाहता था। मैं अब अफसर हूँ। यह अफसरी मेरे और उसके बीच में दीवार बन गई है। मैं अब उसका लिहाज पा सकता हूँ, अदब पा सकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया योग्य हूँ। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूँ।

गुल्ली-डंडा (मुंशी प्रेमचन्द्र )

हिन्दी के वरिष्ट तथा प्रतिष्टित कथाकारको मे एक नाम है मुंशी प्रेमचन्द्र का। मैनै मुंशी प्रेमचन्द्र की लगभग सभी रचनाओ को पढा है। उनकी रचनाओ को पढकर हि मै जान पाया कि क्यो उन्हे कहानी स्र्माट कहा जाता है।लगभग 11-12 साल कि उम्र मे मुझे उन की कहानी गुल्ली-डंडा पढने का मौका मिला। मुझे ये कहानी काफी अच्छी लगी क्योकि मै भी तब काफी गुल्ली-डंडा खेलता था। मुझे इस बात का आभास था कि इस खेल मे कितना मजा आता है। इस कहानी ने मुझे जहा एक तरफ गुल्ली डंडे कि हिन्दुतानिय्त का एह्सास तो दूसरी तरफ व वरगभेद का आभास कराया। मेरे लिये कहानी का हीरो गया था। कथानक जो 20 साल बाद इंजीनियर बनकर लौटता है और गया से गुल्ली-डंडा खेलने को कहता है तो वह ना चाह्ते हुए भी ना नही कर पाता । वह कथानक के खेल के दौरान लाख बेमानी करने पर भी शांत रहता है। कथानक को बाद मे इस बात का एहसास हो जाता है कि गया उस पर मेहरबानी कर रहा था। पर प्रेमचन्द्र जी कहानी का दूसरा पहलू यह दिखाना चाह्ते थे की गया के दिल मे कथानक के लिये मेहरबानी हि ना थी बगावत भी थी वरना क्यो वह दूसरे दिन मैच का इन्तज़ाम करके ये जाहिर करता कि उसे इस खेल मे कितनी महारत हासिल है। खैर ये सब का अलग अलग नजरिया है। कुछ की सहानुभूति गया के साथ तो कुछ की कथानक के साथ पर जो भी है आशा करता हूँ आप सब को यह कहानी जरुर पंसद आयेगी।

हमारे अँग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया।
विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैंकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता। यहॉँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रूपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाऍं, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो? ठीक है, गुल्ली से ऑंख फूट जाने का भय रहता है, तो क्या क्रिकेट से सिर फूट जाने, तिल्ली फट जाने, टॉँग टूट जाने का भय नहीं रहता! अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है, तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं, जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे। यह अपनी-अपनी रूचि है। मुझे गुल्ली की सब खेलों से अच्छी लगती है और बचपन की मीठी स्मृतियों में गुल्ली ही सबसे मीठी है।
वह प्रात:काल घर से निकल जाना, वह पेड़ पर चढ़कर टहनियॉँ काटना और गुल्ली-डंडे बनाना, वह उत्साह, वह खिलाड़ियों के जमघटे, वह पदना और पदाना, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, जिससे छूत्-अछूत, अमीर-गरीब का बिल्कुल भेद न रहता था, जिसमें अमीराना चोचलों की, प्रदर्शन की, अभिमान की गुंजाइश ही न थी, यह उसी वक्त भूलेगा जब .... जब ...। घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे वेग से रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं, अम्माँ की दौड़ केवल द्वार तक है, लेकिन उनकी विचार-धारा में मेरा अंधकारमय भविष्य टूटी हुई नौका की तरह डगमगा रहा है; और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ, न नहाने की सुधि है, न खाने की। गुल्ली है तो जरा-सी, पर उसमें दुनिया-भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा हुआ है।
मेरे हमजोलियों में एक लड़का गया नाम का था। मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा। दुबला, बंदरों की-सी लम्बी-लम्बी, पतली-पतली उँगलियॉँ, बंदरों की-सी चपलता, वही झल्लाहट। गुल्ली कैसी ही हो, पर इस तरह लपकता था, जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है। मालूम नहीं, उसके मॉँ-बाप थे या नहीं, कहॉँ रहता था, क्या खाता था; पर था हमारे गुल्ली-कल्ब का चैम्पियन। जिसकी तरफ वह आ जाए, उसकी जीत निश्चित थी। हम सब उसे दूर से आते देख, उसका दौड़कर स्वागत करते थे और अपना गोइयॉँ बना लेते थे।
एक दिन मैं और गया दो ही खेल रहे थे। वह पदा रहा था। मैं पद रहा था, मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते है; पदना एक मिनट का भी अखरता है। मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चलीं, जो ऐसे अवसर पर शास्त्र-विहित न होने पर भी क्षम्य हैं, लेकिन गया अपना दॉँव लिए बगैर मेरा पिंड न छोड़ता था।
मैं घर की ओर भागा। अननुय-विनय का कोई असर न हुआ था।
गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला-मेरा दॉँव देकर जाओ। पदाया तो बड़े बहादुर बनके, पदने के बेर क्यों भागे जाते हो।
‘तुम दिन-भर पदाओ तो मैं दिन-भर पदता रहँ?’
‘हॉँ, तुम्हें दिन-भर पदना पड़ेगा।‘
‘न खाने जाऊँ, न पीने जाऊँ?’
‘हॉँ! मेरा दॉँव दिये बिना कहीं नहीं जा सकते।‘
‘मैं तुम्हारा गुलाब हूँ?’
‘हॉँ, मेरे गुलाम हो।‘
‘मैं घर जाता हूँ, देखूँ मेरा क्या कर लेते हो!’
‘घर कैसे जाओगे; कोई दिल्लगी है। दॉँव दिया है, दॉँव लेंगे।‘
‘अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था। वह लौटा दो।
‘वह तो पेट में चला गया।‘
‘निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद?’
‘अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। मैं तुमसे मॉँगने न गया था।‘
‘जब तक मेरा अमरूद न दोगे, मैं दॉँव न दूँगा।‘
मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरूद खिलाया होगा। कौन नि:स्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए देते हैं। जब गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुझसे दॉँव लेने का क्या अधिकार है? रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं, यह मेरा अमरूद यों ही हजम कर जाएगा? अमरूद पैसे के पॉँचवाले थे, जो गया के बाप को भी नसीब न होंगे। यह सरासर अन्याय था।
गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा-मेरा दॉँव देकर जाओ, अमरूद-समरूद मैं नहीं जानता।
मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागना चाहता था। वह मुझे जाने न देता! मैंने उसे गाली दी, उसने उससे कड़ी गाली दी, और गाली-ही नहीं, एक चॉँटा जमा दिया। मैंने उसे दॉँत काट लिया। उसने मेरी पीठ पर डंडा जमा दिया। मैं रोने लगा! गया मेरे इस अस्त्र का मुकाबला न कर सका। मैंने तुरन्त ऑंसू पोंछ डाले, डंडे की चोट भूल गया और हँसता हुआ घर जा पहुँचा! मैं थानेदार का लड़का एक नीच जात के लौंडे के हाथों पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न की।

