शुक्रवार, मार्च 09, 2007

फिल्म समीक्षा - निशब्द

अधेड उम्र के पुरूष या महिला का अपनी बेटा/बेटी के उम्र के लडके/लडकी के साथ प्यार, आकषर्ण भारतीय दर्शको के लिये कोई नया विषय नही है। निशब्द से पहले भी कई फिल्मे इस विषय पर बन चुकी है जैसे दूसरा आदमी, लम्हे, लीला, तुम, छोटी सी लव स्टोरी और जांर्गस पार्क। इन फिल्मो मे इस तरह के रिश्ते की पेचदीगियो और उनके भावो को परदे पर दर्शाने का प्रयास किया गया था। पर क्या भारतीय दर्शक इस विषय पर बनी फिल्म देखने के लिये मानसिक रूप से तैयार है? पर मानना पडेगा रामगोपाल वर्मा को जिन्होने इस संवेदनशील को चुना और बडी शिद्रदत के साथ पर्दे पर उतारा भी है। इस फिल्म के जरिये उन्होने साबित कर दिया है कि वो संवेदनशील विषयो पर भावुक फिल्मे बना सकते है। बहुत से लोग इसे एडरिन लापन की "लोलिता" की कांपी बताते है पर ऐसा कुछ नही है, केवल समानता है तो सिर्फ विषय कि और कुछ नही।

फिल्म कि शुरूआत होती है विजय (अमिताभ बच्चन, ज्यादातर फिल्मो मे उनका यही नाम होता है) से, जो पेशे से एक वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर है। अपनी पत्नी रेवती और बेटी रितु (श्रद्धा आर्य) के साथ एक हिल स्टेशन मे रहते है। एक बार की सहेली जिया (जिया खान) उसके साथ छुटटीया बिताने उसके घर आती है। तलाकशुदा माँ बाप की बेटी जिया भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर है। विजय से पहली ही मुलाकात मे जिया उसकी तरफ आर्कषित हो जाती है। इसे पहली नजर का प्यार कहो या विपरिताकर्षण । दोनो एक दूसरे कि तरफ खीचे चले जाते है। विजय को अपने प्यार को व्यक्त करने के लिये शब्द ही नही मिलते। वह अपनी भावना को करने मे खुद को दोषी महसूस करता है। इस कारण वह आत्महत्या के बारे मे भी सोचता है। वह असंमनजस मे है। एक तरफ उसकी भावनाए है, तो दूसरी तरफ जिम्मेदारी। जैसा कि होता ही है प्यार छुपाये नही छुपता। रितु को अपने पिता और जिया के प्यार के बारे मे पता लग जाता है। तब आता है सब के जींवन मे सुनामी जैसा कहर। विजय को अपने दंद्ध एव जिम्मेदारी की के बीच फैसला लेना पडता है और जिम्मेदारी की जीत होती है । विजय, जिया को अपने घर से निकल जाने का आदेश देते है पर इस से पहले अपनी पत्नी और बेटी के सामने जिया से प्यार को स्वीकारते है। जिया चली जाती है और विजय अपनी यादो मे जिया को बसाए हुए है। इसी के साथ फिल्म खत्म हो जाती है ।

फिल्म ठीक-ठाक बन पडी है पर फिल्म की गति बहुत धीमी है। इन्टरवल के बाद तो और भी 2-3 पंचर हो जाते है। अमित राय की सिनेमेट्रोग्राफी काफी बेहतरीन है, मन्नार के चाय के बागान एव हरी भरी वादीयो को अच्छी तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म में संगीत दिया है विशाल भारद्वाज और अमर मोहिले ने और बोल लिखे हैं फरहद, साजिद ने। इसमें बिग बी और जिया खान ने खुद ही गाने गाए है। पाश्र्वसंगीत भी अच्छा है। थोडी मेलोडी के बीच मे स्वर ध्वनिया अधिक कारगर लगती है। लगता है लेखक महाशय कहानी के बीच मे कही उलझ गये थे जिस कारण फिल्म के मध्य भाग मे ठहराव सा प्रतीत होता है। संवाद द्रश्यो को अच्छी तरह से न फिल्मा पाना भी नकारात्मक असर डालता है। अभिनय के मामले मे अमिताभ बच्चन तो कमाल करते ही है। आँखो से अपना सारा दर्द ब्यान करने मे सफल हुए है। जिया ने भी अच्छा अभिनय किया है। रेवती, श्रद्धा आर्य, नासीर ने अपने कार्य के साथ न्याय किया है। सब कुछ मिलाकर फिल्म को देखा जा सकता है अगर आप इस विषय के अनकहे दर्द को झेलना चाहते है तो। और हाँ फिल्म को देखने के बाद अपनी प्रतिक्रिया लिखना मत भुलना।

1 टिप्पणी:

manya ने कहा…

मुझे तो ये फ़िल्म बहुत अच्छी लगी और ये भी लगा की निर्देशक जो दिखाना चाहते थे वो द्वंद काफ़ी अच्छी तरह चित्रित हुआ है.. समझ में आती है अमिताभ की पीङा और ज़िया खान की उमर और हालात की वजह से अमिताभ कि तरफ़ आकर्षित होना.. मुझे बहुत खुब्सूरत लगे सारे भाव और ईमान्दार भी .. रही बात भारतीय मानसिकता की तो वो अब नहीं बद्लेगी तो कब बदलेगी.. जो दिखाया गया है वो इतना असामान्य नहीं है.. सही ज़िंदगी में भी ऐसा हो सकता है.. या होता भी होगा कई लोगों के साथ बस हम अपने भाव नहीं दिखाते समाज के डर से.. ये फ़िल्म देखना जरूरी है ऐसे रिश्तों पर अपनी राय बदल्ने को..