उन्हीं दिनों पिताजी का वहॉँ से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने की खुशी में ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिलकुल दु:ख न हुआ। पिताजी दु:खी थे। वह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्मॉँजी भी दु:खी थीं यहॉँ सब चीज सस्ती थीं, और मुहल्ले की स्त्रियों से घराव-सा हो गया था, लेकिन मैं सारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों में जीट उड़ा रहा था, वहॉँ ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे घर हैं कि आसमान से बातें करते हैं। वहॉँ के अँगरेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पीटे, तो उसे जेहल हो जाए। मेरे मित्रों की फैली हुई ऑंखे और चकित मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाह में कितना स्पर्द्घा हो रही थी! मानो कह रहे थे-तु भागवान हो भाई, जाओ। हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी।

मंगलवार, अगस्त 14, 2007

फिल्म समीक्षा - ‘चक दे इंडिया’

बहुत दिनो से कोई फिल्म नही देखी थी सोचा चलो आज ये काम भी कर लिया जाये। जीतू भईया ने तो ‘कैश’ देखने का मन बनाने के लिये पहले ही चेतावनी दे चुके थे और मेरा भी मारधाड और काल्पनिक विषय को झेलने का हौशला ना था। रह गई थी ‘चक दे इंडिया’ । बहुत सुना था इस फिल्म के बारे मे सोचा चलो आज आजमा लेते है वैसे भी किसी नये विषय मे बनी फिल्म थी। सच मानो फिल्म देखकर समय और पैसे कि पूरी वशूली हो गई ।

हॉकी हमारा राष्ट्रीय और देसी खेल है, लेकिन आज यह पिछड़ा हुआ खेल माना जाता है। पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय खेल हॉकी में हमारे देश की टीम का प्रदर्शन बेहद लचर है। इसकी वजह से यह खेल अपनी लोकप्रियता खो बैठा है। हॉकी एसोसिएशन के पदाधिकारियों की सोच रहती है कि चकला-बेलन चलाने वाली लड़कियाँ हॉकी क्या खेलेंगी, लेकिन निर्देशक ने कई दृश्यों के जरिये साबित किया है कि महिलाएँ किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं। इस खेल और देशभक्ति को आपस में सही अनुपात मिलाकर यशराज फिल्म्स ने इतने उम्दा तरीके से फिल्म बनाई है कि ‍सिनेमाघर में बैठकर दर्शक के अंदर देशभक्ति की भावनाएँ हिलोरे लेने लगती हैं। ना कोई फालतू की मार-धाड, ना फालतू के रोमांस कि खिचडि, ना कोई फालतू दृश्य या संवाद । पटकथा एकदम कसी हुई। दर्शक पहली फ्रेम से ही फिल्म में खो जाता है। छोटे-छोटे दृश्यों में कई बातें सामने आती हैं, जो निर्देशक और लेखक की सोच बयान करती हैं। कई बातें बिना संवादों के केवल दृश्यों के माध्यम से कहीं गई हैं। मसलन शाहरुख को खटारा स्कूटर पर बैठाकर निर्देशक ने भारत के श्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी की आर्थिक स्थिति बता दी है।

कबीर खान (शाहरुख खान) कभी भारतीय हॉकी टीम का कप्तान हुआ करता था। उसकी कभी दुनिया के श्रेष्ठ सेंटर फॉरवर्ड में गिनती हुआ करती थी। खेल के दौरान एक मामूली चूक के कारण उसे गद्दार मान लिया गया। आज उसकी कोई पहचान नहीं है। उसे कठिन चुनौतियाँ स्वीकारना अच्छा लगता है। उसके अंदर ‘जो नहीं हो सकता है, वहीं करना है’ जैसी भावनाएँ मौजूद है। अपने इस कलंक को धोने के लिए वह एक कठिन चुनौती स्वीकार करता है। वह महिला हॉकी टीम का कोच बनकर इस ‍टीम को विश्वविजेता बनाता है। भारतीय महिला हॉकी टीम को प्रशिक्षण देना बेहद कठिन है। इस टीम में कोई जोश नहीं है। अच्छा खेलने की चाहत नहीं है। भारत के लिए खेलने में जो गर्व महसूस होता है वह कभी इस टीम के खिलाडियों ने महसूस नहीं किया है। वे सिर्फ इसलिए खेल रही हैं ता‍कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें कुछ सरकारी लाभ मिलें।

महिला टीम होने के कारण इन्हें पुरुषों की छींटाकशी ‍का‍ शिकार भी होना पड़ता है। कबीर खान उन्हें सीखाता है कि 'जो महिला पुरुष को पैदा कर सकती है वह कुछ भी कर सकती है'। कोई भी मैच जीतने का स्वाद कैसा होता है। ट्राफी जीतकर उसे उठाने में कितना आनंद आता है। भारत के लिए खेलना कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। ‘चक दे इंडिया’ उस कबीर खान की कहानी है जिसे निचले पायदान वाली टीम को सँवारना है।
शाहरुख खान ने एक कलंकित खिलाड़ी और कठोर प्रशिक्षक की भूमिका को बखूबी निभाया है। वे शाहरुख खान नहीं लगकर कबीर खान लगे हैं। कई दृश्यों में उन्होंने अपने भाव मात्र आँखों से व्यक्त किए हैं। कलंक धोने की उनकी बेचैनी उनके चेहरे पर दिखाई देती है। उनकी टीम में शामिल 16 लड़कियाँ भी शाहरुख को टक्कर देने के मामले में कम नहीं रहीं। उनकी आपसी नोकझोंक और हॉकी खेलने वाले दृश्य उम्दा हैं। पंजाब और हरियाणा से आई लड़कियों का अभिनय शानदार है।फिल्म 2-3 गाने हैं, लेकिन वे पार्श्व में बजते रहते हैं। इन गीतों का उपयोग बिलकुल सही स्थानों पर किया गया है।

‘चक दे इंडिया’ के जरिये निर्देशक शिमित अमीन और लेखक जयदीप साहनी ने कई बातें कही हैं। जैसे

· हॉकी की हमारे देश में जो स्थिति है उसके लिये सिर्फ खिलाडियों को ही जिम्मेदार मानना सही नही है, उसके लिये हॉकी संघ में बैठे भ्रष्ट लोग भी उतने ही जिम्मेदार है।
· हॉकी खिलाड़ियों की आर्थिक स्थिति कैसी होती है। मसलन शाहरुख का खटारा स्कूटर पर बैठकर कोचिग देने जान भारत के श्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी की आर्थिक स्थिति बताती है।
· एक सच्चे देशभक्त मुस्लिम को हर समय संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। खेल के दौरान एक मामूली चूक के कारण कबीर खान को गद्दार मान लिया गया।
· महिला खिलाड़ियों को पुरुषों से कमतर आंका जाता है ऐसा समझा जाता है चकला-बेलन चलाने वाली लड़कियाँ हॉकी क्या खेलेंगी
· मिजोरम जैसे उत्तर-पूर्वी लोगों को हमारे देश का सदस्य नहीं माना जाता है।
· मै हिन्दू हूँ, यह मुस्लिम है, वह सिख है, सभी बोलते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि सबसे पहले वे भारतीय हैं।

मै तो इस फिल्म को 100 मे से 99 अंक दूँगा तथा आप लोगो से ‘चक दे इंडिया’ को देखकर आने कि अपील करुँगा अगर आप एक अच्छी फिल्म देखने के उदेश्य से सिनेमाहाल जाते है।

सोमवार, अगस्त 06, 2007

मित्रता दिवस - मैत्री पर्व

सभी चिट्ठाकार मित्रो को मित्रता दिवस कि हार्दिक शुभकामनाये। माफ करना चिट्ठाकार मित्रो नई नियुक्ति कि शुरुआती व्यक्ता तथा अपने को माहौल के अनुसार ढलने मे कुछ ज्यादा समय लगा । ये पोस्ट तो मेरे को कल पोस्ट करनी चाहिये थी पर समयाभाव के कारण न कर सका। तो हम बात कर रहे है मित्रता दिवस कि। आमतौर पर लोग इस तरह के दिवसो कि आलोचना करते है क्योकि उन्हे लगता है कि हमे इस तरह के दिवसो कि आवश्य्कता नही है। पर उन्हे क्या पता आजकल के भौतिकवादी, उपभोक्तावादी, मशीनी युग में वे यंत्रवत जीवन शैली में जिंदा है, पर जीने की अदा भूल चुके है। एक ठंडी आह और कसक के साथ हम सब चले जा रहे हैं, अपने कंधों पर अपने-अपने सलीब उठाए। जिस तरह से तमाम नजदिकी संबंध या खून के रिश्ते खत्म हो रहे है या ढोये जा रहे है सिर्फ दोस्ती वह रिश्ता है जिसका जज्बा आज भी वैसे ही बरकरार है। द्वंद्व और उलझनों से भरे जीवन में कुछ पल शांति और सुकून के मिलते हैं तो वह सिर्फ इस दोस्ती के दायरे में ही।

जिंदगी में खुशियों के रंग भरने वाला हसीन रिश्ता है - दोस्ती। इस प्यार भरे रिश्ते को सम्मान दिलाने के लिए अमेरिका में कुछ लोगों ने एक दिन दोस्ती के नाम करना तय किया। उनकी कोशिशें रंग लाईं और सन् 1935 में अमेरिका में अगस्त के पहले रविवार को आधिकारिक रूप से फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस) घोषित किया गया। पिछले 72 सालों में फ्रेंडशिप डे ने अमेरिका की सरहदों को लाँघकर पूरे विश्व में अपना स्थान बना लिया है। जिस तरह से दोस्ती का जज्बा हर दिल, हर देश में होता है, वह किसी जाति, कुल, धर्म, संप्रदाय या प्रांत कि मोहताज नही होती है। जब दोस्ती के रिश्ते के कोई नियम, कायदे-कानून नहीं होते तो इसके सम्मान में समर्पित मित्रता दिवस (फ्रेंडशिप डे) किसी देश या समाज मे कैसे बंध सकता है। इसलिये मित्रता दिवस भी दुनिया के हर मुल्क में मनाया जाने लगा है।

जिस तरह जोडियाँ स्वर्ग में बनने की बात लोग करते हैं, शायद सच्ची दोस्ती भी स्वर्ग में ही बनती होगी। इंसान जब जन्म लेता है तब उसे स्वयं नहीं पता होता कि वह किस जाति, कुल, धर्म, संप्रदाय या प्रांत का हिस्सा बनने जा रहा है। अपने जन्म के साथ ही वह माँ की कोख से अपने साथ लाता है सिर्फ 'रिश्ते', 'खून के रिश्ते' जैसे भाई-बहन, चाचा-ताऊ-मौसा-मामा जिन्हें वह चाहे तो भी बदल नहीं सकता, बना नहीं पाता, मिटा नहीं पाता। ये रिश्ते बँधे होते हैं मर्यादाओं, परंपराओं और परिस्थितियों की जंजीरों से। बँधना कोई नहीं चाहता। हर इंसान की सहज प्रवृत्ति होती है मुक्ति की चाह, अभिव्यक्ति की इच्छा और यहीं से प्रारंभ होता है एक अच्छे साथी की खोज का शायद यही कारण है कि लाख अच्छा वातावरण और परिवेश होने के बावजूद थोड़ा-सा भी स्वविवेक जागते ही हर व्यक्ति एक 'मित्र' की आकांक्षा में एक नए और अनजाने सफर पर निकल पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई नदी अपने उद्गम स्थल से निकलते ही पूरे उफान और वेग के साथ बह पड़ती है।

दुनिया मे कई एसे संबध होते है जिन का अस्तित्व समय के साथ खत्म हो जाता है पर दोस्ती वो जज्बा है जो हमेशा तरोताजा रहता है। ईश्वर ने ऐसे खूबसूरत रिश्ते की बागडोर पूरी तरह से हमारे हाथों में सौंप दी है, जिसके साथ हमारे जीवन की सारी खुशियाँ और सारे गम जुड़े होते हैं। ईश्वर ने हमें पूरी स्वतंत्रता दी है कि हम अपने दोस्त खुद बनाएँ और यह रिश्ता जैसे चाहे, वैसे निभाएँ।

दोस्ती, स्नेह, भावना, विचारधारा या अहसास की धरती से अंकुरित नहीं होती, अपितु इसकी नींव जरूरतों की पूर्ति पर टिकी होती है। सच्ची 'मित्रता' वह तो दुनिया के सारे रिश्ते-नातों से ऊपर है। यही वजह है कि इसमें उम्र, कुल, धर्म, संप्रदाय जैसे क्षेपक कभी नहीं लग पाते। यह आस्था और विश्वास का वह अंकुर होती है जो एक बार हृदय में प्रस्फुटित हुआ तो ताउम्र जीवन को सुरभित और सुवासित करता है। इसकी महक आपके व्यक्तित्व और रूह में रच-बस जाती है, इसीलिए परोक्षतः साथ न होने पर भी आपके मित्र की मित्रता सदैव आपके साथ-साथ चलती है। ऐसा साथ परिवार में मिलना मुश्किल है। कारण भी स्पष्ट है कि पारिवारिक रिश्ते 'निरपेक्ष' नहीं रह पाते। उनके पीछे एक अलग पृष्ठभूमि होती है जो बाधक न भी हो तो भी मित्रता की कसौटी पर सध नहीं पाती, क्योंकि सबके अपने-अपने विचार और मूल्य कहीं न कहीं आड़े ही आ जाते हैं। इसीलिए हमें जरूरत होती है एक ऐसे व्यक्ति की जो पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ हमारी अनुभूतियों का साक्षी बने, जो पूरी करुणा के साथ हमारी पीड़ा व दुःख के गहनतम क्षणों को हमारे साथ-साथ भोगे, जिसका स्नेह ऐसा हो कि जब वह बरसे तो मन की धरती से मुस्कुराहटों की कोपलें फूट पड़ें और जो हमारी भूलों पर आवरण न डालते हुए हमें आईना दिखाने के बाद स्वयं बाँहें पसार उनमें समा जाने का आमंत्रण दें। एक ऐसा साथ जो पूजा की तरह पवित्र व सात्विक हो और सर्वथा निर्विकार हो। ऐसा अपनत्व जो मन की गहराइयों को छूकर हमारी धमनी और शिराओं में हमें महसूस हो और हमारी हर धड़कन के साथ स्पंदित हो... यकीनन ये सब भावना के आवेग से उपजे शब्द प्रतीत हो सकतेहैं, मगर हर उस व्यक्ति को जिसकी जिंदगी में कोई सच्चा 'मित्र' रहा हो, उसे यह अपनी ही बात लगेगी।



मित्रता का शिल्प विश्वास से बना होता है और यह विश्वास इतना कमजोर कतई नहीं होता कि छोटे-छोटे झटके उसे बिखेर दें। सही मित्रता जीवन का प्रकाश पुंज होती है, साथ न रहने पर भी उसकी यादें आपकी राहों को रोशन करती हैं। इसलिए मैत्री पर्व के सुखद अवसर पर यही कामना करता हूँ कि दुनिया के तमाम दोस्तों की हथेलियाँ जुड़ी रहें और जहाँ मित्रता का सूर्य प्रकाशवान हो, ईश्वर करे वहाँ हम भी हों।

Source : Web Dunia

सोमवार, मई 07, 2007

वाकया जोशी जी का.............

किसी ने सच हि कहा है कि शिक्षा के दिन हमेशा हि याद आते है। चाहे वह स्कूली हो या कालेज के । कालेज के दिनो की कुछ शरारतें याद आती हैं - तो चेहरे पर अनायास मुस्कुराहट तैर जाती है। मै ऐसे हि एक वाकया का वर्णन करना चाहूँगा। यह बात तब की है जब मै बी. एस. सी. अन्तिम वर्ष मे था। फाइनल परीक्षा के मुश्किल से दो माह बचे थे। ये दो माह हमारे ग्रुप (तितर बटालियन) के लिये किसी युद्ध से कम नही होते थे। सारी ताकत झोक दी जाती थी इस युद्ध को जीतने के लिये क्योंकि साल के 8-9 माह तो मस्ती करने से फुरसत ही नही मिलती थी। कहने को टयूशन जाते थे पर लडकियो को घूरने या उनको छेडने से फुरसत मिले तब तो पढते। अगर उस से दिल न भरा तो निकल गये सिविल लाइनस( मुख्य बाजार) मे रही सही कसर उतारने । परीक्षा के दो माह मे हम दो या तीन लडके मिल कर एक ग्रुप बना कर कम्बाइन्ड स्ट्डी किया करते थे। मेरा एक दोस्त था सौरभ जोशी जी (जी का प्रयोग महानता दर्शाने के लिये व्यक्त किया गया है)। बेचारे बडे हि सीधे थे। इतने सीधे कि जब उन्होने कालेज मे प्रवेश लिया था तो उन से दो दिन पहले प्रवेश लिये हुए छात्र ने उन की रैगिग ले ली। लड़कियों के शब्द मात्र से उन की हवा खराब हो जाती थी। एक दिन मै और मेरा दोस्त रमैल राणा मेरे कमरे मे कम्बाइन्ड स्ट्डी कर अपने हथियार तेज कर रहे थे, जोशी जी आ धमके। उनका अगले दिन उनका मैट का पैपर था। बेचारे बडे परेशान थे क्योंकि उन्हे किसी का साथ नही मिल रहा था। हमारे ज्यादातर दोस्तो के परीक्षा स्थल शहर के आस पास लगे थे और जोशी जी का परीक्षा स्थल था देहरादून, रुड्की से लगभग़ 55 किलो मीटर दूर, वो भी प्रात:काल मे 9 बजे । सोच रहे थे कैसे जाया जायेगा क्योंकि इससे पहले शायद हि इतनी दूर परीक्षा देने गये हो। देहरादून मे अपना परीक्षा स्थल ढूँढना और वहाँ तक पहुचना तो उन के लिये मैट की परीक्षा से भी मुश्किल काम था । खैर मै और मेरे दोस्त ने अपनी तरफ से पूर्ण कोशिश का आश्वासन देकर जोशी जी को शाम को आने के लिये कहा और ये भी कहा कि अपनी तरफ से भी कोशिश करे किसी मुर्गे को ढूढने कि। हमने काफी कोशिश कि जोशी जी को किसी के साथ एड्जेस्ट करने कि, चाहे कालेज मे पढने वाले दोस्त हो या टयूशन मे पढने वाले मित्र सभी से मदद कि गुहार कि। पर क्या करे ज्यादातर दोस्तो ने अपने-अपने स्वभाव के अनुसार अपने पाट्नर पहले हि ढूँढ लिये थे ताकि खर्चे के दबाव का बराबर बँटवारा किया जा सके।

जोशी जी की हालत हमसे देखी नही जा रही थी क्योंकि एक मित्र को दुखी देखकर दूसरा कैसे खुश हो सकता है। हमारे एक मित्र थे अखिल उनके पास दुपहिया वाहन था। अब उन का जोशी जी से दूर- दूर तक का नाता नही था। अगर होता तो शायद हम उस नाते मदद करने कि दुहाई दे देते। हमने अपने मित्र रमैल से कहा यार तेरे को वो बाइक दे देगा जोशी जी को छोड आना क्योकि अगर वो बाइक दे भी देगा तो जोशी जी को तो चलाना आता नही था। तेरा सारा खाने पीने का व्यय जोशी देगा। जोशी जी मान गये। मरता क्या ना करता। मैने कहा परीक्षा सुबह 9 बजे से है अत; तुम्हें प्रात:काल मे 6 बजे निकलना होगा। जोशी को कहा रात को अपना बोरिया बिस्तर( मतलब स्ट्डी मटिरियल) ले आना मेरे यहाँ। महाशय पहुच गये सही समय पर क्योंकि समय पर पहुचना उन की खानदानी आदतो मे सुमार है। हम भी बैठे हि थे खाना खा कर झक छेतने। कुछ इधर उधर कि बाते करते करते जोशी जी और रमैल मे कुछ कहा सुनी हो गयी, कहा सुनी भी क्या नौबत आ गयी थी हाथापाई तक वो तो मै बीच बचाव मै आ गया वरना दोनो एक दूसरे के खुन के प्यासे हो गये थे। खेर रमैल मिया मेरे समझाने पर मान गये पर जोशी जी शायद लडने का मुड बना कर आये थे। शान्त होने का नाम ही न ही ले रहे थे। विनाशकाले विपरिते बुधे। मै उन्हे समझाने लगा तो मुझ से भी लडने लगे और चिरकुट- चिरकुट कहने लगे। मैने कहा जोशी जी बहुत हो गया मै चुप हूँ इस का मतलब यह मत समझो की मै अहिंसा का पुजारी हूँ कही ऐसा ना हो कि मै अपनी मर्यादा भूल जाऊ और आपको मटिया मेट कर दू। पर जोशी जी कि हिम्मत देखो माने नही। अब मैने सोचा क्यो ना हाथ के बजाय दिमाग का प्रयोग किया जाय । मैने कहा जोशी जी कल आप का पैपर है अगर आप अब शान्त ना हुए तो मै आपको सोने नही दूँगा । अगर आप सोयेगे नही तो आपको परीक्षा मे नीद आयेगी जिससे आपकी परीक्षा की ऐसी तैसी हो जायेगी। पर वो फिर भी ना माने। अब वो जैसी ही थोडा झपकी लेते मै जगा देता। जगकर फिर थोडी देर हमारी ऐसी तैसी करते हुए झपकी लेते में फिर जगा देता, मै फिर जगा देता। यह क्रम सुबह के 3 बजे तक चलता रहा। अन्त मे मैने कहा जोशी जी मान लेते है हम तीनो ही चिरकुट है। हम तीनो ही एक कोरे कागज पर अन्य दो गवाहों कि उपस्थिति मै ये लिखेंगे कि मै चिरकुट हूँ । मैने कहा पहले मै लिखता हूँ बाद मे रमैल लिखेगा और अन्त मे आप लिखना। जोशी जी मान गये। पहले मैने लिखा, फिर रमैल ने और अन्त मे जोशी जी ने। मैने अपना और रमैल का लिखा नोट तो फाड दिया जोशी जी का लिखा मेरे पास रह गया। जो नीचे है।





इस पत्र से बहुत लाभ उठाया हमने । इस पत्र को नष्ट करने के एवज में जोशी जी से कई फिल्मों को दीखाने के लिए धन जुटवाया, कई अन्य कम निकलवाये पर नष्ट नही किया । एक यही तो निशानी है जोशी जी कि हमारे पास ।

खैर अब तो जोशी जी MBA कर उतर चुके है व्यापार के अखाडे मै, पर है अभी भी चिरकुट ही। उनका लिखा नोट जब भी पडता हूँ आँखों के सामने उनका मासूम सा चेहरा घूमने लगता है।

शुक्रवार, अप्रैल 20, 2007

मेरी परिचय

नाम : गिरीश सिह,
जन्मतिथी :31 जनवरी 1983

इमेल: girish.singh एटदी रेट रेडिफमेल डाट काम
और girishsinghbisht एटदी रेट जीमेल डाट काम

जींवन के महत्वपूर्ण 21 साल, कहे तो जींदगी का एक अध्याय रूडकी मे बिताने के बाद लगभग 3 वर्षो से दिल्ली मे हूँ। रोजी रोटी जो कमानी है। कुछ सपने है जिन्हे पूरा करना चाहता हूँ। खेलो मे क्रिकेट, शतरंज फुटबाल पसंद करता हूँ। कम्प्यूटर गेम, चेटीग पर भी हाथ साफ है। थोडा बहुत किताबी कीडा भी हूँ पर वो बात अलग है कि आजकल तो समय नही पाता हूँ इस कार्य के लिये। इन्टरनेट पर जो पढ लिया वो ही काफी है। संगीत से काफी लगाव है। जगजीत सिह, किशोर, रफी, मुकेश और बर्मन दा के गाने ज्यादा पसंद करता हूँ।
अमिताभ बच्चन, शाहरूक खान, आशुतोष राणा पसंदीदा अभिनेता है। अभिनेत्रिया तो उम्र के साथ साथ बदलती रही। बचपन मे मधुबाला, रेखा पसंद थी कुछ समय के बाद ऐश, प्रिटी तत्पश्चात रानी ,प्रियंका और अब विघा बालान । कपडो मे जीन्स, टी-शर्ट पसंद करता हूँ। पर ज्यादातर साधारण वेशभुषा मे रहता हूँ। खाने मे चटपटा खाना पसंद करता हूँ। कभी-कभी कुछ नये व्यंजन वनाने की भी नाकाम कोशिश करता रहता हूँ। थोडा बहुत हाड ड्रिक का भी शौक पाल रखा है। पर अकेले मे कभी नही पीता हूँ। सही मे मै झूठ नही बोलता।
प्यार के मामले मे अब तक थोडा अनलक्की रहा हूँ, कारण शायद यही रहा होगा कि दिल के डिसीजन लेते समय मैने दिमाग को ज्यादा अहमियत दी। जींदगी के हाइवे पर काफी उतार चढाव देखे है। कभी खुशी का उजाला तो कभी दु:ख का अधेरा । अपनो को बैगाना एवं बैगानो को अपना बनते देखा है। एक संवेदनशील और कोआपरेटीव आदमी हूँ। जो कभी कभी एक कमजोरी भी लगती है,क्योकि आजकल ज्यादा कोआपरेटीवनेस दिखाते है तो लोग समझते है कि न जाने इसे क्या फायदा रहा है? और संवेदनशीलता तो लोगो को दिखावा लगती है।
दोस्तो मे काफी पसंद किया जाता हूँ। दुनिया को अपनी नजरो से देखना चाहता हूँ पर कम्बखत चश्मा बीच मे आ जाता है। किसी चीज से नफरत है तो वह है सुबह जल्दी उठना,बर्तन माझना और गन्दगी । पर क्या करे जब तक अकेले है तो इन चीजो से रोज दो-दो हाथ करने ही पडते है। मेरा मानना है कि जींदगी काफी छोटी होती है इसमे सिर्फ प्यार के लिये जगह होनी चाहिये,नफरत के लिये नही। वर्तमान एक उपहार है इसलिये तो अग्रेजी मे इसे present से उच्चारित करते है। मेरे हिसाब से काफी झक छेत ली मैने अपने बारे मे कुछ और पुछना हो तो मेल करे।

बुधवार, अप्रैल 04, 2007

48 वर्षो से नहाया ही नहीं

क्या आप यकीन करेंगे कि कोई व्यक्ति 48 साल तक बिना नहाये रह सकता है। लेकिन संबलपुर के धनेश्वर प्रधान की कहानी दूसरों से काफी हटकर है। उनकी उम्र इस समय लगभग 120 वर्ष है पर वे 48 वर्षो से नहाये नही है। है न कमाल कि बात? चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ऐसा करने वाले के शरीर में तरह-तरह की बीमारियाँ घर कर सकती हैं, लेकिन वे तो अभी भी भले-चंगे हैं। जीवन का शतकीय पारी खेल चुके प्रधान के बाजुओ मे अब भले हि पहले जितनी ताकत न हो, भले हि उन्हे लाठी का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन वे अपना सारा काम खुद ही करते हैं। 48 वर्षो से अब तक न नहाने का रहस्य धनेश्वर प्रधान ने खोला नहीं है। पर पूछे जाने पर पता चला कि उन्हें गर्मी के दिनों में भी ठंड लगती है और वे आग जलाकर तापने बैठ जाते हैं। ऐसे स्वाधीनता सेनानी पर अब तक सरकार की कोई दृष्टि नहीं पड़ी है और वे गुमनाम सी जिंदगी जी रहे हैं। पूरी खबर यहाँ पढे

मंगलवार, अप्रैल 03, 2007

खोता बचपन

आजकल के शहरी बच्चो के बचपन को देखकर मेरे मन मे अकसर ये खयाल आत है कि क्या इन्हे वो बचपन नसीब हो रहा है जिसके ये हकदार है। क्या इनके बचपन को इनके माता पिता या अभिभावको ने उनके भविष्य को सुरक्षित करने को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इनके वर्तमान का गला घोट दिया है। मै इस बात से इनकार नही करता कि आज कल के संघर्षपूण माहौल देख कर इनके जीवन की सीढी के पहले पायदान को मजबूत करने की जरुरत है पर बच्चो के बचपन को भी नजरअंदाज न करे।

ज्यादातर घरो मे एक या दो ही बच्चे होते है । वे तरह-तरह की सुविधाओ के बीच पल रहे है। घर पर खाना उनकी इच्छानुसार ही बनाया जाता है। उनसे किसी तरह का घरेलू कार्य नही कराया जाता है। उन्हे विघालय से लाने और ले जाने के लिय आरामदेह गाङिया या बसे होती है। पढने के लिये सुन्दर किताबे एव लिखने के लिये रंग-बिरंगी कापिया होती है। स्कूली वेशभूषायें एवं जूते-मोजे भी कई प्रकार के होते है। स्कूल मे भी उन्हे घर जैसी सुख-सुविधायें उपलब्ध होती है। बडे-बडे हवादार कमरे, तरह-तरह के खेलो के लिये मैदान, अच्छी बैठक व्यवस्था, अच्छी पुस्तकालय, विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्पर्धायें इत्यादि। फिर भी बच्चो के माता पिता या अभिभावको की यही शिकायत रहती है कि बस्ते के बोझ से बच्चो का बचपन दब रहा है। परीक्षाओं का भी बच्चो पर काफी दबाव होता है। इन शिकायतों के चलते परीक्षाओं को सरल और बस्ते के बोझ को कम करने की कवायद चलती रहती है। परीक्षाओं को सरल करने के लिये कभी ग्रेड देकर काम चला लिया जाता है, तो कभी मौखिक या मासिक परीक्षाओं के परिणाम को देखकर दुसरी कक्षा मे भेज दिया जाता है।

बच्चो को बचपन से ही कुछ बनने के लिये प्रेरित किया जाता है। उनके सर्वागीण विकास के लिये मंह्गे खेलो से सम्बंन्धित विभिन्न संस्थाओं मे प्रवेश दिला दिया जाता है। मार्ग दर्शन के लिये अच्छे कोच नियुक्त किये जाते है। अब बच्चे बडे दिनो या गरमी की छुट्टियॉ खेलने-कूदने मे जाया नही करते बल्कि उन्हे विभिन्न प्रकार की हाबी क्लासो मे प्रवेश दिला दिया जाता है। गुल्ली डंड़े, कंच्चो,पतंग बाजी, छुपन्न-छुपाइ जैसे खेलो का स्थान हिंसक कम्पयूटर गेम्स एवं विडियो गेम्स ने ले लिया है। मेलो या हाट के बारे मे शायद हीं किसी को पता हो। बच्चे तो सिर्फ जूँ , वाट्ररपार्क जैसी जगहें जाना पसंद करते है। क्योंकि वो सिर्फ उन्ही के बारे मे जानते है। बच्चो पर इन तथाकथित सुख-सुविधाओ के साथ तनाव अनजाने ही लादा जाता है। रिश्ते नाते नही, दोस्त नहीं, मन भर का खेल नही, ज्यादा घूमना फिरना नही, और तो और भरपूर नीद को भी तरस जाते है ये बच्चे। दिन भर स्कूल मे, घर आकर होमवर्क, ट्यूशन और ट्यूशन वर्क मे ही दिन-रात गुजर जाते है। इन सब मे बचपन, बचपन की चंचलता, मस्ती दफन हो जाती है। इस कारण बच्चे कई बार अतृप्त, दुखी, उदास, चिड़चिडे, सबसे खफा से दिखाई देते है।

दसवी मे प्रवेश करते ही उस का सारे जग से रिश्ता तुड्वा दिया जाता है। न दोस्तो से मिलना, न घूमना-फिरना, न खेलना। घर को सोने का पिजरा बना दिया जाता है। 12वी का वर्ष तो अतिदक्षता को प्राप्त करने का वर्ष होता है। 12वी की पढाई के साथ-साथ विभिन्न करियर संबधी होने वाली परीक्षाओं का दबाव अलग से होता है। बच्चो के माता पिता या अभिभावक उन्हे वो बनाना चाह्ते है जो वे खुद न बन सके। सब कुछ हासिल करना ही जीवन का उदेश्शय बना दिया जाता है। जिसके कारण जीवन मे असफलता, अपयश के कटु अनुभवो को स्वीकारना उनके लिय अत्यन्त कठिन हो जाता है।

हमारा बचपन था जब हम कई तरह के अभावो मे जीते थे। हम घर के काम को अपनी जिम्मेदारी समझते थे, एक जोडी यूनिफार्म एव एक जोडी जूते-जुराब साल भर घिसते । किसी त्योहार पर अगर रात को 9 बजे तक घूमने कि आज्ञा मिलने पर स्वत्रंतत्रा का अनुभव करते, कुल्फी या आईसक्रिम मिलने पर आनंदित होते। रोटी के जगह पराठे मिलने पर माँ को धन्यवाद देते। जन्मदिन पर माता पिता के आशिर्वाद से तृप्त होना, विभिन्न संस्कारो वाला बचपन कितना सुखी था।

रिश्तो की मह्क से महकता, संस्कारो से जडा, आभावो मे भी जीवन को जीना, हर परिस्थिती का मुकाबला करना, जो मिल गया उसी मे सुखी होना, हार-जीत, सफलता-असफलता को समझना, यश- अपयश को स्वीकारना यही तो सीखा है हमने अपने बचपन से जो शायद आज की पीढी को नसीब नही हो रहा है।

शुक्रवार, मार्च 30, 2007

एक कहानी

आज हम चिट्ठाकार मित्रो को एक कहानी सुनाते है। यह कहानी अच्छी हि नही बल्कि हमारे सामाजिक जीवन एवम पैशे के लिये भी महत्वपूर्ण है। तो शुरु करे । एक धोबी महाशय होते है, जिनके पास दो गधे होते है। गधा अ ओर गधा स । अ का मनना था कि वह बहुत फुर्तीला और हर कार्य को स से अच्छा कर सकता है। वह हमेशा धोबी का विश्वासपात्र और चहेता बनना चाहता था इस कारण वह ज्यादा बोझ उठाने तथा धोबी के साथ चलने की कोशिश करता। बेचारी स बहुत सीधा और साधारण विचारो का था। वह अपनी क्षमता के हिसाब से बोझ उठाता एवं औसत चाल से चलता। अ के कार्य को देखकर धोबी ने स पर अ के बराबर कार्य करने के लिये दबाव डालना शुरू कर दिया। स ने भी थोडी बहुत कोशिश की परन्तु ज्यादा सफल न हो सका। इस कारण वह हमेशा की मार खाता।
बेचारा स काफी दुखी था उसने अ से विन्रमतापूर्वक प्रार्थना कर कहा प्रिय मित्र यहा पर सिर्फ हम दो ही है इसलिये क्यो एक दूसरे से आगे निकलने के लिये दौड करे। आपको ज्ञात है कि मैं ज्यादा बोझ उठाने मे असर्मथ हूँ। हम बराबर बोझ उठाते है और औसत चाल से चले। परन्तु अ कहा मानने वाला था। अगले दिन अ ने ईष्या के कारण और दिन की अपेक्षा थोडा ज्यादा वजन उठाया और अपनी रफ्तार भी बढा दी। स ने भी थोडी बहुत कोशिश की परन्तु ज्यादा सफल न हो सका। स के कार्य को देखकर धोबी काफी खफा था। बेचारा स नित्य मार खाता रहता। अ यह देखकर काफी खुश होता। एक दिन स अत्यधिक मार से चल बसा। अ अपने आप को सर्वोच समझने लगा पर कुछ समय पश्चात ही उसका यह भ्रंम टूट गया। अब उसे स का भी कार्य करना पडता वो भी दोहरे रफ्तार से। अत्यधिक कार्य करने के कारण बेचारा बिमार पड गया। अब उससे ज्यादा नही उठता था और रफ्तार मे भी कमी आ गयी थी। स के कार्य करने की क्षमता मे गिरावट देखकर धोबी को काफी गुस्सा आता। धोबी ने स से भी मार मार कार्य कराना शुरू कर दिया। स अपने कार्य करने की क्षमता को न बढा सका और एक दिन ने धोबी उसे लात मारकर चला गया नये गधे ढूढने।
यहा पर इस कहानी का अन्त नही है पर इस से हमे व्यवसायिक और सामाजिक शिक्षा मिलती है कि हमे अपने सभी साथियो को समान समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति कि अपनी क्षमता होती है। कभी भी अपने स्वामी के आगे जरूरत से ज्यादा दिखावा नही करना चाहिए और न ही साथियो को दबाव मे देखकर प्रसन्न होना चाहिए। इस बात से कोई फर्क नही पडता आप अ हो या स लेकिन आप अपने स्वामी के लिये गधे हो। आखिर मैं यही कहना चाहूगा कि जरूरत से ज्यादा काम करने की कोशिश न करे बल्कि काम को चतुराई से करे। सफलता कोई नियत स्थान नही है बल्कि एक यात्रा है। आशा करता हूँ आप लोग इस कहानी से कुछ सीख जरूर लेगे।